रविवार, 27 अक्टूबर 2013

बच्चों को मिट्टी में खेलने दीजिए

 छोटे बच्चों के घुटने चलने के साथ ही उनके आसपास एक ऐसा परिवेश तैयार हो जाता है, जो हर समय उन पर निगरानी रखता है कहीं बच्चा गिर न जाए, वह कुछ खा न ले। यह सर्तकता तो अच्छी बात है, मगर आजकल पैरेन्ट्स अपने नन्हे को घुटने चलने के दौरान उसके जमीन से संपर्क करने से परहेज करते हैं। नीचे डस्ट का खतरा, बाहर जाने पर भी धूल-मिट्टी के डर से उसे स्वतंत्र रूप से खेलने ही नहीं दिया जाता। बिस्तरों पर या कालीन पर एक बच्चा कब तक रह सकता है, उसे भी खुद के विकास के लिए एक स्वतंत्र माहौल चाहिए होता है, जिसे वह बेहतर तरीके से जान सके और उसमें घुल-मिल सके। हर चीज को जानने की उसकी जिज्ञासा बाहरी परिवेश में पहुंचकर ही शांत होती है। यदि आप भी बच्चे को सही परिवेश नहीं देते हंै, तो जान लीजिए आप उससे उसका बचपन छीन रहे हैं।
हाल ही में ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में हुए एक नए शोध में खुलासा हुआ है कि बच्चों को इस तरह बाहरी परिवेश में घुलने-मिलने न देने की वजह से उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। प्रमुख शोधकर्ता सुजेन वांग का मानना है कि बचपन में बैक्टीरिया और वायरस रहित वातावरण आगे जाकर हाई ब्लड प्रेशर और उससे संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि बचपन के दौरान शरीर में ऐसे 'ह्यूमन फ्रेंडली" बैक्टीरिया विकसित होते हैं, जो कई बीमारियों से लड़ने में बच्चे की मदद करते हैं और बच्चा स्ट्रॉन्ग बनता है। यही वजह है कि धूल-मिट्टी के बीच पलने-बढ़ने वाले ग्रामीण बच्चों को शहरी बच्चों के मुकाबले प्रदूषण और अन्य चीजों से बहुत कम एलर्जी होती है।
इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि आप बच्चे को चाहें जहां खेलने के लिए छोड़ दें। बस यह जरूरी है कि उसे अपने बचपन की हर वह खुशी लेने दीजिए जो उसे घर के आंगन में भागकर, गार्डन में फूलों की खुशबू के बीच दौड़ते हुए, फिसलपट्टियों से फिसलते हुए और बढ़ती उम्र के साथ घर-घर गुल्ला खेलते हुए, मिट्टी के खिलौने बनाने में मिलती है।  आपने कभी गौर किया है जब बच्चे पेंटिंग बनाते हैं तो वे अधिकांशत: उन्हीं चीजों का चित्रण करते हैं जो बातें बचपन में उनके मस्तिष्क पटल पर अंकित हो जाती है।  

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