बुधवार, 13 नवंबर 2013

बाल: करें थोड़ी देखभाल

बाल आमतौर पर तीन तरह के होते हैं- ऑयली, ड्राइ और नॉर्मल। किसी भी तरह के शैंपू, तेल, कंडीशनर और बालों के रखरखाव के जुड़ी चीजों के इस्तेमाल से पहले यह जरूर जान लें कि आपका बाल किस तरह का है। अगर आपका बाल ड्राइ है तो फिर आपके शैंपू और कंडीशनर नमी प्रदान करने वाले तत्वों जैसे जोजोबा और एलोवेरा से भरपूर होना चाहिए। वहीं अगर आपका बाल ऑयली है तो फिर आपको अपने बालों को नियमित रूप से धोना चाहिए। साथ ही आपको बालों के पोषण के लिए सिर्फ उन्हीं उत्पादों का इस्तेमाल करना चाहिए जो ऑयली हेयर के लिए बने हों।
 नियमित बाल धोएं
आपके बाल किसी भी प्रकार हों, आपको नियमित रूप से अपने बालों को शैंपू से धोना चाहिए। हालांकि शैंपू के चुनाव में इस बात का ध्यान जरूर रखें के आपके बाल किस प्रकार के हैं। अगर इसमें किसी तरह की दिक्कत आए तो त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लें।
शैंपू
बहुत जल्दी-जल्दी और बहुत देर से अपने शैंपू का ब्रांड न बदलें। हर शैंपू का असर दिखने में थोड़ा समय लगता है। जब शैंपू आपके बालों पर असर दिखाना बंद कर दे तो फिर आप किसी दूसरे ब्रांड के शैंपू के बारे में सोचें।
तेल लगाना
बालों में नियमित रूप से तेल लगाना हेयर केयर का एक अहम हिस्सा है। इसके कई फायदे हैं और यह बालों के विकास में काफी मददगार होता है। कोशिश करें कि अपने बालों में गर्म तेल लगाएं और हल्का मसाज भी करें। बालों पर असर दिखने के लिए आप इसे रात भर छोड़ दें या फिर कम से कम तीन घंटे का समय दें।
कंडीशनिंग
कंडीशनिंग से बाल न सिर्फ स्वस्थ रहते हैं, बल्कि चमकदार भी बनते हैं। इसके लिए आप एलोवेरा, ट्री टी ऑयल, जोजोबा आदि प्राकृतिक कंडीशनर का इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही व्यवसायिक रूप से बनाए गए कंडीशनर भी मुलायम और चमकीले बाल पाने में काफी मददगार होते हैं।
ड्राइंग
शैंपू से बाल धोने के बाद इसे सुखाने के कई तरीके हैं। कई बार यह जरूरी हो जाता है कि आप बालों को तौलिए में लपेट कर उसे सूखने दें। ब्लो ड्राइंग भी बालों को सुखाने का एक चर्चित तरीका है। हालांकि इस में आपको इस बात का ध्यान रखना पड़ता है
कि कहीं बाल ज्यादा न सूख जाए या जल न जाए।
ग्रूम और साइज
शैंपू से सिर धोने के बाद बालों को झड़ने से रोकने के लिए इसकी ग्रूमिंग भी बेहद महत्वपूर्ण है। ज्यादा लंबे समय तक और बेतरतीब दिशा में ग्रूमिंग न करें। इससे बाल ज्यादा झड़ेंगे। अपने बालों के प्रति उदार रहें और इसे सुरक्षित रखने के लिए कंडीशनर का इस्तेमाल करें।
 सावधानी से करें डाइ
ज्यादातर पुरुषों यह मानते हैं कि बालों की सफेदी उम्र की निशानी है। ऐसे में सफेद बाल आने पर वे घबरा जाते हैं और आत्मविश्वास खो देते हैं। जहां तक संभव हो सके बालों में हर्बल और ऑर्गेनिक कलर का ही इस्तेमाल करें। अमोनिया जैसे बिना रसायन वाले नेचुरल हेयर कलर को ही प्रयोग में लाएं। यह जानने के लिए एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें कि कौन सा डाइ आपके बालों को अच्छे से सूट करता है।

खान-पान का ध्यान तो निमोनिया काबू में

अगर निमोनिया से तुरंत ना लड़ा जाए तो, निमोनिया से फेफड़ों पर खतरा भी पड़ सकता है। निमोनिया पर काबू पाने के कुछ घरेलू नुस्खे।
लहसुन
लहसुन को नियमित अपने खाने में शामिल करें क्‍योंकि यह प्राकृतिक एंटीबायटिक के रूप में जाना जाता है। यह शरीर में रोगाणुओं को खतम करता है।
हल्‍दी
हल्‍दी को खाने में जरुर डालें क्‍योंकि निमोनिया को जल्‍द खतम करने में सहायक होती है।
अदरक
लहसुन की ही तरह अदरक भी सांस से संबन्‍धित समस्‍या को दूर करती है। इसे चाय में डाल कर सुबह पियें।
तुलसी
यह एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसे डॉक्‍टर भी लेने को बोलते हैं। यह खराब बैक्‍टीरिया को शरीर से बाहर निकालती है। इसे दिन में 6 बार लेना चाहिये।
विटामिन सी
विटामिन सी से युक्‍त बहुत सारे फल मिल जाएंगे, इन्‍हें अपनी डाइट में शामिल करें। बिटामिस सी का स्रोत अमरूद भी होता है।
पानी
इस रोग में बहुत सारा पानी पीना चाहिये। इससे शरीर हाइड्रेट रहेगा।
 गाजर
यह केवल आंखों के लिये ही नहीं बल्‍कि फेफड़ों के लिये भी अच्‍छा होता है। निमोनिया होने पर गाजर का जूस जरूर पीना चाहिये क्‍योंकि इसमें बहुत सारा विटामिन ए होता है।
मिर्च
एक्‍सपर्ट्स का मानना है कि मिर्च में इंफेक्‍शन से लड़ने की बहुत ताकत होती है। इसलिये इसे निमोनिया होने पर जरुर खाएं।
तिल
निमोनिया के खतरनाक बैक्‍‍टीरिया से तिल के बीज छुटकारा दिलाते हैं।
शहद
चीनी की बजाए इस बीमारी में शहद खाना चाहिये। क्‍योंकि इसमें एंटीबैक्‍टीरियल गुण होते हैं जो कि खराब बैक्‍टीरिया से शरीर को बचाने में मदद करते हैं।
मेथी दाना
इसमें बहुत सारी शक्‍ति होती है। इस बीमारी के दौरान आपको मेथी अवश्‍य खाना चाहिये।
काली चाय
जिन्‍हें निमोनिया हो उन्‍हें दूध के बने उत्‍पादों से दूरी बना कर रखनी चाहिये। इस दौरान काली चाय का सेवन करना चाहिये।
चुकंदर
चुकंदर में बहुत सारी उर्जा होती है और यह शरीर के अंदर का इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूती प्रदान करता है। इस बीमारी में आपको इसका सेवन जरुर करना चाहिये।
न खाएं पशु प्रोटीन
अगर आप नॉन वेज खाने के शौकीन हैं तो, सी फूड खाइये ना कि पशु का मांस। मछली जैसे, ट्यूना और साल्‍मन आदि मछलियों में बहुत सारा ओमेगा फैटी एसिड होता है जो कि बीमार शरीर की आवश्‍यकता है।

हड्डियां कमजोर हैं? तो आज से करें अमल

डाइट में नियमित रूप से कैल्‍शियम शामिल करने और अन्‍य उपायों से आप अपनी हड्डियों को कमजोर होने से बचा सकते हैं। यहां पर 10 ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं जिनसे आप अपनी हड्डियों में मजबूती ला सकते हैं, तो ज़रा गौर करें।
हरी पत्‍तेदार सब्‍जियां
अपने आहार में गहरे हरे रंग की पत्‍तेदार सब्‍जियां, ब्रॉक्‍ली, डेयरी प्रोडक्‍ट शामिल करें क्‍योंकि यह विटामिन डी का अच्‍छा विकल्‍प होती हैं और हड्डियों के लिये कमाल कर सकती हैं।
लहसुन-प्‍याज
लहसुन और प्‍याज सल्‍फर के अच्‍छे स्‍त्रोत हैं तो इनका सेवन जरुर करें।
रोजाना व्‍यायाम करें
अपनी दिनचर्या में व्‍यायाम शामिल करें। चाहे तो सीढियों से चढे-उतरे, जौगिंग, डासिंग या वेट लिफ्टिंग करें, ये सब ही हड्डियों को मजबूती प्रदान करती हैं।
सप्‍लीमेंट का सेवन करें
यदि आपको लगता है कि आपको भोजन दा्रा पूरा पोषण नहीं मिल रहा है तो आप सप्‍लीमेंट या जडी़ बूटी का सेवन कर सकते हैं। पर इसको लेने से पहले अपने डॉक्‍टर से जरुर सलाह ले लें।
जडी़ बूटियां खाएं
जौ घास, अल्‍फाअल्‍फा, धनिया और रोज हिप्‍स आदि कुछ ऐसी जडी़ बूटियां हैं जो आपको हड्डी मजबूत करने में सहायता प्रदान करेंगी।
विटामिन डी का सेवन
रोज सुबह जल्‍दी उठें और सूरज की हल्‍की धूप में केवल 15 मिनट का समय व्‍यतीत करें। इससे आपके शरीर में विटामिन डी का लेवल बढेगा।
हाई प्रोटीन मांस
हाई प्रोटीन मांस का सेवन ज्‍यादा ना करें क्‍योंकि इससे शरीर से कैल्‍शियम खतम होने लगता है।
कम पिये कॉफी और चाय
कॉफी और चाय का सेवन कम कर के दूध के गिलास का सेवन करें। इसमें खूब सारा कैल्‍शियम, विटामिन डी, प्रोटीन, फॉस्‍फोरस और पोटैशियम होता है जो कि हड्डियों के लिये अच्‍छा माना जाता है।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

जुकाम के घरेलू उपचार

  • थोड़ा अदरक, अजवाइन (1 चम्मच), लौंग (5), काली मिर्च (3), मैथी (1 चम्मच), तुलसी और पुदीना पत्ती (10 प्रत्येक) इन सबका काढ़ा बनाकर, खांडसारी मिलाकर दिन में दो बार आराम होने तक लेना चाहिए।
  • 10 ग्राम लहसुन को 1 कप दूध में 1/2 कप होने तक उबालें। इसे शाम को सोते समय या नाश्ते के पहले लें।
  • 1 चम्मच प्याज का रस बराबर मात्रा में शहद मिलाकर दिन में तीन बार लें।
  • हल्दी और सौंठ के चूर्ण का लेप बनाकर कपाल पर लगाएँ।
  • काली मिर्च जलाकर उसका धुआँ सूँघने से बंद नाक खुलती है।
  • अदरक के टुकड़ों का काढ़ा 20 मि.ली. से 30 मि.ली. दिन में तीन बार लेने से सर्दी से आराम मिलता है।
  • भिंडी का 50 मि.ली. काढ़ा दिन में तीन बार लेने से गले की खराश और सूखी खाँसी में आराम मिलता है।
  • एक गिलास गरम पानी में चुटकीभर नमक, चुटकीभर खाने का सोडा मिलाकर दिन में दो बार तथा सोते समय गरारे करने से गले की खराश में आराम मिलता है।

सोमवार, 11 नवंबर 2013

अमेरिका में धूमधाम से की गई छठ पूजा

 भारी संख्या में भारतीय अमेरिकी छठ मनाने के लिए सप्ताहांत में तापमान के शून्य से भी नीचे होने के बावजूद अमेरिकी राजधानी के उपनगर में ऐतिहासिक पोटोमैक नदी के किनारों पर एकत्र हुए। पटना के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अमेरिका में छठ मनाने की शुरुआत की थी। यह पांचवां साल है, जब सूर्य की पूजा के लिए समर्पित यह वार्षिक हिन्दू त्योहार यहां मनाया गया।
हर साल बढ़ रही है श्रद्धालुओं की संख्या 
पिछले कुछ वर्षों से इस वार्षिक समारोह का अकेले ही आयोजन करने वाले पटना के कृपा शंकर सिंह ने कहा कि हमें शानदार प्रतिक्रिया मिली है और छठ पूजा करते समय हमें देखने के लिए आने वाले लोगों की संख्या हर साल बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि कुछ भारतीय अमेरिकी अटलांटा से भी यहां आए। समुदाय के सदस्यों ने इस समारोह को अगले वर्ष औ
र बड़े स्तर पर आयोजित करने की मांग की है।
हीटर के इंतजाम भी किए  
 शुक्रवार शाम और शनिवार तड़के तापमान के शून्य से भी नीचे होने के बावजूद कई श्रद्धालुओं को नदी के बेहद ठंडे पानी में प्रवेश करते और पारंपरिक तरीके से छठ पूजा करते देखा गया। सिंह ने लोगों को ठंड से बचाने के लिए अलाव और इलेक्ट्रिक हीटरों का भी इंतजाम किया था।
स्वीकृति मिल गई 
सिंह की पत्नी अनीता सिंह को बिहार में रह रही उनकी सास ने छह वर्ष पहले छठ मनाने को कहा था। इसके बाद सिंह और उनके कुछ दोस्त लौदन काउंटी में पोटोमैक नदी के किनारे पिकनिक मनाने गए थे। सिंह ने बताया कि उनके मन में तब यह विचार आया कि यह स्थान छठ पूजा करने के लिए उपयुक्त है। इसके बाद उन्होंने लौदन काउंटी पार्क एंड रिक्रिएशन डिपार्टमेंट से छठ पूजा करने की अनुमति मांगी और उन्हें स्वीकृति दे दी गई।  

जुकाम या कुछ और!

लंबे समय तक जुकाम, खांसी, छींक और हल्का बुखार। ये लक्षण किसी बुखार या वायरल संक्रमण के हों ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार गंभीर समस्याओं के लक्षण जुकाम के रूप में नजर आते हैं और कई बार इसके कारणों का पता देर से चलता है।  जानिए, ऐसे ही पांच गंभीर रोगों के बारे में जिनके लक्षण सर्दी-जुकाम के रूप में नजर आते हैं।
बहरापन 
सर्दी-जुकाम के दौरान ऊंचा सुनाई पड़ना बहुत सामान्य है, लेकिन लंबे समय तक सर्दी-जुकाम बहरेपन का भी संकेत हो सकता है। इस स्थिति में कान और मस्तिष्क के सिग्नल में अवरोध होते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शोध में यह माना गया है। इस दौरान जुकाम के साथ-साथ कानों में सूजन और दबाव महसूस होता है।
फेफड़ों में संक्रमण 
मेथिलिन रेजिस्टेंट स्टाफिलोकोकस ऑरस (एमआरएसए) नामक बैक्टीरिया का संक्रमण हो सकता है, जिससे फेफड़े भी प्रभावित हो सकते हैं। आमतौर पर छोटे बच्चों को निमोनिया की स्थिति में यह संक्रमण तेजी से होता है, जो जानलेवा हो सकता है।
दिल की बीमारी 
हृदय की मांसपेशियों के टिशूज् में होने वाली सूजन की स्थिति मायोकार्डिटिस कहलाती है, जो दिल के दौरे की वजह भी हो सकती है। इस स्थिति में सर्दी-जुकाम, बुखार और सीने व जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं।
दिमाग और लिवर में सूजन 
दिमाग और लिवर में सूजन की एक स्थिति 'रेये सिंड्रोम" कहलाती है। इसका पुख्ता कारण तो अब तक खोजा नहीं जा सका है। यह बच्चों और किशोरों में जुकाम, बुखार, उल्टी, थकान आदि का कारण हो सकता है।
गर्भपात
गर्भावस्था के दौरान बहुत अधिक सर्दी-जुकाम व बुखार गर्भपात का कारण भी हो सकता है। इसके उपचार का सबसे सुरक्षित तरीका बचाव ही है। 

सुंदरता के लिए दो चुटकी नमक

नमक खाने में स्वाद ही नहीं बढ़ाता, आपकी सेहत भी बनाता है। जब यही नमक आपकी खूबसूरती को भी निखारने का काम करे, तो है न कमाल की बात!
रिलेक्स होना हो तो...
लगभग चार चम्मच साधारण नमक आधी बाल्टी पानी में लेकर मिक्स करें। अब इस नमक घुले गुनगुने पानी में अपने दोनों पैरों को घुटनों तक डुबोएं। पैरों को पानी में डुबाकर लगभग 10-15 मिनट तक रखें। इस बीच लगातार गहरी सांस लें और छोड़ें। इससे दिनभर की थकावट दूर होती है। दरअसल नमक सोडियम और क्लोराइड का मिश्रण होता है सोडियम क्लोराइड के इस घोल की कईं खासियत होती हंै।
यह दिनभर के कामकाज के दौरान शरीर में बनी निगेटिव एनर्जी को एब्जॉर्ब कर व्यक्ति को तनाव से मुक्त कर देता है। इस प्रयोग से आपको गहरी और सुकून देने वाली नींद आती है। नमक में बहुत से ऐसे एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो दर्द और सूजन जैसी समस्याओं से भी राहत देते हैं।
फेशियल टोनर 
आपकी त्वचा तैलीय है, तो आप नमक को फेशियल टोनर के रूप में इस्तेमाल कर सकती हैं। एक स्प्रे बोतल में गुनगुने पानी के साथ एक छोटा चम्मच नमक मिक्स करें। अच्छे से मिक्स करने के बाद चेहरे पर स्प्रे करें। इससे आंखों को बचाना है। चेहरे पर इसे लगाकर सूखने दें।
आंखें होंगी सुंदर 
थकावट की वजह से अगर आंखें फूल गई हों, तो गुनगुने पानी में नमक मिक्स कर इस पानी से सिकाई ले सकती हैं। इसी तरह अगर आपकी त्वचा में खुजलाहट की समस्या हो, तो नहाने के पानी में थोड़ा नमक मिलाएं। जैसे एक बाल्टी पानी में 1/4 कप सी-सॉल्ट या टेबल सॉल्ट लें। इससे आप रिलेक्स महसूस करेंगी और त्वचा की खुजलाहट से भी निजात मिलेगी।ह नहाने से पहले थोड़े से नमक को हाथ पर लें। कुछ बूंद पानी मिलाकर इसे त्वचा पर हल्के हाथों से मलें। इससे आपकी त्वचा मुलायम हो जाएगी। पैरों को मुलायम बनाने के लिए भी नमक का स्क्रब इस्तेमाल कर सकती हैं।
दांतों की चमक बढ़ाएं 
बेकिंग सोडा, पानी और थोड़ा सा नमक (एक हिस्सा नमक और दो हिस्सा बेकिंग सोडा) इसे टूथब्रश में लेकर ब्रश करें। जहां बेकिंग सोडा दांतों में चमक लाता है, वहीं नमक दांतों को स्वस्थ रखता है। यह कीटाणुओं को मारने के साथ दांतों में चमक भी बढ़ाता है। इससे मसूड़ों से संबंधित परेशानियां भी कम होती हैं।
आधा छोटा चम्मच नमक और आधा चम्मच बेकिंग सोडा को आधे गिलास पानी में मिक्स करें। इस पानी से कुल्ला करने से सांसों की दुर्गंध दूर होती है।


नाइट शिफ्ट यानी ज्यादा खाना!

नाइट शिफ्ट में काम करने के दौरान लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें नींद की समस्या से लेकर, दिनचर्या में गड़बड़ी और तरह-तरह की परेशानियां मुख्य हैं। अमेरिका में हाल ही में हुए एक शोध में एक और नई बात सामने आई है, वह यह कि दिन के मुकाबले नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोग ज्यादा खाते हैं। यानी नाइट शिफ्ट से शरीर को एक और नुकसान।
225 लोगों पर अध्ययन  
शोध में 22 से 50 वर्ष की उम्र के 225 लोगों को शामिल किया गया। जिसमें उन्हें 18 दिन तक एक स्लीप लैब में रखा गया। इस कक्ष में सभी को निश्चित समय पर खाना दिया गया और कुछ खाना अलग से भी रखा गया, जिसे प्रतिभागी अपनी इच्छा से या भूख लगने पर खा सकते थे।
दो समूहों में बांटा गया 
प्रतिभागी घूम-फिर सकते थे, लेकिन उन्हें व्यायाम करने की मनाही थी। उन्हें टीवी देखने, पढ़ने, वीडियो गेम खेलने और बैठे रहने वाली गतिविधियों को करने की आजादी थी। सभी प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटकर पांच दिनों तक पहले समूह को केवल चार घंटे (सुबह 4 से 8 बजे तक) और दूसरे समूह को 10 घंटे (रात 10 से सुबह 8 बजे तक) सोने को कहा गया।
 अध्ययन में यह पाया 
शोध में दूसरे समूह के मुकाबले पहले समूह के लोगों का वजन बढ़ा हुआ पाया गया। पहले समूह के लोगों ने रात दस बजे से सुबह चार बजे तक काम करने के दौरान ज्यादा खाया। इन लोगों ने रात में जो खाया-पीया उसमें कैलोरी का प्रतिशत अधिक था। इसका कैलोरी प्रतिशत दिन में लिए जाने वाले खाने से अधिक था। अध्ययन से पता चला कि रात में काम करने से वजन तो ज्यादा बढ़ता ही है। असमय खाने से प्रतिदिन खाए जाने वाले खाने का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। साथ ही इससे कैलोरी लेने का समय भी बिगड़ जाता है। जिसका असर शरीर पर आसानी से देखा जा सकता है।

कैंसर से लड़ने में मददगार विवाहित जिंदगी

खुशहाल वैवाहिक जीवन को जिंदगी की सबसे बड़ी पूंजी माना गया है। गृहस्थ में रहते हुए व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों को संभालने के साथ जीवन के कई तरह के फलसफे सीखता है। वहीं इसके कई फायदे भी हैं। जिनमें से एक यह कि यह किसी सुरक्षित कवच से कम नहीं है। जी हां, एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि विवाहित मरीजों में किसी भी रोग से लड़ने की क्षमता अविवाहितों की तुलना में ज्यादा होती है।
अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार कैंसर के वह  मरीज जो इलाज के समय विवाहित होते हैं वे अविवाहित मरीजों की तुलना में ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं। अध्ययन में पाया गया कि वास्तव में कुछ कैंसर रोगों से बचाव में कीमोथैरेपी की अपेक्षा विवाहित होना ज्यादा प्रभावकारी साबित होता है।
अनुसंधानकर्ता बोस्टन के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉक्टर एयलर आइजर इस अध्ययन के प्रमुख हैं। उनके अनुसार विवाहित मरीजों में इसकीशुरुआती चरण में ही पहचान होने से रोग का समय रहते उचित इलाज हो जाता है। यह मरीजों की जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में सहायक होता है। उन्होंने कहा कि अध्ययन से यह पहली बार पता चला है कि कैंसर के प्रमुख रूपों जैसे फेफड़े, स्तन, अग्नाशय, प्रोस्टेट, लिवर, सिर, गर्दन, ओवेरियन और भोजन नलिका के रोगियों के लंबे समय तक जीवित रहने में विवाह कैसे फायदेमंद साबित होता है।
आईजर ने उम्मीद जताई है कि विवाह के कारण मिलने वाली सामाजिक मदद ही लोगों के लिए इस बीमारी से उबरने में मददगार साबित होती है। अध्ययन के परिणाम बताते हंै कि जो मरीज विवाहित नहीं हैं उन्हें बीमारी का पता चलने पर सुधार के लिए दोस्तों की मदद लेना चाहिए और डॉक्टरों से भी लगातार संपर्क         करना चाहिए।



डायटिंग कहीं दिमाग को कमजोर न कर दे!

वजन कम करने की राह में सबसे पहला कदम डायटिंग का होता है। इससे मोटापे से तो भले ही मुक्ति मिल जाए, लेकिन क्या आपको मालूम है इसका बुरा असर दिमाग पर भी पड़ता है। व्यक्ति की मानसिक क्षमता कमजोर होने लगती है। एक अध्ययन में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि डायटिंग के दौरान लोगों को अपने खानपान की आदतों पर सख्ती से काबू करना होता है। ऐसे में उनका सारा ध्यान इस बात पर रहता है कि कहीं वे जरूरत से अधिक कैलरी का सेवन न कर लें। इस जद्दोजहद में उन्हें बाकी चीजों पर ध्यान देने का मौका ही नहीं मिलता। उनकी इसी आदत के चलते मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता शिथिल पड़ने लगती है।
होता है नेगेटिव असर 
शोधकर्ता सेंढिल मुल्लईनाथन बताते हैं कि दिमाग के शिथिल पड़ने से रोजमर्रा के कई कामों में दिक्कत आती है। साथ ही इंसान की तर्कशक्ति, समस्याएं सुलझाने की क्षमता और नई बातें सीखने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इतना ही नहीं व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता पर भी नेगेटिव असर पड़ता है। इसका खामियाजा केवल दिमाग को ही नहीं बल्कि शरीर को भी उठाना पड़ता है।
दो भागों में बांटकर
किया परीक्षण 
कई बार डायटिंग करने वाले लोग खानपान को लेकर गलत फैसले ले लेते हैं और कैलरी से परहेज नहीं कर पाते। ठोस निष्कर्ष निकालने के लिए शोधकर्ताओं ने कुछ लोगों पर एक परीक्षण किया। इनमें से कुछ प्रतिभागी डायटिंग करने वाले जबकि कुछ खानपान की सामान्य दिनचर्या का पालन करने वाले थे।
दोनों समूह के प्रतिभागियों को एक-एक चॉकलेट खाने को दी गई। सामान्य आहार लेने वाले चॉकलेट खाने के बाद अपना काम करने लगे। जबकि डायटिंग करने वाले चॉकलेट खाने के बाद उसमें मौजूद कैलरी का हिसाब-किताब करने लगे। उन्हें इस बात का मलाल भी हुआ कि उन्होंने चॉकलेट का सेवन क्यों किया? इस सब के बीच वे जरूरी कामों पर ध्यान देना भूल गए। इससे मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता प्रभावित हुई। शोधकर्ताओं के मुताबिक डायटिंग अच्छी चीज है, लेकिन हर वक्त इसके बारे में सोचना आपकी सेहत के लिए अच्छा नहीं।



कृत्रिम किडनी सेल्स बनाने में सफलता

सिंगापुर में वैज्ञानिकों ने लेबोरेटरी में सफलतापूर्वक किडनी सेल्स बनाने में कामयाबी हासिल की है। यह किडनी सेल बिना किसी जीव या सेल या फिर अन्य किसी ऑर्गन के उपयोग से बनाई गई है। इंस्टीट्यूट ऑफ बायोइंजीनियरिंग एंड नैनोटेक्नोलॉजी (आईबीएन) ने इस मानव किडनी सेल्स का निर्माण विट्रो में मानव एम्ब्रियॉनिक स्टेम सेल्स के जरिए किया है। रीनल सेल्स (किडनी सेल्स) का निर्माण पूरी तरह से कृत्रिम तरीके से लेबोरेटरी में किया गया है। यह एक ऐसा अनुसंधान है जिस पर अभी तक सफलता हासिल करना संभव नहीं था। आईबीएन के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जैकी वाय. यिंग ने बताया कि उनकी यह खोज विट्रो टॉक्सिलॉजी, ट्रग स्क्रीनिंग, डिसीज मॉडल्स और रिजनरेटिव मेडिसीन के निहितार्थ तक पहुंचने में मदद करेगी। उन्होंने कहा कि हम अपनी इस नई तकनीक का उपयोग एनिमल टेस्टिंग के लिए करने को उत्सुक हैं।

जैतून का तेल और बादाम हार्ट के लिए फायदेमंद

 जैतून का तेल, बादाम और भूमध्यसागर के  आसपास पाए जाने वाले अन्य खाद्य पदार्थ हृदयाघात या हृदय रोग से मौत होने के  खतरे को 30 फीसद तक घटा देते हैं। यह बात 'मेडिसीन जर्नल" में प्रकाशित एक शोधपरक लेख में सामने आई है। शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि भूमध्यसागर के आसपास पाए जाने वाले खाद्य पदार्थ, जैतून का शुद्ध तेल या बादाम के सेवन से अत्यंत जोखिम भरे हृदय रोग की आशंका काफी कम होती है। केवल इतना ही नहीं इन खाद्य पदार्थों के सेवन से हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों की तकलीफ काफी हद तक कम हो जाती है।
सचमुच कारगर 
यूनिवर्सिटी ऑफ वरमॉन्ट में पोषाहार विज्ञान की प्रोफेसर एवं अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की प्रवक्ता रैकल जॉनसन ने शोध से सामने आए तथ्यों को सचमुच कारगर बताया। रैकल ने कहा कि उन्होंने दिल का दौरा, सदमा और मौत के  अंतर्संबंधों का अध्ययन किया। अंत में जिस निष्कर्ष पर पहुंचे, वह सबके  सामने है। भूमध्यसागर के आसपास के लोग अपने भोजन में जैतून का तेल, फल, बादाम, सब्जियां, मछली, चिकन, अंडे को शामिल करते हैं और कम से कम एक गिलास शराब जरूर लेते हैं। वे दूध से बनी वस्तुओं, लाल मांस और मिठाइयां कम मात्रा में लेते हैं।
रहेगा दिल तंदुरुस्त 
यही वजह है कि भूमध्यसागर के आसपास के देशों में रहने वालों का दिल तंदुरुस्त रहता है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उनके दिल की यह तंदुरुस्ती वंशानुगत है या फिर यह उनकी जीवनशैली या भोजन में विविधता के कारण है, अभी इस बात पर और भी शोध जारी है।
5 साल तक चला अध्ययन
5 साल तक किए अध्ययन में यह बात सामने आई है। इसमें यह भी कहा गया है कि यह डाइट उन लोगों के लिए भी काफी हेल्पफुल है जो अपना वजन कम करने में असफल रहते हैं। हाइपरटेंशन, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में यह डाइट काफी मददगार साबित होती है।
भूमध्यसागरीय खाद्य सामग्री
भूमध्यसागरीय खाद्य सामग्री में जैतून का तेल, बादाम, बीन्स, फ्रूट्स और वेजिटेबल भरपूर मात्रा में होता है। यही वजह है कि मौसमी आहार के रूप में वहां रहने वाले लोग सारे फ्रूट्स व वेजिटेबल का सेवन करते हैं और रिच और हेल्दी ऑयल वाली वहां की वनस्पति उनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास करती है। 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसीन" में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य दिए हैं, जिनसे यह जानकारी मिलती है कि भूमध्यसागरीय भोजन हार्ट की विभिन्ना बीमारियों और स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक कम कर देते हैं।




पुरुषों में स्लीप एप्निया का खतरा ज्यादा

नींद के दौरान सांस लेने में अक्सर जो दिक्कत महसूस होती है, वह कभी-कभी खतरनाक भी हो सकती है। स्लीप एप्निया के रूप में पहचानी जाने वाली यह समस्या भले ही सुनने में छोटी लगती हो, लेकिन इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। आईआईएमएस के एक शोध के मुताबिक भारतीय पुरुषों में नींद के दौरान सांस लेने में दिक्कत महिलाओं की अपेक्षा तीन गुना अधिक होती है। इतना ही नहीं शोध में यह भी पाया गया कि इस बीमारी में अधिकतर लोग डॉक्टर के पास जाने की सोचते ही नहीं हैं। यही वजह है कि हमारे देश में केवल चार प्रतिशत लोग ही अपनी समस्या को बीमारी मानकर इसका उपचार कराने के लिए डॉक्टरी परामर्श लेते हैं। जबकि दूसरे देशों की अपेक्षा हमारे देश में इस बीमारी के मामले कहीं अधिक हैं।
क्या है समस्या - यह समस्या रात को नींद के दौरान हो जाती है। इस समस्या की वजह से सोते समय व्यक्ति की सांस सैकड़ों बार रूक जाती है। श्वसन प्रक्रिया में आने वाले इस अंतर को एप्निया कहा जाता है।


सभी तरह के फ्लू का यूनिवर्सल टीका

 फ्लू के कारगर इलाज के लिए कई तरह के शोध लगातार होते रहते हंै। मगर हाल ही में ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने फ्लू से बचाव के लिए नई वैक्सीन खोजने का दावा किया है। नई वैक्सीन किसी भी तरह के फ्लू से बचाने में कारगर होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि वे इस तरह की वैक्सीन बनाने के करीब पहुंच चुके हैं, जो बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों से लोगों को सुरक्षित रख सकेगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इंफ्लूएंजा से ही हर वर्ष दुनियाभर में 2.5 लाख से पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। वैज्ञानिक पिछले कई दशक से इस तरह की वैक्सीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो हर प्रकार के फ्लू से लोगों को बचा सके। लेकिन अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली थी।
नई उम्मीद जागी 
इस अध्ययन से उम्मीद जागी है कि इससे फ्लू से होने वाली मौतों के आंकड़ों को कम किया जा सकेगा। साथ ही भावी महामारियों को भी रोका जा सकेगा। इस अध्ययन की शुरुआत उस समय हुई थी, जब वर्ष 2009 में स्वाइन फ्लू फैला था। इंपीरियल कॉलेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने जांच की कि क्यों कुछ लोग स्वाइन फ्लू से बीमार हो गए। जबकि कुछ इससे बचे रहे। उन्होंने सैकड़ों स्टॉफ मेंबर्स और विद्यार्थियों के खून के नमूनों की जांच की और अगले दो सीजन तक उन पर नजर रखी। अभी जो वैक्सीन उपलब्ध हैं वे फ्लू के सबसे सामान्य रूपों को लक्ष्य बनाती हैं। ये वैक्सीन फ्लू के नए रूपों पर कारगर नहीं हो पाती हैं। वे सिर्फ प्रतिरोधी तंत्र को एंडीबॉडी या रोग-प्रतिरक्षी उत्पादित करने के लिए प्रेरित करती है और उनके जरिए होने वाले संक्रमण को रोकती है। रोग प्रतिरक्षी खास तरह के प्रोटीन होते हैं और शरीर में बाहर से प्रवेश करने वाले बैक्टीरिया व वायरस को पहचान कर फैलने से रोकते हैं।



दिन की झपकी बढ़ा सकती है बच्चों की मेमोरी

अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे पढ़ाई में बेहतर रहें तो उन्हें दोपहर में हल्की झपकी लेने से न रोकिए। इस तरह का यह पहला अध्ययन है जिसमें यह दावा किया गया है कि दिन के समय एक घंटे की नींद प्री-स्कूल के बच्चों की मेमोरी को बेहतर करता है, जिससे उनके सीखने की प्रक्रिया तेज होती है।
मेसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने यह निष्कर्ष निकाला है। रिसर्चर्स ने पाया कि बच्चों की शुरुआती जिंदगी में मेमोरी को मजबूत करने के लिए दिन की नींद एक अहम भूमिका निभाती है। रिसर्च के ये नतीजे 40 बच्चों पर किए गए प्रयोगों के आधार पर निकाले गए हैं। शोधकर्ता साइकोलॉजिस्ट रेबेका स्पेंसर ने कासे डकलोज और लॉरा कुर्दजेल के साथ किए अध्ययन में यह  निष्कर्ष निकाला।
ऐसे किया अध्ययन
इस अध्ययन के तहत बच्चों के समूह को दो वर्गों में बांटा गया। इसमें पहले समूह के बच्चों की एक्टिविटी औसतन 77 मिनट की नींद के बाद देखी गई। जबकि दूसरे समूह के बच्चे पूरे समय जागते रहे। जब इन बच्चों का मेमोरी टेस्ट लिया गया था तो शोधकर्ताओं को यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ कि जिन बच्चों ने दिन में कुछ देर की नींद ली थी, उनकी याददाश्त अन्य बच्चों की तुलना में तेज थी। वहीं दूसरे समूह के बच्चों में याद करने की आदत ज्यादा नहीं देखी गई।
थोड़ी देर की झपकी करे तरोताजा
दिनभर की भागदौड़ के दौरान कभी-कभी काम के समय में भी काफी सुस्ती आने लगती है, जिससे काम में मन लगना थोड़ा कठिन हो जाता है। यही वजह है कि आजकल कॉर्पोरेट सेक्टर्स में कहीं-कहीं नैपिंग रूम बनाए जा रहे हैं ताकि कुछ देर की झपकी के बाद व्यक्ति खुद को तरोताजा महसूस कर सके। झपकी लेने से ऊर्जा में दोगुना वृद्धि हो जाती है। सूचना प्रौद्योगिकी, बीपीओ,  मीडिया और निर्माण क्षेत्र की कंपनियों में दूसरे क्षेत्रों की तुलना में काम के घंटे तो ज्यादा होते ही हैं, साथ ही उनका काम थका देने वाला भी होता है। इस वजह से तनाव भी बढ़ता जाता है।


रविवार, 10 नवंबर 2013

दो भाषाएं जानने से नहीं होता डिमेंशिया

करियर में बेहतर अपॉर्च्यूनिटी के लिए भाषायी ज्ञान का होना अति आवश्यक है। हाल ही में हुए एक नए शोध में बताया गया है कि दो भाषाओं की जानकारी होने से व्यक्ति को दिमागी बीमारी होने की आशंका कम रहती है। इस अध्ययन के मुताबिक दो भाषाएं बोलने वाले लोगों पर भूलने की बीमारी होने की आशंका कम रहती है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा और हैदराबाद के निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज् के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से इस पर अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने दिमागी बीमारी या डिमेंशिया से ग्रस्त 600 से ज्यादा लोगों को चुना।
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के टॉमस बाक के साथ सुवर्णा और उनके सहयोगियों ने जब रोगियों का अध्ययन किया तो पाया कि उनमें से दो भाषाएं बोलने वालों को डिमेंशिया की बीमारी चार से पांच साल बाद असर करती हैं जबकि एक भाषी लोगों पर इस बीमारी का असर पहले ही दिखता है।
निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज हैदराबाद की न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. सुवर्णा अल्लादि ने बताया कि 'भाषायी आधार पर इसका पहला अध्ययन कनाडा के टोरंटो शहर में हुआ, जहां ढेर सारे द्विभाषी लोग रहते हैं और जो आसपास के देशों से वहां आए हैं और अपनी मातृभाषा के अलावा फ्रेंच या अंग्रेजी बोलते हैं। दूसरा अध्ययन हैदराबाद में हुआ जहां पर लोग द्विभाषी हैं"।
दिमागी कसरत होती है बेहतर 
शोधकर्ताओं का मानना है कि द्विभाषी लोग एक भाषा से दूसरी भाषा में सोचने और बोलने का काम आसानी से कर पाते हैं और इससे उनके दिमाग की अच्छी कसरत भी हो जाती है। यही उन्हें भूलने की बीमारी से लंबे समय तक बचाकर रखती है। यह अध्ययन अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी की मेडिकल पत्रिका 'न्यूरोलॉजी" में प्रकाशित हुआ।  

कॉन्फिडेंट बनिए, नहीं तो तनाव घेर लेगा

वर्कप्लेस पर किसी भी व्यक्ति के लिए कॉन्फिडेंट होना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति में कॉन्फिडेंस की कमी रहती है तो उसे किसी न किसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है। यह कमी अक्सर महिलाओं में देखने को मिलती है। मगर यदि वे इस कमी से ऊपर आ जाएं तो किसी भी क्षेत्र में अव्वल रहने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता।
एक नए शोध में बताया गया है कि वर्कप्लेस पर महिलाओं में कॉन्फिडेंस के कारण उनका दिमागी संतुलन बिगड़ता है और वे मानसिक तनाव का शिकार होती हैं। इतना ही नहीं इसके कारण वे करियर में भी पीछे रहती हैं।
चार्टर्ड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट ने हाल ही में इस पर एक शोध किया है। इस शोध के अनुसार महिलाएं अपनी खामियों को सही-सही आंक नहीं पाती हैं और यही उनको मानसिक विकार के साथ करियर में भी असफल बनाता है। इस शोध के मुताबिक महिलाएं अपनी कार्यक्षमता को लेकर पशोपेश में रहती हैं इसके कारण ही वह छोटी-छोटी बातों को लेकर शर्मींदगी भी महसूस करती हैं और बाद में यही तनाव का कारण भी बनता है।  सर्वे के अनुसार अपने कॉन्फिडेंस के कारण कामकाजी महिलाएं वरिष्ठ पदों तक पहुंचने से चूक जाती हैं। जूनियर मैनेजर के स्तर पर जहां 60 फीसद महिलाएं पहुंचती हैं वहीं वरिष्ठ पदों पर केवल 20 फीसद महिलाएं ही पहुंच पाती हैं।
*शो नहीं करतीं महिलाएं :
महिलाओं को लगता है कि उन्हें अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने की जरूरत नहीं है जबकि पुरुषों की प्रवृत्ति इस मामले में बिल्कुल उलट होती है। जो महिलाएं करियर में पीछे रह जाती हैं उनको तनाव और अवसाद जैसे मानसिक विकार होते हैं। इसका असर उनके करियर के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी पड़ता है।  

वजन घटाना हो तो, ठाड़े रहिए

अक्सर देखा गया है कि वजन बढ़ जाने पर हर किसी के माथे पर चिंता की लकीरें  दिखाई देने लगती हैं और फिर होती है मेहनत-मशक्कत, जो वजन घटाने में कारगर सिद्ध हो। मगर सफलता बहुत कम ही लोगों के हाथों में लगती है। इसलिए यदि आप भी वजन घटाना चाहते हैं लेकिन चाहकर भी आप एक्सराइज के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं तो अब चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि एक नए शोध में वैज्ञानिकों ने वजन घटाने के लिए बेहद आसान उपाय खोज निकाला है।
जी हां, ब्रिटिश शोध के अनुसार एक घंटे तक खड़े रहने से आप 40 कैलोरी बर्न कर सकते हैं, जो आपको स्लीम और फिट रखने में मददगार सिद्ध हो सकती है।
एक सप्ताह तक प्रयोग 
यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के शोधकर्ताओं ने अपने शोध के दौरान प्रतिभागियों को एक सप्ताह में तीन घंटे प्रतिदिन खड़ा रखने के बाद उनकी कैलोरी का निरीक्षण किया और बेहद सकारात्मक परिणाम पाए।
कैसे होता है वजन कम 
शोधकर्ताओं ने पाया कि खड़े रहने पर दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं और प्रति मिनट 0.7 कैलोरी कम होती है। शोध के दौरान प्रतिदिन तीन घंटे खड़े रहने वाले प्रतिभागियों ने 630 कैलोरी कम की है। यदि आप यह सोच रहे हैं कि इतनी देर तक खड़े रहने का टाइम किसके पास है तो इस शोध में उसके लिए भी आसान उपाय बताए गए हैं।
रूटीन करें थोड़ा चेंज  
शोधकर्ताओं का मानना है कि अपने रूटीन में अगर हम बैठकर करने वाले कामों को खड़े होकर करें, जैसे बस में जरूरतमंद को सीट दें और खुद थोड़ी देर खड़े रहें, फोन पर खड़े होकर बात करें या फिर टीवी पर कार्यक्रम कुछ देर खड़े होकर देखें। अब अगर आप भी वजन घटाने की चाह रखते हैं तो कुर्सी पर बैठे रहने का आलस तो आपको छोड़ना ही पड़ेगा। नहीं तो कुर्सी पर बैठने का फेविकोल का जोड़ आपको मोटा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।  

फिश ऑयल का सेवन रखे सेहतमंद

फिश ऑयल और एस्प्रिन का कॉम्बिनेशन आर्थराइटिस सहित कई जीर्ण रोगों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि ये दोनों चीजें एकसाथ मिलकर शोथ को हटाने में कारगर होती हैं। शोथ ही कई तरह की बीमारियों जैसे हार्ट डिसीज, कैंसर और आर्थराइटिस का कारक है। विशेषज्ञ हमेशा लो-डोज एस्पिरिन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स के स्वास्थ्य पर लाभकारी प्रभावों का बखान करते रहते हैं। ओमेगा-3 फैटी एसिड फ्लैक्स सीड्स (अलसी) और सालमोन (एक तरह की मछली) में भरपूर मात्रा में पाया जाता है। हालांकि अभी इसके प्रभाव के पूरे मैकेनिज्म पर अध्ययन जारी है।
सेल प्रेस जर्नल कैमिस्ट्री एंड बायोलॉजी में प्रकाशित नए शोध में यह बताया गया है कि एस्पिरिन शरीर में 'रिसोलविन्स" नामक मॉलिक्यूल के उत्पादन को सक्रिय करने में मदद करती है और यह मॉलिक्यूल शरीर में प्राकृतिक रूप से ओमेगा-3 फैटी एसिड्स के द्वारा बनते हंै। इसलिए एस्पिरिन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स को अध्ययन में साथ में शामिल किया गया। यह रिसोलविन्स लंग डिसीज, हार्ट डिसीज और आर्थराइटिस को रोकता है। चूहों पर किए गए अध्ययन में शोधकर्ताओं को काफी हद तक सफलता मिली है। इसी से अंदाजा लगाया जा रहा है कि मनुष्यों पर भी यह मेथड लाभदायक सिद्ध होगी।
उम्र की रफ्तार पर भी लगता है कंट्रोल 
फिश ऑयल कई मायनों में सेहत के लिए बहुत गुणकारी माना है। विशेषकर महिलाओं को बढ़ती उम्र में इसके सेवन की ज्यादा हिदायत दी जाती है। एक अन्य अध्ययन में यह बात सामने आई है कि फिश ऑयल का नियमित सेवन उम्र की रफ्तार को भी कंट्रोल करता है। यही वजह है कि बाजार में आने वाली महंगी एंटी-एजिंग क्रीमों में विटामिन 'ई" की मात्रा ज्यादा होती है। मछली के तेल में पाए जाने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड के कारण महिलाओं की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। एबरडीन ब्रिटिश साइंस फेस्टिवल में इस शोध के नतीजों को पेश किया गया। शोध में यह पाया गया कि ओमेगा-3 के नियमित सेवन से बढ़ती उम्र का प्रभाव दिखाई नहीं देता है। शाकाहारियों के लिए फिश आयल का उत्तम विकल्प है फ्लैक्स सीड्स (अलसी) जो ओमेगा-3 से भरपूर है।  

कम कैलोरी बनाएगी ओल्ड एज को सिक्योर

बढ़ती उम्र का असर सबसे ज्यादा सेहत पर दिखाई देने लगता है। इसके साथ ही सेहत का ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि यदि ओल्ड एज में पौष्टिक और संतुलित भोजन लिया जाए, जिसमें कैलोरी की मात्रा कम हो तो ओल्ड एज में होने वाली समस्याओं से काफी हद तक निजात पाई जा सकती है। इस खान-पान का असर उम्र पर भी दिखाई देता है और देह पर ओल्ड एज एकदम झलकती नहीं है।
भारतीय मूल के शोधकर्ता ने 'एसआईआर 2" जीन के बारे में दावा किया है। शोध में आए नतीजों के आधार पर कहा गया है कि यह जीन बढ़ती उम्र में होने वाले नुकसानों पर काबू पाने में काफी मददगार साबित होता है। इस जीन पर वैज्ञानिकों की बड़ी टीम लगातार शोध कर रही है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में ओल्ड एज की समस्याओं से लड़ने में इस जीन के बारे में और भी कई खुलासे हो सकते हैं। हालांकि इस जीन की विशेषता यह है कि यह तभी काम करता है, जब इंसान अपने खान-पान में कम कैलोरी का सेवन करे। यह जीन सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं बल्कि सभी जीवों में पाया जाता है। शोध में यह बात खुलकर सामने आई है कि ओल्ड एज में कम कैलोरी का सेवन करने से यह जीन अत्यंत सकारात्मक तरीके से काम करता है। यानी बढ़ती उम्र में संतुलित और खूब पौष्टिक खाइए मगर सिर्फ कैलोरी का ध्यान रखिए।
कई बीमारियों पर भी पाया जा सकता है काबू 
वैज्ञानिक इस जीन को काफी फायदेमंद मान रहे हैं। अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि यह जीन इंसानी शरीर में डायबिटीज, मोटापे, कैंसर, अल्जाइमर्स और पार्किंसन्स समेत कई तरह के हृदय रोगों का खतरा भी कम करता है। मनुष्य की लंबी उम्र के लिए भी इस जीन को जिम्मेदार माना जाता है, जिसे सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक अपने शोध कर रहे हैं।


फंगस से बिगड़ सकती है नाखूनों की सेहत

नेल फंगस एक या एक से अधिक नाखूनों में होने वाला फंगल इंफेक्शन है। नेल फंगस का संक्रमण्ा अपने अंगुली के नाखून या पैर के नाखून की नोक के नीचे एक सफेद या पीले रंग के धब्बे के रूप में श्ाुरू हो सकता है। जैसे-जैसे नेल फंगस आपके नाखून में गहराई तक फैलता जाता है, इसके कारण नाखून बदरंग, उसके पास के हिस्से मोटे और उनमें दर्द  महसूस होता है।
सही समय पर इलाज व देखभाल न की जाए तो यह इंफेक्शन गंभीर रूप ले सकता है। साथ ही यह समस्या दोबारा भी हो सकती है। हालांकि नेल फंगस को खत्म करने के लिए दवाएं उपलब्ध हैं। ब्रिटेन में 10,000 लोगों पर किए गए एक बड़े सर्वेक्षण में पता चला कि कुल 2.71 प्रतिश्ात आबादी में नेल फंगस मौजूद है, जबकि फिनलैंड में और संयुक्त राज्य अमेरिका के हालिया सर्वेक्षण्ाों के अनुसार कुल आबादी के 7 से 10 प्रतिश्ात लोग इस समस्या से प्रभावित हैं।  अधिक वजन या डायबिटिक लोगों को इस फंगल इंफेक्शन से अधिक परेशानी हो सकती है। छोटे बच्चों के पैरों और नाखूनों का पूरा खयाल रखें, नहीं तो फंगस के संक्रमण से नाखूनों में दर्द वाले घाव हो सकते हैं। यदि नाखूनों की साफ-सफाई का खयाल न रखा जाए तो संक्रमण का खतरा अधिक रहता है।
कैसे बचें नेल फंगस से  
नायलोन के मोजे की जगह हमेश्ाा सूती मोजे ही प्रयोग करें। गीले मोजे को बदलने में देरी ना करें। पैरों की सफाई का विश्ोष खयाल रखें। गीले पैरों और नाखूनों को ठीक प्रकार से साफ करने के पश्चात उन्हें सुखाना ना भूलें क्योंकि नमी या गीलापन होने से फंगस जल्दी होती है। यदि आप लंबे समय तक जूतों में रहते हैं तो बीच-बीच में पैरों को हवा लगने दें।  हफ्ते में एक दिन जूतों को कुछ देर धूप में रखें, जिससे उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवी या फंगस नष्ट हो जाएं और नमी भी पूरी तरह से सूख जाए। बरसात में डायबिटिक फुट की समस्याएं ज्यादा बढ़ जाती हैं और फंगस वाले जूतों से संक्रमण्ा की आशंका भी अधिक हो जाती है। इसके अलावा नाखूनों पर लगाए जाने वाले नेल पेंट को लेकर सावधानी बरतें। नेल पेंट और रिमूवर का नाखूनों पर ज्यादा इस्तेमाल किए जाने पर वे खराब होने लगते हैं।


अच्छी नींद के लिए...

सुबह उठते वक्त अगर आप फ्रेश फील ना करते हों या फिर आपको शरीर में दर्द रहता हो तो हो सकता है कि आप सही तरीके से नहीं सो पा रहे हैं। जरूरी नहीं कि इसकी वजह काम का दबाव या परेशानी हो बल्कि ये खराब मैट्रेस होने के कारण भी हो सकता है।
मैट्रेस अगर आपकी बॉडी टाइप के अनुसार न हो तो शरीर को पूरी तरह से आराम नहीं मिल पाता। नतीजा होता है गर्दन, कमर या पीठ में दर्द बना रहना। हो सकता है  कि आपने बेस्ट ब्रांड का सबसे महंगा मैट्रेस खरीदा, फिर भी आपको आराम नहीं पहुंचता तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं। कई बार बहुत सॉफ्ट मैट्रेस भी आरामदायक नहीं होते। मैट्रेस लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाली चीज है इसलिए इसे लेने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
कॉयर या फोम वाले मैट्रेस
मैट्रेस लेते समय यही बात दिमाग में बार-बार आती है कि कॉयर (जूट) वाले मैट्रेस ज्यादा अच्छे होते हैं या फिर फोम वाले। दरअसल फोम मैट्रेसेज में दबाव सहने की क्षमता होती है और इससे शरीर का पॉश्चर भी ठीक रहता है जबकि कॉयर बेस वाले मैट्रेस सख्त होते हैं और उस पर एडजस्ट होने के लिए अतिरिक्त दबाव देना पड़ता है। वैसे आजकल मेमोरी फोम मैट्रेस ज्यादा पसंद किए  जा रहे हैं।
सॉफ्ट चुनें संभलकर 
फोम बेस मैट्रेस लेने से पहले ये चेक कर लेना चाहिए कि वह बहुत ज्यादा स्प्रिंगी और सॉफ्ट ना हो। इन दिनों ऐसे फोम मैट्रेस भी मार्केट में हैं जो सॉफ्ट होने के साथ-साथ आपको सपोर्ट भी देते हैं।
यदि हो बैक की परेशानी 
ज्यादातर डॉक्टर्स का यह मानना है कि थोड़े सख्त मैट्रेस उन लोगों के लिए बेहतर होते हैं जिन्हें कमर दर्द की परेशानी होती है। लेकिन फिर भी इन्हें खरीदने से पहले उसपर लेटकर यह चेक जरूर करना चाहिए कि आपके लिए वह आरामदायक है या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भ्रम है कि कॉयर मैट्रेस फोम वाले से बेहतर होते हैं। बहुत सख्त या बहुत मुलायम दोनों ही तरह के मैट्रेस लेने से बचना चाहिए। मेमोरी फोम मैट्रेसेज शरीर के पॉश्चर के अनुसार एडजस्ट हो जाते हैं।




फ्लू वायरस को मारेगी नई ड्रग

कनाडाई वैज्ञानिकों ने एक नए शोध के तहत एक नई ड्रग की खोज की है, जो इन्फ्लुएंजा के वायरस को आसानी से खत्म कर सकेगा।
सिमोन फ्रेजर यूनिवर्सिटी के विरोलॉजिस्ट मैसाहिरो निकुरा औरा उनके डॉक्टरेट की विद्यार्थी निकोल बैंसे ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक दल के साथ मिलकर यह शोध किया। इन शोधकर्ताओं ने नई क्लास के मॉलिक्यूलर कंपाउंड्स की खोज की है, जो इन्फ्लुएंजा वायरस को मारने में सक्षम होंगे। प्रारंभिक स्तर पर चल रहे इस अध्ययन के द्वारा वैज्ञानिकों को आने वाले समय में इन्फ्लुएंजा से लड़ने में मदद मिलेगी।
'साइंस डेली" में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया कि यह नए कंपाउंड्स इन्फ्लुएंजा के खिलाफ लड़ेगा। यह उसी तरह काम करेगा, जिस तरह अभी टैमीफ्लू काम करता है। यह एंटी-इन्फ्लुएंजा ड्रग वायरस को मारने में ज्यादा सक्षम होगी। 'द जर्नल साइंस एक्सप्रेस" में यह शोध प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह नए कंपाउंड्स ज्यादा असरकारण इसलिए होंगे क्योंकि यह वॉटर-सॉल्यूबल होते हैं और वायरस पर जल्द अपना प्रभाव डाल सकते हैं।  

रोने का तरीका बताती है बच्चे की फीलिंग्स

स्पेन में किए गए अध्ययन में कहा गया है कि बच्चे रोने के तरीके से बताता है कि वह इसके जरिए गुस्सा जता रहा है, अपने शरीर में उठे दर्द को बता रहा है या भय जाहिर कर रहा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ वैलेंसिया की अनुसंधानकर्ता मॅरियानो शोलिज का कहना है कि बच्चों के पास अपनी निगेटिव फीलिंग्स को जाहिर करने के लिए रोने के सिवा और कोई चारा नहीं होता है। उनका कहना है कि रोने का यह पैटर्न 3 से 18 माह के बच्चों में नजर आता है और उसके तीन ही कारण होते हैं-भय, गुस्सा और दर्द।
ये होते हैं लक्षण
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जब बच्चा गुस्से के कारण रो रहा होता है तो उसकी आंखें खुली, अधखुली रहती हैं लेकिन जब वह दर्द के कारण रोता है तो उस दौरान उसकी आंखें बंद रहती हैं।
अगर बच्चा गुस्से में है तो उसके रोने की इंटेसिटी धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। दर्द और भय के कारण रोने के दौरान भी यही पैटर्न नजर आता है।
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जब बच्चा गुस्से के कारण रोता है तो उसकी आंखें खुली या आधी खुली रहती हैं। उसका मुंह खुला या आधा खुला रहता है और उसके रोने की इंटेसिटी धीरे-धीरे बढ़ने लगती है।
भय में रोने के दौरान बच्चे की आंखें पूरे समय पूरी खुली रहती हैं। वह अपने सिरे को बार-बार पीछे की ओर ले जाने की कोशिश करता है।
दर्द में रोने के दौरान बच्चा अपनी आंखें पूरी तरह बंद रखता है। अगर आंखें खुलती भी हैं तो वह कुछ क्षणों के लिए और निगाहें स्थिर रहती हैं। आंखों के आसपास तनाव उभरता है। रोने की इंटेसिटी अधिकतम स्तर पर होती है।


पपीते के फायदे अनेक

बीमार होते ही सबसे पहले दिया जाने वाला फल है पपीता। इसलिए अधिकांश लोग इसे मरीजों का फल भी कह देते हंै। मगर यह सिर्फ मरीजों के लिए नहीं बल्कि बड़े, बच्चों सबके लिए फायदेमंद फल है। पौष्टिकता और रस से भरपूर पपीता विटामिन का सबसे अच्छा स्रोत होता है। पेट के रोगों के साथ-साथ इसे आंतों की सफाई करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
पपीते के नियमित उपयोग से शरीर में विटामिन्स की कमी नहीं रहती। इसमें 'पेप्सिन" नामक तत्व पाया जाता है, जो बहुत ही पाचक होता है। इसकी वजह से डॉक्टरों द्वारा भी सबसे पहले मरीजों को इस फल को खाने की हिदायत दी जाती है।
शरीर में 'पेप्सिन" प्राप्त करने का एकमात्र कुदरती साधन पपीता होता है। पपीते का रस प्रोटीन को आसानी से पचा देता है। अधिकांश रोग की उत्पत्ति पेट से ही होती है, इसलिए पेट के विकारों को दूर करने में पपीता महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसे आंखों की रोशनी और त्वचा के लिए अच्छा माना जाता है। वात, पित्त, कफ की समस्या से भी यह फल निजात दिलाता है। वहीं यह इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को भी मजबूत करता है।
क्या-क्या हैं पपीते में
पपीते में विटामिन 'ए", 'बी" और 'सी" भरपूर मात्रा में होता है। पपीता पेप्सिन नामक पाचक तत्व का एकमात्र प्राकृतिक स्रोत है। इसमें कैल्शियम और कैरोटीन भी अच्छी मात्रा में मिलता है। इसके अलावा फॉस्फोरस, पोटेशियम, आयरन, एंटीऑक्सीडेंट्स, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का भी यह बेहतर स्रोत है। यानी एक पपीते में भरपूर पौष्टिकता भी समाया हुआ है।
कच्चा और पका दोनों फल काम के
पपीता ऐसा फल है जो कच्चे और पके दोनों रूप में फायदेमंद होता है। कच्चे फल की सब्जी और हलवा बनाया जाता है। इसके अलावा कच्चे पपीते को घाव पर बांधने से घाव आसानी से भर जाते हैं।

...ज्यादा मिठास भी अच्छी नहीं!

मीठे का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के मुंह में पानी आ जाता है...और आए भी क्यों न, चीनी की मिठास का कोई जवाब ही नहीं है। आम लोग चीनी के बिना शायद अपनी जिंदगी की कल्पना भी न कर पाएं, लेकिन सेहत पर इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए एक प्रमुख डच स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने इसे हमारे समय का सबसे खतरनाक नशा करार दिया है। एम्सटर्डम में स्वास्थ्य सेवा के प्रमुख पॉल वान डेर वेलपेन तो चीनी को शराब और तंबाकू की तरह एक नशा मानते हैं। वेलपेन ने यह बातें एक सार्वजनिक स्वास्थ्य वेबसाइट पर लिखी हैं। उन्होंने लिखा है कि चीनी मौजूदा समय का खतरनाक नशा है और इसे हासिल करना भी आसान है।
हिदायत भी दे दी
केवल इतना ही नहीं उन्होंने तो यह हिदायत भी दी है कि जिस तरह धूम्रपान संबंधी उत्पादों पर चेतावनियां लिखी होती हैं, उसी तरह सॉफ्ट ड्रिंक और मीठे उत्पाद चेतावनियों के साथ उपलब्ध होने चाहिए। वेलपेन के मुताबिक चीनी की लत स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं।
मोटापे के लिए भी जिम्मेदार
वेलपेन ने लिखा है कि आज की दुनिया में मोटापे की समस्या महामारी का रूप ले चुकी है और इसके लिए मुख्य रूप से चीनी जिम्मेदार है। लोग का वजन लगातार ज्यादा बढ़ रहा है। इससे स्वास्थ्य की देखभाल से जुड़ा खर्च बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि मोटापा दूर करने के लिए खानपान में बदलाव ज्यादा प्रभावी तरीका हो सकता है।  

सेहतमंद रहने के लिए 30 मिनट

सेहतमंद रहने के लिए लाइफ स्टाइल में बदलाव लाना जरूरी है। आज की भागमभाग वाली जिंदगी में सबसे ज्यादा कोताही बरती जाती है तो वह है सेहत की अनदेखी करके।  हाल ही में एक अध्ययन में कहा गया कि प्रतिदिन 30 मिनट का शारीरिक व्यायाम, ऊर्जा को बढ़ाता है। इसके साथ ही यह लोगों को स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है। कोपनहेगन विश्वविद्यालय के शोध में समझाया गया है कि कैसे हल्का व्यायाम, कड़े प्रशिक्षण की अपेक्षा प्रेरणाप्रद है। निष्कर्ष को जनस्वास्थ्य पत्रिका स्कैनडिनेवियन में प्रकाशित किया गया है।
'साइंस डेली" की रिपोर्ट के अनुसार मोटापा सेहत के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। कोपनहेगन विवि के शोधकर्ता इस बड़ी समस्या से बचने और इसके इलाज के लिए एक नए एकीकृत तरीके को विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। कोपनहेगन विवि के बायोमेडिकल विभाग के प्रोफेसर बेंटे स्टालनेच ने कहा कि मोटापा एक जटिल समस्या है, इसके प्रति बहुविधदृष्टिकोण की जरूरत है।
13 सप्ताह की परीक्षण अवधि
एक नए वैज्ञानिक लेख में हमने बायोमेडिकल अध्ययनों पर 13 सप्ताह की परीक्षण अवधि के दौरान के अनुभवों को गठित किया। उन्होंने कहा कि यह उस आश्चर्यजनक तथ्य को बताने में समर्थ है कि प्रतिदिन 30 मिनट की कसरत एक घंटे किए कड़े शारीरिक परिश्रम के समान ही लाभकारी है।
आज के युवावर्ग में कोल्ड ड्रिंक की आदत एक आम लत की तरह हो गई है और शायद इसलिए उन्हें कोल्ड ड्रिंक इतनी अच्छी लगती है कि उसके आगे वे भोजन भी भूल जाते हैं। मगर यह बात ध्यान देने की है कि उनकी यह पसंद सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। शीतल पेय के ज्यादा सेवन से युवाओं में किडनी स्टोन के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। इसके अलावा कम पानी पीने के साथ ही फैट और कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार से भी स्टोन यानी पथरी की समस्या बढ़ती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी में स्टोन की समस्या से ग्रसित मरीजों में से 30 फीसद मरीज 25 से 35 वर्ष की आयु वाले हैं। अध्ययन से पता चला है कि युवाओं में खाने के साथ पानी की बजाय सॉफ्ट ड्रिंक लेने का चलन बढ़ा है। जिसका स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ रहा है और लोग कम उम्र में ही किडनी स्टोन की समस्या से ग्रसित हो रहे हैं। वहीं चॉकलेट और जंक फूड का इस्तेमाल भी समस्या को बढ़ा रहा है। सर्वे में यह भी पाया गया है कि घर से दूर रहने वाले युवाओं को स्टोन संबंधी समस्या ज्यादा होती है।
क्या उपाय हैं जरूरी
पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, हरी सब्जियों का सेवन, दूध पीना और जंक फूड से परहेज करना युवाओं को इस समस्या से दूर रख सकता है।
किडनी स्टोन के लक्षण
किडनी स्टोन की समस्या में पसली के नीचे व किनारे की तरफ तेज दर्द होता है। यह दर्द थोड़ी-थोड़ी देर में घटता-बढ़ता रहता है। किडनी स्टोन के लक्षणों में यूरिनेशन में दर्द और उल्टी या जी-मचलाने की समस्या होना आम बात है।कोल्ड ड्रिंक के
सेवन से किडनी स्टोन का खतरा




अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाता है काला छाता

गर्मी का मौसम आते ही महिलाएं अपने चेहरे को धूप से बचाने के लिए कई प्रकार के जतन करने लग जाती हैं। इसके लिए वे हजारों रुपए सनस्क्रीन लोशन और ब्यूटी पार्लर पर खर्च कर देती हैं। महिलाएं गर्मी में अगर काले छाते का इस्तेमाल करें तो धूप के प्रकोप और सूर्य की अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों से बहुत हद तक बचा जा सकता है। रंग-रूप की हिफाजत में काला छाता सनस्क्रीन से कहीं ज्यादा कारगर साबित हो सकता है।
इसके इस्तेमाल से यूवी किरणों से 99 फीसदी तक सुरक्षा मिलती है। एमोरी यूनिवर्सिटी  के शोधकर्ताओं ने बताया कि छाता यूवी किरणों को त्वचा तक पहुंचने से रोकता है। इन नतीजों को पुख्ता करने के लिए उन्होंने 23 छातों पर अध्ययन किया। अप्रैल के महीने में शोधकर्ताओं ने कुछ लोगों को ये छाते लेकर धूप में निकलने को कहा। इसके बाद शोधकर्ताओं ने सूर्य से निकलने वाली यूवी किरणों का स्तर मापा। साथ ही छाते का इस्तेमाल करने वाले लोगों की त्वचा पर इनके प्रभाव की जांच की।

29 की उम्र में महिलाएं दिखती हैं आकर्षक

 यूं तो महिलाएं हर उम्र में अपनी खूबसूरती को लेकर काफी सतर्क रहती हैं, लेकिन 29 साल की उम्र वे ज्यादा आकर्षक लगती हैं। हाल ही में हुए सर्वे में भी यह बात साबित हो गई है।
पुरुषों का मानना है कि महिलाएं 29 की उम्र में सबसे ज्यादा खूबसूरत दिखती हैं। अमेरिकी मैगजीन 'एल्योर" के हाल ही में किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है। सर्वे में 2,000 लोग शामिल हुए। इस दौरान महिलाओं ने भी माना कि 30 की उम्र में वे सबसे ज्यादा आकर्षक नजर आती हैं। हालांकि 35 साल के बाद उनके  निखार में कमी आने लगती है। सर्वे में जवान दिखने के दबाव को लेकर भी प्रतिभागियों की राय ली गई।
दाग-धब्बों को लेकर चिंता
84 फीसदी पुरुषों ने कहा कि उम्र के असर को छिपाने के लिए वे काफी तनाव महसूस करते हैं। ऐसी सोच रखने वाली महिलाओं की संख्या 91 फीसदी थी। 34 प्रतिशत पुरुषों और 56 फीसदी महिलाओं ने चेहरे पर दाग-धब्बे और झुर्रियां पड़ने को लेकर फिक्र जताई।


होली का रंग नैचुरल हो तो बेहतर

एक-दूसरे को रंग से सराबोर करने का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे लोगों में होली के पावन पर्व का उल्लास छाता जा रहा है। आगामी 27 मार्च को रंगों का त्योहार होली धूमधाम से मनाया जाएगा, लेकिन इसके साथ ही डॉक्टर भी अपनी चिंता जताने लगे हैं। डॉक्टरों को रंगों में इस्तेमाल में होने वाले जहरीले रसायन के कारण स्किन व आंखों में इंफेक्शन की चिंता है और वे लोगों से इन रंगों से बचने की सलाह भी दे रहे हैं।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के मुख्य कॉस्मेटिक सर्जन अनूप धीर कहते हैं कि होली का त्योहार बिना रंगों के बेमतलब है लेकिन रसायन वाले रंगों के कारण कई समस्याएं पैदा होती हैं। यदि रंगों में ऑक्साइड, धातु, शीशे के कण व टेक्सटाइल इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले डाई बेस जैसे खतरनाक व जहरीले रसायन मिले हुए होंगे तो ये बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, इन रासायनिक रंगों में सीसा, टेट्राथिलिन, बेंजिंन व अन्य सुगंधित पदार्थ मिले होते हैं जो त्वचा को सूखा बना देते हैं। लाल, काले व हरे जैसे गहरे रंगों में भारी मात्रा में मरकरी सल्फाइट, सीसा, ऑक्साइड व कॉपर सल्फेट मिले होते हैं जिनसे स्किन कैंसर भी हो सकता है।डॉक्टर धीर कहते हैं कि कई लोगों को इन रासायनिक रंगों से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है। इन रंगों के कारण खुजली व एलर्जी होने लगती है। यदि इन रंगों को बालों पर लगाए जाने के तुरंत बाद ही नहीं धोया जाए तो वे कमजोर व बेजान हो सकते हैं।
रासायनिक रंगों से बचें
रंगों के इस त्योहार के दिनों में खुजली व एलर्जी के मामले कई गुना बढ़ जाते हैं। इनमें बच्चे और बड़े सभी होते हैं। बीएलके अस्पताल में प्लास्टिक सर्जन कंसल्टेंट डीजेएस टुला का कहना है कि कई लोग मस्ती व शरारत के लिए चिकनाई वाले रंगों का इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर इन रसायन वाले पदार्थों के संपर्क में आने के दो से तीन घंटे बाद ही प्रतिक्रिया दिखनी शुरू हो जाती है। कई बार जिद्दी रंगों को छुडाने के लिए साबुन, डिटर्जेंट व केरोसिन के इस्तेमाल से भी समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
ऐसे बनाए नैचुरल कलर
उत्तरी दिल्ली की रहने वाली गृहिणी प्रीति बांजाल कहती हैं कि यदि आपको होली के त्योहार का आनंद लेना है तो घर पर ही ऑर्गेनिक रंगों को बनाना चाहिए। पीले रंग के लिए हल्दी को बेसन या आटे के साथ मिलाकर रंग की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इनके साथ ही गेंदे के फूल की सूखी पंखुड़ियों से भी पीला रंग बनाया जा सकता है। मेहंदी व गुलमोहर की पत्तियों को सूखाकर बेहतरीन हरा रंग व लाल गुलाबों को सूखाकर लाल रंग आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।


एक कैप्सूल उतार देगा नशा

शोधकर्ताओं  ने एक ऐसा कैप्सूल तैयार किया है, जो चुटकियों में नश्ाा उतार देगा। शोधकर्ता एक छोटे से कैप्सूल में दो पूरक एंजाइम भरने में सफल रहे, जो तेजी से श्ारीर से अल्कोहल निकालने में मदद करते हैं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के युंगफेंग लू की अगुआई में इस शोध को अंजाम दिया गया। शोधकर्ताओं  के मुताबिक दोनों एंजाइम पाचन तंत्र में अल्कोहल को लिवर की तरह ही प्रोसेस करते हैं। आगे जाकर यह खोज हैंगओवर से बचने का अहम उपाय हो सकती है।
कोश्ािकाओं में पाए जाने वाले प्राकृतिक एंजाइम अल्कोहल को श्ारीर से बाहर करने के लिए मिलकर काम करते हैं। शोधकर्ताओं ने कृत्रिम रूप से कई एंजाइम साथ जुटाए ताकि वे प्राकृतिक तरीके की नकल कर सकें। अल्कोहल ऑक्सीडेज नामक एंजाइम अल्कोहल के ऑक्सीकरण्ा को बढ़ावा देता है, पर जहरीली हाइड्रोजन पॅरॉक्साइड भी पैदा करता है। हालांकि दूसरा एंजाइम हाइड्रोजन पॅराक्साइड को पानी और ऑक्सीजन में विघटित कर उसके जहरीले असर को खत्म कर देता है। दोनों एंजाइम को साथ रखने पर सफलतापूर्वक अल्कोहल को निकाला जा सकता है। शोधकर्ताओं ने दोनों एंजाइम को जिस पॉलीमर कैप्सूल में रखा, उसका व्यास कुछ नैनोमीटर ही है। 

दूध और शुगरी फूड दे सकते हैं आपको मुहांसे

हाई ग्लाईकेमिक इंडेक्स (जीआई) युक्त खाद्य पदार्थ जैसे व्हाइट राइस (सफेद चावल) और दूध पीने से न सिर्फ मुहांसे होते हंै बल्कि कुछ मामलों में यह काफी गंभीर भी हो जाता है। तकरीबन 50 वर्षों तक किए गए अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है।  लाखों युवाओं में त्वचा पर पड़ने वाले प्रभाव देखे जा सकते हंै, जो युवावस्था में धीरे-धीरे बढ़ते जाते हंै। इस तरह की त्वचा की वजह से फेस, नेक, चेस्ट और बैक पर कई भद्दे स्पॉट नजर आने लगते हैं। इस तरह स्पॉट का व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ता है। मुहांसों से एंक्जाइटी, लो सेल्फ-एस्टीम, डिप्रेशन के हालात बनते हैं।
खान-पान से जुड़ा मामला
19वीं सदी के अंतिम दौर में अनुसंधानकर्ताओं ने यह बात साबित कर दी थी कि मुहांसों का संबंध खान-पान से जुड़ा है। अधिक मात्रा में चॉकलेट, शगर और फैट का सेवन करने से मुहांसे होने लगते हैं। लेकिन 60 के दशक और उसके बाद अध्ययनों में बताया गया कि डाइट का मुहांसों से कोई संबंध नहीं है। डिपार्टमेंट ऑफ न्यूट्रीशन, फूड स्टडीज एंड पब्लिक हेल्थ और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में स्टेनहार्ट स्कूल ऑफ कल्चर, एजुकेशन एंड ह्युमन डेवलपमेंट की डॉ. जेनिफर बुरीस का कहना है कि मुहांसों के प्रति एटीट्यूड में यह बदलाव दो महत्वपूर्ण अध्ययनों के बाद आया, जिसमें लिटरेचर और पॉपुलर कल्चर का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि डाइट और मुहांसों के बीच कोई संबंध नहीं है। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि हाई जीआई फूड्स खाने से इंसुलिन समेत अन्य हार्मोनों का स्तर बढ़ जाता है, जो शरीर में सीबम का प्रोडक्शन करने लगता है।

दिल के पास जमा फैट हो सकता है हानिकारक

किडनी की बीमारी वाले मरीजों में मौत का कितना जोखिम है इस बात का पता आसानी से दिल के आसपास जमा फैट के सीटी स्कैन से लगाया जा सकता है। इस बात का खुलासा एक शोध से हुआ है। समाचार एजेंसी 'शिन्हुआ" के अनुसार 'नेफ्रोलॉजी डायलिसिस ट्रांसप्लांटेशन" पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन कनाडा, वेनेजुएला, इटली और अमेरिका के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। कनाडा के एडमोंटन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एल्बेटा के एक शोधकर्ता पाओलो रग्गी ने कहा कि हम जानना चाहते थे कि दिल में इस तरह का फैट किडनी की बीमारी वाले मरीजों में कोई खतरा तो पैदा नहीं करता है, लेकिन यह जोखिम का एक बेहद स्पष्ट संकेत था। उन्होंने कहा कि दिल के करीब इस फैट की अधिकता के चलते मरीजों की मृत्युदर अधिक थी। किडनी की बीमारी से पीड़ित 109 अमेरिकी मरीजों के सिटी स्कैन के अध्ययन के पश्चात शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रत्येक मरीज के दिल में फैट की मात्रा में प्रति 10 घन सेंटीमीटर की वृद्धि मृत्यु का खतरा छह प्रतिशत तक बढ़ा देती है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि दिल के आसपास जमा चर्बी भविष्य में धमनियों में कैल्शियम और कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर को भी बढ़ा सकती है।  

लाल अंगूर और ब्लूबैरी बढ़ाए इम्युनिटी पावर

 सेहत के लिए अंगूर और ब्लूबैरी बहुत फायदेमंद होते हैं। हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार लाल अंगूर में मौजूद रिर्जवेराट्रॉल और जामुन में मौजूद पेरोस्टिलिबीन जैसे तत्व शरीर की इम्युनिटी पावर बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि इन फलों में मौजूद इन तत्वों को स्टिलबेनॉयड्स भी कहते हैं। यह तत्व विटामिन 'डी" के संपर्क में आते ही प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाते हैं। शोधकर्ता एंड्रियन गोबार्ट के अनुसार हमने शोध के दौरान फलों के 449 तत्वों का अध्ययन किया और पाया कि लाल अंगूर व जामुन में पाए जाने वाले यह तत्व विटामिन 'डी" के संपर्क में आते ही रिएक्ट करना शुरू कर देते हैं। जिसका बड़ा फायदा शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को मिलता है। इससे पहले भी लाल अंगूर में पाए जाने वाले तत्व रिर्जवेराट्रॉल पर कई अध्ययन हो चुके हैं जिसमें इसे दिल से जुड़े रोगों, कैंसर व जलन के उपचार में प्रभावी माना गया है, लेकिन विटामिन 'डी" के संपर्क में इसके बदलावों पर यह अपनी तरह का पहला शोध है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे न सिर्फ शरीर की इम्युनिटी पावर बढ़ती है बल्कि यह बैक्टीरियल संक्रमण से लड़ने में काफी अहम भूमिका निभाता है।


यूरिन टेस्ट बता देगा हाई ब्लड प्रेशर को

किसी वयस्क को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होगी अथवा नहीं, इसका पता अब बचपन में ही लग सकता है। वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में कहा कि अब यूरिन टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी बच्चे को भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर होगा या नहीं।
जॉर्जिया रीजेंट्स यूनिवर्सिटी के शोध में 10 से 19 साल के 19 प्रतिभागियों के यूरिन टेस्ट के दौरान यूरिन में सोडियम की मात्रा से यह पता लगाया है कि उन्हें हाई ब्लड प्रेशर का कितना खतरा है। शोधकर्ताओं ने माना कि गलत जीवनशैली के अलावा बहुत अधिक तनाव के दौरान यूरिन में सोडियम की मात्रा अधिक होती है। इससे यह पता चल सकता है कि आगे चलकर यह सोडियम कितना खतरा पैदा कर सकता है। शोधकर्ता ग्रेगरी हार्शफील्ड के अनुसार इस शोध से न सिर्फ बच्चे के यूरिन टेस्ट से उसके भविष्य को सेहतमंद बनाया जा सकता है बल्कि उसके अभिभावकों को भी हाई बीपी व स्ट्रोक के खतरों से बचाने में मदद मिल सकती है।
सोडियम मानव शरीर की रक्त कोशिकाओं में फ्लूड की मात्रा बढ़ा देता है, जिसका प्रभाव ब्लड प्रेशर पर पड़ता है। अगर सही समय पर इसकी पहचान करके बचाव के तरीके अपनाएं जाएं तो आगे चलकर हार्ट अटैक, हाई बीपी व स्ट्रोक जैसे खतरों से बचा जा सकता है।


फिश प्रोटीन से कैंसर पर काबू

 वैज्ञानिकों ने एक नए शोध के तहत यह पता लगाया गया है कि पेसिफिक कॉड (मछली की एक प्रजाति) में पाए जाने वाले प्रोटीन में प्रोस्टेट कैंसर और संभवत: अन्य प्रकार के कैंसर की ग्रोथ रोकने की क्षमता होती है। पेसिफिक कॉड एक महत्वपूर्ण कमर्शियल फूड प्रजाति है। इस शोध में भारतीय मूल के वैज्ञानिक भी शामिल हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन के शीर्ष प्रोफेसर हाफिज अहमद ने बताया कि एंटी-ट्यूमर एक्टिविट वाले नेचरल डाइटेरी प्रोडक्ट्स को प्रमुख रूप से शोध में शामिल किया गया। श्री अहमद इंस्टीट्यूट फॉर मरीन एंड एनवायरंमेंटल टेक्नालॉजी (आईएमईटी) के भी वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश कैंसर पेशेन्ट्स की मौत तब होती है, जब ट्यूमर सेल्स ब्लड और लिम्फ वेसल्स तक पहुंच जाती है और उन्हें पूरी तरह से ढंक लेती है। इस प्रोसेस को मेटास्टेटिस(रोग स्थानांतरण) कहते हैं। ऐसे वक्त यह आवश्यकता होती है कि ये कैंसर सेल्स और किसी क्षेत्र में न फैलें और न ही उनकी वजह से अन्य सेल्स को कोई नुकसान पहुंचे।
इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पेसिफिक कॉड में पाए जाने वाले प्रोटीन की खोज की, जिसकी वजह से कैंसर की ग्रोथ प्रभावित होती है। यह प्रोटीन ग्लाइकोपेप्टाइड है, जो कैंसर की वृद्धि को रोकता है। विशेषकर प्रोस्टेट कैंसर को रोकने में इसे ज्यादा कारगर बताया जा रहा है। इसको लेकर वैज्ञानिक आगे भी कई शोधों में लगे हुए हैं।  

बड़ी-बड़ी खुशियां हैं छोटी-छोटी बातों में

यूं  तो खुशी को मापने का कोई पैमाना नहीं होता। हर स्थिति में खुशियों को ढूंढेंगे तो वे आसानी से मिल जाएंगी। प्रकृति ने चारों ओर प्रसन्नाता और खुशी फैला रखी है, इसे अपने हिस्से में करना मनुष्य के स्वयं के हाथों में है। बुधवार को 'इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे" मनाने का शगल भी यही था ताकि हम खुशियों का मतलब समझते हुए खुद भी खुश रहें और दूसरों को भी खुशियां दें। खुशी एक ऐसा खजाना है, जिसमें से जितना दोगे यह उतना ही बढ़ता जाएगा। छोटी-छोटी बातों से खुश होना सीखिए, यह कब बड़ी खुशियों में बदल जाएंगी आपको मालूम ही नहीं पड़ेगा।
खुशी स्वस्थ और सफल जीवन की कुंजी भी है। खुशियां आपको ऊर्जावान बनाती हैं। इसलिए कुछ इन बातों पर ध्यान दीजिए शायद खुशियों के खजाने की चाबी आपको भी मिल जाए :
सकारात्मक सोचें : जीवन में उतार-चढ़ाव के कई क्षण आते हैं। ऐसे में खुद पर नेगेटिविटी को हावी न होने दें, हमेशा सकारात्मक सोचें। यह जरूरी है कि आप खुद इस बात को जानें कि आप स्वयं को क्या संदेश देना चाहते हैं।
बातों को साझा करें : कहते हैं साझा की गई खुशी दोगुनी होती है और साझा किया गया दुख आधा होता है। तो फिर क्यों न अपनी खुशियों में दूसरों को शामिल किया जाए। क्या पता आपकी खुशियां उन्हें भी खुशी दे दें। इसके लिए समय-समय पर आपको दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के समर्थन की भी जरूरत होती है।
हमेशा मदद का हाथ बढ़ाएं : कभी आपने किसी बुजुर्ग को रास्ता पार करवाया है। यदि हां, तो आप उस आशीर्वाद और उससे मिली खुशी की कीमत को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। अपने घर के बड़े-बुजुर्गों का ध्यान रखें उनसे मिलने वाले आशीर्वाद आपके जीवन में कब रक्षा कवच बन जाएंगे आपको मालूम ही नहीं पड़ेगा।
आभार व्यक्त करें : कभी भी उन लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने से पीछे नहीं हटिए जो आपको प्रसन्ना बनाते हैं। आभार जताना मन की एक खुशी होती है, जिससे सामने वाले को भी आत्मसंतोष मिलता है।
अपने आपको रिचार्ज करें : सबसे पहले यह जाने कि जीवन में वे कौन सी छोटी-छोटी बातें हैं, जिनसे आपको खुशी मिलती हैं। इनमें लिखना-पढ़ना, शॉपिंग, स्वीमिंग, मेडिटेशन जैसे कई शौक शामिल हो सकते हैं। इनमें खुद को इन्वॉल्व करते हुए अपने आपको रिचार्ज करने की कोशिश करें  ताकि सबसे पहले अपने खुद के चेहरे पर भी मुस्कुराहट ला सकें।
बुरी आदतों को बदलिए : यदि आपको लगता है कि आपकी ही कुछ बुरी आदतें आपको परेशान करती हैं, तो उन्हें बदलने की कोशिश करें। आप अपनी आदत सुधारेंगे तो दूसरों को सिखाने में भी आप कामयाब होंगे।
रिश्तों को ताजा करें : अपनों से प्यार जताएं। ऐसे लोगों के लिए समय व्यर्थ न करंे,जो आपके आसपास नहीं हैं। मगर उन लोगों का समर्थन करें, जो आपको समर्थन देते हैं और आप
की केयर करते हैं। हर समय  पूर्णता का अनुभव करने की कोशिश न करें। हर विपरीत परिस्थितियों में भी रिश्तों को संभाले रखें क्योंकि रिश्ते टूटने पर उन्हें जोड़ना काफी कठिन हो जाता है।
दिनचर्या में परिवर्तन करें : अगर आपको लगता है कि आपकी दिनचर्या आपको तनाव से भर देती है तो उसे बदलने की कोशिश कीजिए। परेशानियों का समाधान खोजकर ही हम खुद खुश रहते हुए दूसरों को भी खुश रख सकते हैं। अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए समय निकालें और साथ में खान-पान पर ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है।



आंवले में छिपे हैं सेहत के गुण

ठंड के साथ आंवले की आवक बाजार में बढ़ जाती है। मौसम के अनुकूल यह प्रकृति का ऐसा तोहफा है, जिसमें सेहत के तमाम गुण छिपे हुए हैं। विटामिन 'सी" का भरपूर स्रोत आंवला हमारे शरीर में पनपने वाली कई बीमारियों का नाश करता है। इसलिए इसे प्रकृति का वरदान कहा जाता है। यानी कि अच्छी सेहत का पूरा श्रेय एक छोटे से आंवले को दिया जा सकता है। आंवले को कई तरह से खाया जा सकता है। इसे कच्चा खा सकते हंै या चटनी-मुरब्बा बनाकर खाया जा सकता है या फिर उबालकर खाया जाता है। वहीं आंवले का जूस यदि पीया जाए तो वह काफी लाभकारी होता है।
क्या है आंवले में
आंवले में आयरन और विटामिन 'सी" भरपूर मात्रा में होता हैै। हर व्यक्ति को प्रतिदिन 50 मिलीग्राम विटामिन 'सी" की जरूरत होती है। ऐसे में आंवले का सेवन या फिर इसके रस का सेवन शरीर में विटामिन 'सी" की जरूरत को
पूरा करता है।
और भी हैं फायदे 
आंवला खाने या इसका जूस प्रतिदिन पीने से पाचन क्षमता अच्छी होती है। आंवले से त्वचा कांतिमय होती है और त्वचा की चमक बरकरार रहती है। त्वचा रोगों में भी आंवला काफी गुणकारी होता है। बालों की चमक बढ़ाने के साथ-साथ असमय बालों को सफेद होने से भी रोकता है। दिल को मजबूत रखने में भी आंवले का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। आंखों की रोशनी बढ़ती है और कमजोरी भी हटती है।
आंवले का मौसम
सर्दियों के शुरू होने के साथ ही आंवले बाजार में आना शुरू हो जाते हैं। आंवले का मौसम दिसंबर से अप्रैल तक रहता है। यानी सर्दियों में आंवले का सेवन कर आप अपने शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते हैं। और साल भर स्वस्थ रहने का बीमा कर सकते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं में आंवले का इस्तेमाल किया जाता है। वृक्ष की छाल भी बेहद उपयोगी मानी जाती है। यूनानी चिकित्सक भी आंवले को एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह देते हंै।

  • आंवला जूस को पानी में मिलाकर गरारे करने से मुंह के छाले खत्म हो जाते है। 
  • आर्थ्राइटिस की वजह से जोड़ों में होने वाली सूजन को कम करते हुए जोड़ों के दर्द को भी खत्म करता है। 
  • इंसोम्निया (अनिद्रा) जैसे स्लीप डिसआडरर्््स में आंवले को काफी लाभदायक माना जाता है। आंवले के सेवन से स्ट्रेस (तनाव) दूर होता है और व्यक्ति आराम महसूस करता है। 





नई 'पिलो-डेस्क" देगी आपको ऑफिस में आराम

 वर्कप्लेस पर कभी-कभी टायर्डनेस फील होती है और ऐसा महसूस होता है, कुछ समय के लिए आराम कर लिया जाए। इसी लिहाज से कई आईटी कंपनियों ने अपने यहां 'नेपिंग रूम" बनाएं हैं ताकि एम्प्लाइज कुछ समय के लिए झपकी ले लें और खुद को रिलेक्स महसूस करें। अब एक अमेरिकी डिजाइनर ने एक डे ड्रीमर डेस्क यानी 'पिलो-डेस्क" ईजाद की है, जो वर्कप्लेस पर कर्मचारियों को कुछ देर आराम प्रदान करेगी। इस डेस्क के टॉप पर एक मेट्रेस लगा हुआ है, जिसमें लकड़ी का एक छोटा ब्लॉक भी लगाया गया है, जो नोटपैड या कॉफी कप रखने के लिए होगा।
डिजाइनर निक डिमार्को (27) को उम्मीद है कि यह डेस्क एम्प्लाइज को आराम प्रदान करेगी ताकि थोड़े आराम के बाद उनमें काम के लिए नई ऊर्जा  उत्पन्ना हो और वे बेहतर आउटपुट दे सकें।
कम्फर्टेबल स्ट्रेस रिलीवर  
'डेली मेल" की रिपोर्ट के अनुसार डिमार्को ने इसे 'प्रेक्टिकल एंड कम्फर्टेबल स्ट्रेस रिलीवर" के रूप में डिस्क्राइब किया है। उनका मानना है कि यह डेस्क वर्कप्लेस पर बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। न्यूयॉर्क के डिमार्को का कहना है कि डेस्क डिजाइन करने का मकसद कर्मचारियों को आलसी बनाना कतई नहीं है बल्कि यह तो कुछ समय के रिलेक्सेशन से उन्हें अधिक ऊर्जावान बनाने लिए है। मैं उम्मीद करता हूं कि यह डेस्क उनके काम और जिंदगी दोनों के लिए जरूरी साबित होगी। डिमार्को ने कहा कि यह डे ड्रीमर डेस्क थॉटफुल डे-ड्रीमिंग, इंट्रोइंस्पेक्शन और ब्रेन वर्क के लिए जरूरी है, जहां किसी अन्य टास्क की अपेक्षा एक ही डेस्क पर इन सभी चीजों को महत्वपूर्ण तरीके से सोचा-विचारा भी जा सकता है।
क्या है कीमत
डिमार्को ने अपने फर्नीचर स्टूडियो में ही इस डेस्क का निर्माण किया है। इस डेस्क की कीमत तकरीबन 1474 डॉलर (करीब 78 हजार रु.) है। डिमार्को का यह डेस्क कन्सेप्ट अब तक का अनोखा है।
इस डेस्क की सरफेस सॉफ्ट फोम से बनी हुई है, जिस पर निओप्रीन फेब्रिक का वाटरप्रूफ कवर है। पूरी डेस्क की संरचना पावडर-कोटेड स्टील की बनी हुई है। इसमें 8.5 इंच बाय 11 इंच का एक लकड़ी का ब्लॉक रखा गया है, जिसमें नोटपैड आसानी से फिट हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति आराम के दौरान मन में आने वाले विचारों को नोटपैड पर लिख सकता है। 

कुछ यूं छिपाएं उम्र के असर को...

अक्सर बढ़ती उम्र और उसका चेहरे पर दिखता असर हर किसी को परेशान कर देता है, लेकिन इससे बचना हो तो इसका उपाय भी हमारे पास ही रहता है। मगर हर कोई इसकी अनदेखी करने लगता है। जी हां, यह उपाय है हमारी दिनचर्या में बदलाव, खुशी और तनाव से दूर रहना। हम जितना खुश रहेंगे उतना तनाव को खुद से दूर भगाएंगे। यह तनाव ही तो चेहरे पर उम्र की रेखाओं को आसानी से दिखा देता है।
एक नए शोध में इस बात के संकेत मिले हैं कि बढ़ती उम्र के असर को कम किया जा सकता है। इसके लिए न तो कोई क्रीम ईजाद की गई है और न ही कोई फॉर्मूला मिला है। बल्कि इस अध्ययन में जीवनशैली में बदलाव करने का सुझाव दिया गया है। जैसे-तनाव कम करना, खाने में पौष्टिक तत्वों को शामिल करना। इसके अलावा नियमित कसरत। इन सबसे टेलोमीयर की लंबाई बढ़ती है। टेलोमीयर यानी क्रोमोसोम या गुणसूत्रों के सिरे, जो किसी व्यक्ति के बुढ़ापे को नियंत्रित करते हैं। इसलिए अब कहा जा सकता है कि बढ़ती उम्र के असर को रोकना मुमकिन होगा।
जेनेटिक कोड की करता है रक्षा 
टेलोमीयर डीएनए का विस्तार है, जो हमारे जेनेटिक कोड की सुरक्षा करता है। ये क्रोमोसोम को बिखरने से रोकते हैं साथ ही जेनेटिक कोड को स्थिर भी रखते हैं। किसी भी कोशिका के विभाजन के साथ ही टेलोमीयर छोटा हो जाता है यह उस बिंदु तक होता है जब तक कि वृद्ध हो रही कोशिका और विभाजित न हो सके या फिर निष्क्रिय हो जाए या बूढ़ी होकर मर न जाए।
तुलनात्मक अध्ययन 
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने उन 10 पुरुषों पर नजर रखी, जो प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे और उनसे कहा गया कि वे पौधों से मिली चीजों पर आधारित खाना खाएं, व्यायाम करें, योग की मदद से तनाव पर नियंत्रण रखें। इन लोगों के टेलोमीयर की लंबाई शुरुआत में ली गई और फिर पांच साल बाद दोबारा जांच की गई। इसकी तुलना उन 25 लोगों से की गई, जिन्हें जीवनशैली बदलने को नहीं कहा गया था। निर्देशों का पालन न करने वाले लोगों के टेलोमीयर तीन फीसद छोटे हो चुके थे जबकि अच्छी जीवनशैली का पालन करने वाले के टेलोमीयर की लंबाई 10 प्रतिशत बढ़ गई।


पेट के कैंसर के खतरे को कम करेगा समुद्र का पानी

समुद्र का किनारा और उसकी लहरें हरेक को आकर्षित करती हैं। समुद्र को जहां अथाह संपदा वाला माना जाता है तो वहीं इसके पानी और इसमें पाई जाने वाली वनस्पतियों में कई तरह के रोगों से लड़ने की क्षमता भी समाई होती है। हाल ही में हुए एक नए अध्ययन में पाया गया कि समुद्री पानी का एक घूंट पेट के अल्सर और कैंसर के खतरे को कम कर सकता है।
इस अध्ययन के तहत शोधकर्ताओं ने हैलीकोबैक्टर पाइलोरी विषाणु को खत्म करने के लिए मरीजों को गहरे समुद्र का पानी पीने के लिए कहा। शोधकर्ताओं का कहना है कि 10 में से 4 लोग अपनी जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर इस विषाणु से प्रभावित होते हैं। पेट के अल्सर के पीछे यही विषाणु जिम्मेदार होता है। कई लोगों में यह बिना नुकसान पहुंचाए शरीर में रहता है, लेकिन 15 प्रतिशत प्रभावित लोगों में यह अल्सर पैदा करता है। ऐसा माना जाता है कि कुछ लोगों में यह विषाणु पेट की मजबूत परत को नुकसान पहुंचाता है।
बैक्टीरिया कम होते हैं
सेंट्रल मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी एचएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट डॉ. जॉन मेसन ने  इस शोध पर कहा कि यह एक आकर्षक काम की तरह लगता है और यह बहुत दिलचस्प बात है कि यह बैक्टीरिया की संख्या कम कर देता है। हालांकि हमें अभी तक इ
स बात का पता नहीं है कि लोगों को पानी पीने से रोकने में बैक्टीरिया संख्या में वृद्धि होगी या नहीं।
कोशिकाओं को फैलने से रोकता है
प्रारंभिक अवस्था में किए गए प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला गया कि समुद्र का पानी स्तन कैंसर कोशिकाओं के विकास को भी रोक सकता है। 'कैंसर विज्ञान इंटरनेशनल जर्नल" में प्रकाशित शोध में कोरिया के वैज्ञानिकों ने एक टेस्ट-ट्यूब में कैंसर की कोशिकाओं के साथ समुद्री पानी को मिलाया। उन्होंने पाया कि पानी ने कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोक दिया। यह सेल प्रसार में शामिल होता है और कंपाउंड के लेवल को प्रभावित करता है। इसे 'ट्रांसफॉर्मिंग ग्रोथ फैक्टर" कहते हैं। टीम को बड़े परीक्षण में पानी का उपयोग करने की उम्मीद है। साथ ही शोधकर्ताओं का कहना है कि यह भविष्य में ट्यूमर को रोकने या शरीर के चारों ओर फैलाने सेरोकने के इलाज में काम आएगा।



एक प्याला ग्रीक कॉफी... लंबी उम्र का राज

 हर रोज एक तेज गर्म ग्रीक कॉफी का प्याला लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का राज हो सकता है। वैज्ञानिकों ने एक नए अध्ययन में यह दावा किया है। यह शोध 'जर्नल वास्कुलर मेडिसिन" में प्रकाशित किया गया है। जिसमें शोधकर्ताओं ने ग्रीक आइलैंड में इकारिया क्षेत्र के बड़ी उम्र के लोगों पर अध्ययन किया। यह वह स्थान है जहां दीर्घजीवन की दर पूरे विश्व के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सबसे ज्यादा मानी जाती है।
शोधकर्ताओं ने इन लोगों को देखते हुए कार्डियोवास्कुलर हेल्थ पर ज्यादा ध्यान दिया। जिसे देखकर उन्होंने माना कि एक कप गर्मागर्म कॉफी यहां के लोगों की अच्छी सेहत का राज है और जिसकी वजह से यहां लोग लंबे समय तक जीते हैं।
क्या पाया शोध में 
शोध में पाया गया कि पूरे योरपीय देशों में मात्रा 0.1 प्रतिशत लोग ही 90 वर्ष की आयु से ज्यादा जीते हैं। मगर ग्रीक आइलैंड के इकारिया क्षेत्र में यह आंकड़ा 1 प्रतिशत है।
इसका मतलब स्पष्ट है कि लंबी उम्र तक जीने के लिए यहां के लोगों में कुछ खास था। शोधकर्ताओं ने पाया कि यहां सबसे ज्यादा खपत ग्रीक कॉफी की थी, जो हर एक की दिनचर्या में शामिल थी।
'यूनिवर्सिटी ऑफ एथेंस मेडिकल स्कूल" के मेडिकल डॉक्टर गेरेसिमॉस सिआसोस और उनके सहयोगियों ने यह अध्ययन किया ।  इन्होंने अपने शोध में पाया कि यहां के हर बुजुर्ग के जीवन में कॉफी प्रमुखता से जुड़ी थी, जिसका प्रभाव इनकी उम्र पर देखा गया। शोधकर्ताओं ने यहां 65 वर्ष से ऊपर की आयु वर्ग के तकरीबन 673 लोगों पर यह अध्ययन किया और उनसे पूछे गए सवालों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला। 

नींद में बार-बार खलल यानी काम पर असर

भरपूर नींद स्वस्थ जीवन की कुंजी होती है। अच्छी नींद का प्रभाव न सिर्फ व्यक्ति की सेहत पर पड़ता है बल्कि उसकी पूरे दिन की  दिनचर्या पर भी यह साफ दिखाई देता है। यह बात कई वैज्ञानिक शोधों में प्रमाणित हो चुकी है। इसके विपरीत रात की नींद में खलल या बार-बार उठने की बीमारी व्यक्ति की कार्यक्षमता पर प्रभाव डालती है।
हाल ही में नीदरलैंड की मॉस्ट्रीक यूनिवर्सिटी में यूरोलॉजी के प्रोफेसर फिलिप वान केरेब्रोक द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। इसमें प्रो. फिलिप और उनकी टीम ने पाया कि रात की नींद में बार-बार टॉयलेट जाने के लिए उठने वाले लोगों की कार्यक्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके चलते वे वर्कप्लेस पर उतना काम नहीं कर पाते, जितना उन्हें करना चाहिए। यानी कि नींद कम होने से व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी घटती है।
कैसे किया अध्ययन 
हालांकि यह अपनी तरह का बिल्कुल अलग ही शोध है। इसमें शोधकर्ताओं ने  261 महिलाओं एवं 385 पुरुषों पर अध्ययन किया, जो रात में बार-बार उठने की आदत से पीड़ित थे।
नॉक्टूरिया का शिकार
रात को टॉयलेट जाने के लिए कई बार जागने की आदत को 'नाक्टूरिया" कहते हैं। इस समस्या से ग्रसित व्यक्ति  सुबह उठने पर खुद को थका हुआ महसूस करता है और इसका प्रभाव उसके सारा दिन के काम पर दिखाई देता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नाक्टूरिया ग्रसित व्यक्ति  सही से काम नहीं कर पाता जिससे कार्यस्थल पर उसका प्रदर्शन खराब होता है। शोधकर्ता मानते हैं कि एक तिहाई वयस्कों में नाक्टूरिया एक बड़ी समस्या है।

  • नाक्टूरिया से ग्रसित लोगों को सबसे पहले चिकित्सकों से सलाह लेना चाहिए।
  • आहार पर ध्यान देने की जरूरत। 
  • अधिकांश लोग जो शिफ्टों में काम करते हैं, उनकी बायोलॉजिकल क्लॉक के बिगड़ने के कारण उन्हें यह समस्या होती है। इसके लिए दिनचर्या सुधारने की जरूरत है। 

अच्छी नींद से बनते हैं ऊर्जावान 
वैज्ञानिकों का कहना है कि भरपूर नींद लेने से ज्यादा स्वस्थ और सुंदर हो सकते है। गहरी नींद सोने वाला दिनभर तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करता है। उसका मन प्रसन्ना रहता है, वह कई रोगों से भी दूर रहता है। उसके शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। उसका हर काम में उसका मन भी लगा रहता है। शरीर को रिचार्ज करने और स्वस्थ बनाने के लिए भी भरपूर नींद बहुत जरूर है।