धर्मेंद्र सिंह राजावत
गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधeनी में आयोजित होने वाली परेड में
राज्य की झांकियों के साथ ही सेना और पुलिस बल के जवान अपने जौहर दिखाते
हैं। युवा इस परेड पर सवाल खड़े करते हुए पूछता है कि आखिर परेड और हकीकत
में इतना अंतर क्यों? पुलिस के जवान जो जौहर परेड में दिखाते हंै, उनको
असल जिंदगी में क्यों नहीं।
बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला शुभम सवाल करता कि देश की राजधानी में सड़क
पर दौड़ती बस में गैंग रेप हो जाता और पुलिस कुछ नहीं कर पाती। सरहद पर
जवानों के सिर कलम हो जाते हैं और हमारी सेना सरकार का मुंह ताकती रहती।
चारा, 2-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और कोयले के साथ ही न जाने कितने
घोटाले हो जाते हैं, पर ज्यादातर आरोपी आजाद घूमते रहते हैं। आखिर ऐसा
क्यों?
पुलिस में भर्ती होने के लिए इंदौर में तैयारियां कर रहा भरतराज पाण्डे
के मन में भी कई सवाल हैं। वह कहता है कि नेता और अफसर भ्रष्टाचार में
बदस्तूर डूबते जा रहे है, मगर कोई सुनने वाला नहीं। महंगाई आसमान छू रही
पर कोई रोकने वाला नहीं। बिना सुरक्षा और बिना भोजन के कैसा और कौन सा
गणतंत्र। आखिर कौन-सा नेता और कौन-सा अधिकारी है, जो आम आदमी की सुनता है
और उसकी समस्या का तत्काल समाधान करता है। शायद कोई नहीं। और न ही कोई
ऐसी जगह है, जहां उसकी समस्या का तत्काल समाधान हो जाए। तो फिर कहां है
गणतंत्र। सरकार और नेता जो बताने और दिखाने की कोशिश करते हैं, उस पर अमल
करें तभी सही मायने में गणतंत्र बनेगा।
गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधeनी में आयोजित होने वाली परेड में
राज्य की झांकियों के साथ ही सेना और पुलिस बल के जवान अपने जौहर दिखाते
हैं। युवा इस परेड पर सवाल खड़े करते हुए पूछता है कि आखिर परेड और हकीकत
में इतना अंतर क्यों? पुलिस के जवान जो जौहर परेड में दिखाते हंै, उनको
असल जिंदगी में क्यों नहीं।
बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला शुभम सवाल करता कि देश की राजधानी में सड़क
पर दौड़ती बस में गैंग रेप हो जाता और पुलिस कुछ नहीं कर पाती। सरहद पर
जवानों के सिर कलम हो जाते हैं और हमारी सेना सरकार का मुंह ताकती रहती।
चारा, 2-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और कोयले के साथ ही न जाने कितने
घोटाले हो जाते हैं, पर ज्यादातर आरोपी आजाद घूमते रहते हैं। आखिर ऐसाक्यों?
पुलिस में भर्ती होने के लिए इंदौर में तैयारियां कर रहा भरतराज पाण्डे
के मन में भी कई सवाल हैं। वह कहता है कि नेता और अफसर भ्रष्टाचार में
बदस्तूर डूबते जा रहे है, मगर कोई सुनने वाला नहीं। महंगाई आसमान छू रही
पर कोई रोकने वाला नहीं। बिना सुरक्षा और बिना भोजन के कैसा और कौन सा
गणतंत्र। आखिर कौन-सा नेता और कौन-सा अधिकारी है, जो आम आदमी की सुनता है
और उसकी समस्या का तत्काल समाधान करता है। शायद कोई नहीं। और न ही कोई
ऐसी जगह है, जहां उसकी समस्या का तत्काल समाधान हो जाए। तो फिर कहां है
गणतंत्र। सरकार और नेता जो बताने और दिखाने की कोशिश करते हैं, उस पर अमल
करें तभी सही मायने में गणतंत्र बनेगा।

