बदलती जीवनशैली का प्रभाव केवल खानपान पर ही नहीं, सेहत पर भी पड़ा है। बात जब दांतों की खराबी की आती है तो उसके लिए भी हमारे खानपान की बदलती आदतों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसे में दांतों का कोई स्थायी उपचार उन लोगों के लिए वरदान जैसा होगा, जिनके दांत अत्यध्ािक खराब हो चुके हैं।
कागोशिमा के शीन निपॉन बायोमेडिकल लेबोरेटरीज के वैज्ञानिक मिसाको नाकाशिमा और उनकी टीम ने खराब दांतों के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण खोज की है। स्टेम सेल्स के जरिए अब लोगों के असली दांतों को ही रिस्टोर किया जा सकेगा। ऐसा माना जा रहा है कि इस ट्रीटमेंट के जरिए दांतों की कैविटी को दूर करने के लिए फिलिंग और कैपिंग की पद्धति का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। दांतों से जुड़ी परेशानियां न केवल मरीज को दांतों में दर्द देती हैं, बल्कि इससे हृदय रोगों की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं।
रूट कैनाल ट्रीटमेंट: बैक्टीरिया या इंफेक्शन के कारण दांतों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इससे ठीक होने की प्राकृतिक रफ्तार ध्ाीमी पड़ जाती है। यदि दांतों का ऊपरी ठोस हिस्सा नष्ट होने लगा है और संक्रमण दंातों के अंदरूनी हिस्से में जाना शुरू कर दे तो इससे सॉफ्ट पल्प टिशूज मृत होेने लगते हैं। ऐसी स्थिति में रूट कैनाल ट्रीटमेंट या दांतों को निकलवाने तक की नौबत आ जाती है।
पल्प है जरूरी : गर्म, ठंडा और दबाव जैसी संवेदना महसूस करने के लिए पल्प दांतों का एक जरूरी हिस्सा है। पल्प में ही स्टेम सेल्स मौजूद होते हंै। टूथ टिशु को फिर से तैयार करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। शोध्ाकर्ताओं ने स्टेम सेल आध्ाारित थैरेपी की जांच की है, जो पल्प के पुन: निर्माण में कारगर हो सकता है। इससे संभावना जताई जा रही है कि दांतों को पहले की तरह स्वस्थ्ा अवस्था में लाया जा सकता है।
परीक्षण डॉग्स पर
वैज्ञानिकों ने इस शोध्ा की सफलता जांचने के लिए डॉगीज पर इसे आजमाया। उन्होंने 18 डॉगीज के पल्प स्टेम सेल्स के नमूने लेकर उनमें वृद्धि के कारकों की उपस्थिति की जांच की। फिर पल्प टिशूज को रिजेनरेट कर डॉगीज के रूट कैनाल में फिल कर दिया। शोध्ाकर्ताओं को आशानुरूप परिणाम मिले हैं और उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इंसानों पर भी इसे आजमाया जा सकेगा।
कागोशिमा के शीन निपॉन बायोमेडिकल लेबोरेटरीज के वैज्ञानिक मिसाको नाकाशिमा और उनकी टीम ने खराब दांतों के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण खोज की है। स्टेम सेल्स के जरिए अब लोगों के असली दांतों को ही रिस्टोर किया जा सकेगा। ऐसा माना जा रहा है कि इस ट्रीटमेंट के जरिए दांतों की कैविटी को दूर करने के लिए फिलिंग और कैपिंग की पद्धति का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। दांतों से जुड़ी परेशानियां न केवल मरीज को दांतों में दर्द देती हैं, बल्कि इससे हृदय रोगों की आशंकाएं भी बढ़ जाती हैं।
रूट कैनाल ट्रीटमेंट: बैक्टीरिया या इंफेक्शन के कारण दांतों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इससे ठीक होने की प्राकृतिक रफ्तार ध्ाीमी पड़ जाती है। यदि दांतों का ऊपरी ठोस हिस्सा नष्ट होने लगा है और संक्रमण दंातों के अंदरूनी हिस्से में जाना शुरू कर दे तो इससे सॉफ्ट पल्प टिशूज मृत होेने लगते हैं। ऐसी स्थिति में रूट कैनाल ट्रीटमेंट या दांतों को निकलवाने तक की नौबत आ जाती है।
पल्प है जरूरी : गर्म, ठंडा और दबाव जैसी संवेदना महसूस करने के लिए पल्प दांतों का एक जरूरी हिस्सा है। पल्प में ही स्टेम सेल्स मौजूद होते हंै। टूथ टिशु को फिर से तैयार करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। शोध्ाकर्ताओं ने स्टेम सेल आध्ाारित थैरेपी की जांच की है, जो पल्प के पुन: निर्माण में कारगर हो सकता है। इससे संभावना जताई जा रही है कि दांतों को पहले की तरह स्वस्थ्ा अवस्था में लाया जा सकता है।
परीक्षण डॉग्स पर
वैज्ञानिकों ने इस शोध्ा की सफलता जांचने के लिए डॉगीज पर इसे आजमाया। उन्होंने 18 डॉगीज के पल्प स्टेम सेल्स के नमूने लेकर उनमें वृद्धि के कारकों की उपस्थिति की जांच की। फिर पल्प टिशूज को रिजेनरेट कर डॉगीज के रूट कैनाल में फिल कर दिया। शोध्ाकर्ताओं को आशानुरूप परिणाम मिले हैं और उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इंसानों पर भी इसे आजमाया जा सकेगा।

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