गुरुवार, 21 मार्च 2013

जो दिखाते हैं वह धरातल पर चाहिए

धर्मेंद्र सिंह राजावत
गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की राजधeनी में आयोजित होने वाली परेड में
राज्य की झांकियों के साथ ही सेना और पुलिस बल के जवान अपने जौहर दिखाते
हैं। युवा इस परेड पर सवाल खड़े करते हुए पूछता है कि आखिर परेड और हकीकत
में इतना अंतर क्यों? पुलिस के जवान जो जौहर परेड में दिखाते हंै, उनको
असल जिंदगी में क्यों नहीं।
बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला शुभम सवाल करता कि देश की राजधानी में सड़क
पर दौड़ती बस में गैंग रेप हो जाता और पुलिस कुछ नहीं कर पाती। सरहद पर
जवानों के सिर कलम हो जाते हैं और हमारी सेना सरकार का मुंह ताकती रहती।
चारा, 2-जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ और कोयले के साथ ही न जाने कितने
घोटाले हो जाते हैं, पर ज्यादातर आरोपी आजाद घूमते रहते हैं। आखिर ऐसा
क्यों?
पुलिस में भर्ती होने के लिए इंदौर में तैयारियां कर रहा भरतराज पाण्डे
के मन में भी कई सवाल हैं। वह कहता है कि नेता और अफसर भ्रष्टाचार में
बदस्तूर डूबते जा रहे है, मगर कोई सुनने वाला नहीं। महंगाई आसमान छू रही
पर कोई रोकने वाला नहीं। बिना सुरक्षा और बिना भोजन के कैसा और कौन सा
गणतंत्र। आखिर कौन-सा नेता और कौन-सा अधिकारी है, जो आम आदमी की सुनता है
और उसकी समस्या का तत्काल समाधान करता है। शायद कोई नहीं। और न ही कोई
ऐसी जगह है, जहां उसकी समस्या का तत्काल समाधान हो जाए। तो फिर कहां है
गणतंत्र। सरकार और नेता जो बताने और दिखाने की कोशिश करते हैं, उस पर अमल
करें तभी सही मायने में गणतंत्र बनेगा।

इंतजार कर करिए वार

धर्मेंद्र सिंह राजावत

पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, बिजली और सब्जी के साथ ही अन्य वस्तुओं की
कीमतों में बदस्तूर बढ़ोतरी जारी है। सरकार जब-जब बढ़ोतरी करती है तभी
तत्काल रिऐक्शन के तौर पर लोग सड़कों पर उतरकर उसके खिलाफ गुस्सा जाहिर
करते हैं। दूसरा, जब-जब नेताओं और अफसरों द्वारा किए गए घोटाले और
भ्रष्टाचार की पब्लिक को जानकारी मिलती है, वह तुरंत सड़क पर उतरकर उसके
खिलाफ प्रदर्शन करने में जुट जाती है। इसके बाद वह घर लौटकर अपने काम में
व्यस्त हो जाती है। दरअसल, वह इससे ज्यादा कुछ करने की स्थिति में भी
नहीं होती। लेकिन, उनको इंतजार करना चाहिए और जब सरकार के बजाय उसकी बारी
(चुनाव) आए तो सरकार से हिसाब बराबर कर लेना चाहिए। एक पार्टी या नेता के
लिए जब सबक बनेगा तो दूसरा गलती से भी गलती नहीं करेगा। न महंगाई को
बेकाबू करने की और न भ्रष्टाचार या घोटाला करने की।
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घटनाएं जो सवाल खड़े करतीं हैं

धर्मेंद्र सिंह राजावत

पीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप
सिंचाई, चारा, टू-जी स्पेक्ट्रम, विकलांग और कॉमनवेल्थ गेम्स के साथ ही न
जाने कितने घोटाले के आरोप नेताओं पर लगे हैं, मगर पिछले दिनों जब
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कोयला घोटाले की कालिख उड़ेली गई तो सारा देश
स्तब्ध रह गया। अब सभी के मन में एक ही सवाल बार-बार उभर रहा है कि आखिर
देश की परवाह किसे है। कौन देश का भला सोच रहा है।
दिल्ली गैंग रेप
देश की राजधानी में चलती बस में एक युवती के साथ जो हुआ, वह सोचने पर
मजबूर कर रहा है कि हम किस तरह के गणतंत्र में जी रहे हैं। इसके बावजूद
सरकार ने आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। हालांकि, वर्मा कमेटी ने काफी

सख्त सिफारिशें कीं हैं, मगर वह प्रभावी हो पाएंगी यह वक्त बताएगा।
जवानों का सिर कलम
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की सेना हमारे जवानों के सिर कलम कर ले जाती है और
देश के प्रधानमंत्री उस पर प्रतिक्रिया देने में कई दिन गुजार देते हैं।
इसके बाद चेतावनी देते हैं, पर कार्रवाई नहीं करते। अलबत्ता, पाकिस्तान
संघर्ष विराम का बदस्तूर उल्लंघन कर गोलीबारी करता रहता है।
शिंदे ने फोड़ा बयान का बम
पाक सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों की नृशंस हत्या से जब देश के लोग रोष
में थे, तभी देश के गृहमंत्री ने हिंदू आतंकवाद पर बयान देकर नया बखेड़ा
खड़ा कर दिया। उनके बयान से देश को लाभ हुआ या नहीं मगर सरहद पार बैठे
मुंबई हमले के आरोपी ने इसका जरूर फायदा उठाया। सुशील कुमार शिंदे के
बयान के सहारे उसने हिंदुस्तान को ही आंदकवाद का पोषक करार दे दिया।
लाखों का घोटाला नहीं करते
विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी के एनजीओ के घोटाले का जब पिछले
दिनों खुलासा हुआ तो केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह कहकर सनसनी
फैला दी कि इतने बड़े नेता लाखों का घोटाला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि
बात करोडों की होती तो मानता। हालांकि, बाद में उन्होंने अपने बयान के
लिए मांफी मांग ली।
मेरे पास जादू की छड़ी नहीं
कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए लोगों से वादा किया था कि वह महंगाई पर
काबू पाएगी, मगर वह ऐसा कर न सकी। महंगाई जब बेकाबू हुई तो लोगों ने
प्रधानमंत्री से कुछ समय पहले इस बाबत सवाल किया। उन्होंने महंगाई को
काबू करने के बजाय बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी
नहीं है।
जंग: जनरल बनाम सरकार
उम्र को लेकर सेना के जनरल रहे वीके सिंह और सरकार के बीच ऐसे विवाद हुआ,
जैसे स्कूल के दो बच्चों में झगड़ा हो रहा हो। इस मामले में जो कुछ हुआ,
वह काफी शर्मसार करने वाला था। सरकार के लिए भी और सिंह के लिए भी।
अण्णा का आंदोलन
जनलोकपाल को लेकर राजधाानी में अनशन करने वाले अण्णा हजारे को आखिर इसकी
जरूरत क्यों पड़ी। उनके आह्वान पर आखिर लाखों लोग क्यों सड़कों पर पड़े रहे।
इस सवाल पर सरकार शायद अब भी विचार नहीं कर रही।

बनाएं शहीदों के सपनों का गणतंत्र

धर्मेंद्र सिंह राजावत

 कुर्बानियां देकर शहीदों ने हमे जो गणतंत्र दिया, उसे हमने
और हमारे समाज ने बदसूरत कर दिया। यह गणतंत्र वतन के लिए जान देने वालों
के सपनों का तो कतई नहीं रहा है। अपने आसपास होने वाली घटनाओं और
वारदातों को देखकर मुझे राजस्थान के अजमेर जिले के शतावरिया (बांदनवाड़ा)
गांव में जन्मे और इंदौर के ऋषिकुल ब्रह्मचर्य आश्रम मंे पढ़े स्वतंत्रता
सेनानी वैद्य ज्योति स्वरूप व्यास के बोल आज भी कानों में यकायक गूंज
उठते हैं।
कुछ बरस पहले ही उनसे भेंट हुई थी। गणतंत्र दिवस नजदीक था, इसलिए इस पर
ही चर्चा शुरू हो गई। उनका चेहरा गंभीर हो गया। फिर बहुत ही बोझिल और
करुणाभरी आवाज में बोले, 'जान पर खेलकर जिस गणतंत्र की कल्पना की थी मुझे
उसका पच्चीस फीसदी भी दिखाई नहीं पड़ रहा है। देश की आजादी के लिए हमने बम
फोड़े, इंदौर से महू छावनी सामग्री ले जाने वाली मालगाड़ी की फिश प्लेटें
उखाड़ उसे नदी मंे गिरा दिया। इसके लिए जेल भी गया। इस सब के पीछे सपना था
कि देश आजाद हो। यहां की हवा आजादी की हो और उसमें हम आजाद होकर सांस
लें। अलबत्ता, आज आजाद तो हैं, पर हवा में भ्रष्टाचार, घोटाले और
रिश्वतखोरी की बदबू आ रही है। पीड़ित परेशान होता रहता है, पर थानों में
उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। नेता वोट मांगने जरूर आता है, पर मसीबत में
वह किसी के लिए अपने घर के दरवाजे नहीं खोलता। कोई दलाल पकड़ा जाता है तो
मिनिस्टर उसकी थाने पहुंचने से पहले ही सिफारिश कर देता है। यह सब देखकर
बहुत दुख होता है।" कुछ देर रुककर वह फिर बोलते हैं, 'अगर सही गणतंत्र
देश में लाना है तो युवाओं और बच्चों को इसके बारे में गंभीरता से सोचना
होगा।"
व्यास जी के दिल की आवाज शायद अब युवाओं ने सुन ली है और इसका असर भी
दिखने लगा है। यही वजह है कि ज्यादातर अपनी ही धुन में रहने वाले युवा ने
अब गणतंत्र का स्वरूप विगाड़ने वाले के खिलाफ मोर्चा लेना शुरू कर दिया
है। अण्णा हजारे का आंदोलन और गैंग रेप की वारदात के बाद दिल्ली मंे
युवाओं का उग्र विरोध-प्रदर्शन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
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गणतंत्र दिवस: मनाने का ही नहीं बनाने का सोचो

धर्मेंद्र सिंह राजावत
गण (व्यक्ति) और तंत्र (व्यावस्था) से मिलकर बना 'गणतंत्र" शब्द वर्तमान
के परिपेक्ष में कितना सार्थक है इसको लेकर नई बहस छिड़ी हुई है। दरअसल,
पिछले दिनों दिल्ली में गैंग रेप की वारदात के बाद युवाओं का जो आक्रोश
दिखा, उससे साफ जाहिर है कि वह देश की व्यावस्था से संतुष्ट नहीं हैं।
यही वजह है कि वह न्याय और सुरक्षा की मांग को लेकर राष्ट्रपति भवन
रायसीना हिल पर सीना खोलकर पहुंच गए। हालांकि, उनको वहां से खदेड़ने के
लिए पुलिस ने पानी की बैछार के साथ ही आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठियां
भी भांजी, मगर बुलंद इरादे लेकर आए युवाओं के आगे वह बेबस हो गए। यहां यह
सवाल खड़ा होता है कि कुछ समय पहले तक ज्यादातर आंदोलनों (अण्णा के अनशन
को छोड़कर)से दूर रहा युवा (खास कर लड़कियां) इस बार आखिर इतना मुखर क्यों
हो गया? दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालने पर समझ में आता है कि अब युवा न केवल
जाग गया है बल्कि उसको यह समझ में भी आ गया है कि देश में गणतंत्र नहीं
गड़बड़तंत्र कायम है। तंत्र का उपयोग के बजाय दुरुपयोग हो रहा है। शायद इसी
कारण वह गैंग रेप की वारदात के बाद न्याय की गुहार लगाने किसी नेता या
प्रधानमंत्री के बजाय सीधा राष्ट्रपति भवन पहुंचा, मगर उसको वह नहीं
मिला जिसकी वह मांग करने वहां पहुंचा था। ऐसे में अब युवाओं को आज के दिन
(गणतंत्र दिवस) यह सोचना होगा कि यह समय गणतंत्र मनाने के साथ ही फिर से
इसके बनाने के बारे में विचार करने का है।
यदि विचार किया जाए तो समझ में आता है कि देश के 'तंत्र" में बहुत ज्यादा
खामी नहीं है। खामी है तो 'गण" में। गण (व्यक्ति) अपने उन दायित्वों का
निर्वाधन नहीं कर रहे हैं, जिसे उन्हें करना चाहिए। यही वजह है कि हमारा
गणतंत्र कमजोर पड़ गया है। अण्णा के जनलोकपाल बिल को ही ले लीजिए। कानून
की मांग को लेकर कई दिन लाखों लोग दिल्ली सहित देशभर की सड़कों पर आंदोलन
करते रहे, पर कुछ हासिल नहीं हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद
यादव ने यह कहकर उनकी चुटकी जरूर ली कि कानून आप नहीं हम बनाते हैं।
अलबत्ता, उन्होंने सही कहा। कानून सांसद ही बनाता है आम आदमी नहीं।
लेकिन, उनको यह याद नहीं रहा कि उनको जनता ही सांसद बनाती है, जो कि
आंदोलन कर रही है। दूसरा, जनता को भी अपने इस पॉवर (नेता चुनने का) का
भान नहीं है। जब कानून लालू बनाते हैं और लालू को जनता बनाती है तो फिर
कानून बनाने की बागडोर तो जनता के हाथ हुई न। बेहतर गणतंत्र कायम करने के
लिए जनता को इसका अहसास करना होगा और इसका उपयोग भी।
अब तंत्र की बात करते हैं। लोग खुद के बारे में सोचने के बजाय तंत्र को
कोसते हैं, मगर हकीकत तो यह है कि इसका ज्यादातर लोग सही उपयोग ही नहीं
करते हैं। मसलन, आम आदमी वोट का और अफसर सीट का। यहां मैं बात करना
चाहूंगा पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी टीएन सेशन की। जिस चुनाव आयोग के बारे
में ज्यादातर लोग जानते तक नहीं थे, उस विभाग ने टीएन सेशन ने पद संभालते
ही कई बड़े काम किए। यहां यह विचारणीय है कि सेशन ने आखिर नया क्या किया?
जवाब मिलेगा कि उन्होंने अधिकारों का उपयोग किया। मसलब साफ है कि तंत्र
तो वही था, पर पहले के अधिकारी उसका सही उपयोग नहीं कर रहे थे। अब जरूरत
है तंत्र का उपयोग कर अच्छे गणतंत्र को आकार देने की। इसके लिए किसी को
कुछ भी करने के बजाय खुद के अधिकारों और उत्तरदायित्यों को समझकर उनको
पूरा कनरे की जरूरत है। फिर न अण्णा को आंदोलन करना पड़ेगा और न युवाओं को
किसी की आबरू लुटने पर रायसीना हिल पर जाकर सुरक्षा की गुहार लगाने की
जरूरत पड़ेगी। हालांकि, जिस तरह दिल्ली गैंग रेप के बाद बिना किसी आह्वान
और बिना किसी के अगुवाई के युवाओं ने आंदोलन किया वह इस बात का संकेत है
कि जल्द ही हम उस गणतंत्र में जी रहे होंगे, जिसकी हमारे शहीदों ने
कल्पना की थी और जिसकी हम इच्छा रखते हैं।