कसरत भले ही थोड़ी मात्रा में की जाए, इससे आपका डीएनए भी बदल सकता है। इससे मोटापे और डायबिटीज की जोखिम तक कम हो सकती है। एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है।
स्वीडन के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार इस बात को रेखांकित किया है कि हमारी फैट सेल्स में एपीजेनेटिक लेवल पर उस वक्त क्या असर होता है, जब हम कोई शारीरिक गतिविधि कर रहे होते हैं। लुंड यूनिवर्सिटी डायबिटीज सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर चार्लोट लिंग का कहना है कि हमारे अध्ययन बताते हैं कि कसरत का सकारात्मक प्रभाव यही है कि यह जीनों के एपीजेनेटिक पैटर्न को प्रभावित करता है, जो सीधे-सीधे शरीर के फैट पर असर डालता है।
डीएनए का खेल
बॉडी के सेल्स में डीएनए होता है, जिनमें जीन होते हैं। ये जीन वंशानुगत होते हैं और इनमें बदलाव नहीं किया जा सकता। हालांकि जीन में मिथाइल ग्रुप जुड़ा होता है, जो जीन एक्सप्रेशन के रूप में जाना जाता है। इस मिथाइल ग्रुप को विभिन्ना तरीकों से प्रभावित किया जा सकता है। यह तरीका कसरत, डाइट और लाइफ स्टाइल के जरिए भी हो सकता है। इस पूरी प्रोसेस को 'डीएनए मिथाइलेशन" कहते हैं। यही एपिजेनेटिक्स है, जो तुलनात्मक रूप से अनुसंधान का नया क्षेत्र है। हाल ही के वर्षों में इसने और अधिक ध्यान खींचा है।
अध्ययन में यह किया
अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान लगभग 35 वर्ष के मोटे, स्वस्थ व्यक्तियों को शामिल किया। ये लोग पूर्व में कसरत जैसी शारीरिक गतिविधियां नहीं कर रहे थे। इनसे छह माह तक नियमित रूप से स्पीनिंग और एरोबिक्स क्लासेस ज्वॉइन कराई गई। अध्ययन में यह देखा गया कि शारीरिक गतिविधि नहीं करने और शारीरिक गतिविधि करने के दौरान उनके फैट सेल्स में मिथाइल ग्रुप में क्या बदलाव आया। अध्ययन में पाया गया कि शारीरिक गतिविधि के दौरान उनमें 7 हजार जीन (एक व्यक्ति में 20 से 25 हजार जीन होते हैं) में एपिजेनेटिक बदलाव देखा गया। मिथाइलेशन के दौरान उन जीनों पर नजर रखी गई जो टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे से जुड़े हैं। लुंड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट अनुसंधानकर्ता टिना रॉन का कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान डीएनए में बदलाव तक देखा गया। यह अध्ययन जर्नल 'पीएलओएस जेनेटिक्स" में प्रकाशित हुआ है।
स्वीडन के अनुसंधानकर्ताओं ने पहली बार इस बात को रेखांकित किया है कि हमारी फैट सेल्स में एपीजेनेटिक लेवल पर उस वक्त क्या असर होता है, जब हम कोई शारीरिक गतिविधि कर रहे होते हैं। लुंड यूनिवर्सिटी डायबिटीज सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर चार्लोट लिंग का कहना है कि हमारे अध्ययन बताते हैं कि कसरत का सकारात्मक प्रभाव यही है कि यह जीनों के एपीजेनेटिक पैटर्न को प्रभावित करता है, जो सीधे-सीधे शरीर के फैट पर असर डालता है।
डीएनए का खेल
बॉडी के सेल्स में डीएनए होता है, जिनमें जीन होते हैं। ये जीन वंशानुगत होते हैं और इनमें बदलाव नहीं किया जा सकता। हालांकि जीन में मिथाइल ग्रुप जुड़ा होता है, जो जीन एक्सप्रेशन के रूप में जाना जाता है। इस मिथाइल ग्रुप को विभिन्ना तरीकों से प्रभावित किया जा सकता है। यह तरीका कसरत, डाइट और लाइफ स्टाइल के जरिए भी हो सकता है। इस पूरी प्रोसेस को 'डीएनए मिथाइलेशन" कहते हैं। यही एपिजेनेटिक्स है, जो तुलनात्मक रूप से अनुसंधान का नया क्षेत्र है। हाल ही के वर्षों में इसने और अधिक ध्यान खींचा है।
अध्ययन में यह किया
अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान लगभग 35 वर्ष के मोटे, स्वस्थ व्यक्तियों को शामिल किया। ये लोग पूर्व में कसरत जैसी शारीरिक गतिविधियां नहीं कर रहे थे। इनसे छह माह तक नियमित रूप से स्पीनिंग और एरोबिक्स क्लासेस ज्वॉइन कराई गई। अध्ययन में यह देखा गया कि शारीरिक गतिविधि नहीं करने और शारीरिक गतिविधि करने के दौरान उनके फैट सेल्स में मिथाइल ग्रुप में क्या बदलाव आया। अध्ययन में पाया गया कि शारीरिक गतिविधि के दौरान उनमें 7 हजार जीन (एक व्यक्ति में 20 से 25 हजार जीन होते हैं) में एपिजेनेटिक बदलाव देखा गया। मिथाइलेशन के दौरान उन जीनों पर नजर रखी गई जो टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे से जुड़े हैं। लुंड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट अनुसंधानकर्ता टिना रॉन का कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान डीएनए में बदलाव तक देखा गया। यह अध्ययन जर्नल 'पीएलओएस जेनेटिक्स" में प्रकाशित हुआ है।

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