फिलहाल अंग प्रत्यारोपण काफी महंगा होता है। आम आदमी के बस की बात नहीं है अंग प्रत्यारोपण लेकिन एक नई खोज के बाद यह न केवल सस्ता बल्कि सुरक्षित भी हो सकेगा। इससे जुड़े एक शोध में यह दावा किया गया है कि मरीजों को इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं का सेवन कराए बिना भी इस ऑपरेशन को अंजाम दिया जा सकता है क्योंकि इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं के सेवन से रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है जिससे मरीज का जीवन प्रत्यारोपण के बाद कठिनाई में आ जाता है।
शोधकर्ताओं ने लैबोरेटरी में टी-रेग्ज (रेग्युलेटरी टी सेल्स) बनाने का दावा किया है, जो मरीजों को प्रत्यारोपित किए जाने पर इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह खोज अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित होगी। इससे न सिर्फ रोगियों की मृत्युदर में कमी आएगी बल्कि उनके परिवारों पर वित्तीय बोझ भी कम पड़ेगा। इसकी खोज से न सिर्फ अंग प्रत्यारोपण बल्कि ऑटोइम्यून डिसॉर्डर, डायबिटीज, होमोफीलिया, एड्स और कैंसर के इलाज में भी मदद मिलेगी। इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिसीजेस एंड रिसर्च सेंटर-इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसप्लांट साइंसेस की प्रमुख डॉ. अरुणा वनीकर ने बताया कि शोधकर्ताओं द्वारा टी-रेज का इस्तेमाल ऐसे 27 मरीजों पर किया जा चुका है, जिन्होंने किडनी ट्रांसप्लांट कराई थी। इस परीक्षण के बाद सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
दूसरी बड़ी सफलता
अरुणा वनीकर ने कहा कि टी-रेज एक ऐसा सेल है जो विट्रो और वीवो में कार्य करता है। इस प्रकार प्रतिरक्षात्मक क्रिया में इसकी भूमिका प्रमुख हो जाती है। इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं के सेवन से यह मुक्ति दिला सकता है। मेसेंकाईमल स्टेम की खोज के बाद अगर इसे दूसरी सबसे बड़ी सफलता माना जाए तो गलत नहीं होगा।
दूसरी बड़ी सफलता
अरुणा वनीकर ने कहा कि टी-रेज एक ऐसा सेल है जो विट्रो और वीवो में कार्य करता है। इस प्रकार प्रतिरक्षात्मक क्रिया में इसकी भूमिका प्रमुख हो जाती है। इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं के सेवन से यह मुक्ति दिला सकता है। मेसेंकाईमल स्टेम की खोज के बाद अगर इसे दूसरी सबसे बड़ी सफलता माना जाए तो गलत नहीं होगा।

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