शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

होंठों को बचाएं झुर्रियों से

झुर्रियां या लकीरों का दिखाना बढ़ती उम्र की निशानी मानी जाती है। इसके अलावा बुरी आदतें व अनियमित जीवनशैली भी इन समस्याओं को बढ़ा देती हैं। ज्यादातर महिलाएं मुंह व होठों के आसपास की त्वचा पर लकीरों की समस्या से परेशान रहती हैं।  होठों पर झुर्रियां और लकीरों के कई कारण हो सकते हैं। इन कारणों के उपायों के बारे में जानने से पहले एक नजर उन कारणों पर डाल लेते हैं-
धूम्रपान  : धूम्रपान की आदत ना सिर्फ फेफड़ों के लिए हानिकारक होती है बल्कि यह आपके होठों की त्वचा को भी नुकसान पहुंचाती है। धूम्रपान से कोलेजन व इलेस्टिन (वे तत्व जो त्वचा को सहारा व संरचना प्रदान करते हैं) क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए धूम्रपान की आदत को जल्द से जल्द छोड़ने की कोशिश करें।
च्युइंग गम : सुनने में च्युइंग गम खाने की आदत भले ही बुरी ना लगती हो लेकिन ज्यादातर लोग स्मोकिंग के बाद च्युइंग गम खाते हैं जो होठों पर झुर्रियों का कारण बन सकती है। च्युइंग गम खाने से होठों के आसपास की त्वचा या जॉ लाइन क्षतिग्रस्त होने लगती हैं।    
स्ट्रॉ का प्रयोग : जब आप कोई भी ड्रिंक स्ट्रॉ से पीते हैं तो आपके होठों का आकार सिगरेट पीने के समान हो जाता है। आपने देखा होगा जो लोग सिगरेट पीते हैं उनके होठों पर या इसके आसपास झुर्रियां व लाइनें दिखाई देने लगती हैं। इसी प्रकार स्ट्रॉ का प्रयोग करने वाले लोगों में भी यह समस्या हो सकती है।  होठों पर झुर्रियों व लाइनों की समस्या से बचने के लिए खास देखभाल की जरूरत होती है। 

ऑफिस के साथ तनाव भी करें मैनेज

महिलाएं ऑफिस और घरवालों की देखभाल करने में खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाती हैं। कार्यालय में काम के बोझ के कारण तनाव ज्यादा होता है, लाइफस्टाइल का नकारात्मक असर सबसे ज्यादा सेहत पर पड़ता है। खान-पान में पौष्टिक आहार की कमी के कारण तनाव होना लाजमी है। यदि आप नियमित दिनचर्या का पालन कर रही हैं तो काम के दौरान तनाव होने की आशंका कम होती है। इसके लिए जरूरी है मॉर्निंग वॉक और सुबह का नाश्ता। यदि आप इन तरीकों का पालन कर रही हैं तो ऑफिस में तनाव होने की आशंका भी कम होगी और आप फिट भी रहेंगी।
ब्रेकफास्ट करके जाएं
ऑफिस जाने की तैयारी कर रही हैं तो ब्रेकफास्ट करना बिल्कुल न भूलें। सुबह का नाश्ता न केवल आपका पहला आहार होता है बल्कि यह आपको पूरे दिन ऊर्जावान रखता है। सुबह के नाश्ते में पूड़ी, पराठा न लें, इससे आलस्य आता है। नाश्ते में दूध के साथ ब्राउन ब्रेड, जैम या थोड़ा-सा मक्खन, मैंगो शेक, स्प्राउट, दलिया, ब्रेड-अंडा, सैंडविच के साथ कॉफी ले सकते हैं।
काम के बीच ब्रेक
लगातार काम करने से बचें, काम के दौरान बीच में ब्रेक बहुत जरूरी है। लगभग 1 घंटे के बाद 10-15 मिनट का ब्रेक लीजिए। ब्रेक लेने से आपके दिमाग को आराम मिलता है और दोबारा काम करने के दौरान आलस नहीं आता। इसके अलावा यह आपको तनाव से भी बचाता है। इसलिए काम के बीच में ब्रेक बहुत जरूरी है।
थोड़ा सा टहलें
कुर्सी पर ज्यादा देर तक बैठने से तनाव या सिरदर्द हो रहा है तो कुर्सी छोड़कर थोड़ी देर टहलें। इस दौरान आप अपने ऑफिस  कैफेटेरिया, अपने कैबिन या फिर सहकर्मी  की सीट तक टहल सकते हैं। टहलने से शरीर में रक्त का संचार सुचारु तरीके से होता है। टहलने से आप ऊर्जावान रह सकते हैं। काम के बीच में टहलें।
संगीत सुनें
कार्यालय में यदि लगातार काम करने से आपको तनाव हो गया है तो कुछ देर तक आप अपना मनपसंद संगीत सुन सकते हैं। संगीत सुनने से आपके दिमाग को आराम मिलेगा और तनाव नहीं होगा। काम के दौरान संगीत सुनने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है जिससे दिमाग एकाग्र होता है। एकाग्र दिमाग से व्यक्ति अच्छा काम कर सकता है।
योग और व्यायाम
यह जरूरी नहीं कि आप योग और एक्सरसाइज सुबह या शाम के समय ही कर सकते हैं। सारा दिन कुर्सी पर बैठकर काम करने से शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है और इससे तनाव भी हो सकता है। जब भी आप बोर हों या थकान महसूस करें तो स्ट्रेचिंग व्यायाम कर ताजगी ला सकते हैं। इसके लिए अपनी कुर्सी से पांच-दस बार उठ-बैठ सकते हैं। खड़े-खड़े दोनों हाथ ऊपर उठाकर पंजों के बल खड़े हो सकते हैं, कमर से दाएं-बाएं बाजुओं को घुमा सकते हैं।
थोड़ा फन भी
ऑफिस में गंभीर मुद्रा में काम न करें, हंसते और मुस्कुराते रहें, इससे आपका तनाव कम होगा साथ ही आपके साथियों का मूड भी अच्छा रहेगा। काम करते वक्त अपना चेहरा मुस्कुराते हुए रखें। बीच में अपने मित्र के साथ चैट कर लें, फनी वीडियोज देख लें, जोक्स आदि पढ़ लें। इससे आपका मूड अच्छा रहेगा और काम करने का मन भी करेगा क्योंकि ये सब चीजें तनाव दूर करती हैं।
पानी खूब पीएं
पानी पीना स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है, इससे शरीर फिट रहता है कई बीमारियां नहीं होती हैं। सिरदर्द और तनाव दूर करने के लिए खूब सारा पानी पीजिए। अधिकतर ऑफिस में एसी होते हैं इससे शरीर से प्राकृतिक नमी खत्म होने लगती है। उस नमी को बरकरार रखने के लिए दिन में थोड़ी-थोड़ी देर बाद पानी पीते रहें और दो-तीन बार ठंडे पानी से चेहरा धो लें। ऑफिस में फिट रहने के लिए भरपूर आराम भी जरूरी है, इसलिए ऑफिस का काम वहीं निपटाइए और 7-8 घंटे की नींद के बाद सुबह व्यायाम कीजिए। इन सबसे भी आपका तनाव दूर न हो रहा हो तो चिकित्सक की सलाह लें।  

टमाटर जूस यानी एनर्जेटिक ड्रिंक

आमतौर पर देखा जाता है  कि किसी भी तरह के शारीरिक कार्य या व्यायाम करने के बाद शरीर में एनर्जी की कमी महसूस होती है। इसके बाद लगता है कि खोई एनर्जी को फिर से किस तरह से हासिल किया जाए। इसके लिए ज्यादातर लोग एनर्जी ड्रिंक्स या चॉकलेट ड्रिंक्स पीते हंै। मगर एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि टमाटर जूस इस खोई एनर्जी को लौटाने में ज्यादा कारगर होता है। टमाटर में कई महत्वपूर्ण रसायन मौजूद होते हैं। ये तत्व एक्सरसाइज के बाद मांसपेशियों के खिंचाव को कम करते हंै और ब्लड सरक्युलेशन को सामान्य बनाते हैं।
दो महीने चला अध्ययन 
यूनान स्थित जनरल केमिकल स्टेट लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है। इसके लिए उन्होंने दो महीने तक 15 एथलीटों पर अध्ययन किया।
क्या पाया 
इस शोध के दौरान पाया गया कि रूटीन एक्सरसाइज के बाद एथलीटों ने थकान की शिकायत की। इनमें से 9 को टमाटर का जूस और 6 को अन्य एनर्जी ड्रिंक्स दिए गए। शोधकर्ताओं ने एक्सरसाइज से पहले, उसके दौरान और व्यायाम के बाद प्रतिभागी एथलीटों की शारीरिक क्रियाओं में आने वाले बदलाव का भी अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि टमाटर का जूस पीने वालों की मांसपेशियां एक्सरसाइज के बाद जल्द ही सामान्य अवस्था में लौट आईं। वे ज्यादा बेटर फील करने लगे। क्या-क्या है टमाटर में
टमाटर में विटामिन 'सी", बीटाकैरोटीन, लाइकोपीन, विटामिन 'ए" व पोटेशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिससे दिल की बीमारी का खतरा कम हो जाता है। लाल टमाटर खाने से शरीर की गर्मी भी दूर होती है। टमाटर से बाहरी त्वचा में भी कांति आती है और त्वचा मुलायम रहती है। मगर अब इसके मोटापे को दूर करने के गुण के कारण यह और भी उपयोगी सिद्ध हुआ है।
मोटापा दूर भगाए टमाटर
मोटापे का इलाज करने के लिए लोग न जाने क्या-क्या उपाय आजमाते हंै, मगर दुबले होने में उन्हें ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं होती। मगर अब ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं है। सलाद के साथ ज्यादा मात्रा में टमाटर खाकर भी आप अपने वजन को नियंत्रित कर सकते हंै। जी हां, विटामिन 'सी" से भरा और कोलेस्ट्रॉल को कम करने की क्षमता रखने वाला ये खाद्य पदार्थ है टमाटर। इससे कई रोगों को दूर करने में भी मदद मिलती है और मोटापा भी दूर होता है। एक अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि टमाटर हृदय रोग, कैंसर और अन्य कई जटिल बीमारियों से लड़ने में मददगार होता है।  शोध में ये बात साबित हो चुकी है कि टमाटर वजन घटाने में कामयाब है। टमाटर एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसे खाने के बाद खाना खाने की इच्छा कम होती है और पेट भरा-भरा सा महसूस होता है। टमाटर की यही विशेषता वजन कम करने में लाभकारी है। टमाटर में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो भूख लगने वाले हार्मोंस को कम कर देते हैं और इसके खाने से भूख नहीं लगती। टमाटर खाने से न सिर्फ वजन कम होता है, बल्कि इससे कई बीमारियों से भी निजात मिल जाती है।  

बच्चों के लिए घातक होता है न्यूमोनिया

सर्दी के दिनों में बच्चों में न्यूमोनिया का खतरा ज्यादा हो जाता है। हाल ही के एक शोध में यह बात सामने आई है कि जरा सी लापरवाही से बच्चों के लिए न्यूमोनिया काफी घातक सिद्ध हो सकता है। आंकड़े बताते हंै कि विश्व में हर 20 सेकंड में एक बच्चे की मौत न्यूमोनिया से होती है। इन तथ्यों को जानकर चौंकना स्वाभाविक है। यह तो रही बात विश्व की, मगर भारत में न्यूमोनिया से हर साल मरने वाले बच्चों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। पिछले वर्ष जारी की गई रिपोर्ट में भी इस बात का खुलासा हो चुका है। विश्वभर में बचपन में न्यूमोनिया होने के तकरीबन 15.5 करोड़ सालाना मामले सामने आते हैं। जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय द्वारा जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि न्यूमोनिया से स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की परेशानियां हो जाती हैं, जिससे उबरने में उन्हें काफी समय लग जाता है।
क्या है न्यूमोनिया
न्यूमोनिया, फेफड़ों में एक प्रकार का संक्रमण है, जिसमें रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है। इससे फेफड़ों में दर्द व सूजन आ जाती है।
न्यूमोनिया के दो प्रकार हैं
कम्युनिटी एक्वायर्ड न्यूमोनिया" और एक्वायर्ड न्यूमोनिया"। कम्युनिटी एक्वायर्ड न्यूमोनिया ऐसा प्रकार है, जो घर में रहने पर भी रोगी को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। वहीं 'एक्वायर्ड न्यूमोनिया" अस्पताल में भर्ती लोगों को ज्यादा होता है, जिसकी मुख्य
वजह संक्रमण होता है।
न्यूमोनिया के कारण
आमतौर पर नाक और गले में पाए जाने वाले वायरस और बैक्टीरिया सांस लेने पर फेफड़ों को संक्रमित कर सकते हैं। न्यूमोनिया बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के संक्रमण से होता है। बच्चों में न्यूमोनिया का मुख्य कारण वायरस का संक्रमण है। हवा में मौजूद किसी की खांसी या छींक से निकले रोगाणु के कारण भी बच्चों में न्यूमोनिया के होने की आशंका होती है। इसके लिए सावधानी बरतने की जरूरत है, ताकि बच्चों का सही ढंग से ख्याल रखा जाए।


संगीत, जो देता है पूरे जीवन को रिद्म

अगर आपको बचपन से पियानो या अन्य कोई म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स बजाने का शौक रहा है तो यकीन मानिए इससे आपको फायदा ही हुआ है। इतना ही नहीं यह आपकी बढ़ती उम्र में भी आपके लिए फायदेमंद सिद्ध होगा।
एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि बचपन में संगीत सीखने से बुढ़ापे में दिमाग और सुनने की क्षमता तेज बनी रहती है। यहां तक कि 40 वर्ष की उम्र पार कर चुके वयस्कों, जिन्होंने बरसों से संगीत उपकरण नहीं बजाया, को भी बचपन में की गई इस मेहनत का लाभ होता है।
क्या कहता है शोध 
शोधकर्ताओं का कहना है कि म्यूजिक किसी औषधि से कम नहीं है। यदि आप इसे बचपन में भी ले लें तो यह लॉन्ग लाइफ तक आपका इलाज करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इसलिए कहा जाता है कि बचपन में ली गई संगीत की शिक्षा बुढ़ापे तक लाभ देने में मदद करती है।
ब्रेन समझता है स्वर ध्वनियां 
इस शोध में यह बात साबित हुई है कि ब्रेन कितनी तेजी से स्वर ध्वनियों को समझता है। हालांकि हम यही समझते हैं कि बहरेपन की शुरुआत कानों से होती है लेकिन मस्तिष्क भी हमें सब चीजें साफ-साफ सुनने में मदद करता है। अगर आवाज बहुत धीमे-धीमे आए तो शोर-शराबे वाली जगह पर उसे सुन पाना काफी मुश्किल होता है।
कैसे किया अध्ययन 
अमेरिका के इलिनोइस स्थित नार्थवेस्टन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 'डा" ध्वनि सुनाने के बाद 44 स्वस्थ विशेषज्ञों के मस्तिष्क का निरीक्षण किया। जितने वर्ष महिलाओं अथवा पुरुषों ने संगीत सीखने में बिताए थे, उतनी ही तेजी से उनके मस्तिष्क की कोशिकाएं और न्यूरॉन ने उस ध्वनि पर प्रतिक्रिया की।
वे लोग जिन्होंने कम से कम पांच वर्ष सं
गीत का अभ्यास किया था, उनका मस्तिष्क उन लोगों के मुकाबले जिन्होंने कभी संगीत नहीं सीखा, उस ध्वनि पर प्रतिक्रिया देने में सेकंड के हजारवें हिस्से जितना तेज था। 'न्यूरोसाइंस जर्नल" में प्रकाशित हुई इस रिपोर्ट में बताया गया कि पियानो व अन्य उपकरणों की अपनी भूमिका होती है।
मस्तिष्क का निवेश देता है लाभ 
टेक्सॉस यूनिवर्सिटी के ब्रेन साइंटिस्ट माइकल किलगार्ड का कहना है कि एक मिलीसेकंड तेज होना भले ही बहुत ज्यादा न लगे लेकिन मस्तिष्क समय को लेकर काफी संवेदनशील होता है। और लाखों न्यूरॉन्स के बीच एक मिलीसेकंड तेज होना वयस्कों के जीवन में वास्तविक अंतर पैदा कर सकता है। इस शोध से यह बात साबित होती है कि अपने मस्तिष्क में जो निवेश हम शुरुआती जीवन में करते हैं, उसके लाभ हमें जीवन में बाद में मिलते रहते हैं।  

छींकने से जुड़े हैं कई राज!

यूं तो छींकने का संबंध किसी भी मौसम से नहीं होता, मगर जुकाम के दौरान छींके आने को बेहद स्वाभाविक क्रिया माना जाता है। मगर क्या आपको मालूम है कि छींकना जितनी स्वाभाविक प्रक्रिया है, उतना ही मजेदार होता है लोगों के छींकने का तरीका। किसी के छींकने का अंदाज आपको डरा देता होगा या किसी पर गुस्सा आता होगा लेकिन यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि इससे लोगों का व्यक्तित्व भी जुड़ा होता है।
'पैसेफिक स्टैंडर्ड" में प्रकाशित शोध के आधार पर छींकने के तरीके और व्यक्तित्व के बीच संबंध से जुड़े ऐसे कई पहलू पता चले हैं, जिनकी जानकारी आपको अब तक नहीं होगी!
जी हां, शिकागो स्थित स्मेल एंड टेस्ट ट्रीटमेंट एंड रिसर्च फाउंडेशन में मनोचिकित्सक डॉ. एलेन हिस्च के अनुसार- छींकना भी हंसी के समान है। जिस तरह हंसी के तेज और धीमे होने का संबंध व्यक्तित्व से जोड़ा जाता है, उसी तरह छींकने के तरीके का भी हमारे व्यक्तित्व से गहरा संबंध है।
आप भी जानिए, छींकने से कैसे पहचान सकते हैं किसी का व्यक्तित्व-
* जोर से और देर तक छींकने वाले लोग :
डॉ. एलेन के अनुसार- जो लोग देर तक और बहुत जोर से छींकते हैं या जिनके छींकने का अंदाज मजाकिया लगता है, ऐसे लोग बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं। आमतौर पर ऐसे लोगों में नेतृत्व का गुण प्रबल होता है और उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है। ऐसे लोग बारीकियों पर कम ध्यान देते हैं और दूसरों के प्रति बेपरवाह किस्म के होते हैं।
* बहुत धीमे छींकने वाले लोग :
ऐसे लोग जिनकी छींक आप सही तरह से सुन भी नहीं पाते हैं। ये लोग स्वभाव से विनम्र, खुशमिजाज और दोस्ती में यकीन रखने वाले होते हैं। आमतौर पर इनकी कमजोरी इनके मन में छिपा डर होता है।
* छींक रोकने वाले लोग :
कुछ लोगों की आदत होती है कि वे तब तक छींक रोकते हैं, जब तक उन्हें बुरी तरह छींक नहीं आती है। ऐसे लोग स्वभाव से कर्मठ और महत्वाकांक्षी होते हैं। इन्हें अक्सर गुस्सा तब आता है, जब इनके मन की चीजें नहीं हो पाती है।
* सलीके से छींकने वाले लोग :
छींकते वक्त मुंह पर हाथ रखकर बेहद सलीके के साथ छींकने वाले लोग अक्सर साफ-सुथरे, अनुशासित और संवेदनशील होते हैं। ऐसे लोग अपने बनाए नियमों पर ही चलना पसंद करते हैं और अक्सर अकेले रहते हैं।
वैसे तो ये अपना नियंत्रण कम खोते हैं पर अमूमन यह कुछ गलत होता देख उसका विरोध करने का साहस जरूर दिखाते हैं। 

फैट्स से बताते हैं कुछ ज्यादा ही डर

ब्रिटेन के एक हृदयरोग विशेषज्ञ ने सैचुरेटेड फैट को लेकर आमतौर पर दी जाने वाली सलाह से अलग राय दी है। डॉ. असीम मल्होत्रा का कहना है कि इससे जुड़े जोखिम को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, जबकि चीनी का सेवन करने जैसे दूसरे कारकों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
दूसरी ओर ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन ने कहा है कि दवाओं या दूसरे तरीकों से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा में कमी करके हृदय रोगों का जोखिम कम होता है।
खानपान और रोगों के बीच संबंधों को लेकर हुए अध्ययन के आधार पर इस बात की सलाह दी जाती है कि स्वस्थ जीवन के लिए सैचुरेटेड फैट की कितनी मात्रा लेनी चाहिए।
* वैज्ञानिक प्रमाण :
ब्रिटेन में लाखों लोगों को कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करने के लिए स्टैटिन लेने की सलाह दी जाती है। लंदन स्थित क्रायडन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजी रजिस्ट्रार डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि हृदय रोगों के जोखिमों को रोकने के लिए करीब चार दशक से सैचुरेटेड फैट को कम करने की
सलाह दी जाती रही है।
उन्होंने कहा कि सैचुरेटेड फैट को जिम्मेदार ठहरा दिया गया है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणों से इसका हृदय रोगों के साथ पूरी तरह संबंध स्थापित नहीं होता है।
उन्होंने कहा कि खाद्य उद्योग ने सैचुरेटेड फैट को कम करके उसकी जगह चीनी के इस्तेमाल को बढ़ाया है, जबकि चीनी भी हृदय रोगों के लिए जिम्मेदार है।
*ये भी लिया जा सकता है :
खानपान और बीमारियों के बीच संबंधों को लेकर होने वाले अध्ययन अक्सर विरोधाभासी नतीजे देते हैं। डॉ. मल्होत्रा का कहना है कि स्टैटिन की जगह जैतून का तेल, बादाम, तैलीय मछली, फलों और सब्जियों के साथ रेड वाइन की थोड़ी मात्रा जैसे मेडिटेरेनियन खानपान को अपनाकर हृदय रोगों की आशंका की काफी हद तक कम किया जा सकता है।
* स्टैटिन का असर :
हालांकि ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के प्रोफेसर पीटर वेइसबर्ग ने कहा है कि खानपान और बीमारियों के बीच संबंधों को लेकर होने पर अध्ययनों के दौरान अक्सर विरोधाभासी नतीजे समाने आते हैं। उन्होंने कहा कि दवाओं के परीक्षण के विपरीत एक नियंत्रित और बेतरतीब अध्ययन करना मुश्किल होता है। हालांकि अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल स्तर वाले लोगों को हार्ट अटैक की आशंका अधिक होता है और यह भी साफ है कि कोलेस्ट्रॉल को कम करने का मतलब है जोखिम को कम करना।
कोलेस्ट्रॉल का स्तर कई बातों से प्रभावित होता है। इसमें खानपान, कसरत और दवाओं का भी इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने कहा कि इस बात के भी स्पष्ट सबूत हैं कि स्टैटिन से लोगों को फायदा मिला है। 

अब ब्लड टेस्ट से चल जाएगा फेफड़े के कैंसर का पता

वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में पाया है कि फेफड़े के कैंसर से पीड़ित लोगों के खून में एक खास तरह के प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। यह खोज सामने आने के बाद इस बीमारी की जांच के लिए साधारण्ा-सा ब्लड टेस्ट विकसित करने का मार्ग प्रश्ास्त हुआ है।
श्ाोधकर्ताओं ने पाया कि फेफड़ों के कैंसर से ग्रसित लोगों में आईसोसिट्रेट डी हाइड्रोजिनेज (आईडीएचआई) प्रोटीन काफी उच्च मात्रा में पाया जाता है। प्रमुख श्ाोधकर्ता और बीजिंग में चाइनीज एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेस के निदेश्ाक जाइ हे ने कहा कि यह पहला श्ाोध है जिसने आईडीएचआई की पहचान की है। इस बीमारी का पता काफी देर से चल पाता है। इसी वजह से दुनियाभर में तेजी से फैल रही इस बीमारी की मृत्युदर अभी काफी ज्यादा है। वर्ष 2007 से 2011 के बीच 943 मरीजों के रक्त के नमूनों की जांच कर श्ाोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे। यह श्ाोध 'अमेरिकन एसोसिएश्ान फॉर कैंसर रिसर्च के जर्नल क्लीनिकल कैंसर रिसर्च" में प्रकाशित हुआ है।  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

ऐसे बढ़ाएं अपनी जिस्मानी ताकत

पुरुषों में पाई जाने वाली कुछ शारीरिक समस्याएं जैसे स्वप्न दोष, शीघ्रपतन व कमजोरी आदि ऐसी समस्याएं हैं जो चेतन मन के नियंत्रण खो देने पर होती हैं। किसी व्यक्ति के जीवन में यौन समस्याएं उसके यौन जीवन में शुरुआत में विकसित हो सकती हैं या सुखद व संतोषजनक यौन अनुभव होने के बाद विकसित हो सकती हैं। ऐसी समस्या धीरे-धीरे समय के साथ विकसित हो सकती है या अचानक पैदा हो सकती है जिसके कारण यौन गतिविधि के एक या अधिक चरणों में पूरे या आंशिक तौर पर भाग लेने में अक्षमता हो सकती है। यौन समस्याओं के कारण शारीरिक, मानसिक या दोनो हो सकते हैं।आज हम आपको बता रहे हैं, पुरुषों में कमजोरी पैदा करने वाली समस्याओं को खत्म करने के लिए कुछ नेचुरल नुस्खे जो इस समस्या में रामबाण की तरह काम करते हैं।
केला और आंवला बढ़ाते हैं ताकत
 जिन लोगों को अत्यधिक स्वप्नदोष होने की समस्या है, वे प्रतिदिन आंवले का मुरब्बा खाएं। केला पुरुषों की शक्ति बढ़ाने वाला फल है। प्रतिदिन केले खाएं एवं संभव हो तो केले खाने के बाद दूध भी पीएं।

अनार के छिलकों का प्रयोग
अनार गुणों से भरपूर होता है, ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन अनार का छिलका भी बहुत उपयोगी होता है। पुरुषों में कमजोरी की समस्या में अनार के छिलके बहुत लाभदायक होते हैं। अनार के छिलकों को सुखाकर पीस लें। प्रतिदिन सुबह और शाम एक चम्मच इस चूर्ण को खाएं। कमजोरी व शीघ्रपतन की समस्या से शीघ्र ही राहत मिलेगी।
रात को लें ये चीजें
रोज रात को सोने से पहले लहसुन की दो कलियां निगल लें। इसके बाद थोड़ा-सा पानी पीएं। आंवले के चूर्ण में मिश्री पीसकर मिलाएं। प्रतिदिन रात को सोने से पहले करीब एक चम्मच इस चूर्ण का सेवन करें।
एक आसान उपाय यह भी..
शीघ्रपतन की शिकायत हो तो धाय के फूल, मुलेठी, नागकेशर, बबूलफली बराबर मात्रा में लेकर इसमें आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। इस चूर्ण का 5-5 ग्राम की मात्रा में सेवन लगातार एक माह तक करें। इससे शीघ्रपतन में बहुत जल्दी लाभ मिलता है।
खरपतवार भी है काम की
पुनर्नवा एक तरह का खरपतवार है। यह पुरुषों की कमजोरी को दूर करने में रामबाण का काम करता है। कहा जाता है कि पुनर्नवा की जड़ का रस (2 चम्मच) दो से तीन माह तक लगातार दूध के साथ सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति भी युवा की तरह महसूस करने लगता है। सांभार:डीबी

टमी का फैट कुछ यूं करें सेट!

पेट की बढ़ती चर्बी अगर आपके दिन-रात का चैन उड़ा रही है तो इसे कम करने की कोशिश अभी से शुरू कर दें। पेट पर जमा फैट्स न केवल आपके लुक्स को बल्कि आपकी पूरी सेहत को प्रभावित कर सकता है।
पेट की चर्बी के लिए अगर आप कसरत और डाइट का सही बैलेंस बनाएंगे तो इसे कम करने में काफी आसानी होगी। आइए जानें, ऐसी डाइट के बारे में जो तोंद कम करने में आपके लिए मददगार हो सकती हैं।
तरबूज
यूनिवर्सिटी ऑफ केंटुकी के शोधकर्ताओं का मानना है कि तरबूज के सेवन से पेट की चर्बी कम करने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पशुओं के कोलेस्ट्रॉल लेवल का निरीक्षण किया और उन्हें तरबूज का रस पिलाया, आठ हफ्ते बाद उनके शरीर में फैट्स की मात्रा कम हो गई।
टमाटर
एक बड़े टमाटर में सिर्फ 33 कैलोरी है। इसमें पाया जाने वाला 9 ओएक्सओ ओक्टाकैडिएनोइक नामक तत्व फैट्स कम करने में मदद करता है।
केला
सेब की तरह ही केले में भी पैक्टीन नामक तत्व अच्छी मात्रा में होता है, जो पेट में चर्बी जमा होने से रोकता है। इसके अलावा, इसमें विटामिन ए, सी, ई, बी6 और पोटेशियम जैसे तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। तोंद कम करने के लिए डाइट और एक्सरसाइज का सही संतुलन ही फायदेमंद होता है, इनमें से किसी एक के भरोसे वजन घटाना या चर्बी पर काबू पाना संभव नहीं है। 

ऐसा कुछ न कहें...

कई बार आपकी तरफ से दी गई भली सलाह भी बुरे नतीजों का सबब हो जाती है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसी कौन सी बात है जो आपको अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड से कभी नहीं कहना चाहिए।
यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में माना है कि अपने जीवनसाथी को डाइटिंग के लिए कहना या उसके खानपान पर बार-बार टिप्पणी करना उसको गलत जीवनशैली के लिए प्रोत्साहित करता है और तनाव की वजह बनता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि बार-बार डाइटिंग के लिए कहने पर लोग सेहतमंद डाइट के बजाय भोजन छोड़ने डाइट पिल्स लेने, अधिक खाने या तनाव के आदी हो सकते हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक है।
शोधकर्ता मार्ला एसेनबर्ग के अनुसार ''अगर आप अपनी पत्नी को बार-
बार डाइटिंग के लिए कहते हैं तो वह खुद को अनाकर्षक और ओवरवेट मान सकती हैं जिससे न सिर्फ उनका आत्मविश्वास घटता है बल्कि गलत तरीकों से वेट लॉस व तनाव को भी बढ़ावा मिलता है।""
ऐसे में क्या करें
अपने जीवनसाथी के गलत खानपान और बढ़ते वजन को लेकर अगर आप वाकई गंभीर हैं तो उसे सीधे टोकने के बजाय दूसरे उपाय भी अपना सकते हैं।
एसेनबर्ग बताती हैं कि ''बेहतर उपाय यह है कि आप उन्हें उनकी पसंदीदा आइसक्रीम खाने पर टोकने के बजाय रात में अपने साथ वॉक पर चलने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे न सिर्फ फिटनेस के प्रति उनका उत्साह बढ़ेगा बल्कि आपके रिश्ते की मिठास भी   बरकरार रहेगी।""

प्यार करने वालों के दो दिल और धड़कन एक

शेर, शायरी, कविताओं और अन्य जज्बाती अभिव्यक्तियों में अक्सर कहा जाता है कि प्यार करने वालों के दो दिल और धड़कन एक होती है। अब वैज्ञानिकों ने भी इस पर मुहर लगा दी है। जो जोड़े प्यार में होते हैं, वे प्राय: एक-दूसरे के सेंटेंस को पूरा करते हैं, एक ही जोक पर समान रूप से हंसते हैं और खास यह है कि जब वे साथ में होते हैं तो उनकी हार्ट की धड़कन की गति भी एक समान होती है! वैज्ञानिकों ने पाया है कि जब दो जोड़े एक-दूसरे के करीब बैठे होते हैं तो उनके सांस लेने का पैटर्न और हार्ट रेट एक समान हो जाती है। यह उस स्थिति में भी होता है, जब वे एक-दूसरे के सिर्फ पास में बैठे हों और उन्होंने एक-दूसरे का हाथ भी नहीं थाम रखा हो। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति अपरिचितों के बीच न
जर नहीं आती है, भले ही वे एक-दूसरे से सटकर बैठे हों।
क्या मैचिंग है!
यूसी डेविस साइकोलॉजी के प्रोफेसर एमिलियो फेरर ने कपल्स में रोमांटिक रिलेशनशिप पर लंबा अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने अध्ययन में शामिल कपल्स की हार्ट रेट और सांस की गति को नापा और पता किया कि कपल्स में सांस लेने और छोड़ने का वक्त बिलकुल एक जैसा था। यह उसे स्थिति में भी था, जब वे एकांत में, अकेले में बैठे रहे लेकिन उन्होंने एक-दूसरे को छुआ तक नहीं।
समझ जाते हैं इमोशन
फेरर का कहना है कि हमने कई अनुसंधानों में देखा है कि रिलेशनशिप में व्यक्ति इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ जाता है कि उससे जुड़ा व्यक्ति भावनात्मक रूप से क्या फील कर रहा है। लेकिन अध्ययन यह भी कहता है कि रिलेशनशिप में व्यक्ति अपने जज्बात एक-दूसरे से शेयर करता ही है।
महिलाओं में ज्यादा
फेरर का कहना है कि पुरुष अपनी महिला पार्टनर से हार्ट बीट में  तालमेल बैठाने में वक्त लेता है। लेकिन महिला अपने पार्टनर को एडजस्ट करने में ज्यादा कुशल होती हैं। यह बात न केवल साइकोलॉजिकल लेवल पर सच है बल्कि हर रोज होने वाले जज्बाती अनुभवों पर भी खरी है।

हार्ट डिसीज के लिए खराब आबोहवा जिम्मेदार!

अमेरिका में हुए एक हालिया शोध में चेतावनी दी गई है कि हृदयाघात के  बढ़ते मामलों के  पीछे वायु प्रदूषण तथा ओजोन परत का क्षरण होना भी हो सकता है।
राइस विश्वविद्यालय (हॉस्टन) में सांख्यिकीविद कॅथरीन एंसॉर तथा लॉरेन राउन ने आंकड़ों के आधार पर यह बात कही है। उन्होंने ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के वायु की गुणवत्ता का आकलन करने वाले गहन नेटवर्क  द्वारा संकलित पिछले आठ वर्षों के  आंकड़ों तथा ह्यूस्टन आपात चिकित्सा सेवा द्वारा दर्ज 11,000 से अधिक हृदयाघात के  मामलों का गहन विश्लेषण किया। एंसॉर कहती हैं, 'इस अध्ययन का मूल उद्देश्य लोगों के जीवन की रक्षा करनी है।"
बेहतर नहीं है चेतावनी
एंसॉर का कहना है कि हम प्रत्येक व्यक्ति  के  लिए खतरे की सूचना देने वाली बेहतर चेतावनी प्रणाली के  विकास में सहयोग करना चाहते हैं। वायु प्रदूषण की सामान्य चेतावनी बेहतर नहीं हो सकती। इसके  साथ ही हम वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य को होने वाले खतरे की समझ को और बेहतर करना चाहेंगे और वायु प्रदूषण को लगातार कम होता देखना पसंद करेंगे।
इनका किया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने वायु में मौजूद नाइट्रोजन डाईऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के स्तर का भी विश्लेषण किया लेकिन हृदयाघात पर इनमें से किसी के प्रभाव के प्रमाण नहीं मिले। बोस्टन में हुए अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट ऑफ साइंस (एएएएस) समारोह में यह अध्ययन प्रस्तुत किया गया।



यह थकान कुछ कहती है...

यदि आप रोज अच्छी डाइट लेते हैं, पूरा आराम करते हैं, अच्छी नींद लेते हैं और बेहतर जीवन जीते हैं...फिर भी थोड़ा सा काम करने के बाद ही थक जाते हैं या अक्सर थका-थका ही महसूस करते हैं तो इसे सिर्फ आलस समझकर दरकिनार न करें क्योंकि यह आपके लिए कई रोगों का इशारा हो सकता है। जानिए, बहुत अधिक थकान किन-किन रोगों का लक्षण हो सकती है।
एनीमिया
आमतौर पर महिलाओं में एनीमिया की समस्या अधिक होती है। शरीर में रेड ब्लड सेल की कमी के कारण फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी और थकान जैसी समस्याएं होती हैं।
डायबिटीज टाइप 2
बहुत अधिक थकान होना डायबिटीज टाइप 2 का भी एक प्रमुख लक्षण हो सकता है। जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि टाइप 2 डायबिटीज के दौरान शरीर में ग्लूकोज का इस्तेमाल सही तरीके से नहीं हो पाता है इस वजह से शरीर जल्दी ऊर्जा खो देता है और बार-बार थकान होती है।
थकान के साथ बार-बार प्यास लगे, बार-बार पेशाब हो, वजन घटने लगे या देखने में दिक्कत हो तो यह डायबिटीज टाइप 2 का संकेत हो सकता है।
थाइरॉयड
थाइरॉयड के दौरान शरीर की मेटाबॉलिक प्रक्रिया तेज हो जाती है जिसकी वजह से खाना जल्दी पच जाता है और बार-बार थकान होती है। थकान के साथ मांसपेशियों में दर्द, वजन बढ़ना, आदि थाइरॉयड के संकेत हो सकते हैं।


पुरुषों में बीमार होने का खतरा ज्यादा

महिलाओं व पुरुषों की शारीरिक संरचना के आधार पर कई तरह के तुलनात्मक अध्ययन किए जा चुके हैं। इसी तरह के एक नए अध्ययन से यह पता चला है कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में शारीरिक बीमारी विकसित होने की आशंका अधिक होती है। 10 साल तक कनाडा के 'सेंट माइकल" अस्पताल द्वारा आयोजित इस शोध से पता चला कि कोई एक मानसिक बीमारी होने पर पुरुषों और महिलाओं दोनों ही में शारीरिक बीमारी के विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। मगर यह खतरा पुरुषों में लगभग 10 प्रतिशत अधिक होता है।
हालांकि सेंटर फॉर रिसर्च ऑन इनर हेल्थ के वैज्ञानिक डॉ. फ्लोरा मैथेसन द्वारा किए अध्ययन के अनुसार वे महिलाएं जिन्हें कोई मानसिक रोग होता है, को पुरुषों की तुलना में कोई शारीरिक रोग एक साल पहले होता है। हालांकि फिर भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को शारीरिक बीमारी के विकसित होने का जोखिम 14 प्रतिशत तक कम रहता है। यानी कि पुरुष स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक वंचित हैं।
इस शोध में क्लीनिकल इवैल्यूएटिव साइंसेज् के डेटा का इस्तेमाल किया गया। इसके जरिए यह देखने की कोशिश की गई कि क्या मानसिक बीमारी और शारीरिक बीमारियों की शुरुआत का निर्धारण व्यक्ति के लिंग के आधार पर भी होता है। नए अध्ययनों से यह पता चला है कि गंभीर मानसिक रोग वाले लोगों में शारीरिक रोगों जैसे कि मेटाबॉलिज्म सिंड्रोम, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग, वायरल और सांस की बीमारियों का खतरा अधिक पाया जाता है। अब शारीरिक और मानसिक बीमारी के बीच की कड़ी का अध्ययन करने की ओर रूचि बढ़ रही है। यह अध्ययन 'जर्नल ऑॅफ एपिडेमिक एंड कम्युनिटी हेल्थ" में ऑनलाइन प्रकाशित किया गया है।




कहीं आपकी रसोई में तो नहीं पक रही बीमारी!

आपकी सेहत का रास्ता रसोई से होकर जाता है, इसलिए रसोई की सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। हम रोजाना की साफ-सफाई से ही अपनी रसोई को साफ-सुथरा मान लेते हैं, जबकि उससे कीटाणु पूरी तरह से खत्म नहीं होते।
फिर यही कीटाणु आपके भोजन में दाखिल होकर कई बीमारियों को दावत देते हैं। इसलिए किचन को कीटाणु मुक्त रखना भी आपकी सेहत के लिए बहुत जरूरी है।
बर्तन धोने वाली सिंक : रसोई में कीटाणुओं की सबसे पसंदीदा जगह होती है सिंक। यदि नियमित रूप से सिंक की सफाई न की जाए तो यह भी आपकी बीमारी का कारण बन सकता है। इससे बचने के लिए सिंक में बर्तन, कच्चा मांस, सब्जी आदि धोने के बाद इसे ठीक प्रकार से साबुन या कीटाणुनाशक लिक्विड से साफ कर देना चाहिए।
स्पॉन्ज : बर्तन धोने से लेकर सिंक की सफाई तक आप स्पॉन्ज को रसोई में कई तरह से प्रयोग करते हैं। इस्तेमाल के बाद इसे वापस सिंक पर रख दिया जाता है। स्पॉन्ज के अंदर फंसे खाद्य पदार्थ के टुकड़े कीटाणुओं को जन्म देते हैं। दोबारा  स्पॉन्ज का इस्तेमाल करने पर यह बर्तनों या सिंक में भी फैल जाते हैं। इसलिए स्पॉन्ज के इस्तेमाल के बाद कटोरी में एक चम्मच ब्लीच डालकर उसे भिगो दंे ताकि वह अच्छी तरह से साफ हो जाए।
चॉपिंग बोर्ड : सब्जी काटने के लिए इस्तेमाल होने वाले बोर्ड की भी नियमित सफाई बहुत जरूरी है। इसके लिए बोर्ड को साबुन के गर्म पानी से धोएं। बेहतर होगा कि प्लास्टिक या कांच का बोर्ड प्रयोग करें क्योंकि यह कीटाणुरोधी होते हैं। यदि आप लकड़ी का बोर्ड प्रयोग कर रहे हैं तो उसे प्रयोग करने के बाद अच्छी प्रकार से धो लें।
डिश टॉवल : किचन में प्रयोग होने वाला डिश टॉवल भी कीटाणुओं को निमंत्रण दे सकता है। यदि आप चिकन पका रहे हैं तो उसे पकाने से पहले आप अपने हाथ तौलिए से पोंछ लेते हैं। इससे यह नुकसान होता है कि आपके हाथों से कीटाणु टॉवल में चले जाते हैं। कुछ भी पकाने के दौरान अपने हाथ तौलिए से पोंछने से पहले अच्छी प्रकार से साबुन से धो लें और उसके बाद किचन के तौलिए का इस्तेमाल करें, इससे बैक्टीरिया नहीं पनपेगा।
वाटर फिल्टर : आपकी रसोई में मौजूद पानी का नल भी बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है। खाना बनाते समय पानी के नल से कुछ पानी टपकता रहता है। इस अशुद्ध पानी से भी कीटाणुओं की संख्या बढ़ती रहती है। फिल्टर के नल को सप्ताह में एक बार रात भर सफेद सिरके में भिगोकर रखें।


खूबसूरत त्वचा के लिए सेहतमंद भोजन जरूरी...

खूबसूरत दिखने की चाहत हर किसी को रहती है और इसके लिए हर कोई तमाम तरह के जतन करने से भी नहीं चूकता। मगर वैज्ञानिकों की मानें तो लाख जतन का सिर्फ एक ही उपाय है सेहतमंद भोजन। आप कितने ही क्रीम और लोशन लगाएं जब तक आपका भोजन सही नहीं है, त्वचा पर निखार नहीं आ सकता। जी हां, त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए सबसे अच्छा तरीका है 'पौष्टिक भोजन" करना। भोजन की पौष्टिकता का असर त्वचा पर खुद-ब-खुद दिखाई देने लगता है।
त्वचा विशेषज्ञ बताते हैं कि त्वचा की नमी बनाए रखकर बढ़ती उम्र के साथ होने वाली समस्याओं जैसे झुर्रियां, बेजान त्वचा व रुखापन आदि समस्या से बचा जा सकता है और बढ़ती उम्र के साथ भी त्वचा को सुंदर चमकदार और आकर्षक बनाकर रखा जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय से भोजन कर त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए सेहतमंद भोजन करना न छोड़ें।
'नेचर क्योर एंड योग हेल्थ सेंटर" स्वास्थ्यवर्धक पोषक तत्वों से परिपूर्ण भोजन की सलाह देते हैं। स्वास्थ्य एवं सौंदर्य के क्षेत्र में उपभोक्ता, उत्पाद और सेवाएं प्रदान करने वाली एक कंपनी के त्वचा विशेषज्ञ त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए निम्न टिप्स अपनाने की सलाह देते हैं-
*त्वचा को कांतिमय और पोषित बनाए रखने के लिए इसमें नमी बनाए रखना प्रतिदिन की जाने वाली शारीरिक देखभाल का एक हिस्सा होना चाहिए। साथ ही पैरों और हाथों की देखभाल को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
*जवां और बेदाग रूप के लिए हफ्ते में कम से कम दो बार शरीर की मृत त्वचा को निकालना आवश्यक होता है। इसके लिए घर पर ही स्क्रब किया जा सकता है। लेकिन स्क्रब बनाने के लिए प्राकृतिक चीजों को वरीयता मिलना चाहिए। इसे बनाने के लिए जई, शहद और चीनी के दानों को मिलाकर लेप बनाकर लगाया जा सकता है।
*दिन के आहार में ताजे फल, नारियल पानी और बादाम, अखरोट, अंजीर जैसे संतुलित आहार की परिपूर्णता होना चाहिए। साथ ही अन्य सेहतमंद आहार का सेवन भी करना चाहिए। भोजन समय पर करना भर काफी मायने रखता है।
*त्वचा को नमी देने के लिए घर में बनाए गए लेप लगाएं। जैसे पपीते के गूदे और शहद को बराबर मात्रा में मिलाकर इस लेप की चेहरे पर 15 मिनट मसाज करें, इसके बाद ठंडे पानी से धो लें।
*संतरे के छिलके आप यूं ही फैंक देते होंगे। इस बार इन्हें फैंकि ए मत और सूखा कर इन्हें मिक्सर में दरदरा पीस लीजिए। यह पावडर पानी में भिगो कर उबटन की तरह इस्तेमाल करें तो त्वचा कोमल और चमकदार हो जाती है।
*रुखी त्वचा वालों को दही उबटन की तरह पूरे शरीर पर मल कर कुछ देर बाद गुनगुने जल से ाान करना चाहिए। इससे त्वचा चिकनी और चमकदार हो जाती है। *नियमित रूप से अलसी पावडर एक चम्मच और दही का भोजन के साथ सेवन भी त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाता है।
ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं
पौष्टिक आहार लेने से विटामिन, मिनरल्स मिलते हैं, जो एजिंग संबंधित त्वचा समस्याओं से निपटने में मददगार होते हैं। साथ ही बैलेंस डाइट के साथ भरपूर नींद लेना और धूम्रपान से बचना भी जरूरी है। इन सबके साथ दिन में अधिक से अधिक पानी भी पीना अतिआवश्यक है क्योंकि पानी भी त्वचा के लिए एक औषधि के समान है। यह न केवल त्वचा को तरोताजा रखता है बल्कि त्वचा को अद्भुत चमक भी प्रदान करता है।  

हाई बीपी को नजरअंदाज न करें

अक्सर ब्लड प्रेशर को हर कोई नजरअंदाज करता रहता है। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि हमें ब्लड प्रेशर की समस्या हो ही नहीं सकती। यदि आपको भी ऐसा लगता है तो थोड़ा सोच लीजिए। इसके लिए आपको सबसे पहले ध्यान देना है कि कहीं आप बार-बार किसी चीज को भूलते तो नहीं हैं। यदि यह आदत आपमें दिनोंदिन बढ़ रही है तो एक बार अपना ब्लड प्रेशर जांच करवाना जरूरी है।
जी हां, एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि जो लोग याददाश्त से जुड़ी समस्या से जूझ रहे हैं तो उन्हें हाई बीपी की समस्या होने की आशंका ज्यादा होती है।
एमआरआई के जरिए खुलासा 
शोधकर्ताओं ने ब्लड प्रेशर के मरीजों के एमआरआई स्कैन्स के अध्ययन के आधार पर माना है कि मस्तिष्क का हिप्पोकैंपस नामक भाग, जो याददाश्त से संबंधित है, पर हाई बीपी का नेगेटिव इफेक्ट होता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि हाई बीपी के दौरान हिप्पोकैंपस में ब्लड सर्क्युलेशन का संचार सही तरह से नहीं हो पाता है। इस वजह से हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को याददाश्त से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक हो जाता है।
20 से 30 मिनट एक्सरसाइज 
यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स के शोधकर्ता बैरी ब्रॉन का मानना है कि खानपान पर नियंत्रण और रोज 20 से 30 मिनट की एक्सरसाइज से बीपी पर नियंत्रण रखा जा सकता है।  

ये भी हो सकता है गंजेपन का कारण

 वैसे तो पुरुषों में गंजेपन के कारणों में जीवनशैली से लेकर हार्मोन्स तक शामिल होते हैं। मगर हाल में इसकी एक दिलचस्प वजह का भी पता चला है। जी हां, एक शोध में यह बात सामने आई है कि पुरुषों में गंजेपन का जिम्मेदार गुरुत्वाकर्षण का नियम भी है! यकीन नहीं होता ना, मगर शोध में यह बात सामने आई है कि गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव सिर में मौजूद टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन के स्तर पर पड़ता है, जिसकी वजह से बाल झड़ सकते हैं।
तुर्की के अंकारा में प्लास्टिक सर्जन व शोधकर्ता डॉ. एमिन तुनके के अनुसार- 'हमने अपने शोध में बाल झड़ने और गुरुत्वाकर्षण के नियम से जुड़े बारीक से बारीक तत्व खोजे हैं। गुरुत्वाकर्षण के कारण सिर में मौजूद टेस्टोस्टेरॉन और एंड्रोजेनिक एलोप्सिया (एजीए) का स्तर प्रभावित होता है, जिससे बाल झड़ते हैं।"
उनका मानना है कि गुरुत्वाकर्षण के कारण ही सिर के हिस्से और शरीर के दूसरे अंगों के टेस्टोस्टेरोन व एजीए के स्तर में अंतर होता है। यही कारण है कि सिर के बालों की अपेक्षा शरीर के अन्य हिस्सों के बाल अधिक घने और मोटे होते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ जब सेक्स हार्मोन का स्तर कम होता है तो भी गंजेपन की समस्या पुरुषों में अधिक होती है। मगर इसके पीछे शरीर में गुरुत्वाकर्षण का नियम संबंधित है, इस बारे में जानकारी इस शोध से ही मिली है। यह शोध 'प्लास्टिक एंड रिकन्सट्रक्टिव जर्नल" में प्रकाशित हुआ है।  

बुधवार, 6 नवंबर 2013

फोन में बैलेंस नहीं तो भी करें दिल खोलकर बातें

अगर आपके मोबाइल का बैलेंस खत्म हो जाए तो अब कोई टेंशन की बात नहीं है। दरअसल, आपका स्मार्टफोन इस मुश्किल का भी हल निकाल सकता है। कई ऐसे स्मार्टफोन ऐप्स इंटरनेट पर मौजूद हैं, जो फ्री में नेश्नल और इंटरनेश्नल कॉल करवा सकते हैं। बस इन ऐप्स को इंस्टॉल करने की जरूरत है। इनमें से कई तो गूगल प्ले पर फ्री में भी मिल जाएंगे।
वाइबर  
बातें करने के लिए यह अब-तक का सबसे अच्छा ऐप माना जाता है। इस ऐप की मदद से आप टेक्स्ट मैसेज, फोटोज और वीडियोज भी भेज सकते हैं। इसी के साथ किसी को कॉल भी कर सकते हैं। इस ऐप को काम करने के लिए थ्री-जी और वाई-फाई की जरूरत होती है। यह ऐप स्काइप से बेहतर इसलिए माना गया है, क्योंकि ना ही यह आपके स्मार्टफोन की बैटरी को ज्यादा यूज करता है और ना ही इसमें आपके फोन की ज्यादा मेमोरी यूज होती है।
स्काइप  
इंटरनेट पर सबसे ज्यादा फ्री वॉयस और वीडियो कॉल स्काइप की मदद से किए जाते हैं। कम्प्यूटर और लैपटॉप के अलावा अब यह सॉफ्टवेयर स्मार्टफोन के लिए भी एक ऐप के रूप में मौजूद है। इस ऐप को एंड्रॉइड 2.2 और उससे आगे के वर्जन पर चलाया जा सकता है और एंड्रॉइड 2.3 से ऊपर के सभी वर्जन पर फ्रंट कैमरा भी प्रयोग किया जा सकता है।
मूडूहट एक्स डायलर 
इस ऐप का वजन काफी हल्का है। हम बात कर रहे हैं इस ऐप के द्वारा यूज की जाने वाली मेमोरी की। अगर आपके स्मार्टफोन में इंटरनल मेमोरी कम है तो यह आपके काम का ऐप है। इसे सिर्फ 1.35 एमबी मेमोरी की जरूरत होती है। यह एक कॉलिंग ऐप है, जिसकी मदद से आप किसी को भी कॉल कर सकते हैं।
 टेकफोन 
यह एक आसान कॉलिंग रिप्लेस्मेंट है। इस ऐप की मदद से फ्री कॉलिंग और भी ज्यादा सहूलियत भरी हो जाती है। इसमें आप सभी कॉन्टैक्ट्स का इस्तेमाल कर सकते हैं। मिस कॉल, इनकमिंग कॉल जैसे सभी नोटिफिकेशन आपको इसमें मिल जाएंगे।
वी चैट
कुछ ही समय में खासा लोकप्रिय हुआ यह ऐप वॉइस मैसेज्स बहुत ही इजी और स्मूदली प्रोसेस करता है। इसमें वॉइस और वीडियो कॉल के दौरान आवाज बहुत ही स्पष्ट रहती है। इसके स्माइलीज काफी एनिमेटेड और लाइवली हैं। फोटो शेयरिंग भी काफी आसानी से हो जाती है। 40 फ्रेंड्स को वाकी-टाकी मोड में रख सकते हैं।
टचपाल कॉलिंग ऐप  
बड़े ही खास तरह से डिजाइन किया गया है यह ऐप आसान से लेआउट के साथ आता है। इस ऐप में कॉन्टैक्ट्स के लिए ईजी-स्वाइप फीचर भी है। किसी भी फोन की तरह इस ऐप में भी कॉन्टैक्ट्स के लिए स्पेशल रिंग टोन सेट की जा सकती है। इसके अलावा ड्रॉ गेस्चर, फोन नंबर रजिस्ट्रेशन वगैराह की सुविधा भी है।
पिंगर  
गूगल प्ले पर उपलब्ध इस ऐप में फ्री टेक्सट और फ्री कॉलिंग की सुविधा है। इस ऐप में कई ऐसे फीचर्स हैं, जो इसे एक अल्टिमेट कॉलिंग ऐप बनाता है। इस ऐप की मदद से टेक्सट मैसेज भेजने पर फ्री मिनेट्स भी मिलते हैं जो वॉयस कॉलिंग के काम में आते हैं। सांभार: भास्कर

जंक फूड हेपेटाइटिस से भी घातक!

ताजा चेतावनी यह है कि नियमित रूप से जंक फूड खाना केवल आपकी वेस्टलाइन या मोटापे को बढ़ाने में सहायक तो है ही, बल्कि यह आपके लिवर को उतना ही नुकसान पहुंचा सकता है, जितना कि हेपेटाइटिस होने की स्थिति में पहुंचता है। लिवर शरीर को स्वस्थ रखने का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। फास्ट फूड से नुकसान की चेतावनी टेलीविजन प्रोग्राम 'द डॉक्टर्स" में दी गई है। प्रोग्राम में अध्ययन के हवाले से कहा गया कि मात्र एक माह जंक फूड या फास्ट फूड खाने से लिवर में महत्वपूर्ण बदलाव देखे जा सकते हैं।
फैट्टी लिवर की स्थिति
'द डॉक्टर्स" के डॉ. ड्र्यू ऑर्डोन का कहना है कि फैट और सैचुरेटेड फैट्स की मात्रा ऐसी स्थिति पैदा करती है, जिसे फैट्टी लिवर कहा जाता है। उन्होंने कहा कि जंक फूड से होने वाले नुकसान के लिए हम सब दोषी हैं। लेकिन समस्या यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग विशेष रूप से बच्चे फास्ट फूड खाने लगे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अगर आप पूरे माह रेाां जाकर फास्ट फूड खाते हैं तो यह आपके लिवर में ही बदलाव ला देता है। डॉ. ऑर्डोन ने कहा कि ये बदलाव ठीक उसी तरह के होते हैं, जैसे हेपेटाइटिस या पीलिया हो जाने की स्थिति में होता है। हेपेटाइटिस आगे जाकर लिवर को फेल करने का कारण बनता है।
बच्चों में फास्ट फूड का बढ़ रहा है चलन
सेहत की खतरनाक 'रिंग"
सीबीएस न्यूज डॉट कॉम के अनुसार स्टडी में पाया गया है कि फ्रेड चिकन और ओनियन रिंग्स जैसे फास्ट फूड आइटम्स का नियमित सेवन विशेष रूप से लिवर के लिए बहुत ही घातक है। इनके सेवन से कई आश्चर्यजनक काम्पलिकेशंस हो सकते हैं और उन लोगों के लिए डेंजरस है, जो इन्हें खाते हैं।
शकर, नमक, फैट बाप रे बाप!
डॉ. ऑर्डोन का कहना है कि हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम अपने खाने में नमक ज्यादा डाल रहे हैं, उसे ज्यादा फैट में पका रहे हैं और साथ ही उसमें शकर भी मिला रहे हैं। शकर क्यों? क्या इसलिए कि यह फूड को गोल्डन क्रिस्पी बनाता है? लेकिन इसके सेहत पर पड़ने वाले असरों को नजरअंदाज कर जाते हैं।
एक चेतावनी यह भी
डॉ. ऑर्डोन ने यह चेतावनी भी दी कि उपभोक्ताओं को फास्ट फूड प्रतिष्ठानों पर बिकने वाले फास्ट फूड आइटम्स के प्रति सचेत रहना चाहिए। ये फास्ट फूड कितने फ्रेश होते हैं या हेल्दी होते हैं, कोई नहीं जानता क्योंकि इन आइटम्स पर इसका कोई उल्लेख नहीं होता है। इन फूड्स में आम तौर पर केमिकल्स भी मिलाए जाते हैं। सलाद में यह स्थिति अधिक देखी जाती है। उनका कहना है कि कुछ जगहों पर सलाद में प्रोपलीन ग्लायकोल मिलाया जाता है, जो एंटी-फ्रीज होता है। कारण स्पष्ट है कि यह सलाद को गलने से बचाता है। डॉ. ऑर्डोन का कहना है कि रेाां वालों का कहना रहता है कि थोड़ा बहुत एंटी-फ्रीज होने से शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है लेकिन आपके सामने तो चॉइस है कि आप इस तरह का एंटी-फ्रीज
खाना नहीं खाएं।  

नाम में है बहुत कुछ

अगर आप भी फेसबुक और टि्वटर पर अधिक से अधिक लोगों से दोस्ती की ख्वाहिश रखने वालों में से हैं तो बहुत ही आसान उपाय से आपकी यह ख्वाहिश पूरी हो सकती है। हाल में हुए एक शोध की मानें तो छोटे नाम वाले लोग इंटरनेट पर अधिक आकर्षक होते हैं।
सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बडू डॉट कॉम के शोध के अनुसार इंटरनेट पर नाम छोटा करने वाले लोग अपोजिट सेक्स को आकर्षित करना चाहते हैं और इसी मनोविज्ञान के तहत इंटरनेट पर उनके दोस्तों की फेहरिस्त लंबी होती है।
इंटरनेट की दुनिया ऐसी ही
बडू डॉट कॉम के प्रवक्ता निकोलो फोरमई के अनुसार- आकर्षण के पीछे सिर्फ आपके लुक्स ही नहीं काम करते हैं बल्कि आपके नाम की लंबाई भी दूसरों को आकर्षित करने में मदद करती है, खासतौर पर इंटरनेट की दुनिया में कुछ ऐसा ही है।
5 माह तक किया अध्ययन
शोध के दौरान शोधकर्ताओं ने अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ब्राजील, फ्रांस, स्पेन, इटली और जर्मनी जैसे आठ देशों के लोगों का पांच महीनों तक अध्ययन किया है। इस दौरान उन्होंने 162 लोगों के नाम पर अध्ययन किया। बड़े नाम नहीं लगते अच्छे : शोध में पाया गया कि 72 प्रतिशत लोग मानते हैं कि लंबे नाम उन्हें कम आकर्षित करते हैं। शोध में 79 प्रतिशत पुरुषों ने माना कि वे महिलाओं के छोटे नाम देखकर अधिक आकर्षित होते हैं जबकि 69 प्रतिशत महिलाएं छोटे नाम वाले पुरुषों के प्रति अधिक आकर्षित होती हैं। अगर आप भी सोशल साइट्स पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहते हैं तो नाम के साथ यह प्रयोग आजमाने में कोई हर्ज नहीं है।


छोटा सा इम्प्लांट देगा कैंसर के इलाज में मदद

भविष्य में कैंसर पेशेन्ट्स के इलाज में और भी ज्यादा मदद मिल सकेगी। वैज्ञानिकों के एक दल ने पाया कि एक छोटे सेंसरी इम्प्लांट्स के जरिए ट्यूमर्स को बहुत ही सूक्ष्मता के साथ मॉनीटर करके ट्रीट किया जा सकेगा।  बताया जा रहा है कि यह डिवाइस आकार में बहुत छोटी एक आईलैश के बराबर है, जिसे पेशेन्ट्स के ट्यूमर में प्लांट किया जा सकता है और फिर डॉक्टर्स उस स्थान पर रेडियोथैरेपी या कीमोथैरेपी कर सकेंगे। डिवाइस के जरिए ट्यूमर की सही स्थिति पता चलेगी। जिससे पेशेन्ट्स के जल्दी ठीक होने के चांस ज्यादा होंगे।
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में हेरिओट-वाट यूनिवर्सिटी के सदस्यों ने संयुक्त रूप से यह शोध प्रस्तुत किया है। उन्होंने बताया कि पांच साल के प्रोजेक्ट के दौरान मिनिएचर चिप्स का विकास कर लिया जाएगा। इस चिप के विकास से कीमोथैरेपी के डोज को सीधे ट्यूमर पर देने में मदद मिलेगी। ताकि आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं होगा। कैंसर के ट्यूमर पर सीधे हमला करने वाली यदि यह डिवाइस सफल होती है तो कैंसर को आसानी से खत्म किया जा सकेगा।

अब जल्द ही बाजार में पारदर्शी मोबाइल

ताइवान की एक कंपनी ने नई पीढ़ी कापारदर्शी मोबाइल फोन बनाने का दावा किया है। यह मोबाइल फोन इस साल के अंत तक बाजार में उपलब्ध हो जाएगा।
पोलिट्रान टेक्नोलॉजी नाम की इस कंपनी ने अपने मल्टी टच मोबाइल फोन का प्रचार भी श्ाुरू कर दिया है। प्रचार के लिए तैयार किए गए मॉडल में 'स्विचेबल ग्लास" तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। 'द डेली मेल" अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक 'यह तकनीक ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड (ओएलईडी) पर आधारित है, जिसके तहत छवियों को प्रदश्र्ाित करने के लिए क्रिस्टल के तरल अण्ाुओं का इस्तेमाल किया जाता है। जब मोबाइल फोन को बंद कर दिया जाएगा, तो ये अण्ाु इकट्ठा होकर दूधिया संरचना का निर्माण्ा करेंगे लेकिन जैसे ही मोबाइल को चालू किया जाएगा, ये अण्ाु फिर से इकट्ठा होकर श्ाब्दों, तस्वीरों, अन्य छवियों का निर्माण्ा करेंगे।" इस फोन में करंट पारदर्श्ाी तारों के जरिए प्रवाहित किया जाएगा।
कंपनी के जनरल मैनेजर सैम यू ने कहा, 'यह मोबाइल इस साल के अंत तक बाजार में उपलब्ध होगा। फोन की बैटरी लिथियम आयन से बनाई गई है। इस फोन में आगे और पीछे दोनों तरफ मल्टी टच फीचर होंगे।" जापान की एक और कंपनी इस समय पारदर्श्ाी लिक्विड क्रिस्टल डिस्पले (एलसीडी) का इस्तेमाल कर घ्ाड़ी का निर्माण्ा कर रही है।

ये बैक्टीरिया हैं फायदेमंद

बैक्टीरिया का खयाल आते ही दिमाग में बीमारियों के नाम आने लगते हैं। लेकिन सभी बैक्टीरिया सेहत के लिए हानिकारक नहीं होते। कुछ बैक्टीरिया बेहद मददगार भी होते हैं। यह बैक्टीरिया खाना पचाते हैं, विटामिन्स बनाते हैं और शरीर को इन्फेक्श्ान से बचाते हैं। इन सूक्ष्मजीवों को प्रो-बायोटिक कहा जाता है।
फायदे कौन-कौन से
पाचन और पोषण्ा में लाभदायक लैक्टोबेसिलस श्रेण्ाी के प्रो-बायोटिक्स पेट के लिए वरदान हैं। इनके बिना पाचन और पाचन तंत्र अधूरा रहता है। जीवधारियों के श्ारीर में भोजन को श्ारीर में अवश्ाोषित करने और पोषण्ा चक्र की अंतिम कड़ी तक बैक्टीरिया सक्रिय रहते हैं। इसलिए लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवा देने के बाद डॉक्टर रोगी को प्रो-बायोटिक लेने की सलाह देते हैं।
झुर्रियां होंगी कम
लैक्टोबेसिली और बाइफिडो बैक्टीरिया श्ारीर में एंटीऑक्सीडेंट की भूमिका निभाते हैं। बुढ़ापे की सबसे प्रमुख वजह है-मुक्त कण्ा, जो तमाम मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं, हानिकारक तत्वों और दिनचर्या की वजह से पैदा होते हैं। अच्छे बैक्टीरिया हानिकारक फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को कम करने की श्ाक्ति रखते हैं।
एलर्जी कम करने में
ओसाका यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन के अनुसार नाक और साइनस से संबंधित एलर्जी में प्रो-बायोटिक्स बेहद कारगर होते हैं। लैक्टोबेसिलस कैसेइ, लैक्टोबेसिलस पैराकैसेइ, लैक्टोबेसिलस सिडोफिलस और बायफिडोबैक्टेरियम लोंगम जैसे अच्छे बैक्टीरिया हानिकारक प्रभावों से मुकाबले में मददगार होते हैं।
वायरस से करते मुकाबला
इटली की स्पेंजा यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने प्रो-बॉयोटिक बैक्टीरिया में वायरस के मुकाबले की श्ाक्ति खोज निकाली है। श्ाोध के अनुसार लैक्टोबेसिलस ब्रेवी जैसे बैक्टीरिया हर्पीज जैसे वायरस का मुकाबला करते हैं और श्ारीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर उसे स्वस्थ रखते हैं।
नवजातों के लिए
यदि गर्भवती महिलाओं को प्रो-बायोटिक्स से भरपूर खुराक मिले तो दूध की मात्रा और गुण्ावत्ता दोनों बढ़ सकती है।




एक जैसे हैं तो नहीं चलेगा रिश्ता!

क्या इंसानों का परस्पर विपरीत स्वभाव एक-दूसरे को खींचता है। एक नया अध्ययन तो यही कहता है। इस अध्ययन के अनुसार जो कपल्स शारीरिक रूप से और पर्सनालिटी में भी एक-दूसरे के सिमिलर हैं, तो उनमें रिलेशनशिप लंबी चलने की कोई गुंजाइश नहीं है।
पर्सनालिटी एक्सपर्ट्स ने उस सीक्रेट को खोज लिया है, जो रिलेशनशिप को लंबे समय तक बनाए रखने में मददगार है। एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबी रिलेशनशिप एक दूसरे के बेहद करीब रहने से नहीं होती है बल्कि इस बात पर टिकी होती है कि एक-दूसरे को कितना खुश रखा जाता है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है कि जो कपल्स आम तौर पर हर समय एक-दूसरे से सहमत रहते हैं, वे वास्तव में खुद को रिलेशनशिप में कंफर्ट जोन के बहुत क्लोज पाते हैं। डेली मेल के अनुसार अनुसंधानकर्ताओं ने तीन साल 732 वयस्क पुरुषों और महिलाओं की साइकोलॉजिकल प्रोफाइल का अध्ययन किया। उनसे पूछा गया था कि उनकी आपसी रिलेशनशिप कैसी है, कितनी एक-दूसरे से इंटीमेसी है, एक-दूसरे से कितने संतुष्ट हैं और अपने पार्टनर के प्रति कितनी क्लोजनेस है, क्या उन्होंने कभी ब्रेक-अप के बारे में भी सोचा, रिश्तों में कमिटमेंट और डिप्रेशन कितना है। अपने पार्टनर के कितने नजदीक हैं, यह जांचने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने एक टेस्ट लिया, जिसे आम तौर पर 'इंक्लुजन ऑफ अदर इन सेल्फ "कहा जाता है। इसमें देखा गया कि दो लोग आपस में कितना अपने व्यक्तित्व की बातें बताते हैं, वेल्यूज पर बात करते हैं या जीवन के अन्य पहलुओं को साझा करते हैं।  

दूध पीयो रोज ग्लास फुल...

अधिकांश बच्चों में दूध से परहेज की आदत देखी जा सकती है। दूध सामने आते ही नाक-मुंह बनाकर आनाकानी करना और फिर मां की डांट-डपट से दूध पीना अमूमन हर बच्चे का यही काम रहता है। मगर बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए दूध को एक पोषक आहार के रूप में माना जाता है। एक नए अध्ययन में तो इस बात का दावा किया गया है कि न सिर्फ बच्चों को बल्कि कॉलेज जाने वाले जो युवा रोजाना तीन बार दूध नहीं पीते हैं उनमें दूध पीने वालों की तुलना में मेटाबोलिक सिंड्रोम का खतरा तीन गुना ज्यादा होता है। इलिनोइस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मेक्सिको कॉलेज के तकरीबन 339 छात्रों पर यह अध्ययन किया। इनसे फूड फ्रिक्वेंसी की प्रश्नावली भरवाई गई, जिसके आधार पर मेटाबोलिक सिंड्रोम रिस्क फैक्टर्स का पता लगाया गया।
क्या पाया शोध में
शोधकर्ता मार्गरिटा टेरान-गार्शिया ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि चार युवाओं में से मात्र एक ही रोज दूध की उचित मात्रा का सेवन करता है। यह निष्कर्ष एक चेतावनी है, जिसमें 18 से 25 वर्ष के तकरीबन तीन चौथाई कॉलेज स्टूडेंट मेटाबोलिक सिंड्रोम के खतरे के नजदीक खड़े हुए हैं। मेटाबोलिक सिंड्रोम तब उत्पन्ना होता है जब एक ही व्यक्ति में तीन रिस्क फैक्टर्स एब्डॉमिनल ओबेसिटी, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर ज्यादा पाए जाते हैं। इसके अलावा अनहेल्दी कोलेस्ट्रॉल और लिपिड लेवल का बढ़ना भी मेटाबोलिक सिंड्रोम का जोखिम भरा कारक है। इन डिस्आर्डर्स के चलने व्यक्ति में धीरे-धीरे बढ़ने से हार्ट डिसीज और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है।  यही वजह है कि वैज्ञानिकों का मानना है कि डेयरी प्रोडक्ट्स ओबेसिटी के खिलाफ सुरक्षा का कार्य करते हैं। साथ ही एक्स्ट्रा वेट समेत अन्य हेल्थ प्रॉब्लम्स से निजात दिलाते हैं। शोध के तहत मार्गरिटा ने बताया कि डेयरी प्रोडक्ट्स में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, प्रोटीन होता है। कुल मिलाकर इसे किसी भी व्यक्ति के हेल्दी वेट को बनाए रखने में मदद मिलती है।
दूध का सब्सिट्यूट नहीं  
शोधकर्ताओं का कहना है कि दूध का कोई सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। आज के युवा दूध के बदले में सोडा और अन्य स्वीट ड्रिंक्स पीना पसंद करते हैं। मगर उन्हें नहीं मालूम के यह जाने-अनजाने शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी का भंडारण करते हैं। जो मोटापा बढ़ाने के साथ-साथ कई तरह की बीमारियों की उपज हो सकते हैं। कई चेतावनियों के बावजूद आज का एक चौथाई युवा वर्ग डेयरी प्रोडक्ट्स की जगह दूसरे पेय पदार्थों को तवज्जो देते हुए अपनी बॉडी में सरप्लस कैलोरी जमा कर रहे हंै।
क्या है मेटाबोलिक सिंड्रोम 
मेटाबोलिक सिंड्रोम चिकित्सकीय विकारों का ऐसा मेल है, जिससे कार्डियोवास्कुलर डिसीज एवं डायबिटीज होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पूर्व में किए एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन से यह पता चला है कि चार में से एक व्यक्ति इससे पीड़ित होता है। यह रोग बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता जाता है। चिकित्सीय राय में मेटाबोलिक सिंड्रोम एक ही व्यक्ति में 5 में से 3 जोखिम कारक होने के आधार पर तय किया जाता है। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारक कमर की मोटाई है, जिसमें पेट के मध्य भाग पर ज्यादा मोटापा होता है।  मेटाबोलिक सिंड्रोम का पता लगाने के लिए अब चार में से दो जोखिम कारकों का होना ही जरूरी है- जिनमें हाई ब्लड प्रेशर, फास्टिंग बल्ड शुगर लेवल का ज्यादा होना, ट्राइग्लिसरॉइड्स का बढ़ना एवं एचडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल कम होना शामिल है। प्रत्येक जोखिम कारक अपने आप में कार्डियोवास्कुलर जोखिम को बढ़ाते हैं। लेकिन जब पांच में से तीन जोखिम कारक एक साथ होते हैं तो रोगी की कार्डियोवास्कुलर रोग से मृत्यु की संभावना ज्यादा रहती है। साथ ही मधुमेह होने का जोखिम भी ज्यादा रहता है। 

मिल गया लंबी उम्र का राज!

वैज्ञानिकों ने लंबी उम्र का राज खोज लिया है। उन्होंने कोल्ड एन्वॉयर्नमेंट्स में रहने वाले केंचुओं की लंबी उम्र के पीछे छुपे जेनेटिक प्रोग्राम की पहचान की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मैकेनिज्म इंसान सहित वार्म-ब्लडेड (गरम खून वाले) एनिमल्स में भी काम करता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन लाइफ साइंस इंस्टीट्यूट के अनुसंधान शॉन झु का कहना है कि इस खोज ने इस बात की संभावना बढ़ा दी है कि कोल्ड एयर के संपर्क में आने अथवा कोल्ड-सेंसिटिव जेनेटिक प्रोग्राम के फार्माकोलॉजिकल स्टीमुलेशन से स्तनपायियों, जिनमें इंसान भी शामिल हैं, की जीने की उम्र को लंबा किया जा सकता है। लगभग एक सदी से अनुसंधानकर्ता इस बात को जानते हैं कि केंचुआ, मछली जैसे कोल्ड-ब्लडेड एनिमल्स कोल्ड एन्वॉयर्नमेंट्स में ज्यादा लंबे जीते हैं लेकिन इसका वास्तविक कारण वे नहीं जान पाए।
यह है कारण
ऐसा माना जाता है कि कोल्ड एन्वॉयर्नमेंट्स में एनिमल्स पेसिव थर्मोडायनेमिक प्रोसेस के कारण लंबे जीते हैं। इसका कारण यह है कि कम तापमान में केमिकल रिएक्शन की दर घट जाती है और इससे शरीर के बूढ़ा होने की गति कम हो जाती है।
लेकिन अब नया फंडा 
शॉन झु के अनुसार लेकिन अब कम से कम केंचुओं में लंबी उम्र की वजह मात्र केमिकल रिएक्शन की दर घटना नहीं है बल्कि एक एक्टिव प्रोसेस है, जो जीन से रेग्युलेट होती है। झु ने पाया कि कोल्ड एयर नर्व में पाए जाने वाली टीआरपीए वन चैनल नाम के रिसेप्टर और नेमाटोड्स में पाई जाने वाली फैट सेल्स एक्टिवेट करती है। रिजल्टिंग चेन ऑफ सिग्नेलिंग अल्टीमेटली लंबी उम्र से जुड़े जीन डीएएफ-16/फोक्सो तक पहुंचती है। जिन केंचुओं में टीआरपीए वन नहीं पाया गया, उनमें कम तापमान पर लंबी उम्र नहीं देखी गई।
कैल्सियम की भी भूमिका
अध्ययन में पहली बार पाया गया कि कैल्सियम लंबी उम्र की ओर संकेत करता है और यह फैट टिश्यू और टेम्प्रेचर रिस्पांस के बीच नॉवेल कनेक्शन बनाता है।
इंसानों पर भी लागू
चूंकि शॉन झु और और सहयोगियों द्वारा पहचाना गया मैकेनिज्म इंसानों समेत अन्य स्तनपायियों में भी पाया गया है इसलिए कम तापमान में इंसानों के अधिक जीने की संभावनाएं प्रबल हैं।
ज्यादा जी सकते हैं...
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि चूहों जैसे वार्म-ब्लडेड एनिमल्स का बॉडी टेम्प्रेचर अगर कम कर दिया जाए तो उनके जीने की उम्र 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है लेकिन यह इंसानों का बॉडी टेम्प्रेचर कम करना प्रैक्टिकल नहीं होगा। लेकिन इंसानों में एजिंग प्रोसेस के कुछ पहलुओं को स्किन और नेमाटोड्स में पाए जाने वाला फैट टिश्यू में प्रयोग किए जा सकते हैं। यह स्टडी जर्नल सेल में प्रकाशित हुई है। 

ऑरेंज ज्यूस रखे कैंसर से दूर

विटामिन 'सी" से युक्त संतरे में यूं तो कई गुण पाए जाते हैं, मगर हाल ही में किए एक नए शोध में दावा किया गया है कि प्रतिदिन एक ग्लास ऑरेंज ज्यूस कैंसर से दूर रखने में भी मददगार होता है। ऑरेंज ज्यूस में कई संभावित पॉजीटिव इफेक्ट्स पाए जाते हैं। जिसकी वजह से कैंसर जैसी बीमारी भी इसके आगे टिक नहीं पाती। विशेषकर इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स की वजह से। जो विशेषकर इसमें पाए जाने वाले हेस्पीरिटिन और नैरिंजिनिन फ्लेवेनॉइड के जरिए प्राप्त होते हैं। ऑरेंज ज्यूस के बायोलॉजिकल इफेक्ट्स के चलते इसमें कई बीमारियों से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह के क्लाइमेट में यह पाया जाता है, उसका भी असर बहुत ज्यादा होता है।
'जर्नल न्यूट्रीशन एंड कैंसर" में प्रकाशित रिव्यू आर्टिकल में ऑरेंज ज्यूस के कई बायोलॉजिकल इफेक्ट्स के बारे में बताया गया। इसमें कहा गया कि यह न केवल कीमो-प्रिवेंशन में सहयोग देता है बल्कि इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटीम्युटेजेनिक और एंटीजिनोटॉक्सिस, साइटोप्रोटेक्टिव हार्मोनल और सेल सिगन्लिंग मॉड्यूलेटिंग इफेक्ट्स भी पाए जाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऑरेंज ज्यूस एंटीमाइक्रोबायल और एंटीवायरल के रूप में कार्य करता है और जेनोबायोटिक्स के अवशोषण में मदद करता है। इसके अलावा एंटीजेनोटॉक्सिस और एंटीम्युटेजेनिक गुण की वजह से यह कैंसर सेल्स को शरीर में पनपने से रोकता है यानी प्रतिरोधक का काम करता है।  

दिन में सपने यानी याददाश्त में इजाफा!

वैसे तो किंवदंती के आधार पर अक्सर घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा कहा जाता है कि दिन में सपने देखने से मामा रास्ता भूल जाते हैं। हालांकि यह बात किस हद तक सच है ये तो नहीं कहा जा सकता। मगर यदि आप भी दिन में कुछ देर के लिए झपकते ही सपनों में खो जाते हैं, तो कोई बात नहीं। वैज्ञानिकों द्वारा किए नए शोध में पाया गया है कि दिन में सपने देखने से याददाश्त मजबूत होती है। जी हां, नए शोध से यह बात सामने आई है कि जो लोग दिन के समय सपने देखते हैं उनकी मेमोरी अन्य लोगों के मुकाबले अच्छी होती है। यह शोध 'जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल साइंस" में प्रकाशित हो चुका है। शोध से पता चला है कि दिन में सपने देखने वालों की एकाग्रता अधिक होती है और उन्हें मल्टीटास्किंग में भी आसानी होती है।
हालांकि इसे एक अलग एंगल से भी लिया गया है क्योंकि अधिकांश कामकाजी लोगों के पास दिन में झपकी लेने का समय नहीं होता। मगर शोधकर्ताओं का कहना है कि यह उन लोगों पर पूरी तरह से लागू होता है, जो  बैठे-बैठे भी सपनों की दुनिया में पहुंच जाते हैं। जी हां, यानी खुली आंखों से सपने देखना। फिर वह सपने भले ही उनके करियर के लक्ष्य को लेकर हों चाहें लाइफ के फ्यूचर के बारे में। मगर इस दौरान उनका मस्तिष्क काफी एक्टिव होता है, जो उनकी याददाश्त को भी मजबूत करने में सहायक सिद्ध होता है।


तेज धूप न बन जाए झुर्रियों का कारण

वैसे तो सूर्य के प्रकाश को विटामिन 'डी" का अच्छा स्रोत माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सूर्य की किरणें आपके चेहरे पर झुर्रियां भी ला सकती हैं? जी हां, वैसे तो सर्दियों के दिन में तेज धूप शरीर पर ज्यादा प्रभाव नहीं डालती, मगर गर्मियों की और बारिश के बाद की तेज तपन शरीर को झुलसाने का काम करती है। यहां तक कि कभी-कभी एक खिड़की से आने वाली किरणें भी नुकसानदेह हो जाती हैं।
हिन्दी महीनों के अनुसार क्वार माह को सबसे तपन वाला माना जाता है। कहते हैं इसमें मृग भी काले हो जाते हैं, इसलिए शरीर को झुलसने से बचाने के लिए इस दौरान सावधानियां बरतना भी जरूरी होता है।
दो अध्ययनों का निष्कर्ष 
ब्रिटिश अखबार 'डेली मेल" की खबर के अनुसार दो अध्ययन बताते हैं कि शीशे से छनकर आने वाली सूर्य की किरणें इस कदर खतरनाक हो सकती हैं कि चेहरे के जिस हिस्से पर पड़े, वह दूसरे हिस्सों से सात साल पुराना दिखने लगे। पहले अध्ययन में फ्रांस के बसांकन में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि किस तरह सूर्य की रोशनी के संपर्क में आने वाले चेहरे के हिस्से जल्दी बूढ़े हो जाते हैं। उन्होंने एक कामकाजी महिला का उदाहरण देते हुए बताया कि कार चलाते समय उसके चेहरे के जिस हिस्से पर धूप पड़ती थी, उस पर अधिक झुर्रियां देखी गईं। दूसरे अध्ययन के मुताबिक गर्मियों के मौसम में अपनी कार में कुछ देर बैठना भी त्वचा को एक हद तक नुकसान पहुंचा सकता है। इस दौरान चेहरे पर काले धब्बे, झुर्रियां और त्वचा सख्त हो सकती है।
इसके लिए जरूरी है धूप में निकलने के पूर्व शरीर को पूरी तरह से कॉटन के कपड़े से ढंका जाए। सन कैप का उपयोग करने के अलावा सनस्क्रीन लोशन लगाकर धूप में निकलने से यह धूप के असर को काफी हद तक दूर करने में सहायक होता है।







कॉल से ज्यादा एप के प्रयोग और ब्राउजिंग में समय देते हैं भारतीय

मोबाइल फोन का इस्तेमाल देखते ही देखते तेजी से दुनिया भर में बढ़ा है लेकिन भारत में लोग दिन भर में ढाई घंटा अपने मोबाइल को दे रहे हैं और इसमें से कुछ ही समय कॉल के लिए होता है। तो फिर आखिर करते क्या हैं फोन पर लोग।
नीलसन इनफोर्मेट ने इस संबंध में एक सर्वेक्षण किया और पाया कि लोगों को फोन का इस्तेमाल करने की लत लग गई है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय लोग अपने स्मार्टफोन के साथ बिताए समय का एक चौथाई से भी कम भाग यानी करीब 18 प्रतिशत समय कॉल और एसएमएस पर लगाते हैं। वहीं 24 प्रतिशत समय ब्राउजिंग और 21 प्रतिशत एप के प्रयोग में खर्च किए जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार स्मार्टफोन का उपयोग करने वाले ज्यादातर लोगों को इनकी लत लग चुकी है और वो इनका उपयोग कॉल या एसएमएस से ज्यादा गेम खेलने के लिए करते हैं। स्मार्टफोन पर गेम खेलने के अलावा गाने सुनने या वीडियो देखने समेत दूसरे ऑफलाइन किए गए कामों पर 37 प्रतिशत समय खर्च किए जाते हैं।
नीलसन की रिपोर्ट के अनुसार स्मार्टफोन का प्रयोग करने वाले आधे से ज्यादा यूजर्स 25 वर्ष से कम की आयु के हैं। सर्वे में पाया गया है कि यूजर्स में एक-दूसरे से डिजिटल माध्यम पर जुड़े रहने ही चाहत और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के कारण भारत में स्मार्टफोन रखने का चलन भी बढ़ा है। सस्ते होते स्मार्टफोन और आकर्षक डेटा पैकेज उपलब्ध होने की वजह से भी स्मार्टफोन की बिक्री को मदद मिली है।
मुंबई में हो रहे फिक्की फ्रेम्स में तकनीकी विशेषज्ञों के पैनल के अनुसार आने वाले समय में भारत मोबाइल एप के क्षेत्र में एक सुपरपावर बनने का माद्दा रखता है। भारत में एप के क्षेत्र में भारी योगदान की क्षमता है। पेड एप के बाजारों में गेम्स की सबसे ज्यादा डिमांड है।
सर्वे के अनुसार गेम सर्च करने वाले हर पांच यूजर में से तीन गेम खरीद लेता है। यूजर्स के बीच मैसेंजर और म्यूजिक स्ट्रीमिंग के एप पेड कैटेगरी में भी काफी लोकप्रिय हैं। एप स्टोर में मैसेंजर या चैंटिंग एप ढूंढने वाले 53 प्रतिशत लोग इसे खरीद लेते हैं जबकि 45 म्यूजिक स्ट्रीमिंग ढूंढने वाले 45 फीसदी लोग इन्हें खरीदते हैं।


सेहत का खजाना है गाजर

बाजार में लाल-लाल गाजर देखकर मन ललचा ही जाता है। गाजर का हलवा, सलाद में गाजर किसे पसंद नहीं होता है। गाजर हलवे रूप में हो या गाजर-मटर की स्वादिष्ट सब्जी, स्वाद से भरा गाजर हमारी सेहत को भी कई फायदे पहुंचाती है। प्रतिदिन गाजर का सलाद खाने या गाजर का जूस पीने से चेहरे पर चमक आती है। गाजर रक्त की विषाक्तता कम करती है और इसके सेवन से कील-मंुहासों से भी छुटकारा मिलता है। गाजर में विटामिन ए प्रचूर मात्रा में उपलब्ध होता है। इसके सेवन से आंखों की रोशनी बढ़ती है।
एक गाजर फायदे अनेक

  • गाजर में कैरोटीनॉयड होता है, जो हृदय रोगियों के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है।
  • गाजर का प्रतिदिन सेवन कोलेस्ट्राल के स्तर को कम करता है।
  • डायबिटीज के मरीजों के लिए गाजर का सेवन रक्त में शर्करा का स्तर को नियंत्रित रखने में मददगार साबित होता है।
  • गाजर खाने से पेट और फेफड़ों के कैंसर का जख्म कम होने लगता है।
  • गर्भवती या मां बन चुकी महिलाओं को गाजर को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए। इससे दूध की गुणवत्ता अच्छी होती है।

बच्चों के लिए भी गुणकारी
कैल्शियम और कैरोटीन की प्रचुर मात्र होने के कारण छोटे बच्चों के लिए यह उत्तम आहार है। गाजर से आंतों के हानिकारक कीड़े नष्ट हो जाते हैं। गाजर का सेवन रक्त को शुद्ध करता है। 10-15 दिन गाजर का रस पीने से रक्त विकार, गांठ, सूजन और त्वचा के रोगों में लाभ मिलता है। इसमें लौह तत्व भी अत्यधिक मात्र में पाया जाता है। गाजर को अच्छी तरह से चबाकर खाने से दांत भी मजबूत, स्वच्छ और चमकीले होते हैं। गाजर में निहित फाइटोकेमिकल्स, पोटैशियम और विटामिन ए, बी1, बी2, सी, ई त्वचा को पोषण देते हैं। हल्की चोट और घाव के ठीक होने में मददगार है। गाजर दिल के रोग के खतरे को भी कम करती है।


मंगलवार, 5 नवंबर 2013

टूटी-फूटी क्रॉकरी का इस्तेमाल न करें

दोस्तों या परिचितों को खाने-पीने की चीजें देते वक्त फेंगशुई का सुझाव है कि टूटी-फूटी व दरार वाली क्रॉकरी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ऐसा करना दुर्भाग्य को आमंत्रित करना है। चीनियों का विश्वास है कि ऐसी क्रॉकरी को न ही अपने लिए और न ही दूसरों के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, ऐसा करने से भाग्य कभी भी पनप नहीं सकता है। व्यवसाय या नौकरी करने वाले टूटी-फूटी क्रॉकरी का इस्तेमाल रोक दें, वरना फलता-फूलता काम भी तबाह हो सकता है। सांभार: एनबीटी 

किसी की ओर उंगली न उठाएं

किसी को भी अपनी ओर उंगली उठाने का दुस्साहस करने की अनुमति न दें और न किसी की ओर उंगली उठाएं। इससे बुरी ऊर्जाएं हमला करती हैं। अगर ऐसा होता है तो समझ लीजिए कि आप जल्दी ही किसी दुर्भाग्य के शिकार होने वाले हैं। खास तौर पर बात करते वक्त दो उंगलियां कभी न उठाएं, क्योंकि कैंची की भांति दो उंगलियों से भी जहरीली ऊर्जा निकलती है। सांभार: एनबीटी 

जल्दी मकान बेचना चाहते हैं तो...

अगर कोई अपना मकान जल्दी बेचना चाहता हो तो एक लाल लिफाफे में किचन के मटैलिक उपकरण का एक टुकडा आंगन या बगिया में रखें और साथ में कुछ मिट्टी और लकड़ी का टुकड़ा रखें। फिर इस लिफाफे को तेज गति से बहने वाली नदी में फेंक दें। चीन में ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से मकान जल्द बिक सकता है। सांभार: एनबीटी 

मौसम ने ली करवट तो छाई मस्ती




राजधानी दिल्ली मंे इन दिनों मौसम का मिजाज खुशनुमा बना हुआ है।
 ऐसे में लोग भी इसका लुत्फ उठाने में पीछे नहीं रह रहे हैं।  



ब्रेन की स्कैनिंग से संभव होगा ऑटिज्म का इलाज

ऑटिज्म से जुड़े लक्षणों की पहचान करने में मस्तिष्क की स्कैनिंग से मदद मिलती है। इससे अपने आप में खोए रहने की इस बीमारी से लोगों को शीघ्र उपचार मुहैया कराने की राह आसान होगी। खासकर बच्चों में इस शोध के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। शोधकर्ताओं के एक समूह ने इसका खुलासा किया है।
'ऑटिज्म" मनोविज्ञान और व्यवहार से जुड़ी एक बीमारी है, जिससे प्रभावित लोग असामान्य रूप से आत्मकेंद्रित होते हैं। वे संचार संबंधी विकारों से ग्रस्त होते हैं और उन्हें कहीं ध्यान करने में दिक्कत होती है। प्रमुख शोधकर्ता राजेश काना के मुताबिक यह शोध दर्शाता है कि ऑटिज्म की पहचान के लिए मस्तिष्क की संयोजकता को तंत्रिका के संकेतों के रूप में देखा जा सकता है। इससे ऑटिज्म के चिकित्सकीय परीक्षण में मदद मिलेगी। मस्तिष्क के क्षेत्र विशेष में स्थानांतरित होने वाली सूचनाएं, किसी ऑटिज्म पीड़ित व्यक्ति में कमजोर हो जाती हैं।
संकेतों को अलग तरह से समझा 
इस स्थिति में शोधकर्ताओं ने ऑटिज्म के शिकार 15 वयस्कों और 16 से 34 की उम्र के 15 ऐसे मरीजों पर अध्ययन किया, जिनमें यह बीमारी विकसित हो रही थी। अध्ययन से पता चला कि वयस्क मरीजों ने अन्य के मुकाबले सामाजिक संकेतों को बिल्कुल अलग तरह से समझा।
अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि मस्तिष्क में संचार संयोजन के दौरान आने वाली बाधाओं के कारण ऑटिज्म से पीड़ित लोगों को सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने में खास तौर पर कठिनाई होती है।  

खाने के साइड इफेक्ट्स

अचानक पेट दर्द और उल्टी के साथ डायरिया शुरू हो जाए तो समझिए आपको फूड पॉइजनिंग की शिकायत है। जहां बेहतर साफ-सफाई रख आप इससे आसानी से बच सकते हैं, वहीं थोड़ी-सी लापरवाही आपको मुश्किल में डाल सकती है। डालते हैं एक नजर, फूड पॉइजनिंग, उसके लक्षण और उससे बचने के उपायों पर...
फूड पॉइजनिंग क्या है
यदि भोजन करने के बाद सेहत से जुड़ी कोई परेशानी होती है, तो उसे फूड  पॉइजनिंग कहते हैं। जब खाद्य पदार्थ बैक्टीरिया या कीटाणुओं के कारण संक्रमित हो जाता है और उस संक्रमित खाने के बाद अपच की समस्या हो जाए तो उससे शुरू होती है फूड पॉइजनिंग की समस्या। डॉक्टर्स के मुताबिक फूड  पॉइजनिंग के लक्षण कभी कुछ घंटों में ही दिखने शुरू हो जाते हैं तो कभी एक से दो दिन बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं।
* क्या हैं इसके लक्षण :
फूड पॉइजनिंग के दौरान आपको डायरिया के साथ उल्टी शुरू हो सकती है। इसके अलावा बुखार, सिरदर्द, पेट में मरोड़ें भी हो सकती हंै।
* किस प्रकार की फूड पॉइजनिंग :
अधपके नॉन-वेजिटेरियन फूड या रेडी टू ईट फूड जैसे कुक्ड स्लाइस मीट, सॉफ्ट ची और प्री-पैक्ड सैंडविचेस् भी फूड पॉइजनिंग के लिए जिम्मेदार होते हैं। बाजार में खुले रखे गोल गप्पे या चाट और पकौड़े खाने से भी फूड पॉइजनिंग हो सकती है। इसके अलावा डेयरी प्रोडक्ट्स को फ्रेश नहीं खाया गया तो इनसे भी फूड पॉइजनिंग के चांसेस् बने रहते हैं।
* किन्हें होता है अधिक खतरा :
छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्ग फूड पॉइजनिंग की चपेट में आसानी से आ सकते हैं क्योंकि इनकी इम्यूनिटी थोड़ी कमजोर होती है, इसलिए इन्हें ज्यादा अलर्ट रहने की जरूरत है। इसके अलावा डायबिटीज, कैंसर के मरीजों या कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को भी फूड पॉइजनिंग को लेकर अलर्ट रहना चाहिए।
* इलाज क्या है :
ज्यादातर लोग जिन्हें फूड पॉइजनिंग होता है, वे बिना इलाज के भी ठीक हो जाते हैं। फूड पॉइजनिंग के बाद घरेलू इलाज के तौर पर सबसे पहले शरीर की नमी बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए हर थोड़ी-थोड़ी देर में इलेक्ट्रॉल या ग्लूकोज पीते रहें। जब तक आप बेहतर महसूस ना करें तब तक आप आसानी से पचने वाला खाना खाएं। बेहतर होगा कि दिनभर में तीन बार अधिक खाने की बजाय दो बार थोड़े-थोड़े अंतराल पर खाएं। डायरिया ठीक होने के तुरंत बाद भी कोई ठोस चीज न खाएं। अगर डायरिया दो दिन से ज्यादा हो गया तो तीसरे दिन ब्लीडिंग की आशंका हो सकती है। दवा के असर ना होने पर भी बिना डॉक्टर से कंसल्ट किए न तो दवा बंद करें ना ही दवा में कोई परिवर्तन करें।
* पकाते समय बरतें सावधानी :
-किसी भी खाने को पकाते वक्त तापमान कम से कम 100 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए।
-पके हुए भोजन को गर्म करते वक्त भी तापमान 63 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होना चाहिए। इससे नीचे के तापमान का बैक्टीरिया पर कोई असर नहीं होगा।
- कमरे के सामान्य तापमान पर रखे कच्चे या पके खाद्य पदार्थ में बैक्टीरिया तेजी से पनपता है।
- किसी भी फूड को बैक्टीरिया से बचाने के लिए फ्रिज में रखते वक्त फ्रिज का तापमान 8 से 4 डिग्री सेल्सियस या इससे नीचे रखें।
- फूड पॉइजनिंग के बाद अगर उल्टी और डायरिया की समस्या बनी रहे तो घरेलू इलाज आजमाने से बचें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
* असरदार लहसुन :
वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी में हाल ही में हुई एक स्टडी के मुताबिक फूड पॉइजनिंग के मुख्य कारकों में शामिल बैक्टीरिया से लड़ने में लहसुन दूसरे अन्य एंटीबायटिक्स की तुलना में 100 गुना अधिक कारगर है।  

वजन घटाएं सोच-समझकर

वजन घटाने के बाद आप अगर अपनी बदली काया देखकर खुश हो रहे हैं तो जान लें कि इसका एक बड़ा नुकसान भी है। हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार वजन घटाने के बाद निजी संबंधों में कड़वाहट आने की आशंका अधिक होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलीना और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में माना है कि अक्सर वजन घटाने में कामयाब व्यक्ति का साथी अधिक असुरक्षित महसूस करता है जिसकी वजह से उसके निजी संबंधों में दिक्कत हो सकती है।
शोधकर्ता डॉ. लैनसे रोमो के अनुसार वजन घटाने का संबंध न सिर्फ कोशिश कर रहे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य से होता है बल्कि उसके साथी के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।
21 जोड़ों पर किया अध्ययन
शोध के दौरान 21 जोड़ों पर दो सालों तक अध्ययन किया गया। जिसमें हर जोड़े के एक व्यक्ति को 30 किलो तक का वजन कम कराया गया और फिर उनसे उनके निजी संबंधों के बारे में ब्यौरा लिया गया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि वजन कम करने वाला व्यक्ति अपने साथी से बातचीत में सेहतमंद आदतों की चर्चा अधिक करते हैं जबकि यह चर्चा उनके साथी को प्रेरित करने के बजाए असुरक्षित महसूस कराती है। यह शोध 'हेल्थ कम्युनिकेशन जर्नल" में प्रकाशित हुआ है।  

मस्तिष्क खुद करता है अपनी सफाई

दिनभर की आपा-धापी भरी जटिल जिंदगी का हमारे मानसिक स्तर पर सीधा असर पड़ता है। वास्तव में यह असर हमारे मस्तिष्क में पाचन के वक्त उत्पादित होने वाले विषाक्त पदार्थो के कारण होता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए किसी मनोचिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं है। एक ताजा अध्ययन से पता चला है कि एक अच्छी नींद ही हमारे मस्तिष्क के इन विषाक्त पदार्थो की सफाई कर देता है, और यह सफाई नींद लेते वक्त हमारा मस्तिष्क स्वयं करता है।
हमारे मस्तिष्क का अद्भुत अपशिष्ट निष्कासन प्रणाली सोते वक्त बेहद सक्रिय हो जाता है, और अल्जाइमर एवं अन्य मस्तिष्क संबंधी विकारों तक को पैदा कर सकने वाले खतरनाक विषाक्त तत्वों की सफाई करता रहता है। अमेरिकी विज्ञान शोध पत्रिका 'साइंस' में इससे संबंधित शोध अध्ययन प्रकाशित हुआ है।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, न्यूयार्क के रोचेस्टर विश्वविद्यालय  के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि सोते वक्त मस्तिष्क की कोशिकाओं का आकार घट जाता है, जिससे कि अपशिष्ट का निष्कासन बेहतर तरीके से हो सके।
रोचेस्टर विश्वविद्यालय के चिकित्सा केंद्र के मैकेन नीडरगार्ड ने बताया, "इस अध्ययन से पता चलता है कि सुसुप्तावस्था में एवं जाग्रत अवस्था में मस्तिष्क अलग-अलग कार्य करता है।" ताजा अध्ययन में यह भी कहा गया है कि सोने से याददाश्त अच्छी होती है, और अधिक से अधिक स्मृतियां अपने मस्तिष्क में संजोई जा सकती हैं।

गिलोय एक, फायदे अनेक

गिलोय (टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया) एक बहुवर्षिय लता होती है। इसके पत्ते पान के पत्ते कि तरह होते हैं।
गिलोय शरीर के दोषों (कफ ,वात और पित्त) को संतुलित करती हैं और शरीर का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है। गिलोय का उल्टी, बेहोशी, कफ, पीलिया, धातू विकार, सिफलिस, एलर्जी सहित अन्य त्वचा विकार, चर्म रोग, झाइयां, झुर्रियां, कमजोरी, गले के संक्रमण, खांसी, छींक, विषम ज्वर नाशक, टाइफायड, मलेरिया, डेंगू, पेट कृमि, पेट के रोग, सीने में जकड़न, जोडों में दर्द, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप, हृदय दौर्बल्य, टीबी, लीवर, किडनी, मूत्र रोग, मधुमेह, रक्तशोधक, रोग पतिरोधक, गैस, बुढ़ापा रोकने वाली, खांसी मिटाने वाली, भूख बढ़ाने वाली पाकृतिक औषधि के रूप में खूब प्रयोग होता है।  ओजवर्धक, हृदयरोग नाशक , शोधनाशक और लीवर टोनिक भी है। यह पीलिया और जीर्ण ज्वर का नाश करती है अग्नि को तीव्र करती है। वातरक्त और आमवात के लिए तो यह महा विनाशक है।
और भी अनेक फायदे

  •  प्रतिदिन सुबह-शाम गिलोय का रस घी में मिलाकर या शहद या मिश्री के साथ सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती है।
  •  गैस दूर करे गैस, जोड़ों का दर्द ,शरीर का टूटना, असमय बुढ़ापा, वात असंतुलित होने का लक्षण हैं। गिलोय का एक चम्मच चूर्ण को घी के साथ लेने से वात संतुलित होता है ।
  •  गठिया गिलोय का चूर्ण शहद के साथ खाने से कफ और सोंठ के साथ आमवात से संबंधित रोग (गठिया) ठीक होता है।

कहां पाई जाती
इसकी पत्तियां नीम और आम के पेड़ों के आस-पास पाई जाती हैं। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं । इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है। आप गिलोय को अपने घर के गमले में लगा कर रस्सी से उसकी लता को बांध सकते हैं। इसके बाद इसके रस का प्रयोग कर सकते हैं। गिलोय एक दवाई के रूप में जानी जाती है, जिसका रस पीने से शरीर के अनेको कष्ट और बीमारियां दूर हो जाती हैं। अब तो बाजार में गिलोय की गोलियां, सीरप, पाउडर आदि भी मिलना शुरू हो चुके हैं।
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Giloy one, many benefits
Giloy (Tinospora cardifolia) is a multivariate creeper. Its leaves are like betel leaves.
Giloy balances the doshas of the body (Kapha, Vata and Pitta) and has the ability to rejuvenate the body. Other skin disorders including nausea, fainting, phlegm, jaundice, metallic disorders, syphilis, allergies, skin diseases, freckles, wrinkles, weakness, throat infections, coughs, sneezes, asymmetric fever, typhoid, malaria, dengue, stomach worms , Stomach diseases, chest tightness, joint pain, blood disorders, low blood pressure, cardiovascular disease, tuberculosis, liver, kidney, urinary disease, diabetes, blood pressure, anticonvulsant, gas, anti-aging, cough suppressant, hunger As a naturally drug Hane is used well. There is also a stimulant, cardiovascular agent, antidote and liver tonic. It destroys jaundice and chronic fever and intensifies fire. It is a great destroyer for the people and people.
Many more benefits
 Mixing Giloy juice with ghee or taking it with honey or sugar candy every morning and evening ends blood loss in the body.
 Removing gas: Gas, joint pain, breakdown of the body, premature aging, vata are symptoms of imbalance. Taking one spoon of Giloy powder with ghee balances Vata.
 Eating arthritis Giloy's powder with honey cures phlegm and dryness with rheumatism (arthritis).
Where is it found
Its leaves are found around neem and mango trees. The qualities of the tree on which it forms its basis, are also included in it. In this view, Giloy is considered the best medicine on Neem. You can tie Giloy in your house pot and tie his creeper with a rope. After this, you can use its juice. Giloy is known as a medicine, by drinking its juice, many problems and diseases of the body disappear. Now Giloy pills, syrup, powder etc. have also started getting in the market.


Dharmendra Singh Rajawat                www.movetonature.blogspot.com