बुधवार, 8 मई 2013

नेता बनने के लिए नहीं, बनाने के लिए पैदा हुए (व्यंग्य)


धर्मेंद्रसिंह राजावत
राजनीति में कॅरिअर बनाने में नाकाम रहे राधेश्याम और अनिल आपस में अपना दुखड़ा रो रहे थे कि तभी एक ज्योतिषी उनके पास से गुजरा। राधेश्याम ने आवाज लगाकर उसको रोका और अपना भविष्य देखने का आग्रह किया।
'पंडित जी! हम दोनों का हाथ देखकर बताएगा कि हम नेता बनेंगे या नहीं?"
पंडित जी ने काफी बारीकी से दोनों के हाथ देखे और फिर कुछ सोचने लगे। कुछ पल के लिए आकाश की ओर देखने के बाद बोले-'तुम दोनों नेता बनने के लिए पैदा ही नहीं हुए। तुम तो नेता पैदा करने के लिए पैदा हुए हो।"
पंडित जी की बात सुनकर दोनों भौंचक रह गए। फिर आश्चर्य के साथ दोनों ने सवाल किया
'पंडित जी! क्या कह रहे हैं आप? क्या यह सही है या फिर मजाक कर रहे हैं। सच-सच बताइए न?"
पंडित जी ने जवाब देने के बजाय सवाल किया
'तुम दोनों मुझे यह बताइए कि क्या मैडम खुद पीएम (किंग) बनी? नहीं न। यदि वह पीएम बन जातीं तो क्या वह किंग मेकर कहलातीं। पीएम न बनने पर ही उनके किंग मेकर बनने का रास्ता साफ हुआ। समझे। अब सोच क्या रहे हो? लोगों को नेता बनाना है या नहीं? यदि हां तो उपाय मेरे पास है, मगर कुछ दक्षिणा देनी होगी। यदि दोगे तो उपाय बताऊं?"
दोनों ने दक्षिणा देने की हामी भर ली तो पंडित जी ने उपाय बताना शुरू किया।
'एक ब्लड बैंक शुरू करो। उसमें आम मरीजों के जरूरत के अलावा नेता बनने के इच्छुक लोगों के लिए भी ब्लड रखो। खयाल रहे ब्लड खास तौर पर उत्तरप्रदेश के कुछ चुनिंदा नेताओं का ही हो।"
'नेताओं का ब्लड क्यों? अनिल ने उत्सुकता बस सवाल किया
'अरे मूर्ख! यूपी के नेताओं के ब्लड से ही तो नेता पैदा करोगे।'
'मैं समझा नहीं।' अनिल फिर बोला
'अच्छा मुझे यह बताओ तुम लोग कहां के रहने वाले हो?
'गुजरात के।" दोनों एक साथ बोले।
'तभी तुम्हें मालूम नहीं। मैं बताता हूं। यूपी में लोगों को राजनीति सिखाई नहीं जाती। वहां लोगों के खून में राजनीति घुली होती है। बच्चा पैदा होने के साथ ही राजनीति सीख जाता है। यही वजह है कि केंद्र में सरकार किसकी बननी है यह यूपी ही तय करता है। अभी भी माया और मुलायम से ही सरकार चल रही है। दूसरा, मैडम को सभी लोग विदेशी-विदेशी चिल्लाते हैं, मगर उनका रिश्ता कहां से है। यूपी से। अब समझ में आया या नहीं। यूपी के नेताओं का ही नहीं वहां के तो किसी भी व्यक्ति का खून किसी में चढ़ा दोगे तो वह उम्दा और कामयाब नेता बन जाएगा।"
पंडित जी के कहे मुताबिक उन्होंने ब्लड बैंक शुरू कर दी। किस्मत से उनके पास नेता बनने के इच्छुक कुछ कस्टमर भी आ गए। उन्होंने सभी को उनकी मांग के अनुसार ब्लड दे दिया। ब्लड बैंक अच्छी चल निकली तो उन्होंने चार कस्टमर के बारे में रिपोर्ट पता करने का तय किया। दरअसल, ब्लड का क्या रिएक्शन हो रहा है, इसका उनको अभी तक फीडबैक नहीं मिला था। दूसरा, खुद के बनाए नेता देखने की दोनों को ही जबर्दस्त उत्सुकता भी थी।
दूसरे दिन दोनों पहले कस्टमर के घर पहुंचे तो बेटे पर ब्लड के रिएक्शन का सवाल करते ही उसकी मां भड़क गईं।
'आप लोगों ने मेरे बेटे की जिंदगी खराब कर दी। बनाना था नेता, मगर वह बन गया क्रिमनल। पहले किसी को पलटकर जवाब तक नहीं देता था, लेकिन अब बात-बात पर लोगों को चाकू मार देता है। न जाने क्या किया आप लोगों ने।"
'आंटीजी! आप नाराज मत होइए। यह तो नेता बनने के शुरुआती लक्षण हैं। कोई भी व्यक्ति क्रिमनल बनने के बाद ही बड़ा नेता बनता है।" राधेश्याम ने किसी तरह समझाने की कोशिश की।
आंटी कुछ और कहतीं उससे पहले दोनों वहां से खिसक लिए। फिर दूसरे कस्टमर के यहां पहुंचे। लेकिन, यहां तो स्थिति और भी खराब निकली। जो लड़का किसी लड़की को आंख उठाकर नहीं देखता था, वह अब कब-किसे अपनी हवस का शिकार बना ले इसका कोई पता नहीं। किसी तरह लड़के के माता-पिता को समझाया कि बहन जी के राज के कुछ मंत्रियों या विधायकों में से किसी का ब्लड चढ़ गया होगा, इसलिए ऐसा रिएक्शन हो रहा है, मगर चिंता की बात नहीं। ये लक्षण भी एक अच्छे नेता के ही हैं। आपका बेटा, नेता तो अच्छा बनेगा ही।
दो कस्टमरों के अनुभव ने अनिल की चिंताएं बढ़ा दीं। मन में कुछ संशय होने लगा। एक बार उसने तय किया कि अब रिएक्शन देखने नहीं जाना, मगर राधेश्याम की जिद पर चल दिए तीसरे के यहां। दरवाजे की घंटी बजाई तो एक बुजुर्ग आंटी ने गेट खोला। अपना परिचय दिया तो वह खुश होकर दोनों लोगों को घर के अंदर ले गईं। आंटी के चेहरे की खुशी देखकर दोनों लोगों की उत्सुकता फिर बढ़ी। उन्होंने आंटी से ब्लड के रिएक्शन के बारे में सवाल किया।
'बेटा मैं तो अपने बेटे को पढ़ाना-लिखाना चाहती थी, मगर उसके पिता को उसे नेता बनाना का भूत सवार था। अलबत्ता, ऊपरवाले ने मेरी सुन ली। आप लोगों ने उसे किसका ब्लड दिया, मुझे नहीं मालूम, लेकिन अब वह जब देखो तब पढ़ता ही रहता है।"
आंटी की बात सुन अनिल के मन में फिर सवाल उठा, आखिर यूपी के ब्लड का असर दिख क्यों नहीं रहा है। किसी में नेता जैसे गुण क्यों नहीं दिख रहे हैं।
'क्यों राधेश्याम? पहले दो केस का मामला तो समझ में आता है, मगर तीसरे केस में ये पढ़ाई का चक्कर कुछ समझ में नहीं आया। ये नेताओं के लक्षण तो बिल्कुल नहीं लग रहे। आखिर माजरा क्या है?' अनिल ने काफी चिंतित होकर सवाल किया
'ब्लड तो यूपी का ही है। पहले दो केस में भी और तीसरे में भी।"
'क्राइम और किसी का रेप करने की बात तो समझ में आती है कि यह यूपी के नेता के खून का ही असर है, मगर पढ़ाई मेरी समझ में नहीं आई। यह कैसे मुमकिन है?' अनिल ने फिर सवाल किया
'तीसरे कस्टमर को या तो बहन जी का ब्लड चढ़ गया या फिर बबलू भैया का। दरअसल, बहन जी पढ़ने की इतनी शौकीन हैं कि भाषण भी पढ़कर ही देती हैं। दूसरा, बबलू भैया सीएम बन गए, पर युवाओं के बीच पढ़ाई का संदेश वह आज भी खुद की मिसाल पेश करके देते हैं। तभी तो चाहे प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या फिर आम सभा, हर जगह अपनी बात शुरू करने से पहले कागज का टुकड़ा निकाल लेते हैं। पढ़ने की कितनी ललक है उनको।'
'राधेश्याम! सही कह रहे हो तुम। तीनों में यूपी का ही असर दिखा है। अच्छा !अब चौथे के भी हाल जान लेते हैं।' अनिल ने चलने का इशारा करते हुए कहा।
चौथे के यहां पहुंचे तो उसके पिता ने दोनों लोगों का काफी गर्मजोशी से स्वागत किया। कुछ समय तक यहां-वहां की बात करने के बाद दोनों लोगों ने उसके पिता से बेटे के रिएक्शन के बारे में पूछा।
'बेटा भाषण तो बहुत अच्छा देता है, वह भी बिना किसी कागज-पत्तर के। जब बोलता है तब काफी तेजस्वी दिखता है। निश्चित ही बहुत बड़ा नेता बनेगा, मगर एक समस्या भी है। जब देखो तब वह यही कहता रहता है कि मैं पीएम बनूंगा, मैं ही पीएम बनूंगा। उसे पीएम बनने की इतनी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।"
रिएक्शन जानने के बाद जब दोनों वापस लौट रहे थे तो वह चौथे केस के बारे में चर्चा करने लगे।
'क्यों राधेश्याम? तुम्हें कुछ गड़बड़ नहीं लग रहा है। पीएम बनने को लेकर चिल्लाना समझ में आता है, क्योंकि कई चिल्लाते रहते हैं, मगर यूपी का नेता तेजस्वी और बिना किसी कागज-पत्तर के भाषण, यह बात कुछ समझ में नहीं आई।"
'हां,  कुछ गड़बड़ मुझे भी लग रही है।"
कुछ सोचने के बाद अनिल ने फिर सवाल किया, 'राधेश्याम! एक मरीज के लिए नमो ब्लड डोनेट करने आए थे, कहीं तुमने उनका ब्लड तो..... ।"
दोनों ने लम्बे-लम्बे कदम बढ़ाए और ब्लड बैंक
पहुंचे। वहां जाकर फाइल पलटी तो पता चला कि जिस मरीज के लिए नमो ने ब्लड डोनेट किया था, उसको उनका ब्लड दिया ही नहीं गया।

मंगलवार, 7 मई 2013

संजू बाबा: मेरी खुशी की घड़ी के साथी (व्यंग्य)


धर्मेंद्रसिंह राजावत
कोर्ट से सजा मुकर्रर होने के कुछ दिन बाद संजू बाबा घर पर अपनी पत्नी के साथ किसी बात को लेकर ठहाके लगा रहे थे। यकायक उन्होंने पत्नी से सवाल किया।
'क्यों? अपनों की पहचान कब होती है?
काफी सोचने के बाद पत्नी से जवाब दिया। 'दुख की घड़ी में।"
'गलत, बिल्कुल गलत।" संजू बाबा ने अपने ही अंदाज में कहा।
'तो फिर आप ही बताइए। कैसे होती ही अपनों की पहचान?" पत्नी ने उत्सुकता वश सवाल किया।
'खुशी की बहार जब आती है, तब।" बाबा ने हंसते हुए कहा।
'ऐसा भी होता है क्या?" पत्नी ने आश्चर्य जताते हुए फिर सवाल किया।
' हां, ऐसा ही होता है। खुशी के मौके पर ही पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया। कौन आपका भला सोचता है और कौन आपकी इज्जत, शांति और स्वाभिमान से नफरत करता है। मन, मैंने कभी आपसे नहीं कहा, मगर मैं पिछले कई सालों से पल-पल मर-मर के जी रहा था। मेरे जीवन में उस वक्त खुशी की बहार आई, जब कोर्ट ने फैसला सुनाया। इससे पहले सुबह उठने से लेकर रात बिस्तर पर जाने तक चिंता में डूबा रहता था। इतना ही नहीं चाहे शूटिंग कर रहा होता या फिर कोई पार्टी, मगर हमेशा दिमाग में यही चलता रहता था कि न जाने कब और क्या फैसला आएगा। क्या जीवन भर जेल में सड़ना पड़ेगा या फिर जान से जाऊंगा। आखिरकार वह घड़ी आ गई, जिसका इंतजार था। इतना ही नहीं वह खुशी का पैगाम भी लेकर आई। न जेल में जिंदगी गुजारनी पड़ेगी और न जान से जाऊंगा। अब तो खुशी का काउंटटाउन शुरू हो गया है। महज साढ़े तीन साल की बात है फिर इज्जत और ऐश की जिंदगी। लेकिन, मेरी यह खुशी कई लोगों को अच्छी नहीं लगी। फैसला आते ही कर दिया बवाल शुरू। मेरे चाहने वालों के अलावा केवल चार लोग ही मुझे ऐसे दिखे, जिनको मेरी फिक्र थी। जब लोग हमदर्दी दिखाने का ड्रामा कर रहे थे, तब हमारे प्रशंसक चुप बैठे थे। मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंसू बहाए, जिससे सभी को पता चले कि मेरे दिल में भी दर्द है, मगर सजा माफी की याचिका दायर नहीं करने की बात कहकर अपने स्वाभिमानी होने का सबूत भी पेश कर दिया। मेरे प्रशंसकों को मेरे मन के बजाय मेरे दिल की बात सुनाई पड़ी। उनको एहसास हो गया कि जेल जाने में ही मुझे सच्ची खुशी मिलेगी और फिर मेरी सजा के खिलाफ एक ने भी आवाज बुलंद नहीं की। न कहीं कोई धरना न कहीं कोई प्रदर्शन। ऐसे होते हैं चाहने वाले। अब आप ही बताइए? लोगों की पहचान सुख में होती है या दु:ख में?"
 पत्नी कुछ जवाब देती उससे पहले ही बाबा ने दूसरा सवाल दाग दिया।
'अच्छा छोड़िए, आप तो यह बताइए कि वह चार लोग कौन हैं, जो खुशी के वक्त भी मेरे साथ खड़े रहे?"
दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद पत्नी बोली- ' अरे। उनका नाम याद नहीं आ रहा। हर किसी की काट करने वाले जू हैं न। क्या नाम है उनका?"
'हां, सही कह रही हो, मगर उनको किसी और से ज्यादा खुद की चिंता रहती है। इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने ही सबसे पहले मेरी सजा को लेकर बखेड़ा खड़ा किया। शायद किसी तरह जुगाड़ करके साढ़े तीन साल की सजा भी मैं खत्म करवा लेता, मगर उन्होंने हंगामा करके सारे रास्ते बंद कर दिए। अच्छा किया नहीं तो मुझे हमेशा इस बात का मलाल रहता। लेकिन, उन्होंने यह सब अकेले मेरे लिए नहीं किया, क्योंकि मुझे लगता है कि वह किसी भी मुद्दे में तभी जबर्दस्ती घुसते हैं, जब उनको पब्लिसिटी पाने का मौका दिखता है। शायद उनके लिए मैं पब्लिसिटी पाने का जरिया था। वह मेरे सगे नहीं। सगे तो कोई और हैं।"
'अच्छा। वह आपके सगे नहीं थे तो आप ही बताइए कि आपके कौन सगे हैं, जो खुशी में भी आपके साथ हैं?" पत्नी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सवाल किया।
'मेरे दो अनमोल रतन, एक हैं भाभी दूसरे हैं भैया।"
'भाभी और भैया? आपने तो कभी नहीं बताया कि आपका कोई भाई भी है।"
'अरे। माई डियर, इतनी टेंशन में क्यों आ गई। मैं जया भाभी और अमर भैया की बात कर रहा हूं। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह ऐसी खुशी में भी मेरा साथ खड़े रहेंगे। दरअसल, जब मेरी सजा माफी की बात चली तो कई नेता मेरे समर्थन में आ गए। शायद वह अपनी पहुंच का उपयोग करके मेरे लिए माफी का रास्ता भी बना लेते, मगर राजनीति का वनवास काट रहे भैया और भाभी ने मेरा खुलकर समर्थन करके सभी नेताओं को दूर कर दिया। शायद मैं बहक जाता और सजा माफी के चक्कर में पड़ जाता, पर उन्होंने इसकी कोई गुंजाइश नहीं रखी। इसे कहते हैं अपनापन। अगर मेरी सजा माफ हो जाती तो न मेरी इज्जत रहती न स्वाभिमान। और हां, भैया-भाभी के अलावा बॉलीवुड से दो लोग और मेरे अपने निकले। एक नाना दूसरा किंगों का भी किंग, सबसे बड़ा किंग....खान। जब समूची फिल्म इंडस्ट्री मुझे सजा सुनाए जाने पर दु:ख जता रही थी तब खान ने ही मेरी सजा को बरकरार रहने के लिए ट्यूटर पर अकेले ही मोर्चा खोलकर मेरा हैसला बनाए रखा। वह अपने ट्यूट में लिखता-'संजू ने तो असल जीवन में ही नहीं फिल्मों में भी स्वीकार किया है, 'नायक नहीं, खलनायक हूं मैं।" दूसरा, नाना ने दिल्ली में अवॉर्ड लेने के बाद टीवी चैनल पर सिर्फ-और-सिर्फ मेरी ही बात की। इतना ही नहीं जोर देकर कहा कि जिसने गलती की है, उसको सजा भुगतनी चाहिए। आज मुझे एहसास हो रहा है कि अपनी सजा को लेकर हर दिन जितना मैं परेशान रहता था,
उतने ही ये चारों रहे होंगे। तभी तो मेरा इतना साथ दे रहे हैं। इन चारों के चरित्र देखकर मेरी खुशी और बढ़ गई। चारों का अपनापन मुझे साढ़े तीन साल सजा काटने में काफी मदद करेगा। हर रोज इनको याद करूंगा और कब समय गुजर जाएगा पता भी नहीं चलेगा।"

सोमवार, 6 मई 2013

गुस्से को कहिए बाय-बाय


क्रोध पलभर का होता है लेकिन इसमें मरने, मारने तक जैसी बातें मन में घर लेती है। जिसके नुकसान का आकलन शायद गुस्से की मियाद पूरी होने के बाद ही होता है। यही वजह है कि क्रोध को नियंत्रण करना जरूरी है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन इसमें आपा खोना नुकसानदायक है। गुस्सा न सिर्फ सेहत को बिगाड़ता है, यह बने-बनाए रिश्तों को भी आसानी से तोड़ देता है। इसलिए जरूरी है गुस्से पर काबू पाना, जिसके लिए कुछ टिप्स आजमाई जा सकती हैं...।

  • क्रोध आने वाले कारणों को खोजिए। जिन कामों से आपको परेशानी होती है उन्हें छोड़िए, जिसकी वजह से आप अपने गुस्से में इजाफा करते हैं ।
  • जब आपको ज्यादा गुस्सा आए तो रिवर्स काउंटिंग करते हुए एक ग्लास पानी पीएं, गुस्सा भगाने में इसे काफी असरकारक माना जाता है।
  • गुस्से की स्थिति में हर कोई अपनी भड़ास निकालता है, मगर उस दौरान संभलने की जरूरत है और उतना ही कहें जितना सामने वाला समझ सकें। 
  • कुछ भी बोलने से पहले दो बार सोचें, गुस्से में व्यक्ति अपनी सुधबुध खो बैठता है। 
  • अपनी इच्छा को प्रबल करें और दृढ़ निश्चय लें कि कुछ भी करके गुस्से पर नियंत्रण रखेंगे। 
  • गुस्से के समय परिस्थितियों को समझना बहुत जरूरी है। 
  • लोगों को माफ करने या माफी मांगने की आदत डालें। 
  • कई बार दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के बीच गलतफहमियों के चलते टकराव की स्थितियां उभर आती हैं। ऐसे में ठंडे दिमाग से सोचें और बातचीत कर गिले-शिकवे दूर करें। 
  • अपना ध्यान कहीं ओर बंटाए, इससे गुस्सा काफी हद तक दूर हो जाएगा 
  • गुस्से में कुछ गलत कदम उठाने के परिणाम बाद में घर वालों को भुगतने पड़ेंगे, यह सोचकर क्रोध को नियंत्रित करें। 
  • ध्यान, योग करें, गहरी सांसें लें ताकि क्रोध की तीव्रता कम हो सके। 
  • खुद को उन कामों में व्यस्त करें जो आपको खुशी देते हैं और उन लोगों के बीच हमेशा रहिए, जो आपको पॉजीटिव बातों के जरिए जीवन जीने की कला सिखाते हों। 

मामा की मीडिया ने बचाई इज्जत (व्यंग्य)

धर्मेंद्रसिंह राजावत
रेल घूसकांड को अंजाम देने वाले भांजे की करतूत से मामा खासे खफा हैं। उनको इस बात का बेहद अफसोस है कि रेलवे में भांजे ने इतनी कम कीमत में उनकी इज्जत नीलाम कर दी। जब दिल्ली में बैठा घटिया से घटिया नेता अरबों ने नीचे डील नहीं करता है तब भांजे ने महज कुछ लाख में सौदा फाइनल कर मामा की इज्जत का बट्टा लगा दिया।
हालांकि, सरकार ने इस्तीफा नहीं देने की बात कहकर मामा को कुछ राहत जरूर दी है, मगर उनको अब भी तीन बातों की सबसे ज्यादा चिंता सता रही है। पहला, मैडम को कैसे मुंह दिखाएंगे। उनका सामना करना अब आसान नहीं है। दरअसल, जब वह सवाल करेंगी कि किससे पूछकर तुमने रेट गिराए तो उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। कैसे कहेंगे कि मैडम हमने नहीं हमारे नालायक भांजे ने रेट बिगाड़ दिया। 'चंद रुपयों में तुम क्या अपने पास रखते और क्या मुझे देते? इस सवाल का मामा के पास कई जवाब नहीं होगा। कमाऊ पूत (मंत्री) के मामले में मामा की रेटिंग गिरने का भविष्य में उनको न जाने क्या खामियाजा भुगतना पड़ेगा, सो अलग। दरअसल, पूरे  12 साल इंतजार करने के बाद यह मंत्रालय पार्टी को मिला था, वह भी न जाने किस-किस की मेहरबानी से।
दूसरी चिंता की बात यह है कि लेन-देन बिरादरी के नेताओं को कैसे समझाएंगे। किस-किस को सफाई देंगे। जब वह कहेंगे कि तुमने मेरा स्तर गिरा दिया तो वह उनको क्या जवाब देंगे। कैसे कह पाएंगे कि मेरा स्तर तो आज भी उतना ही ऊंचा है, जितना 'राजा" का, मगर क्या करें भांजे ने मेरी बाट लगा दी। लेन-देन एसोसिएशन का नियम है कि उसका कानून तोड़ने वाले से लेन-देने के सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं। यदि एसोसिएशन के नेता उनके खिलाफ चले गए तो मुसीबत हो जाएगी। एक बार अधिकार छिन गए तो सारा राजनीतिक जीवन बेकार।
तीसरी सबसे बड़ी चिंता बयानवीर हैं। न जाने क्या बयान दे दें। विकलांगों के घोटाले में उन्होंने यह दावा कर नई मुसीबत खड़ी कर दी थी कि हमारे किसी भी नेता की कीमत इतनी कम नहीं है कि वह लाखों में बिकता फिरे। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया को रुपयों का आंकड़ा जांचने की भी नसीहत दे डाली थी। जब मीडिया को उनकी बात समझ नहीं आई तो उन्होंने साफ कहा कि बात कुछ लाख रुपए की है, तो मैं दावे से कह सकता हूं कि यह सौदा हमारे मित्र ने नहीं किया है। और हां, यदि यह बात करोड़ों की होती तो मैं कह सकता था कि शायद उन्होंने किसी पर मेहरबानी कर दी हो। भांजे ने जो सौदा किया है वह भी इतनी कम कीमत का है कि बयानवीर को यह बात हजम नहीं होगी। वह निश्चित ही कोई-न-कोई बयान देंगे। पक्ष में दिया तो अच्छा नहीं तो फिर नई मुसीबत। हालांकि, पिछले दिनों यूपी में बखेड़ा खड़ा करने के बाद उनके मुंह पर लगाया गया टेप अभी काम कर रहा है, मगर उनके पिछले अनुभवों को देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता है।
पूरे मामले से चिंतित मामा को एक शंका भी सता रही है। उनको लगता है कि भांजे ने कहीं अपने आप को लाइम लाइट में लाने के लिए तो उनका कॅरिअर दांव
पर नहीं लगा दिया। दरअसल, मामा सालों से राजनीति में हैं और जब भी पंजाब जाते तो अखबार से लेकर टीवी की सुर्खियों में रहते, मगर भांजे को कौन जानता। अब एक ही झटके में पूरा देश ही नहीं दुनिया भी उसको जान गई। मीडिया ने इतनी पब्लिसिटी दे दी है कि अब टिकट के साथ ही उसकी जीत भी पक्की है। कहीं विरोधी ने टिकट दे दिया तो 2014 में मुकाबला खुद से भी हो सकता है। हालांकि, इस पूरे मामले में मामा खुश हैं तो सिर्फ मीडिया से। दरअसल, एक मीडिया ही है, जिसने उनकी इज्जत बचा ली। एक दिन बाद ही सही, मगर कुछ लाख की बात को 12 करोड़ तक तो पहुंचा दिया। फिर भले दस करोड़ किसी के बताए और दो करोड़ किसी के। अब कम-से-कम सुनने में तो अच्छा लगता है। कुछ लाख नहीं पूरे बाहर करोड़ डकारे हैं।

रविवार, 5 मई 2013

किताब ने कराया कत्ल (कहानी)


धर्मेंद्र सिंह राजावत
मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके झाबुआ में रहने वाले कालूराम को क्षेत्र के लोग सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी मानते थे। किसी को कोई भी सलाह लेनी होती थी, तो वह कालूराम के पास ही आता था। इसके चलते उसकी इलाके में अच्छी साख थी। सभी लोग उसका सम्मान करते थे। इतना सब होने के बाद भी कालूराम के मन में मलाल था। क्षेत्र में पढ़ाई-लिखाई की कोई व्यवस्था नहीं थी, इस कारण इलाके के ज्यादातर लोग अनपढ़ थे। कालूराम भी पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने जो भी सीखा अपने अनुभव से सीखा। उसको इसी बात का अफसोस था कि काश वह पढ़ा-लिखा होता तो उसकी जिंदगी और बेहतर होती। दरअसल, किसी ने उससे कहा था कि 'एक बेहतर जिंदगी का रास्ता किताबों से होकर गुजरता है"। इसी के चलते उसने तय किया कि वह अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर एक ऐसी जिंदगी देगा, जिसे वह खुद नहीं जी सका। हालांकि, वह समाज में होने वाले अपराध के साथ ही लोगों के नैतिक पतन से भी वाकिफ था, इसलिए उसने तय किया वह बेटे को समाज के असली चेहरे से दूर रखेगा।
कालूराम के चाचा का लड़का नेकराम नौकरी की तलाश में काफी पहले शहर में जा बसा था। कालूराम अपने बड़े बेटे घंसू को लेकर उसके पास पहुंचा। बेटे को पढ़ाने की अपने मन की बात नेकराम को बताते हुए उसने यह भी निवेदन किया कि घंसू को शहरी जिंदगी की हवा नहीं लगनी चाहिए। कालूराम के कहे मुताबिक नेकराम ने घंसू की पढ़ाई की व्यवस्था करवा दी। घंसू कुछ घंटे पढ़ाई करने के बाद सारा समय घर पर ही रहता। मानो उसकी दुनिया किताबों तक ही सीमित हो गई हो। आलम यह हो गया कि अब वह जो भी काम करता उसके बारे में या तो उसने पहले से ही किताब में पढ़ लिया होता था या फिर किताब को देखकर करता।
कुछ साल पढ़ाई- लिखाई करने के बाद वह गांव पहुंचा तो कालूराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दरअसल, उसको अब यकीन हो गया था कि उसके बेटे की जिंदगी सबसे बेहतर होगी। घंसू को आए अभी कुछ ही दिन गुजरे थे कि कालूराम के खेत में खड़ी फसल को जानवरों ने चट कर लिया। मामले की पड़ताल करने पर पता चला कि घंसू ने ही जानवरों को खड़ी फसल के बीच ले जाकर छोड़ दिया था। यह जानकर कालूराम को काफी आश्चर्य हुआ। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि घंसू ऐसा कर सकता है।
'क्यों घंसू, तुमने जानवरों को फसल के बीच ले जाकर क्यों छोड़ा?, कालूराम ने गुस्से में उससे सवाल किया
'जानवर खूंटे से बंधे भूख से तड़प रहे थे। किताब में लिखा है कि जानवरों पर अत्याचार नहीं करना चाहिए। उन पर तो दया करनी चाहिए। इसीलिए मैंने उनको खोल दिया। मुझे क्या पता था कि वह सीधे खेत में ही जाएंगे।" घंसू ने बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया।
घंसू का जवाब सुन कालूराम चुप रह गया। सोचा कि बच्चे ने किताब से सीख तो अच्छी ही ली थी, मगर उसको इस बात का भान नहीं था कि जानवर उसकी ही फसल चटकर जाएंगे। अभी इस वाक्ये को हुए कुछ ही दिन बीते थे कि कालूराम के घर चोर घुस आए। वारदात को अंजाम देते वक्त चोरों ने घर के सदस्यों से रुपए-जेवरात की जानकारी मांगी। सभी लोगों ने कोई-न-कोई बहाना बना दिया, मगर घंसू को जो भी जानकारी थी, उसने सच-सच बता दिया। इसके बाद चोरों ने आराम से अपने काम को अंजाम दिया और चलते बने। चोर अभी कुछ दूर निकले ही थे कि कालूराम ने शोर मचाने के बजाय घंसू को पीटना शुरू कर दिया। घंसू के रोने की आवाज सुनकर आस-पड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए।
'क्यों कालू! क्या बात हो गई। इतनी रात गए बेटे को क्यों पीट रहा है?" पड़ोसियों ने सवाल किया
कालूराम ने घर में चोरी की बात बताते हुए घंसू के द्वारा बोले गए सच के बारे में भी सभी को जानकारी दी। इतना सुनते ही सभी ने एक स्वर में घंसू से सवाल किय
'क्यों घंसू! तूने सच-सच क्यों बता दिया?"
'किताब में मैंने पढ़ा था कि कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। झूठ बोलना पाप होता है। इसीलिए।" घंसू ने जवाब दिया
घंसू का जवाब सुनकर सभी चुप रह गए। इसके बाद एक-एक कर सभी अपने घर को चले गए। कुछ देर बाद जब कालूराम का गुस्सा शांत हुआ तो उसने अफसोस जताते हुए बेटे को दुलारा।
'सच बोलना अच्छी बात है, मगर कब बोलना है यह तो सोचता।" कालू ने घंसू से कहा।
चोरी की वारदात को करीब आठ माह बीत गए थे। कालू ने किसी तरह अपने घर की गिरस्ती को फिर से पटरी पर दौड़ाना शुरू कर दिया था। गुरुवार का दिन था। कालूराम घर पर ही आराम कर रहा था, कि उसे याद आया कि उसको पड़ोस के गांव से कुछ सामान मंगाना है। उसने घंसू से कहा कि वह जाए और सामान ले आए। चूंकि, दोनों गांव के बीच जंगल का रास्ता था और एक नदी भी पड़ती थी, इसलिए उसने अपने मामा के लड़के नत्था को भी साथ ले जाने के लिए कह दिया।
नत्था और घंसू दूसरे गांव से सामान लेकर वापस आ रहे थे कि तेज बारिश शुरू हो गई। काफी इंतजार के बाद भी जब बारिश नहीं थमी तो उन्होंने बरसात में ही घर वापस आने का निर्णय किया। बारिश की वजह से नदी उफान मार रही थी। एक तरफ मूसलधार बारिश तो दूसरी तरफ ऊंची-ऊंची लहरों के साथ दहाड़ मारती नदी उनको डरा रही थी। हालांकि, काफी सोचने के बाद दोनों
ने नदी पार करने का निश्चय किया। घंसू तो किसी तरह नदी पार कर गया, मगर नत्था तेज बहाव में डूबने लगा। वह बचाव-बचाव की आवाज लगाने लगा। घंसू डर गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करे। दिमाग पर जोर डाला और किताब की बात याद करने की कोशिश की। यकायक उसको कुछ याद आया तो वह खुशी से उछल पड़ा। इसके बाद उसने अपनी कमर से कटार निकाली और नदी में उतर गया। नत्था के पास पहुंचकर उसने उसके बाल पकड़े और सिर कलम कर लिया।
नत्था का सिर लेकर जब वह घर पहुंचा तो सभी देखकर दंग रह गए। कालूराम के पूछने पर उसने बरसात होने से लेकर नदी में बाढ़ आने तक की कहानी बता दी। इतने में अधीर हो कालू ने सवाल किया
'अरे, यह बता कि नत्था का सिर किसने और क्यों काटा?"
'मैंने, घंसू ने बड़े ही मासूमियत से जवाब दिया।
घंसू का जवाब सुन सभी सन्ना रह गए। ऐसा लगा मानों सभी के ऊपर बिजली गिर गई। सभी ने एक साथ सवाल किया।
'आखिर क्यों?"
घंसू, 'नत्था डूब रहा था इसलिए।"
'डूब रहा था तो उसको बचाना चाहिए था, मगर सिर क्यों काट लिया?" कालूराम ने गुस्साते हुए पूछा।
घंसू, ' किताब में लिखा था कि कोई वस्तु (सेव) यदि खराब हो रही हो तो उसका जो बचा हुआ सही हिस्सा है यदि उसे काट लिया जाए तो वह कुछ और दिनों तक अच्छा रह सकता है। नत्था का पूरा शरीर डूब गया था, केवल सिर ही सुरक्षित था, जिसे बचाया जा सकता था। इसलिए मैंने उसे काटकर बचा लिया।"
घंसू की इतनी बात सुन कालूराम पछाड़मार कर गिर गया और बेहोश हो गया। जब होश में आया तो वह अपनी किस्मत के साथ ही अपने निर्णय पर अफसोस करने लगा। उसने उस व्यक्ति को भी कोसा, जो कह रहा था कि 'बेहतर जिंदगी का रास्ता किताबों से होकर जाता है"। वह जिंदगी भर अपने अनपढ़ होने पर अफसोस करता रहा था, मगर आज सोच रहा था कि यदि किताबों से होकर जिंदगी का ऐसा रास्ता जाता है तो मैं अनपढ़ ही सही।
जब इस घटना की जानकारी नेकराम को मिली तो वह भी शहर से गांव पहुंचा। शाम को खाना खाने के बाद कालूराम और नेकराम बात कर रहे थे। इसी बीच नेकराम ने नत्था की मौत के लिए कालूराम को जिम्मेदार करार दिया। नेकराम की बात सुन कालूराम दंग रह गया।
'क्या कह रहा नेकराम?, आश्चर्य और गुस्से से कालूराम ने सवाल किया
नेकराम, 'सही कह रहा हूं। कत्ल भले ही घंसू ने किया हो, पर असली गुनेहगार तो आप हैं।"
कालू, 'मैं क्यों हूं?"
नेकराम, 'आपको किसी ने बता दिया कि किताबें पढ़ने से जिंदगी सुधर जाती है तो आपने घंसू को पढ़ाने के लिए शहर भेज दिया, मगर समाज के गिरते नैतिक मूल्यों को देखते हुए उसे उससे दूर कर दिया। यही आपकी गलती थी। दरअसल, अनपढ़ व्यक्ति कितना भी तजुर्बा हासिल कर ले, मगर वह पढ़ाई-लिखाई के बिना अधूरा होता है, ठीक इसी तरह कोई भी व्यक्ति कितना भी पढ़- लिख ले, मगर बिना सामाजिक सीख के उसका ज्ञान अधूरा होता है। आपने उसको केवल किताबी ज्ञान दिया।"