शनिवार, 2 नवंबर 2013

सभी साथियों को दीपावली की शुभकामनाएं


दिल्ली में दीपावली पूजन मुहूर्त

दीपावली पर स्थिर लग्न में पूजा का विशेष महत्व है। इस लग्न में पूजा करने से मां लक्ष्मी जातक के यहां स्थाई तौर पर निवास करती हैं। इस बार दीपावली के दिन चार चरण में स्थिर लग्न है।

सुबह - 7:30 से 10:00 बजे तक
दोपहर- 2:00 से  3:30 बजे तक
शाम-  6:00 से 08:00 बजे तक
रात - 12:30 से 3:00 बजे तक

सुबह व दोपहर के मुहूर्त खास तौर से व्यापारियों और उद्यमियों के लिए हैं तथा शाम  और रात के मुहूर्त घर-परिवार में पूजा के लिए हैं। दीपावली की पूजा में गणेश जी का पाठ, लक्ष्मी जी का पाठ, दुर्गासप्तशती का पाठ, विष्णु सहस्त्रनाम और गोपाल सहस्त्रनाम का जप करने का विशेष महत्व है।

-पंडित संजय मुदगल, दिल्ली

अस्थमा की दवा मधुमेह, मोटापे से लड़ने में भी कारगर !

एमलेक्सानॉक्स, जापान में डॉक्टरों द्वारा अस्थमा के मरीजों को उपचार के लिए लिखी जाने वाली यह दवा अब मधुमेह और मोटापे जैसी बीमारियों से लड़ने में भी मददगार साबित होगी।
यह बात अमेरिका के शोधकर्ताओं के अध्ययन में सामने आई है। इस अध्ययन के संचालनकर्ता और मिशिगन यूनिवर्सिटी के लाइफसाइंसेज इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर एलैन साल्टेल के मुताबिक मुताबिक एमलेक्सानॉक्स, चूहों में चयापचय प्रतिक्रिया को सुधारने में मददगार साबित हुई है। जर्नल नेचर मेडिसीन की रिपोर्ट के मुताबिक जापान में एमलेक्सानॉक्स को डॉक्टरों द्वारा अस्थमा के मरीजों के उपचार के लिए प्रेसक्राइब्ड किया जा रहा है। लाइफसाइंसेज इंस्टीट्यूट के वक्तव्य के मुताबिक 2009 में सॉल्टेल लैब में प्रकाशित खोज में इस अध्ययन की पुष्टि और धारणा का विस्तार है कि जीन आईकेकेई और टीबीके1 चयापचय संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साल्टेल ने बताया कि चूहों पर किए गए प्रयोग के मुताबिक हमें लगता है कि आईकेकेई और टीबीके1 चयापचय प्रक्रिया में सहायक है। एमलेक्सानॉक्स मेटाबॉलिक सिस्टम को दुस्र्स्त करता है, जो मोटापे की संभावना को कम
करता है।  

डायबिटीज को कंट्रोल करे बैक्टीरिया!

 बैक्टीरिया शरीर में स्वास्थ्यगत समस्याओं का कारण बनते हैं। इसी तरह पेट में पाया जाने वाला एक बैक्टीरिया अल्सर और गैस्ट्रिक कैंसर की वजह बनता है लेकिन वास्तव में यह बैक्टीरिया डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए फायदेमंद है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।
वर्जीनिया बायोइन्फॉर्मेटिक्स इंस्टीट्यूट ऑफ वर्जीनिया टेक के इम्यूनोलॉजिस्ट्स के अनुसार अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला है कि गैस्ट्रिक कैंसर और पेप्टिक अल्सर के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया पेट के इकोसिस्टम को बैलेंस करता है और शरीर के वजन को नियंत्रित करता है और ग्लुकोज को टॉलरेट करता है। बीमारी रोकता भी है!
वर्जीनिया टेक में न्यूट्रिशनल इम्युनोलॉजी एंड मॉलेक्यूलर मेडिसीन लैबोरेटरी और सेंटर फॉर मॉडलिंग इम्युनिटी टू एंट्रिक पैथोजेंस के निदेशक जोसेफ बासागैन्या-रिएरा का कहना है कि बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पायलोरी गैस्ट्रिक माइक्रोबायोटा का प्रमुख सदस्य है और इसने दुनिया की आधी आबादी को संक्रमित कर रखा है। इस बैक्टीरिया के संक्रमण से कई बीमारियां जुड़ी हुई हैं लेकिन यह क्रॉनिक इन्फ्लैमेटरी, एलर्जिक या ऑटोइम्युनी डिसीजेज को कंट्रोल करता है।
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि प्रयोग के दौरान यह पहली बार पता चला है कि बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पायलोरी ओबेसिटी और डायबिटीज को नियंत्रित करने में अत्यंत लाभकारी है। यह प्रयोग चूहों पर किया गया था। जर्नल पीएलओएस वन में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पायलोरी से संक्रमित चूहों में डायबिटीज के कारण बनने वाले तत्वों से संघर्ष अधिक देखा गया।
ओवरयूज से बचें
अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि एंटीबायोटिक्स के ओवरयूज से बेनेफिशियल बैक्टीरिया नष्ट हो सकते हैं और इस कारण मोटापा, एलर्जी, इन्फ्लैमेटरी बावेल डिसीज और अस्थमा जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
इस बात पर भी निर्भर
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि संक्रमण लाभदायक है या नुकसानदेह, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बैक्टीरिया हेलिकोबैक्टर पायलोरी के जेनेटिक मैकअप और मरीज के इम्यून रिस्पांस के बीच कितना इंटरएक्शन है।
एक अध्ययन यह भी
एक अन्य अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि पेट के निचले हिस्से में पाए जाने वाले गुड बग्स न केवल अच्छी सेहत का कारण बनते हैं बल्कि डायबिटीज को दूर रखने में भी मददगार होते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटॅ के सिक चिल्ड्रंस हॉस्पिटल के जेयने डांस्का और क्लीनिक फॉर विसेरल सर्जरी एंड मेडिसीन, यूनिवर्सिटी ऑफ बर्न के एंड्र्यू मॅकफेरसन के नेतृत्व में अनुसंधान टीम ने यह निष्कर्ष निकाला है।  

पास और दूर का दिखने के पीछे होते हैं 24 जीन

आमतौर पर कोई यह कहता है कि उसे पास का दिखाई नहीं देता, या कोई यह कहता है कि उसे दूर का दिखाई नहीं देता। इसके भी
कारण होते हैं। हर व्यक्ति में इससे जुड़े कुछ जीन होते हैं, जिनके कारण अलग-अलग परिणाम सामने आते हैं। कुछ लोगों का मानना यह होता है कि यह सिस्टम पीढ़ी दर पीढ़ी  चलता है, जबकि ऐसा
बिल्कुल नहीं है।
वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे नए जीन की खोज कर ली है जो किसी भी व्यक्ति की दूरदृष्टि में सुधार लाने में सहायक हो सकते हैं। लंदन के किंग्स कॉलेज में जेनेटिक एपिडिमियोलॉजी के प्रोफेसर क्रिस हेमंड कहते हैं- हम अब तक यह जानते थे कि दूरदृष्टि या निकटदृष्टि (माइओपिया) की शिकायत पीढ़ियों से चलती है, लेकिन नई खोज के अनुसार अब ऐसा नहीं है। इसके पीछे कुछ जेनेटिक कारण होते हैं। उनके शोध में यह बात सामने आई है कि कुछ जीन का एक समूह होता है जिनसे दूरदृष्टि और निकटदृष्टि का कारण उत्पन्न् होता है।
प्रोफेसर हेमंड के शोध की रिपोर्ट जर्नल नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित की गई है। इसके मुताबिक 24 जीन ऐसे होते हैं जो निकट या दूरदृष्टि की रिस्क को 10 गुना अधिक बढ़ा देते हैं। इस शोध को अंजाम तक पहुंचाने के लिए यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया है। उनका उद्देश्य माइओपिया के कारण को जानना था जो पूरे विश्व में एक समस्या भी है।
शोध के निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने 45,000 लोगों के जेनेटिक और रफ्रेक्टिव इरर डेटा कलेक्ट किए और पाया कि दूर और निकट दृष्टि के कारक 24 जीन होते हैं। माइओपिया की समस्या से यूरोप की 30 प्रतिशत और एशिया की 80 प्रतिशत आबादी जूझ रही है। आश्चर्य की बात यह है कि एशियाई और यूरोपीय नागरिकों के जीन के समूह में कोई विशेष अंतर नहीं पाया गया।
माइओपिया का प्रमुख कारण आंखों की लंबाई होती है। अकसर रोशनी या लाइट रेटिना के ठीक सामने पड़ती है लेकिन दूसरे हिस्सों में नहीं पहुंचती। इसके परिणामस्वरुप दृश्य धुंधला जाता है और इसका उपाय हम ग्लासेस, कान्टैक्ट लेंस या फिर सर्जरी के जरिए करते हैं। 

16 घंटे में 150 बार जाती है मोबाइल पर नजर

 मौजूदा समय में मोबाइल फोन जीवन का अटूट हिस्सा बन गया है, जिसके न होने से एक कमी का एहसास होता है। हालिया एक शोध से भी यही स्पष्ट होता है कि व्यक्ति अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन के साथ्ा ही व्यतीत करता है।
शोध  के मुताबिक एक सामान्य मोबाइल यूजर हर साढ़े छह मिनट बाद अपना मोबाइल चेक करता है। अध्ययन के मुताबिक औसतन एक व्यक्ति दिन के 16 घ्ांटों में जबकि वह जगा होता है तकरीबन 150 बार अपना मोबाइल चेक करता है। ज्यादातर लोग सुबह उठकर सबसे पहले अपना मोबाइल चेक करते हैं और उसके बाद कोई दूसरा काम करते हैं। अगर दिन की श्ाुरुआत मोबाइल का अलार्म बंद करने से होती है तो रात को अलार्म लगाने के बाद ही ज्यादातर लोग बिस्तर पर जाते हैं। सोने और जागने के बीच इंटरनेट चेक करने, ई-मेल पढ़ने, फोन करने, मैसेज भेजने से लेकर ढेरों काम के लिए हम मोबाइल पर ही निर्भर हैं।
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि जो लोग मोबाइल फोन जैसे डिवाइसों को लेकर संवेदनश्ाील नहीं भी होते हैं वे भी नियमित समय पर मोबाइल चेक करते हैं। मोबाइल टेक्नोलॉजी कंसल्टेंट टॉमी अहोनेन के अनुसार एक व्यक्ति हर रोज औसतन 22 फोन कॉल करता या रिसीव करता है और इतनी ही संख्या में टेक्स्ट मैसेज प्राप्त करता या भेजता है। 

कलर ब्लाइंडनेस दूर करेगा लेंस

कलर ब्लाइंड इंसान हरे और लाल रंग को नहीं पहचान पाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने चश्मे के उस लेंस को खोज लिया है जिससे रंग की पहचान न कर सकने वाली बीमारी यानी 'कलर ब्लाइंडनेस" का इलाज किया जा सकता है।
कलर ब्लाइंडनेस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति लाल और हरे रंग को नहीं पहचान पाता, साथ ही कई महिलाओं के अलावा हर 10 में से एक पुरुष, इस बीमारी से पीड़ित होता है। ऑक्सी-आइसो नाम के लेंस को अमेरिका के रिसर्च संस्थान ने ईजाद किया है जिससे कि डॉक्टर उन नसों को देख पाएंगे जहां तनाव है। जांच से पता चला है कि ये लेंस कलर ब्लाइंड इंसान की लाल और हरे रंगों को पहचाने में मदद करते हैं।
रंग पहचानने में मददगार
लेकिन इस लेंस का इस्तेमाल गोताखोर नहीं कर सकते क्योंकि ये लेंस पीले और नीले रंग को पहचानने की क्षमता को कम करता है। न्यूरोबॉयोलॉजिस्ट मार्क चांगिजी ने इस लेंस को विकसित किया है। वे कहते हैं- बाकी स्तनधारियों के मुकाबले इंसानों में रंगों को पहचानने की बेहतर क्षमता है। ऑक्सी-आइसो फिल्टर सिर्फ उन रंगों को उभारता है जो हरे या लाल होते हैं जिन्हें कलर ब्लाइंड नहीं देख पाते।
चटख दिखता है लाल रंग
डेनियल बोर कलर ब्लाइंड हैं और वो ससेक्स यूनिवर्सिटी के सैकलर सेंटर फॉर कांशियशनेस में न्यूरो वैज्ञानिक हैं। उनके अनुसार ये लेंस लाल रंग को बेहद चटख दिखाता है। हालांकि उन्हें इसकी सफलता पर आशंका भी है।
अदृश्य हो जाता है पीला रंग
डेनियल बोर कहते हैं कि ये लेंस पीले रंग को पूरी तरह से अदृश्य बना देता है। उनके मुताबिक- मेरी बेटी के कम्प्यूटर मॉनिटर पर कुछ पीले रंग थे लेकिन मैं उन्हें देख ही नहीं पाया। तो ये उन लोगों के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है जिन्हें ये समस्या है। 

महिलाओं के मोतियों-से दांत पर मरते हैं पुरुष!

महिलाएं और युवतियां अपने फिगर या फेस को भूल जाएं। उन्हें तो बस इस बात पर गौर करना चाहिए कि मर्द खूबसूरत फिगर या चेहरे की बजाय मोतियों से चमकते दांतों वाली महिलाओं की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। एक नए अध्ययन में यह मजेदार निष्कर्ष निकला है।
इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि पुरुष किसी महिला में पहली चीज जो देखते हैं, वे हैं उसके  दांत। शोध में यह बात भी सामने आई है कि किसी नई महिला मित्र की खोज में लगे पुरुष के मापदंडों में आकर्षक दांत पहली वरीयता पर होते हैं।
अध्ययन में भाग लेने वाले 58 फीसद पुरुषों ने कहा कि वे महिलाओं के चमकते दांतों की ओर अधिक ध्यान देते हैं। इसके बाद बाकी चीजें आती हैं। अध्ययन में शामिल 71 प्रतिशत महिलाओं ने भी कहा कि वे किसी पुरुष में जो पहली चीज देखती हैं, वह उनके दांत ही होते हैं। 'डेली मेल' में यह खबर प्रकाशित हुई है।
बालों पर भी होते हैं फिदा
मैच डॉट कॉम द्वारा किए गए अध्ययन में शामिल 51 प्रतिशत पुरुषों की राय थी कि किसी महिला को पसंद करते समय उनके बालों पर भी वे ध्यान देते हैं। इसके बाद 45 प्रतिशत ने कपड़ों को अपनी वरीयता बताया। 55 प्रतिशत पुरुषों ने कहा कि वे महिला की भाषा में इस्तेमाल ग्रामर पर भी ध्यान देते हैं, जबकि 69 प्रतिशत महिलाओं ने इसे अपनी वरीयता बताया। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि 53 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों के बालों को भी अपनी पसंद की सूची में स्थान देती हैं।
पुरुषों की पसंद : दांत, बाल, कपड़े और ग्रामर। 

ये टैटू बड़े काम का!

प्रिंसटन के एक अनुसंधानकर्ता ने दावा किया है कि उसने ऐसा नया हाईटेक टैकू बनाने में सफलता हासिल की है, जो बैक्टीरियल इंफेक्शंस को पकड़ लेगा और आप जब भी बीमार होंगे, यह अन्य लोगों को अलर्ट कर देगा। इसमें एक एंटीना होगा, जो यह अलर्ट भेजेगा।
गोल्ड और सिल्क से बुना हुआ यह टैटू बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण को पहचान लेगा और अन्य को यह बता देगा कि कब आप बीमार हैं या नहीं। उच्च तकनीक से बने इस टैटू में एक एंटीना भी लगा है जो पास ही स्थित कम्प्यूटर को वायरलेस अलर्ट भेजकर आपकी बीमारी की जानकारी देगा।
अस्थमा से उपजा आइडिया
डेली मेल में छपी खबर के अनुसार इस टैटू का विकास प्रिंसटन के प्रोफेसर माइकल मॅकअल्पाइन ने किया है। माइकल का कहना है कि उन्हें इस टैटू को बनाने का आइडिया एक महिला के बारे में पढ़ने के बाद मिला, जिसे ग्रॉसरी स्टोर पर अचानक ही अस्थमा का अटैक आ गया था। माइकल ने टाइम्स ऑफ ट्रेंटन को बताया कि वह महिला सांस बड़ी मुश्किल से ले पा रही थी और अपने पास खड़े व्यक्ति को बताने में असमर्थ थी कि उसे आखिर हुआ क्या है लेकिन उसकी बांह पर एक टैटू था, जिसने संकेत दे दिया था कि महिला को अस्थमा का अटैक आया है।माइकल ने कहा-'मैंने सोचा कि उस टैटू का ही कमाल था कि महिला की अस्थमा की बीमारी का तत्काल पता चल गया तो ऐसा एक्टिव टैटू भी होना चाहिए जो लगातार आपकी सेहत पर नजर रख सके। माइकल बहुत जल्द अपना प्रयोग अस्पतालों में शुरू करेंगे। उन्हें उम्मीद है कि वे टैटू में लगे एंटीना से व्यक्ति के दैनिक कामकाज पर कोई असर नहीं होगा।
पहले भी की है खोज
यह पहला मौका नहीं है जब माइकल ने शरीर में बीमारियों का पता करने का नॉवेल तरीका खोजा होगा। इससे पहले उन्होंने और उनकी टीम ने किसी व्यक्ति की सांस के आधार पर उसके शरीर में मौजूद बीमारी पता करने का तरीका ढूंढ़ा था।  

स्टेम सेल से हो सकेगा हड्डियों का विकास

स्टेम सेल से टूटी हडि्डयों की वृद्धि में मदद मिल सकती है। श्ाोधकर्ताओं ने एक नई तकनीक का विकास किया है जिसके तहत स्टेम सेल को एक कठोर पदार्थ के साथ मिलाने पर हडि्डयों में एक बार फिर से वृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है। इस पदार्थ का विकास यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग और साउथैंपटन की ओर से किया गया है।       यह पदार्थ मधुमक्खी के छत्ते की तरह है। इससे होकर रक्त प्रवाहित हो सकता है और स्टेम सेल इससे जुड़ सकता है व हडि्डयों का विकास हो सकता है। यह अध्ययन एडवांस्ड फंक्श्ानल मटैरियल्स जर्नल में प्रकाश्ाित किया गया है। जानवरों पर किए गए इसके कुछ प्रयोग सफल रहे हैं। श्ाोधकर्ता मनुष्यों पर भी इसका परीक्षण्ा करने की तैयारी में हैं।
यह एक क्रांति होगी
एडिनबर्ग स्कूल ऑफ केमिस्ट्री के प्रोफेसर मार्क ब्रैडली ने कहा कि इस तकनीक के इस्तेमाल से टूटी हड्डी एक बार फिर विकास करने लगती है। यदि मानव में इसका परीक्षण्ा सफल हुआ तो यह एक क्रांति होगी। खासतौर पर उम्रदराज लोगों के लिए यह बहुत लाभदायक साबित होगा।  

सीजेरियन बच्चे होते हैं अधिक बीमार

ऐसा माना जाता रहा है कि नॉर्मल डिलिवरी बच्चे और मां दोनों के लिए बेहतर होती है। कई बार महिलाओं में सामान्य डिलिवरी होने की संभावना नहीं रहती है और कई बार वे स्वयं भी प्रसव पीड़ा से बचने के लिए सीजेरियन का रास्ता चुनती है। लेकिन एक रिसर्च बताती है कि सीजेरियन का प्रभाव बच्चों की सेहत पर पड़ता है।
गट्स में छपी स्वीडन की रिसर्च रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि सीजेरियन बच्चों में हेल्दी बैक्टीरिया का स्तर सामान्य प्रसव से पैदा हुए बच्चों की तुलना कम होता है। इससे सीजेरियन बच्चों मे बार-बार बीमार पड़ने का खतरा अध्ािक रहता है। ऐसे बच्चों का इम्यून सिस्टम सामान्य से कमजोर होता है, जिससे इन्हें बार-बार एलर्जी हो जाती है। 24 बच्चों पर किए गए इस अध्ययन में 9 बच्चे ऐसे थे जो सीजेरियन पैदा हुए थे। शोध्ा के दौरान उनमें हेल्दी बैक्टीरिया की संख्या कम पाई गई। इस दौरान एक हफ्ते, 6, 12 और 24 हफ्तों के बच्चों के सैंपल की जांच की गई। उनके  इम्यून सिस्टम को जांचने के लिए ब्लड सैंपल्स भी लिए गए। इस दौरान पाया गया कि जिन बच्चों का जन्म सामान्य प्रसव से नहीं हुआ है उनमें बैक्टेरॉयडेट्स नामक बैक्टीरिया का ग्रुप मौजूद नहीं था। यहां तक कि उन बच्चों में एक साल की उम्र तक भी इस बैक्टीरिया का निर्माण नहीं हो पाया था।
क्या करता है यह बैक्टीरिया
शोध्ाकर्ताओं का कहना है कि बैक्टेरॉयडेट्स बैक्टीरिया इम्यून सिस्टम को बूस्ट अप करने का काम करता है। एलर्जी, डायबिटीज और इनफ्लेमेंटरी बाउल की स्थिति में अति सक्रिय नहीं होता। प्रसव के दौरान मांओं के जरिए बैक्टीरिया बच्चे को पास हो जाता है, लेकिन सीजेरियन में ऐसी स्थिति नहीं बन पाती।  

रोजमेरी की खुशबू बढ़ा सकती है याददाश्त

रोजमेरी (केशवास) की हर्ब्स के बारे में शेक्सपीयर भी जानते थे, तभी तो उन्होंने अपने नाटक में इसका जिक्र अक्सर किया है। कहा जाता है  रोजमेरी से तैयार ऑयल की खुशबू याददाश्त बढ़ा सकती है। एक नए अध्ययन में अब यह बात साबित हो गई है। रोजमेरी के तेल की उम्दा खुशबू वयस्कों में याददाश्त को न सिर्फ बढ़ाती है बल्कि भविष्य के टास्क को बेहतर तरीके से करने के लिए उन्हें सक्षम भी बनाती है। रोजमेरी का रिश्ता प्रारंभ से ही याददाश्त और स्वामीभक्ति से जुड़ा है। इसी वजह से इनका प्रयोग प्राचीनकाल में मिस्रवासी शादियों और अंतिम संस्कार के अवसर पर करते थे। रोजमेरी के इन गुणों से परिचित अंग्रेजी के महान लेखक और कवि विलियम शेक्सपीयर ने  भी अपने नाटक 'हेमलेट" में इसका जिक्र किया।
 हेमलेट में ओफेलिया कहती हैं 'यह है रोजमेरी, जो स्मरण के लिए होती है।"
'टेलीग्राफ" की रिपोर्ट के अनुसार नए अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों की याददाश्त में सुधार का संबंध उनके मूड से नहीं देखा गया, मगर यह पाया गया कि रोजमेरी ऑयल में स्थित एक विशेष केमिकल के प्रभाव के कारण इसका असर याददाश्त पर पड़ता है।शोधकर्ता इस शोध को ब्रिटेन के हैरोगेट स्थित 'ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी" की वार्षिक कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत करेंगे। इस शोध के निष्कर्ष लोगों में उम्र के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में कम हो रही याददाश्त के मामले में कारगर सिद्ध होंगे।
इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता डॉ. मार्ग मोस ने कहा कि हम अपने प्रारंभिक शोध को और मजबूती देना चाहते हैं जिसमें बताया गया है कि रोजमेरी अरोमा से दीर्घकाल के लिए याददाश्त अच्छी होती है। मेंटल एरिथमेटिक के लिए भी यह बेहतर है।
कैसे किया अध्ययन
इस अध्ययन में 66 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इन्हें दो समूहों में  विभाजित किया गया और इन्हें अलग-अलग कमरों में इंतजार करने के लिए कहा गया। इनमें से एक कमरे को रोजमेरी ऑयल से सेंटेड किया गया। इसके बाद इनका मेमरी टेस्ट लिया गया, जिसमें कमरे में छिपे ऑब्जेक्ट्स को ढूंढने के साथ कई अन्य टास्क दिए गए।
इसमें पाया गया कि जो लोग रोजमेरी ऑयल से सेंटेड कमरे में थे वे अपने मेमरी टास्क को बेहतर तरीके से कर पाए और इनके ब्लड में याददाश्त को बढ़ाने वाले एक हार्मोन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया।
शोध का निष्कर्ष : इस शोध से यह निष्कर्ष निकला कि रोजमेरी ऑयल की खुशबू शरीर के केमिकल सिस्टम पर प्रभाव डालती है और इसका असर याददाश्त पर भी पड़ता है।  

अमृत तुल्य जवारे रोग निवारे

प्रकृति ने हमें ढेर सारी नियामतें दी हैं, जिनसे हम आसानी से स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं। बस उन्हें जानने की जरूरत है। चैत्र नवरात्र के इस पावन पर्व पर माता की आराधना के लिए उगाए जाने वाले जवारे भी इन्हीं नियामतों में से एक है। मां की पूजा के लिए घटस्थापना के दिन ही जवारे बोने का रिवाज वर्षों से चला आ रहा है। शक्ति स्वरूपा मां की पूजा में जवारों का उपयोग संभवत: उसके शक्तिवर्धक गुणों की वजह से ही शुरू हुआ होगा।आहार शास्त्री जवारों को पृथ्वी की संजीवनी बूटी मानते हैं। जवारे के रस को 'ग्रीन ब्लड" नाम इसलिए ही दिया गया है क्योंकि इसका सेवन कई रोगों में लाभदायक माना जाता है। जवारे के रस का प्रतिदिन सेवन अमृतपान के समान माना गया है। वाकई गेहूं में ईश्वर प्रदत्त अपूर्व गुण है। तभी तो बारह मास भोजन में गेहूं का प्रयोग किया जाता है। वैज्ञानिक गेहूं को रोगनाशक मानते हैं, यही वजह है कि गेहूं के जवारे व्यक्ति को असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाने में सहायक होते हैं। इसके अलावा अब वैज्ञानिक जौ के जवारों को इससे भी अधिक पोषक मानते हैं। इसलिए गेहूं या जौ के जवारों के रस का सेवन कर बेहतर स्वास्थ्य पाया जा सकता है।
---------------------------------------------

Joware disease like amrit

Nature has given us many rules, from which we can easily get health benefits. Just what they need to know. Javaras grown for the worship of mother on this auspicious festival of Chaitra Navratri is also one of these rules. The custom of sowing jowar for the worship of mother has been going on for years. The use of jowar in the worship of Shakti Swarupa Maa may have started because of its powerful properties. Jaware juice has been given the name "green blood" only because its consumption is considered beneficial in many diseases. Daily intake of jowar juice has been considered similar to that of nectar. The wheat has a God-given uncommon quality. Only then twelve Wheat is used in the mass meal. Scientists consider wheat to be a curative, which is why wheat jowar is helpful in getting rid of incurable diseases. May include. In addition, now that the Jwaron scientific barley are considered more nutritious. So consumed Jwaron juice of wheat or barley can be found better health.

Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

अचूक शक्ति है प्रार्थना

चैत्र प्रतिपदा यानी हिंदू नववर्ष की शुरुआत । हिंदू संस्कृति में नववर्ष की शुरुआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है और गुरुवार को सभी इस नववर्ष को मनाएंगे। प्रार्थना, आराधना और नए संकल्पों का यह पर्व हर व्यक्ति को जीवन में नई शुरुआत करने का एक और मौका देता है। इसी को ध्यान में रखते हुए आज हम प्रार्थना और उस पर किए वैज्ञानिक अनुसंधान के बारे जानते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में हाल ही में एक शोध में पाया गया कि धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों में बीमारियों की आशंका कम होती है। उनका मानना है कि प्रार्थना में वह शक्ति है, जो अच्छी-अच्छी दवाइयों में नहीं मिलेगी।
तनाव दूर करने में सहायक
आज की भागमभाग भरी जिंदगी में हर एक के हिस्से में तनाव (स्ट्रेस) भी शामिल हो गया। बच्चों से लेकर बड़ों तक कोई भी इस तनाव से अछूता नहीं है। किसी को थोड़ा तनाव है, तो किसी को बहुत ज्यादा, और सब इससे अपने-अपने स्तर पर निपटने का प्रयास करते रहते हैं। जिसमें व्यायाम से लेकर डॉक्टरी सलाह तक शामिल होती है। मगर इन सबके अलावा भी एक उपाय है, जो तनाव को आपके पास से छू-मंतर करने में कारगर हो सकता है और वह उपाय है प्रार्थना। अब तो वैज्ञानिक भी प्रार्थना और उससे होने वाले फायदों को मानने लगे हैं।
खुद से पूछिए
इस शोध के बाद हम खुद से यह पूछ सकते हैं कि क्या तनाव में हमने कभी प्रार्थना का सहारा लिया है या नहीं? यदि नहीं लिया तो इसकी शुरुआत अभी से की जा सकती है क्योंकि प्रार्थना से न सिर्फ तनाव का स्तर कम होता है, बल्कि यह कई बीमारियों से बचाने में भी मददगार साबित होती है। इस नए शोध में दावा किया गया है कि प्रार्थना मन के साथ-साथ संपूर्ण शरीर को भी स्वस्थ रखती है। इससे ब्लड प्रेशर, अवसाद, एंग्जाइटी जैसे कई विकारों पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है। केवल इतना ही नहीं प्रार्थना उम्र के असर को भी आपके चेहरे से छिपा सकती है, ऐसा शोधकर्ता मानने लगे हैं।
सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है 
नियमित रूप से पूजा-प्रार्थना करने से मन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। आज के समय की अनियमित जीवन शैली की वजह से शरीर रोगों की खान बनता जा रहा है, मगर ऐसे में प्रार्थना को अपने जीवन में नियमित रूप से शामिल करने से निश्चित ही बदलाव महसूस किया जा सकता है।
मन से किया जाए  
प्रार्थना का सकारात्मक प्रभाव देखने के लिए जरूरी है कि उसे सच्चे मन से किया जाए। सच्चे मन से की गई प्रार्थना हमेशा पूरी होती है। प्रार्थना व्यक्ति के आसपास एक ऐसा 'ऑरा"  बनाती है, जो बीमारियों के खिलाफ रक्षा कवच का कार्य करता है।
प्रार्थना में समाए ढेरों लाभ

  • प्रार्थना से मन को शांति और शक्ति मिलती है और नेगेटिव बातों से दूर रहा जा सकता है। 
  • वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रार्थना से शरीर में ऐसे हार्मोन्स का स्राव होता है, जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • प्रार्थना से स्मरण शक्ति बढ़ती है और यह क्रोध पर नियंत्रण रखने में भी मदद दिलाती है। 

कहीं गायब न हो जाए आपकी मुस्कान

आपकी सिर्फ एक मुस्कान, बिगड़ा हुआ काम भी बना देती है, लेकिन इस मुस्कान को बनाए रखने के लिए कुछ चीजों का ध्यान जरूरी है। दांतों की बेहतर सफाई से आपके पूरे मुंह की सेहत बनी रह सकती है। जानिए, मुस्कान के ऐसे  दुश्मनों के बारे में जो आपके दांतों की रौनक और मुंह की सेहत छीन लेते हैं और आपको पता भी नहीं लगता।
स्पोर्ट्स ड्रिंक्स
एकेडमी ऑफ जनरल डेंटिस्ट्री के श्ाोध के अनुसार स्पोर्ट्स ड्रिंक्स दांतों के लिए फायदेमंद नहीं। इनमें श्ाकर की अधिकता होती है जिससे दांतों पर बैक्टीरियल संक्रमण्ा अधिक होते हैं और दांत जल्दी सड़ते हैं। इसके अलावा इनमें मौजूद एसिडिक तत्व दांतों की सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाते हैं।
बोतलबंद पानी
बोतलबंद पानी की प्रोसेसिंग के दौरान फ्लोराइड की मात्रा कम कर दी जाती है जो दांतों की सेहत के लिए ठीक नहीं है। ऐसे में अगर बोतलबंद पानी पीना आपकी मजबूरी है तो खरीदते वक्त उसके लेबल पर फ्लोराइड की मात्रा जांचने के बाद ही खरीदें।
दांत पीसना
बात-बात पर दांत पीसने की आपकी आदत भी दांतों व जबड़ों के लिए दर्द का सबब हो सकती है। इससे दांत अधिक संवेदनश्ाील हो जाते हैं और मुस्कराने पर भी आपको दर्द हो सकता है।
कम पानी पीना
कम पानी पीने से दांतों को संक्रमण का खतरा रहता है। कम पानी पीने से मुंह में लार अच्छी तरह नहीं बन पाती है जिससे हानिकारक बैक्टीरिया तेजी से संक्रमण फैलाने का काम करते हैं।
तंबाकू
तंबाकू का सेवन न सिर्फ दांतों को पीलापन देता है बल्कि यह आपको मुंह के कैंसर का श्ािकार भी बना सकता है। ऐसे में सेहतमंद मुस्कान के लिए तंबाकू से दूरी बरतना श्ाुरूकर दें। 

अब आपकी ईटिंग हैबिट्स बता देगा 'स्मार्ट टूथ"

दांतों के बारे में अक्सर डॉक्टरों से लेकर बड़े-बुजुर्गों द्वारा सलाह दी जाती है कि खाने को आराम से चबा-चबाकर खाना चाहिए। हड़बड़ी में खाने पर वह ठीक से पच नहीं पाता है। इसके बावजूद लोग ऐसी सलाह को अनसुना कर देते हैं। लेकिन अब इस परेशानी का समाधान निकालने के लिए वैज्ञानिकों ने ऐसा 'स्मार्ट टूथ" बनाया है, जिससे यह पता चल सकेगा कि लोग चबाने, खाने और पीने में कितना समय खर्च करते हैं। इतना ही नहीं इस 'स्मार्ट टूथ" की मदद से सांस संबंधी समस्याओं के साथ खान-पान की दिनचर्या के पालन का भी पता लगाया जा सकता है।
कैसे करता है काम
'नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी" के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया यह गैजेट दिखने में बिल्कुल एक आम दांत की तरह दिखता है, लेकिन इस्तेमाल के लिहाज से बहुत उपयोगी है। 'स्मार्ट टूथ" एक कम्प्यूटर प्रोग्राम से जुड़ा हुआ है। कुछ भी चबाने, खाने-पीने और धूम्रपान करने पर इसकी जानकारी कम्प्यूटर प्रोग्राम में फीड हो जाती है। इसका विश्लेषण कर वैज्ञानिक मुंह के अंदर की गतिविधियों का पता लगाते हैं। इनका आकलन करने के लिए गैजेट में नाखून के आकार का चिपनुमा एक सेंसर लगाया गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि दंत चिकित्सकों के लिए यह दांत बहुत उपयोगी हो सकता है। दंत संकाय के प्रमुख डॉ. टी. जॉनसन ने कहा कि दंत चिकित्सा में इसके बहुत सारे उपयोग हो सकते हैं। यह दांत शोधकर्ताओं के लिए भी बहुत उपयोगी है और आने वाले समय में इसका उपयोग और बढ़ेगा। डॉक्टरों के अनुसार मुंह हमारे शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारे खानपान का स्वास्थ्य पर असर होता है। उन्होंने कहा कि यदि 'स्मार्ट टूथ" हमारे खाने-पीने की जासूसी कर उसका हिसाब-किताब रखेगा तो हम अपने स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल कर सकेंगे और बीमार होने पर डॉक्टरों को बीमारी का पता लगाने में भी मदद मिलेगी।
इस्तेमाल को हरी झंडी
वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक 'स्मार्ट टूथ" का परीक्षण करने के बाद इसके इस्तेमाल को हरी झंडी दी है। उन्होंने कुछ लोगों के दांत से इस गैजेट को जोड़ा और उन्हें कुछ कार्य करने को दिए। इसके तहत प्रतिभागियों को एक बोतल पानी पीना,  च्युइंगम चबाना और एक कहानी को जोर से पढ़ना था। इस दौरान शोधकर्ताओं ने घड़ी से मिलाकर सभी प्रतिभागियों के कार्य करने के समय पर नजर रखी।  

ज्यादा समय की नींद देती है डायबिटीज से मुक्ति

भरपूर नींद लेने से न सिर्फ दिमाग स्वस्थ रहता है बल्कि व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ महसूस करता है। ऐसा कई अध्ययनों में साफ हो चुका है। नए अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर बताया गया है कि किशोरावस्था में ज्यादा सोने वाले युवाओं को भविष्य में टाइप 2 डायबिटीज होने की आशंका कम होती है।
लॉस एंजिल्स बॉयोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया कि लंबे समय तक सोने वाले किशोरों के शरीर में इंसुलिन का स्तर सही रहता है जिससे उन्हें टाइप-2 डायबिटीज होने की आशंका कम होती है। इंसुलिन की संवेदनशीलता से शरीर में ब्लड शुगर का स्तर नहीं बढ़ता।
शोध में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ.पीटर लियू ने बताया कि लंबे समय तक गहरी नींद लेना सभी को पसंद होता है, लेकिन काम के दबाव और व्यस्त दिनचर्या के बीच यह संभव नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि नए शोध से साफ हुआ है कि नींद के घंटों में बढ़ोतरी से शरीर में इंसुलिन का प्रयोग बेहतर हो सकता है, जिससे टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा कम हो जाता है। इंसुलिन एक प्रकार का हार्मोन है, जो शरीर में ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित रखता है। टाइप 2 डायबिटीज की समस्या में शरीर में इंसुलिन का उत्पादन प्रभावित होने से शरीर में इंसुलिन की मात्रा कम हो जाती है। वहीं शरीर में इंसुलिन की मौजूदगी टाइप 2 डायबिटीज के खतरे को कम करती है। लियू ने बताया कि शोध से सामने आए परिणामों के मुताबिक पूरे सप्ताह लंबे समय तक सोने वाले किशोरों के शरीर में इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है, जिससे उन्हें भविष्य में डायबिटीज होने का खतरा कम हो जाता है।
कम सोने की आदत है मोटापेकी सबसे बड़ी वजह
यदि आप भी अनिद्रा के शिकार हैं तो इसका उपचार जल्द कीजिए, क्योंकि नींद की समस्या से ग्रसित लोग मोटापे का शिकार जल्द होते हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि नींद और मोटापा एक-दूसरे से संबंधित है। शोध के मुताबिक नींद की कमी से व्यक्ति में केवल थकान और चिड़चिड़ापन ही उत्पन्ना नहीं होता, बल्कि उसकी कमर का आकार भी बेडौल होने की गुंजाइश बढ़ जाती है। स्टॉकहोम स्थित उपसला यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में इन तथ्यों का खुलासा किया है कि नींद की कमी का भूख के हार्मोंस से कहीं न कहीं संबंध है। नींद न आने पर व्यक्ति को खाने की तलब लगती है और वह असमय भी कुछ न कुछ खाने लगता है। 

जीवन की संजीवनी है खुशी

किसी ने सच ही कहा है कि खुश रहना हजार परेशानियों का हल है। जब आप खुश रहते हैं तो जीवन में अपार संभावनाएं दिखाई देती हैं और किसी भी तरह की चुनौती का सामना करने में आप सक्षम रहते हैं। मगर नाखुश व्यक्ति के हिस्से में सिर्फ दुख और परेशानियां ही आती हैं। कई शोधों में भी यह बात सिद्ध हो चुकी हैं कि खुश रहने से व्यक्ति के आसपास का माहौल भी खुशनुमा हो जाता है। इसलिए खुशी जीवन की संजीवनी से कम नहीं है, जिसे संभालकर रखा जाना जरूरी है। इसकी वजह से न सिर्फ आपके स्वभाव में परिवर्तन आता है, बल्कि आपकी मानसिक स्थिति इतनी अनुकूल रहती है जो आपको समय-बेसमय निर्णय लेने में मदद करती है। छोटी-छोटी बातों से हमें बड़ी-बड़ी खुशियां हासिल हो सकती हैं, सिर्फ जरूरत है इसे महसूस करने की। एक नए अध्ययन में कहा गया है कि अगर किसी का बचपन खुशियों से भरा हो तो उसे जिंदगी में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में आसानी होती है, लेकिन अगर
किसी बच्चे के बचपन में
खुशियां कम हो तो ऐसे बच्चे आगे चलकर चिड़चिड़े और भौतिकवादी बन जाते हैं।
प्रसिद्ध शोध पत्रिका 'लाइव साइंस" में प्रकाशित शोध के अनुसार नाखुश बच्चे, खुश रहने वाले बच्चों की तुलना में ज्यादा भौतिकवादी और चिड़चिड़े होते हैं।
क्या कहता है शोध 
नीदरलैंड के एम्सटर्डम स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन रिसर्च की शोधकर्ता सुजैन ओप्री ने इस शोध के जरिए पता लगाया कि जो बच्चे अपनी जिंदगी से खुश नहीं होते, वे समय के साथ-साथ रिश्तों और भावनाओं की अपेक्षा भौतिक सुख-सुविधाओं को ज्यादा तरजीह देने लगते हैं।
विज्ञापनों का भी योगदान 
शोध के अनुसार नाखुश बच्चों के भौतिकवादी बनने के पीछे कम खुशी के साथ ही विज्ञापन भी एक वजह है। विज्ञापन देखकर नाखुश बच्चों को यह लगता है कि अगर उनके पास सुख-सुविधा ज्यादा रहेगी तो वे खुश हो सकते हैं। खुश रहने के लिए वे ज्यादा भौतिकवादी बन जाते हैं। इससे पहले यह माना जाता था कि भौतिकवादी बच्चे बड़े होने पर नाखुश रहते हैं लेकिन नए शोध से पता चला है कि बच्चे पहले नाखुश होते हैं और यही कारण उन्हें भौतिकवादी बनाता है।  

नाश्ते से पहले व्यायाम से दूर भागता है मोटापा

 यूं तो सुबह की एक्सरसाइज से लेकर नाश्ते और खाने तक के लोगों के अपने नियम होते हैं। मगर वे लोग जो मोटापा कम करना चाहते हैं, उनके लिए यह बात जरूरी है कि सुबह जल्दी उठकर नियमित रूप से नाश्ते से पहले व्यायाम करें। इससे उनके मोटापे में 20 प्रतिशत तक की कमी आएगी।
जी हां, 'ब्रिटिश जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन" में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि मोटापा घटाने के लिए जरूरी है कि सुबह उठकर कुछ भी खाया-पिया न जाए। इस अध्ययन में पाया गया कि जो लोग नाश्ते से पहले व्यायाम करते हैं उनमें नाश्ते के बाद व्यायाम करने वालों की तुलना में शरीर का मोटापा 20 प्रतिशत अधिक कम किया जा सकता है।
12 लोगों को किया शामिल  
इस अध्ययन में 12  फिजिकली एक्टिव लोगों को शामिल किया। इन लोगों से सुबह 10 बजे ट्रेडमिल पर कुछ देर व्यायाम करने को कहा गया। इनमें नाश्ते से पहले और बाद में व्यायाम करने वाले दोनों तरह के लोग शामिल थे। बाद में सभी को चॉकलेट मिल्कशेक दिया गया और दोपहर के खाने में पास्ता दिया गया और उन्हें भर पेट खाने को कहा गया।  

आपके खाने पर निर्भर करती है अलर्टनेस

ऑफिस में आते ही उनींदापन, आपके द्वारा ली गई डाइट पर निर्भर करता है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ऑफिस में या फिर दोपहर के समय अन्य किसी स्थान पर जाने पर आपका उनींदापन या फिर अलर्टनेस पूरी तरह आपके खाने पर निर्भर करती है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि हाई फैट डाइट का संबंध दिन के समय उनींदेपन से होता है। वहीं हायर कार्बोहाइड्रेट इंटेक का संबंध अलर्टनेस से जुड़ा होता है।
कैसे किया शोध 
शोध अलग-अलग लोगों पर उनकी एज, बॉडी मास इंडेक्स, उनकी नींद की अवधि और उनके द्वारा लिए जाने वाले टोटल कैलोरी इंटेक के आधार पर किया गया।
अध्ययन में क्या पाया  
हर्शे स्थित पेन स्टेट कॉलेज ऑफ मेडिसीन में साइकिएट्री के प्रोफेसर एलेक्जेंड्रो वोगोंताज ने बताया कि भोजन में लगातार फैट कन्सम्प्शन का बढ़ना अलर्टनेस पर विपरीत असर डालता है। फिर वह हेल्दी व्यक्ति हो या मोटापे से रहित। किसी भी व्यक्ति में फैट का यह बड़ा हुआ स्तर दिन के समय उनींदेपन को बढ़ावा देता है। यह शोध 'जर्नल स्लीप" में प्रकाशित किया गया। इसके आधार पर यह देखा गया कि दिन में उनींदेपन का मुख्य कारण क्या होता है। जिसके निष्कर्ष के तहत शोधकर्ताओं का कहना है कि हाई फैट डाइट को कम करके अलर्टनेस बढ़ाई जा सकती है। जिसका न सिर्फ व्यक्ति की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है बल्कि उससे पब्लिक सेफ्टी भी होती है। यानी कि उनींदेपन की वजह से व्यक्ति को ट्रैफिक में गाड़ी चलाने में भी परेशानी हो सकती है, जिसके लिए अलर्टनेस जरूरी होती है। 

दिन में हाई फैट डाइट बनाती है उनींदा

ऑफिस में आते ही उनींदापन, आपके द्वारा ली गई डाइट पर निर्भर करता है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ऑफिस में या फिर दोपहर के समय अन्य किसी स्थान पर जाने पर आपका उनींदापन या फिर अलर्टनेस पूरी तरह आपके खाने पर निर्भर करती है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि हाई फैट डाइट का संबंध दिन के समय उनींदेपन से होता है। वहीं हायर कार्बोहाइड्रेट इंटेक का संबंध अलर्टनेस से जुड़ा होता है।
कैसे किया शोध 
शोध अलग-अलग लोगों पर उनकी एज, बॉडी मास इंडेक्स, उनकी नींद की अवधि और उनके द्वारा लिए जाने वाले टोटल कैलोरी इंटेक के आधार पर किया गया।
अध्ययन में क्या पाया  
हर्शे स्थित पेन स्टेट कॉलेज ऑफ मेडिसीन में साइकिएट्री के प्रोफेसर एलेक्जेंड्रो वोगोंताज ने बताया कि भोजन में लगातार फैट कन्सम्प्शन का बढ़ना अलर्टनेस पर विपरीत असर डालता है। फिर वह हेल्दी व्यक्ति हो या मोटापे से रहित। किसी भी व्यक्ति में फैट का यह बड़ा हुआ स्तर दिन के समय उनींदेपन को बढ़ावा देता है। यह शोध 'जर्नल स्लीप" में प्रकाशित किया गया। इसके आधार पर यह देखा गया कि दिन में उनींदेपन का मुख्य कारण क्या होता है। जिसके निष्कर्ष के तहत शोधकर्ताओं का कहना है कि हाई फैट डाइट को कम करके अलर्टनेस बढ़ाई जा सकती है। जिसका न सिर्फ व्यक्ति की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है बल्कि उससे पब्लिक सेफ्टी भी होती है। यानी कि उनींदेपन की वजह से व्यक्ति को ट्रैफिक में गाड़ी चलाने में भी परेशानी हो सकती है, जिसके लिए अलर्टनेस जरूरी होती है। 

बच्चों के साथ समय गुजारना जरूरी

आज के आधुनिक जीवन में हर कोई यंत्रवत जीवन जी रहा है। अधिकांश पति-पत्नी नौकरीपेशा होते हैं और ऐसे में सफर करना पड़ता है बच्चों को। यूं तो बच्चों की स्कूली दिनचर्या और ट्यूशन व अन्य एक्टिविटी भी पूरे दिनभर ही चलती है लेकिन पैरेन्ट्स के नौकरीपेशा होने का असर उनके जीवन पर देखने को मिलता है। इस स्थिति में पहले तो बच्चों को पैरेन्ट्स की कंपनी नहीं मिलती, इसलिए वे अपनी बातों को प्रॉपर तरीके से शेयर ही नहीं कर पाते हैं और दूसरे वे अपनी ही दुनिया में रहने लगते हैं, अकेला महसूस करते हैं और गुमसुम रहने लगते हैं।
हाल ही में एसोचेम लेडिज लीग (एएलएल) द्वारा किए एक अध्ययन में बच्चों और किशोरों  के अलावा कुछ वयस्कों को भी शामिल किया। इनकी उम्र 8 से 24 साल के मध्य थी। इसमें पाया गया कि कम से कम 65 प्रश बच्चे अपने पैरेन्ट्स के साथ पूरे दिन में मुश्किल से एक घंटे से भी कम समय गुजार पाते हैं। यही वजह है कि इस तरह की स्थितियां बच्चों को उदासीन (अलूफ), अंतर्मुखी (इंट्रोवर्ट), इम्पेशेंस (अधीर) और इन्टॉलरेंट (असहिष्णु) बना देती हैं। एएलएल की डायरेक्टर उर्वशी भुटालिया का कहना है कि पैरेन्ट्स के साथ कम समय बिताने, कम्युनिकेशन की समस्या और अपनी बात खुलकर न कह पाने का असर बच्चों और किशोरों के व्यवहार में आसानी से दिखाई देता है। अकेले रहने के आदी बच्चों को घर आए किन्हीं भी लोगों से मेलजोल अच्छा नहीं लगता और वे किसी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।
भावनात्मक लगाव जरूरी
अध्ययन के तहत कहा गया है कि भले ही नौकरीपेशा लोगों को यह बात तथ्यहीन लगे क्योंकि वे इसके पीछे अर्निंग प्रॉब्लम्स को जोड़कर देखेंगे। मगर उनके लिए यह जानना जरूरी है कि सबसे पहले बच्चे ही हमारे जीवन की जमा-पूंजी होते हैं। उनके लिए हम कमा रहे हैं लेकिन उनकी रक्षा, उनके व्यवहार को संयमित रखना, उन्हें संस्कार सिखाना यह सब पैरेन्ट्स के ही हिस्से में आता है। ऐसा न हो कि जीवन की आपाधापी के बीच बच्चों का व्यवहार असंयमित हो जाए, इसलिए जरूरी है कि बच्चों के साथ पैरेन्ट्स समय गुजारें। छुट्टियों में उन्हें पूरा समय दें, उनके साथ खेलें, उनकी बातें समझें और पूरे सप्ताह की ऐसी योजना बनाएं, जिस पर बच्चे आपसे हमेशा चर्चा करते रहें और आपके और उनके बीच की दूरी कम हो।  

छोटी-सी कसरत बड़े काम की!

व्यायाम सेहत के लिए बहुत मददगार है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि कभी-कभी की जाने वाली छोटी-सी कसरत ब्रेन के प्री-फ्रंटल एरिया की ओर ब्लड और ऑक्सीजन का फ्लो बढ़ाती है। इससे सेल्फ कंट्रोल में बड़ी मदद मिलती है।
अटेंशन हाइपर एक्टिविटी डेफिसिट डिसऑर्डर (एडीएचडी) और ऑटिज्म जैसी दिमाग से जुड़ी बीमारियों का इलाज करने में कसरत काफी उपयोगी है। यह डिमेंशिया को रोकने में भी लाभदायक है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि वैज्ञानिकों ने शारीरिक कसरत के दिमाग पर पड़ने वाले असर के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें दिमाग के मुख्य फंक्शन जैसे स्मरण शक्ति, ध्यान, योजना और फैसले लेने आदि पर कसरत के असर का विश्लेषण किया गया। यह विश्लेषण 6 से 12 साल, 13 से 17 और 18 से 35 साल आयुवर्ग के तीन समूहों पर किए गए 24 अध्ययनों पर आधारित था।
24 में से 19 अध्ययन, जिसमें 586 भागीदार थे, ने कभी-कभी की जाने वाली कसरत और पांच, जिसमें 358 भागीदार थे, में नियमित कसरत का असर शामिल था। यह पाया गया कि नियमित कसरत का ब्रेन के बड़े फंक्शन पर खास असर नहीं देखा गया लेकिन छोटी-छोटी और कभी-कभी की जाने वाली कसरत का ब्रेन के मुख्य फंक्शन पर बड़ा असर नजर आया। विशेष रूप से सेल्फ कंट्रोल में यह बड़ी मददगार साबित होती है।
बच्चों व किशोरों के
लिए महत्वपूर्ण
यह बच्चों और किशोरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वेल डेवलप्ड हायर ब्रेन फंक्शन शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल करने और दैनिक जीवन के अन्य पहलुओं के लिए बहुत जरूरी है। सेल्फ कंट्रोल पर शारीरिक कसरत के सकारात्मक असर उत्साहवर्धक हैं और अत्यंत प्रासंगिक हैं।  

ज्यादा नमक बीमारियों का घर

 खाने में स्वाद बढ़ाने के लिए थोड़ी मात्रा में नमक खाना तो ठीक है लेकिन अधिक मात्रा में इसके सेवन से न केवल हृदय रोग का जोखिम बढ़ जाता है बल्कि यह अस्थमा, एक्जिमा और मल्टीपल स्क्लेरोसिस का कारण भी बनता है।
अमेरिका में येल यूनिवर्सिटी और जर्मनी में यूनिवर्सिटी ऑफ एलरेंजन-न्यूरेमबर्ग के वैज्ञानिकों की टीम का कहना है कि साल्टी डाइट्स से ऑटोइम्यून डिसीजेस के खतरे बढ़ जाते हैं। अधिक साल्टी डाइट के कारण इम्यून सिस्टम पैथोजिंस से लड़ने की बजाए हेल्दी टिश्यू पर ही आक्रमण करने लगता है। यह स्टडी अपनी प्रकार की पहली है, जिसमें अत्यधिक नमक खाने से ऑटोइम्यून डिसीजेस के खतरे की ओर इशारा किया गया है।
इम्यून सेल्स का खेल
येल यूनिवर्सिटी के मार्कस क्लेनवेटफेल्ड और डेविड हाफलर का मानना है कि अधिक मात्रा में नमक खाने से मनुष्यों में सीडी4 पॉजीटिव टी हेल्पर सेल्स (टीएच) में बदलाव आने लगता है। ये इम्यून सेल्स विशेष डाइटरी हैबिट्स से जुड़ी हैं। इम्यून सिस्टम की अन्य सेल्स के साइटोकाइन्स हेल्पर टी सेल्स को आसन्ना संकट से आगाह करती हैं। वे खतरनाक पैथोजिंस से लड़ने के लिए अन्य इफेक्टर सेल्स को एक्टिवेट करती हैं, उनकी मदद करती हैं ताकि इंफेक्शंस को खत्म किया जा सके।
इंफेक्शन से लड़ती हैं
टी हेल्पर सेल्स के विशेष सबसेट साइटोकाइन इंटरल्यूकिन 17 प्रॉड्यूस करते हैं और इन्हें संक्षेप में टीएच 17 कहा जाता है। इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि टीएच 17 सेल्स इंफेक्शन से लड़ने और ऑटोइम्यून डिसीजेस के पैथाजिनेसिस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नमक बिगाड़ता है खेल
अध्ययन के अनुसार नमक नाटकीय तरीके से एग्रेसिव टीएच 17 इम्यून सेल्स के इंडक्शन को बढ़ाता है। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि बढ़ी हुई सोडियम क्लोराइड की मात्रा विशेष साइटोकाइन परिवेश में टीएच17 के ड्रामेटिक इंडक्शन को बढ़ावा देती है। यह वृद्धि दस गुना ज्यादा तक हो सकती है। अधिक साल्ट वाले हालात में सेल्स अपनी साइटोकाइन प्रोफाइल में और बदलाव करती है। 

नौकरी में खतरे की घंटी!

मेहनतकश लोगों के पास काम की कमी नहीं होती, लेकिन अपनी क्षमताओं के अनुसार बेहतर संस्थान का चुनाव करना भी काफी मायने रखता है। ऐसे में सोच-विचार के साथ ऐसी नौकरी चुनें, जहां आप लंबे समय तक काम कर सकें।
हर युवा का सपना होता है एक बेहतर जॉब और उससे जुड़ी बेहतर जिंदगी का। अच्छी जॉब मिल भी जाती है, लेकिन कुछ समय बाद ही निराशा होने लगती है। आप मेहनत भी कर रहे हैं, लेकिन न तो वैसा प्रोत्साहन मिल रहा है और न ही पैसा। हर नौकरीपेशा के जीवन में कभी न कभी इस तरह की परिस्थिति सामने आती है। नौकरी में ऐसे संकेतों को पहचान कर सही समय पर निर्णय लेना ही तरक्की की ओर ले जाता है।
जब कर दें नजरअंदाज : आपके बॉस और साथी आपको अपनी टीम का हिस्सा न मानने लगें और जरूरी मीटिंग्स में भी आपको शामिल न किया जाए। ऐसे में मान लेना चाहिए कि कंपनी आपको नौकरी बदलने का संकेत दे  रही है।
न मिले प्रोत्साहन : पिछले कई सालों से आप एक ही सैलरी पर काम कर रहे हैं। आप अपना काम पूरी मेहनत के साथ कर रहे हैं, लेकिन आपके वेतन में वृद्धि नहीं की जा रही है। आपको लगता है कि आपका काम अच्छा है और किसी और कंपनी में बेहतर विकल्प मौजूद है तो निर्णय लेने में देर न करें।
दुर्व्यवहार किया जाए : अपने बॉस से परेशानी शेयर करें कि आपको काम के लिए सही प्रोत्साहन नहीं मिल रहा। इसके बावजूद आपके बॉस आपकी बातों को नजरअंदाज करे और आपके साथियों के सामने ही भला-बुरा कहे तो ऐसी परिस्थिति में दूसरे विकल्प पर विचार करना चाहिए।
गलत लगे हर बात : आप अपने प्रोजेक्ट पर अपने बॉस का फीडबैक मांगें और आपको हर बार बुरा ही सुनने को मिले तो इसका मतलब है कि आप गलत बॉस के लिए काम कर रहे हैं। 

प्रकृति से पाएं सुरक्षा के उपाय

वर्षों से दादी-नानी के नुस्खों से तरह-तरह की परेशानियों का हल चुटकियों में होता आया है। भले ही उन नुस्खों को ध्ाीरे-ध्ाीरे बिसरा दिया गया है, लेकिन आज भी उत्पादों की भीड़ में कई ऐसे प्राकृतिक उपाय हैं जो नुकसान पहुंचाए बिना आपकी समस्या सुलझा सकते हैं।
घर में मच्छर, मक्खियां, कीड़े-मकोड़ों से परेशान होकर लोग तरह-तरह के उपाय अपनाते हैं, लेकिन स्थिति जस की तस रहती है। जहरीले रसायनों से युक्त इन कीटनाशकों से न केवल प्रकृति को नुकसान पहुंचता है, बल्कि आपकी सेहत भी इससे प्रभावित होती है। ऐसे में यदि कुछ प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल कर समस्या को दूर किया जा सके तो उससे बेहतर क्या हो सकता है।
तुलसी दूर भगाती है मक्खियां :  मक्खियों को तुलसी के पत्तों की खुशबू पसंद नहीं आती। उन्हें घर के अंदर आने से रोकने के लिए दरवाजों और खिड़कियों के पास तुलसी पौध्ो के गमले रख दें। तेज ध्ाूप में तुलसी को न रखें। इसकी सूखी पत्तियों को कपड़े में बांध्ाकर रखें और समय-समय पर उसे मसलते रहें। इससे भी मक्खियां घर के अंदर नहीं आएंगी।
मकड़ियां दूर भागेंगी : मकड़ियों को साइट्रस पसंद नहीं आता। एक स्प्रे बोतल में पानी और नींबू का रस मिलाकर दरवाजों, खिड़कियों या जहां से मकड़ियां आती हैं, उस जगह पर छिड़काव करें।
बंद करें चींटियों की एंट्री : आध्ाा भाग पानी और आध्ाा भाग सिरके का मिलाकर जहां-जहां चींटियां नजर आएं, उस स्थान पर इस घोल को छिड़क दें। चींटियां आना बंद हो जाएंगी।
ततैया घर नहीं बनाएगी : कई प्रजातियां ऐसी होती हैं, जो दूसरे छत्ते के 200 गज दूर तक छत्ता नहीं बनातीं। इसलिए घर में नकली छत्ते लगा दें।
मच्छर भगाएं दूर : कैटनिप पौध्ो से बिल्लियों को जितना प्यार होता है, मच्छरों को उतनी ही नफरत। इसे गार्डन में लगाएं या फिर कैटनिप ऑयल अपनी स्किन पर लगाएं, मच्छर दूर भागेंगे। 

क्यों पिएं पानी...

पानी जीवन का एक अहम हिस्सा है। इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जिन लोगों को पीने का शुद्ध पानी मिलता है उन्हें खुद को खुशकिस्मत समझना चाहिए । यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में 76 करोड़ अस्सी लाख लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल पाता। पानी में अनेक गुण समाए हैं। यह कैंसर का इलाज नहीं कर सकता है, लेकिन उसके लिए जिम्मेदार कारकों से आपको बचा सकता है। यह आम-सा जान पड़ने वाला पानी हमारी अनेक शारीरिक प्रक्रियाओं में अहम भूमिका निभाता है।
मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करता है
यदि आप वजन कम करना चाहते हैं तो पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। इससे शरीर फैट बर्न करने के योग्य बन पाता है। क्लीनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म के जर्नल में छपे श्ाोध्ा के मुताबिक स्वस्थ स्त्री व पुरुषों में पानी 30 प्रतिशत तक मेटाबॉलिज्म रेट को बढ़ाता है। पानी पीने के 10 मिनट के अंदर ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देता है। शोध्ा के मुताबिक खाना खाने से पहले एक या दो गिलास पानी पी लेने से व्यक्ति कम खा पाता है और वजन कम होने में मदद मिलती है।
दिल रखता है सुरक्षित
अमेरिकन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी के मुताबिक जो लोग एक दिन में कम से कम पांच से छह गिलास पानी पीते हैं, उनमें एक या दो गिलास पानी पीने वालों की तुलना में हृदय रोग होने की आशंका 41 प्रतिशत कम होती है। इतना ही नहीं, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का खतरा पर्याप्त मात्रा में पानी पीकर कम किया जा सकता है। शोध्ा बताता है कि पानी की पर्याप्त मात्रा कोलन कैंसर का खतरा 45 प्रतिशत और ब्लेडर कैंसर से जोखिम 50 प्रतिशत तक कम कर देती है।
सिरदर्द से राहत
न्यूरोलॉजी जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पानी से माइग्रेन जैसी बीमारी में भी फायदा पहुंचता है। वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को जांचने के लिए दो अलग-अलग समूह बनाए, एक को प्लेसिबो का डोज दिया गया और दूसरे ग्रुप को अपने रोजाना के पानी की मात्रा में छह कप अतिरिक्त पानी पीने को कहा गया। दो हफ्ते बाद परीक्षण में पाया गया कि ज्यादा पानी पीने वाले समूह को दर्द में 21 घंटे तक की राहत मिली।
अलर्ट रखता है
शरीर में पानी की कमी के कारण थकान की समस्या हो जाती है। आपको नींद आती है और आपको लगता है कि झपकियां लिए बिना काम नहीं हो सकता, ऐसे में काम के दौरान काफी मुश्किलें आती हैं। पानी पीने से डिहाइड्रेशन की समस्या 2 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह शॉर्ट टर्म मेमोरी की परेशानी दूर करने और कम्प्यूटर स्क्रीन पर फोकस करने में भी मददगार होता है। 

पलाश मजबूत करेगा हडि्डयां

अधेड़ अवस्था में स्प्रोजल हार्मोंस की कमी की वजह से होने वाले हड्डी रोगों को ठीक करने के लिए पलाश का पौधा कारगर निकला है। इसमें फाइटो-एस्ट्रोजन खोज निकाला गया है, जिससे ईजाद होने वाली हर्बल दवा से व्यक्ति में एस्ट्रोजेन हार्मोंस की अप्रत्याश्ाित वृद्धि होगी। ऐसे में, यह दवा हड्डी को मजबूती देने के लिए रामबाण्ा होगी। अब तक उपलब्ध एलोपैथिक में दर्द को कम तो किया जा सकता है, लेकिन कमजोर हुईं हडि्डयों को फिर से मजबूत करना कठिन है।
लखनऊ के सेंट्रल ड्रग्स रिसर्च इंस्टीट्यूट में किए गए श्ाोध के जरिये वैज्ञानिकों की जिस टीम ने पलाश्ा को इतना कारगर पाया है, उसमें बरेली कॉलेज में विज्ञान के विद्यार्थी रहे डॉ. अवनीश्ा कुमार गौतम भी श्ाामिल हैं। डॉ. अवनीश्ा ने बताया कि आज के दौर में खान-पान में श्ाुद्धता के अभाव से हडि्डयां कमजोर होने लगी हैं। खासतौर पर महिलाओं में 40 से 45 साल की उम्र में जोड़ों के दर्द की समस्या बढ़ जाती है। इसकी वजह है उनमें श्ाारीरिक कारण्ाों से एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी ज्यादा हो जाती है। इससे हड्डी कमजोर और खोखली तक हो जाती है।
कोशिकाएं होती हैं क्रियाशील
पलाश्ा से निकाले जाने वाले फाइटो स्ट्रोजन से बनने वाली हर्बल औष्ाधि महिलाओं में हडि्डयां को मजबूत करने की कोश्ािकाओं को सश्ाक्त और क्रियाश्ाील बनाएगी। इस श्ाोध का पेटेंट कराया जा चुका है। कनाडा से बेस्ट थीसिस अवॉर्ड जीत चुके डॉ. अवनीश्ा के श्ाोध के कुल
चार इंटरनेश्ानल और एक नेश्ानल पेटेंट हो चुके हैं।
 उन्होंंने बताया कि पलाश्ा की औषधि के लिए क्लीनिक ट्रायल होना बाकी है। 

सूती साड़ी व सूरज की रोशनी से करें गंदे पानी को साफ

गंदे पानी की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए एक राहत भरी खबर है। उनकी इस समस्या को अब महिलाओं की उपयोग की गई साड़ियों और सूर्य की रोशनी से समाप्त किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में पता चला है कि कॉटन की साड़ी से गंदे पानी को छानने और उसे लगभग एक घंटे तक सूर्य की रोशनी में रखने के बाद वह पीने योग्य हो जाता है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में बरसात के पानी को कपड़े से छानकर पानी पीने योग्य बनाने का तरीका पहले से इस्तेमाल होता आ रहा है।
लेकिन अब शोधकर्ताओं ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि साड़ी से छाना गया पानी, जिसे सूर्य की रोशनी में रखा गया हो उसे उबालने की जरूरत नहीं है वह वैसे भी पीने योग्य हो जाता है। महाराष्ट्र के निंबकार कृषि अनुसंधान संस्थान से संबंध रखने वाले नंदनी निंबकार और अनिल राजवंशी ने इस शोध को अंजाम दिया। उनके इस शोध को द जर्नल करंट साइंस में प्रकाशित किया जाएगा।
वर्तमान में घरों के अंदर पानी को साफ करने के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह काफी महंगी हैं और स्थायी भी नहीं हैं। लेकिन साड़ी फिल्टर और सूर्य ताप के संयोजन का काफी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर उन ग्रामीण इलाकों में जहां नदी और कुएं के पानी का उपयोग होता है, यह तरीका एक वरदान होगा।
पानी का शुद्धिकरण रासायनिक उपचार यानी क्लोरीनीकरण या फिर उसे उबालकर किया जाता है। ये दोनों तरीके ऐसे हैं जिन्हें हर समय कर पाना संभव नहीं है। इसके अलावा क्लोरीनीकरण के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जबकि हर वक्त पानी को उबालकर पीना संभव नहीं है।
एनएआरआई के शोधकर्ताओं ने कहा कि पानी को कीटाणुमुक्त बनाने के लिए इसका 55 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करना जरूरी है, और इस तापमान पर सूर्य की रोशनी के माध्यम से भी पहुंचा जा सकता है। इस शोध के परिणामों तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने गंदे पानी को लिया और उसे कॉटन की साड़ी की चार परतें बनाकर साफ किया। इसके बाद छाने गए पानी और 50 से 60 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किए गए पानी के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि साड़ी ने उन कीटाणुओं को काफी हद तक दूर कर लिया गया, जो मनुष्य के लिए घातक साबित हो सकते थे। 

कितना हेल्दी है आपका रिश्ता...

प्रगाढ़ रिश्ता बनाना आसान नहीं, क्योंकि उसे निभाने और बनाए रखने के लिए कई सारी बातों का ध्यान रखना होता है। किसी रिश्ते में दरार न पड़ जाए, लिहाजा इसके संकेतों को समय पूर्व जान लेना कई बार उसे बचाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
रिश्ता हमेशा दोतरफा होता है। यदि दोनों में से कोई एक भी अपनी पूरी जिम्मेदारी नहीं उठा रहा तो वह रिश्ता बहुत दिनों तक टिका नहीं रह सकता। यदि रिश्ते में बचाने लायक कुछ नहीं हो तो फिर उससे दूर हो जाना ही बेहतर होता है, लेकिन थोड़ा प्रयास बड़ा प्रभाव दिखा सकता है तो फिर इसके लिए कोशिश जरूर करना चाहिए।
विश्वास रिश्ते की नींव 
किसी भी रिश्ते में विश्वास नींव की तरह होता है। विश्वास के आधार पर कोई रिश्ता टिका रहता है।  पति-पत्नी का रिश्ता हो या फिर कोई और, हर रिश्ते में पहली प्राथमिकता विश्वास की होती है। आप और आपका पार्टनर एक-दूसरे से कोई सच्चाई न छुपाएं, क्योंकि रिश्ते में यदि एक व्यक्ति सच बोल रहा है और दूसरा नहीं तो उस रिश्ते का टिका रहना काफी मुश्किल होता है।
समान अधिकार 
दो लोगों के आपसी सहयोग से ही रिश्ते की गाड़ी आगे बढ़ती है। यदि एक भी कमजोर पड़ जाए तो बहुत दिनों तक इसे निभा नहीं पाएंगे। इसलिए दोनों के बीच अध्ािकारों का बंटवारा एक जैसा होना चाहिए। किसी एक को भी अध्ािक अध्ािकार दे दिया जाए तो वह उसका दुरुपयोग कर दूसरे पर हावी होेने की कोशिश करेगा और यह किसी भी रिश्ते की सेहत के लिए अच्छा नहीं है।
परस्पर सम्मान  
छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे को भला-बुरा कहना, दोष मढ़ने जैसी स्थिति किसी भी रिश्ते के लिए अच्छी नहीं है। अच्छे रिश्ते में इस चीजों के लिए कोई स्थान नहीं होता। एक दूसरे को प्रोत्साहित करना और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करने से ही रिश्ता मजबूत हो सकता है।
बेहतर कम्युनिकेशन 
स्वस्थ रिश्ते के लिए बेहतर कम्युनिकेशन बहुत जरूरी हैं। एक-दूसरे से खुलकर अपनी बात कहें और भावनाओं की कद्र करें। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हों तो मिल-बैठकर बातचीत से उसे सुलझाएं।  

अधूरा न रहे आपका पोषण

भोजन में हर प्रकार के पोषक तत्व शामिल हों, तभी उसे संपूर्ण कहा जा सकता है। खाने में कोई एक तत्व अध्ािक और कोई कम हो, तो आपके शरीर में किसी न किसी पोषक तत्व की कमी रह जाएगी। केवल विटामिन सी या कैल्शियम जैसे तत्व ही भोजन के आवश्यक घ्ाटक नहीं हैं, जो आपको बीमारियों से बचाए रखते हैं। कई और भी ऐसे तत्व हैं, जिनके बिना आपका पोषण अध्ाूरा है।
आयरन : अध्ािकांश महिलाओं में इस जरूरी मिनरल की कमी पाई जाती है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार आयरन की कमी भोजन के द्वारा इसे पर्याप्त मात्रा में नहीं लेने या मासिक चक्र की वजह से होती है। आयरन लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होता है, जिनके जरिए शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है। मस्तिष्क की क्रियाओं और इम्यून सिस्टम के लिए भी यह एक आवश्यक खनिज तत्व है।
स्रोत : अंडे का पीला भाग, मछली, चिकन, मटर और हरी पत्तेदार सब्जियां आयरन के अच्छे स्रोत माने जाते हैं।
सेलेनियम : यह एंटीऑक्सीडेंट मिनरल विटामिन ए, सी, ई और जिंक के साथ मिलकर कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाने का कार्य करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना, और यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर में हुई रिसर्च के मुताबिक सेलेनियम प्रोस्टेट, कोलन और फेफड़ों के कैंसर के खतरे को कम करता है।  लेकिन इसकी अत्यध्ािक मात्रा से त्वचा में सूजन, शरीर में ऐंठन के साथ-साथ कई अन्य समस्याएं
हो जाती हैं।
स्रोत : मांस, सीफूड, अनाज और सीड्स में भरपूर सेलेनियम होता है। लेकिन इसकी मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित खाद्य किस मिट्टी में उगाया गया है। सेलेनियम प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाया जाता है और जिस मिट्टी में इसकी मात्रा अध्ािक होगी, वहां उगने वाली फसलों में यह स्वाभाविक रूप से अध्ािक होगा।
विटामिन डी : यदि आप पर्याप्त विटामिन डी पाना चाहते हैं, तो धूप में कुछ वक्त बिताएं। आपकी त्वचा द्वारा सूर्य की रोशनी को सोखने के बाद लिवर इस विटामिन का निर्माण कर देता है। यह विटामिन कैल्शियम को मेटोबॉलाइज करने और हड्डियों को मजबूत करने में मददगार होता है।
स्रोत : इसके सबसे अच्छे स्रोत हैं दूध्ा और सूर्य की रोशनी।
विटामिन के  :यह विटामिन रक्त का थक्का जमने में मदद करता है, साथ ही कैल्श्ाियम और विटामिन डी के साथ मिलकर हडि्डयों को मजबूती प्रदान करने का काम करता है। पाचन तंत्र में मौजूद सामान्य बैक्टीरिया विटामिन के  बनाने में मदद करता है।
स्रोत : हरी पत्तेदार सब्जियां, अंडे, दूध्ा और मांस।
जिंक : यह मिनरल शरीर में कई सारी कार्यप्रणालियों में सहायक की तरह काम करता है। वैसे इसकी कमी से तत्काल कोई प्रभाव नजर नहीं आता, लेकिन भोजन में इसकी पर्याप्त मात्रा नहीं लेने से वृद्धि में रुकावट, डर्मेटाइटिस, जन्मजात विकार, शुक्राणुओं में कमी और इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी जैसे प्रभाव सामने आ सकते हैं।
स्रोत : जिंक मुख्य रूप से रेड मीट, बादाम, मूंगफली बटर और ट्यूना में पाया जाता है। मांसाहारियों की तुलना में शाकाहारी लोगों को इसकी पूर्ति के लिए अतिरिक्त प्रयास की जरूरत होती है।   

सिरदर्द की अनदेखी न करें

आए दिन लोग सिरदर्द की समस्या से ग्रस्त होते हैं। सिरदर्द की ये शिकायतें कुछ साधारण होती हैं तो कुछ असाधारण बीमारी का संकेत देती हैं। इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि साधारण सिरदर्द को बीमारी में तब्दील होने से पहले ही उसका इलाज करा लिया जाए ताकि हम सेहत पर होने वाले किसी भी हमले से बचे रहें।
खास बात तो यह है कि यह साधारण सिरदर्द ब्रेन ट्यूमर जैसी खतरनाक बीमारी भी हो सकता है। इसके लिए जरूरी है कि समय रहते डॉक्टर के पास अपना इलाज कराएं। वैसे अक्सर गर्मियों के दिनों में तेज धूप की वजह से व्यक्ति के मूड में अस्वाभाविक परिवर्तन आते हैं। इनमें चिड़चिड़ाहट आम लक्षण है, इसलिए गर्मी में सिरदर्द की परेशानी ज्यादा सामने आती है। एक अध्ययन के अनुसार विश्व के तीन फीसद लोगों को महीने में तीन दिन तेज सिरदर्द होता है।
यह सिरदर्द दो प्रकार का हो सकता है। पहले प्रकार के सिरदर्द की वजह माइग्रेन, स्ट्रेस या तनाव हो सकता है। वहीं दूसरे प्रकार में मस्तिष्क की किसी बीमारी या साइनोसाइटिस, धमनी की कोशिका का बढ़ जाना या फिर ब्रेन टय़ूमर होता है। वैसे 90 फीसद लोग पहले प्रकार के सिरदर्द से पीड़ित रहते हैं। वहीं चिकित्सक भी अधिकांश मामलों में सिरदर्द का कारण तनाव, गर्मी का मौसम और अव्यवस्थित दिनचर्या को मानते हैं।  इसके अलावा घंटों ऑफिस में कम्प्यूटर पर बैठना, ऑफिस स्ट्रेस या फिर लगातार टीवी देखने से भी सिरदर्द होता है।  इसके लिए सबसे पहले जरूरी है लक्षणों को जानना। इसके बाद चिकित्सीय परामर्श लेना ताकि कोई बड़ी बीमारी धीरे-धीरे घर न कर ले।
क्या कहता है शोध 
शोध बताता है कि आजकल तकरीबन 10 फीसद लोग माइग्रेन का शिकार होते हैं, जो सिरदर्द की एक बड़ी वजह हो सकती है। चिकित्सकों का कहना है कि अधिकांश मामलों में सिरदर्द स्ट्रेस की वजह से ही होता है, मगर इसका लगातार बने रहना अच्छा नहीं है। सिरदर्द कोई उम्र विशेष के लोगों को नहीं होता बल्कि यह समस्या हर उम्र के लोगों में देखी गई है। इसमें युवाओं और महिलाओं की संख्या अधिक है।
आजमाए जा सकते हैं उपाय
सिरदर्द से बचने के लिए व्यायाम और योग को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इसके अलावा भरपूर नींद और संयमित आहार के जरिए भी इस समस्या से काफी हद तक निजात पाई जा सकती है।  

फायदेमंद है जामुन


  • जामुन के सेवन से त्वचा का रंग निखरता है 
  • मधुमेह टाइप-2 को नियंत्रित करने में सहायक 
  • सफेद दाग के रोगियों के लिए जामुन का सेवन अच्छा माना गया है 
  • डायबिटीज के रोगियों को जामुन की गुठली के चूर्ण की 5-5 ग्राम मात्रा सुबह और शाम लेने से फायदा होता है
  • जामुन में रक्तस्राव रोकने की क्षमता भी होती है। मसूड़ों से रक्तस्राव रोकने के लिए जामुन का सेवन करना चाहिए 
  • टाइफाइड, मलेरिया, बुखार के बाद लिवर की मजबूती के लिए जामुन का रस फायदेमंद होता है। 
  • वात रोग, पेट दर्द, गैस, अतिसार और हैजे में भी जामुन बेहतर औषधि का काम करता है
  • होमियोपैथी में भी जामुन से बनी दवा 'सिजियम जेम्बुलिकम" मिलती है।  

सोशल नेटवर्किंग साइट्स बना रही हैं मनोरोगी

फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स के इस्तेमाल से आपका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। अनुसंधानकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि सोशल नेटवर्किंग साइटें मनोरोगों और मतिभ्रम का कारण बन सकती हैं।
अध्ययन के अनुसार चूंकि इंटरनेट एक्सेस लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए इससे जुड़ी मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी पनप रही हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटों के इस्तेमाल से इंटरनेट एडिक्शन की समस्या हो सकती है। तकनीक से संबंधित मतिभ्रम पैदा हो सकते हैं। वर्चुअल रिलेशनशिप प्रभावित हो सकती है।
क्या है लक्षण
तेल अवीव यूनिवर्सिटी के सैकलर फैकल्टी ऑफ मेडिसिन और शाल्वता मेंटल हेल्थ केयर सेंटर के डॉ. यूरी नितजान का कहना है कि फेसबुक और चैट ग्रुप्स जैसे कम्प्यूटर कम्युनिकेशंस इस कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। नितजान के अनुसार सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल करने से पीड़ित लोगों ने कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं का जिक्र किया, जिसमें अकेलापन अथवा अपने प्रिय व्यक्ति से बिछुड़ जाना या उससे बिछुड़ जाने का डर सताना, तकनीकी के साथ नौसिखियापन जैसी बातें शामिल थीं। अध्ययन के अनुसार हर एक मामले में मनोरोग के सिम्पटम्स उभरने और इसके धीरे-धीरे विकास के बीच संबंध पाया गया। इन मनोरोगों में मतिभ्रम, एंग्जाइटी, कन्फ्यूजन व कम्प्यूटर कम्युनिकेशंस का ज्यादा इस्तेमाल आदि शामिल था।
अच्छी बात यह भी
अध्ययन के दौरान इन समस्याओं के बीच अच्छी बात यह भी थी कि जो मरीज खुद अपनी इच्छा से इलाज के लिए आए थे, वे उचित इलाज व देखभाल के कारण पूरी तरह रिकवरी पाने में सफल भी रहे। जहां फेसबुक जैसी तकनीकों के ढेरों फायदे हैं, वहीं कुछ यूजर्स इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स से चोट खाते भी नजर आए। इन साइट्स के जरिए आप ऐसे लोगों के संपर्क में आ सकते हैं, जो अकेलेपन के शिकार हैं या अपनी दैनिक जिंदगी से परेशान हैं या साइबर बुलीइंग (इंटरनेट पर डराना-धमकाना) अथवा अन्य हिंसात्मक बर्ताव में मशगूल रहते हैं।
ज्यादातर मिलता है धोखा
अध्ययन में शामिल मरीजों ने अकेलेपन से निजात पाने की चाहत रखी और वास्तविक रिश्तों में कुछ तसल्ली ढूंढने की कोशिश की। यद्यपि इंटरनेट पर रिलेशनशिप शुरुआत में बहुत सकारात्मक नजर आती है लेकिन बाद में फीलिंग्स हर्ट होना, धोखा खाना और निजता में दखल जैसी समस्याएं आने लगीं। यह अध्ययन 'इसराइल जर्नल ऑफ साइकिएट्री एंड रिलेटेड साइंसेस्" में प्रकाशित हुआ है। सार्वजनिक रूप से अपने राजनीतिक दृष्टिकोण्ा को दर्श्ााने वाले प्रोफेसरों को सबसे कम पसंद किया गया। इसके अलावा अपने परिवार को लेकर गंभीर रहने वाले प्रोफेसर को छात्रों ने सबसे ज्यादा पसंद किया और सम्माननीय माना।  

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

एग्जाम टाइम हेल्थ का रखें ध्यान

 एग्जाम के शुरू होने के साथ-साथ बच्चों का टेंशन बढ़ता जाता है। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी कम्पलसरी है। कई तरह के शोधों और कई मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों द्वारा एग्जाम के दौरान बच्चों को कई टिप्स दी जाती हैं, ताकि वे एग्जाम में बेहतर परफार्मेंस दे सकें। आज की नई टिप्स में बच्चों को अपनी हेल्थ पर ध्यान देने को कहा गया है। एक्सपटर््स का कहना है कि परीक्षा के दौरान हेल्दी डाइट और थोड़ी-सी एक्सरसाइज जरूरी होती है। न्यूट्रीशन एक्सपटर््स और डाइटिशियन के अनुसार एग्जाम के इस मैराथन सेशन में बच्चों को पढ़ाई पर कॉन्संट्रेशन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन्हें हेल्दी डाइट दी जाए। इनमें फ्रेश सीजनल फ्रूट्स और वेजिटेबल व सलाद बेहद जरूरी है। इसके साथ ही थोड़ी ब्रीथिंग एक्सरसाइज करने से बच्चों को एग्जाम के दिनों में स्ट्रेस से दूर रहने में काफी मदद मिलती है। केवल इतना ही वे अच्छे मार्क्स भी स्कोर कर सकते हैं। अपोलो अस्पताल की डाइटेटिक्स डिपार्टमेंट की प्रमुख दीपिका अग्रवाल बताती हैं कि अक्सर स्टूडेंट्स एग्जाम के दिनों में चार से पांच घंटे तक लगातार स्टडी में लगते रहते हैं। ऐसे में पैरेन्ट्स को उन्हें हेल्दी फूड देते रहना चाहिए ताकि उनका स्टेमिना बना रहे और उन्हें थकान महसूस न हो। वहीं सुबह और सोते समय थोड़ी ब्रीथिंग एक्सरसाइज भी स्टूडेंन्ट्स के लिए काफी फायदेमंद होती है।
थोड़ा ब्रेक भी लेने दें 
लगातार एक जैसी सीटिंग के बजाए बच्चों को तकरीबन 15 मिनट का ब्रेक लेकर बॉलकनी और टेरेस पर घूमने के लिए कहना चाहिए ताकि मूड फ्रेश होने के साथ-साथ खुली हवा में घूमने से दिमाग पर बना प्रेशर खत्म हो जाए। पढ़ाई भी ऐसे कमरे में की जाए जहां खिड़कियों से ताजी हवा आती रहे। इस तरह का माहौल बच्चों को पढ़ाई के प्रति उबाता नहीं है।
बादाम का हलवा
पुराने समय में माताएं परीक्षा के दिनों में बच्चों को बादाम और पोस्तदाना का हलवा देती थीं। परीक्षा के दिनों में दही भी खिलाया जाता था।
किस तरह का फूड दें 
सुश्री अग्रवाल का कहना है कि बच्चों को संतुलित भोजन के साथ-साथ बेबीकॉर्न, ओट्स, आटे की ब्रेड और पनीर भी दें ताकि इनमें पाए जाने वाले ज्यादा कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा बच्चों के शरीर में पहुंचे और लंबे समय तक बच्चों के शरीर में एनर्जी महसूस होती रहे। सर गंगाराम हॉस्पिटल के मुख्य डाइटिशियन शशि माथुर का कहना है कि बच्चों को पढ़ाई के बीच-बीच में सीजनल फ्रूट्स या फ्रूट ज्यूस देते रहना रहना चाहिए। इसके अलावा ड्रायफ्रूट्स भी शरीर और ब्रेन के लिए बहुत फायेदमंद होते हैं और बॉडी में एनर्जी भी बनी रहती है। ऐसे खाद्य पदार्थ जो एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं और जिनमें फैटी एसिड्स जैसे ओमेगा 6 और ओमेगा 3 पाया जाता है, वे बॉडी में स्ट्रेस की समस्या को रोकते हैं और रिलेक्सेशन प्रदान करते हैं। इसलिए पैरेन्ट्स के जरूरी है कि वे बच्चों को ऐसे हेल्दी फूड देते रहें। वहीं चॉकलेट मिल्क और लस्सी जैसे पदार्थ भी शरीर को जरूरी कैलरी प्रदान कर सकते हैं।  

कार्टून देखते हुए ज्यादा सॉफ्टड्रिंक पीते हैं बच्चे

 आजकल के बच्चे हमेशा टीवी से चिपके रहते हैं। कार्टून देखते हुए खाना-पीना उनकी आदत में शुमार हो गया है। अब टेलीविजन से चिपके रहने वाले बच्चों के माता-पिता अब सावधान हो जाएं क्योंकि ऐसे बच्चे जरूरत से ज्यादा शुगरयुक्त ड्रिंक (सॉफ्टड्रिंक) का सेवन करते हैं।
टीवी के सामने एक घंटा अतिरिक्त समय बिताने से अधिक मात्रा में शुगर ड्रिंक पीने की आशंका 50 फीसद तक बढ़ जाती है। इससे उनकी सेहत को काफी नुकसान पहुंचता है। यूनिवर्सटी ऑफ गोथेनबर्ग के हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है। जो माता-पिता ज्यादा टीवी देखने की इजाजत देते हैं, उनके बच्चे हर हफ्ते दोगुनी मात्रा में नुकसानदेह ड्रिंक का सेवन करते हैं।
17 सौ बच्चों पर किया शोध 
शोधकर्ताओं ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए दो से चार वर्ष के 1,700 बच्चों के अभिभावकों से एक प्रश्नावली भरवाई। इसमें उनसे बच्चों की टीवी देखने और शुगरयुक्त ड्रिंक पीने की आदत के बारे में पूछा गया। इस शोध में जिन अभिभावकों ने बच्चों के ज्यादा टीवी देखने की बात कही, उन्होंने अधिक मात्रा में शुगरयुक्त ड्रिंक पीने की बात भी स्वीकारी। इसके विपरीत शोधकर्ताओं ने कॉर्टून न देखने के दौरान सॉफ्ट ड्रिंक पीने की मात्रा में कमी देखी। 

आपको बीमार न कर दें ऑफिस की कुर्सियां

 दफ्तर में गलत ढंग से रखी हुई कुर्सियां और टेबल कंपनी के मुनाफे पर भारी चोट करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक ब्रिटेन में तकलीफदेह टेबल-कुर्सी की वजह से कर्मचारी अक्सर शरीर में दर्द होने की शिकायत करते हैं। वे बार-बार छुट्टी लेते है। इससे संस्थानों को सालाना सात अरब पौंड से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ता है। आधे से अधिक ऑफिस कर्मी अपनी बीमारी का जिम्मेदार दफ्तर को मानते हैं। तीन चौथाई के मुताबिक ऑफिस में गलत तरीके से रखी हुई कुर्सी-टेबल इसकी प्रमुख वजह है। दस में से सात ने कहा कि इससे उन्हें पीठ दर्द, सिरदर्द और डिप्रेशन का सामना करना पड़ता है।
पेन किलर लेनी पड़ती है
इसके कारण पांच में से एक व्यक्ति को साल में चौदह दिन सिकलीव लेनी पड़ती है। स्थिति गंभीर होने पर छुट्टी की संख्या 21 दिनों तक पहुंच जाती है। हाल मे हुए एक सर्वे में शामिल दो तिहाई कर्मचारियों ने कहा कि कभी-कभी उनका दर्दनिवारक दवाओं पर निर्भर करना पड़ता है। 20 में से एक व्यक्ति का कहना था कि बार-बार बीमार पड़ने के कारण उसे नौकरी छोड़नी पड़ी।
निजी जिंदगी पर भी असर
करीब 50 फीसद कर्मचारियों ने कहा कि अक्सर बीमार रहने की वजह से दफ्तर के काम के साथ उनकी निजी जिंदगी भी प्रभावित होती है। इसके चलते वे शारीरिक सक्रियता का कोई काम न ही कर पाते। 14 फीसद ने कहा कि दर्द के कारण उन्होंने खेलकूद संबंधी गतिविधियां कम कर दी हैं। वही 11 फीसद ने बागवानी करने के अपने शौक से किनारा करने की बात कही। 

दिमाग के संकेतों से अब चला हेलिकॉप्टर

 मोबाइल, कम्यूटर और कार को दिमाग के संकेतों से चलाने के प्रयोगों के बाद वैज्ञानिकों को 'मस्तिष्क संकेतों के मामले में एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने दिमागी नियंत्रण से हेलिकॉप्टर चलाने के प्रयोग को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। दिमागी संकेतों के माध्यम से हेलिकॉप्टर को कमांड भेजे गए और उसे संचालित किया गया। असल में वैज्ञानिक लंबे समय से दिमागी संकेतों को इलेक्ट्रिक सिग्नल में तब्दील करने की कोशिश में लगे हैं। ताजा शोध से इस दिशा में एक नई कामयाबी मिली है। यानी काल्पनिक और वास्तविक दुनिया के बीच का फासला अब थोड़ा और कम हो गया है। कुल साल पहले तक जिसे नामुमकिन माना जाता था, अब यह तकनीक प्रयोगशालाओं से निकलकर आम इंसानों की जद में आने वाली है।
यूं तो संकेतों की इस भाषा का सबसे ज्यादा उपयोग मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर लोगों की मदद करने और वीडियोगेम खेलने के नायाब तरीके ईजाद करने में होगा। लेकिन इसमें शक नहीं कि आम उपयोग में आने वाली चीजों के नियंत्रण में भी इससे क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा।
ऐसे होता है दिमाग नियंत्रित
इस प्रयोग में मस्तिष्क के विद्युत संकेतों को पकड़ा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि डिवाइस बिना किसी मदद के आपके दिमाग को पढ़ लेगा। इसके लिए एक इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तैयार किया जाता है, जिसे दिमाग के विद्युत संकेतों को पढ़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। यह सिस्टम इंसान के दिमाग के भीतर चल रही हलचलों से संकेत ग्रहण करता है और उसे कम्यूटर चिप की मदद से बाइनरी संकेतों में तब्दील कर
देता है।
पहले भी हो चुका इस्तेमाल 
इससे पहले ऐसी तकनीक का इस्तेमाल व्हीलचेयर को चलाने और दिमागी ऑरकेस्ट्रा चलाने के लिए भी हो चुका है। इस तकनीक से जुड़ी कंपनियों को इस प्रयोग से कई नई संभावनाओं की राह खुलती दिख रही है। इसके लिए मुख्य मुकाबला अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों के अलावा जापान और कोरियाई समूहों में भी है। फिलहाल कंपनियां मोबाइल और कंप्यूटर चलाने में इन संकेतों का लाभ उठाना चाहती हैं। जानकारी के अनुसार सैमसंग ने तो दिमागी संकेतों पर आधारित एक टैबलेट को जल्द बाजार में लाने की योजना पर काम शुरू भी कर दिया है।
शोध अब अगले पड़ाव में
अब तक के शोधों में दिमाग के सामान्य संकेतों को इलेक्टिक डिवाइस ने 99 प्रतिशत की शुद्धता से ग्रहण किया है। वैज्ञानिक अब अधिक सूक्ष्म और मिति संकेत समझने की ओर ध्यान लगा रहे हैं।  

कसरत से बदल सकता है डीएनए

कसरत भले ही थोड़ी मात्रा में की जाए, इससे आपका डीएनए भी बदल सकता है। इससे मोटापे और डायबिटीज की जोखिम तक कम हो सकती है। एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।
स्वीडन के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार इस बात को रेखांकित किया है कि हमारी फैट सेल्स में एपीजेनेटिक लेवल पर उस वक्त क्या असर होता है, जब हम कोई शारीरिक गतिविधि कर रहे होते हैं। लुंड यूनिवर्सिटी डायबिटीज सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर चार्लोट लिंग का कहना है कि हमारे अध्ययन बताते हैं कि कसरत का सकारात्मक प्रभाव यही है कि यह जीनों के  एपीजेनेटिक पैटर्न को प्रभावित करता है, जो सीधे-सीधे शरीर के फैट पर असर डालता है।
डीएनए का खेल
बॉडी के  सेल्स में डीएनए होता है, जिनमें जीन होते हैं। ये जीन वंशानुगत होते हैं और इनमें बदलाव नहीं किया जा सकता। हालांकि जीन में मिथाइल ग्रुप जुड़ा होता है, जो जीन एक्सप्रेशन के रूप में जाना जाता है। इस मिथाइल ग्रुप को विभिन्ना तरीकों से प्रभावित किया जा सकता है। यह तरीका कसरत, डाइट और लाइफ स्टाइल के जरिए भी हो सकता है। इस पूरी प्रोसेस को 'डीएनए मिथाइलेशन" कहते हैं। यही एपिजेनेटिक्स है, जो तुलनात्मक रूप से अनुसंधान का नया क्षेत्र है। हाल ही के वर्षों में इसने और अधिक ध्यान खींचा है।
अध्ययन में यह किया
अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान लगभग 35 वर्ष के मोटे, स्वस्थ व्यक्तियों को शामिल किया। ये लोग पूर्व में कसरत जैसी शारीरिक गतिविधियां नहीं कर रहे थे। इनसे छह माह तक नियमित रूप से स्पीनिंग और एरोबिक्स क्लासेस ज्वॉइन कराई गई। अध्ययन में यह देखा गया कि शारीरिक गतिविधि नहीं करने और शारीरिक गतिविधि करने के दौरान उनके फैट सेल्स में मिथाइल ग्रुप में क्या बदलाव आया। अध्ययन में पाया गया कि शारीरिक गतिविधि के दौरान उनमें 7 हजार जीन (एक व्यक्ति में 20 से 25 हजार जीन होते हैं) में एपिजेनेटिक बदलाव देखा गया। मिथाइलेशन के दौरान उन जीनों पर नजर रखी गई जो टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे से जुड़े हैं। लुंड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट अनुसंधानकर्ता टिना रॉन का कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान डीएनए में बदलाव तक देखा गया। यह अध्ययन जर्नल 'पीएलओएस जेनेटिक्स" में प्रकाशित हुआ है। 

बढ़ती उम्र में भी जी-भर के खेलिए वीडियोगेम

 वीडियोगेम का नाम सुनते ही बच्चे उछल पड़ते हैं। बच्चे और युवाओं में वीडियोगेम का शौक काफी देखा जाता है। यूं तो बच्चों के पास पढ़ाई और कई आउटडोर एक्टिविटीज् रहती हैं, इसलिए उन्हें वीडियोगेम कम खेलने की इजाजत दी जाती है। मगर इन वीडियोगेम का उपयोग बड़ी उम्र के लोग भी करें तो यह उनमें अद्भुत खुशी का संचार कर सकता है। जी हां, एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि ओल्ड एज वाले लोगों को यदि वीडियोगेम खेलने के प्रति इन्करेज किया जाए तो यह न सिर्फ उन्हें हैप्पी रखने में मदद करेगा बल्कि उनमें ढलती उम्र में इमोशनल वेल्बीइंग का बेटर सेंस भी डेवलेप होने लगता है। साथ ही वे किसी काम में खुद को व्यस्त भी पाते हैं। तब तो बच्चों को ही अपने दादा-दादी को खुद इसे सीखाना चाहिए ताकि जब बच्चे बाहर खेलने चले जाएं तो दादी-दादी भी कुछ समय के लिए बचपन की इन चीजों का बड़ी उम्र में आनंद ले सकें।
नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में 63 और इससे अधिक आयु वर्ग के तकरीबन 140 बुजुर्ग लोगों को शामिल किया। इस अध्ययन के तहत पार्टिसिपेंट्स के टेस्ट के लिए एक बैटरी दी गई। जिसके जरिए उनके इमोशनल और सोशल वेल्बीइंग को जांचा गया। इनमें से 61 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया वे वीडियो गेम का प्रयोग कभी-कभी ही करते हैं जबकि 35 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया कि वे हर सप्ताह में कम से कम एक बार तो वीडियो गेम खेलते हैं।
निगेटिविटी भी नहीं घेरेगी
शोध में यह भी पाया गया कि जो लोग वीडियो गेम नहीं खेलते उनमें निगेटिव इमोशन्स की भरमार होती है और ऐसे लोग निगेटिविटी से हमेशा घिरे रहते हैं। ऐसे में उनमें डिप्रेशन का लेवल बहुत हाई हो जाता है।
इस शोध के प्रमुख डॉ.जासोन अलाइरे ने बताया कि हमने इस शोध में पाया है कि गेमिंग और बेटर वेल्बीइंग और इमोशनल फंक्शनिंग के मध्य गहरा संबंध होता है। यह अध्ययन 'जर्नल कम्प्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर" में प्रकाशित किया गया है। इस शोध के साथ ही हम एक ऐसे अध्ययन की योजना बना रहे हैं जिसमें यह जाना जाएगा कि क्या वाकई डिजीटल गेम्स ओल्ड एज वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी इम्प्रूव करते हैं।  

बुजुर्गों के लिए अब स्मार्ट छड़ी

जापानी कंपनी फुजित्सु ने बुजुर्गों के लिए एक स्मार्ट छड़ी बनाई है, जिसमें सैटेलाइट नेविगेशन की सुविधा मुहैया कराई गई है। नई पीढ़ी की ये छड़ी न सिर्फ बुजुर्गों  को अपने घर का रास्ता ढूंढने में मदद करेगी बल्कि उनके दिल की धड़कन और शरीर के तापमान पर भी नजर रखेगी। बुजुर्गों की स्थिति को ऑनलाइन भी
देखा जा सकता है। अगर इस छड़ी का इस्तेमाल करने वाला इंसान गिर जाए तो ये छड़ी ई-मेल
अलर्ट भी भेज देगी। इस तरह की तकनीक जापान की बुजुर्ग होती जनसंख्या के लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है।
घर का रास्ता बताएगी
जापान की फुजित्सु और अन्य कंपनियां इस तरह के तरीके खोज रही हैं, जिनसे लोग ज्यादा से ज्यादा गतिशील हो सकें और आपस में जुड़े भी रहें। इस तरह की तकनीक की मदद से लोगों के लंबी उम्र तक काम करने की संभावना बढ़ जाएगी।
मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में पेश 
इस स्मार्ट छड़ी को बार्सिलोना में चल रही मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में पेश किया गया। ये छड़ी जीपीएस, 3जी और वाईफाई के जरिए नेटवर्क से जुड़ी होगी। साथ ही इस छड़ी में एलईडी स्क्रीन लगी है। अगर इस छड़ी को इस्तेमाल करने वाला इंसान तय दिशा से दूसरी ओर मुड़ता है तो ये छड़ी वाइब्रेट करती है और सही दिशा की ओर इशारा करती है।  

एचआईवी संक्रमितों में हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा

 जो लोग एचआईवी से संक्रमित होते हैं उनमें अन्य लोगों की तुलना में हार्ट अटैक का खतरा 50 प्रश ज्यादा होता है। एक अमेरिकी अध्ययन में यह बात सामने आई है। शोधकर्ताओं की यह रिपोर्ट जेएएमए इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित हुई है। हालांकि शोध में इस बात को विस्तृत रूप से नहीं बताया गया है कि क्यों एचआईवी पॉजीटिव लोगों में हार्ट अटैक के खतरे के वास्तविक कारण क्या हैं? लेकिन उन्होंने अनुमान लगाया है कि यह उस एचआईवी वायरस का प्रभाव हो सकता है जो एड्स के लिए जिम्मेदार माना जाता है और दूसरा वे एंटीरिट्रोवायरल ड्रग हो सकती हैं, जिनके द्वारा एड्स का इलाज किया जाता है। पेनसिल्वेनिया के यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन मैथ्यू फ्रेबर्ग के नेतृत्व में किए अध्ययन में पाया गया कि हालांकि यह बहुत कठिन गुत्थी है, मगर हम इस मैकेनिज्म को समझने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार अमेरिका में 11 लाख से ज्यादा लोग एचआईवी प्रभावित हैं। जबकि अन्य 50 हजार हर वर्ष इससे संक्रमित होते हैं। अब चूंकि एचआईवी के इलाज के बाद एचआईवी पीड़ित भी लंबे समय तक जीता है। इसलिए शोधकर्ताओं ने उनकी बढ़ती उम्र में हेल्थ पर पड़ने वाले अन्य विपरीत प्रभावों के बारे में जाना। जिसमें हार्ट डिसीज मुख्य पाई गई।
यह शोध अमेरिका के तकरीबन 82 हजार बुजुर्ग लोगों पर किया गया, जिनमें से अधिकांश पुरुष थे। इनमें से एक तिहाई लोग एचआईवी से प्रभावित थे।  

स्ट्रोक को पहचान लेगा पोर्टेबल गैजेट

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा पोर्टेबल गैजेट प्रस्तुत किया है जो सिर्फ आई मूवमेंट के आधार पर ही स्ट्रोक्स को पहचानने में मदद कर सकता है। एक अमेरिकी अध्ययन में इसकी पुष्टि हुई है। एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के साथ यह आई मूवमेंट के आधार पर सफलतापूर्वक स्ट्रोक का पता कर सकता है। जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर यह बात कही गई है।
प्रमुख शोधकर्ता डेविड न्यूमैन-टोकेर ने बताया कि इस डिवाइस के उपयोग से यह जाना जा सकता है कि किसमें स्ट्रोक की संभावना है और किसमें नहीं। 'जर्नल स्ट्रोक" में प्रकाशित इस खबर में कहा गया है कि अभी तक स्ट्रोक के लक्षणों की सही पहचान न हो पाने के कारण हजारों मिलियन डॉलर के खर्चे के बावजूद हजारों में से कई जिंदगियों को नहीं बचाया जा सका। फिलहाल इस डिवाइस के प्रयोग जारी हैं, इसके पूरी तरह से सफल रहने पर स्ट्रोक को समय पूर्व पहचानने में काफी आसानी होगी और मरीज का इलाज भी हो जाएगा। इस डिवाइस के प्रयोग के बाद न्यूमैन ने कहा कि यह डिवाइस एक दिन इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम के बराबर होगी।  

रेग्युलर एक्सरसाइज से व्यवहार रहता है संयमित

एक्सरसाइज हर उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर नियामत है। एक नए शोध से यह पता चला है कि रेग्युलर एक्सरसाइज किशोरवय लड़कियों के हिंसक व्यवहार को कम करने में मदद कर सकती है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने तकरीबन 1,312 स्टूडेंट्स पर यह अध्ययन किया। न्यूयॉर्क के चार शहरों में हाई स्कूल स्टूडेंट्स पर यह सर्वे किया गया। इसके तहत रेग्युलर एक्सरसाइज और हिंसा से संबंधित व्यवहार में संबंध देखा गया।
इस सर्वे के तहत स्टूडेंट्स से पूछा गया कि वे कैसे एक्सरसाइज करते हैं, क्या है कितनी सिट-अप्स करते हैं और पिछले चार सप्ताह में उनका सबसे लंबा दौड़ने का टाइम कितना था। इसके अलावा उन्होंने पिछले कुछ सालों में कौन-सी स्पोर्ट्स एक्टिविटी में भाग लिया। स्टूडेंट्स से यह भी पूछा गया कि वे पिछले 30 दिनों में अपने साथ हथियार के साथ स्कूल गए हैं या फिर पिछले दिनों में यदि उन्होंने किसी और के साथ किसी तरह का संघर्ष किया हो। इस शोध में भाग लेने वाले तीन चौथाई लैटिन अमेरिकी थे और 19 प्रतिशत अश्वेत थे जबकि सारे स्टूडेंट्स में 56 प्रतिशत लड़कियां शामिल थीं।
क्या निकला निष्कर्ष  
इस शोध में पाया गया कि जो लड़कियां रेग्युलर एक्सरसाइज करती थीं उनमें हिंसक व्यवहार का स्तर कम पाया गया। वहीं लड़कों में हिंसक व्यवहार और एक्सरसाइज के मध्य कोई संबंध नहीं देखा गया। यह शोध वाशिंगटन में आयोजित पिडिएट्रिक एकेडेमिक सोसाइटीज् (पीएएस) की वार्षिक मीटिंग में पेश
किया गया।