मंगलवार, 28 जनवरी 2014

ग्लूटेन कर सकता है बीमार

हमारा शरीर कई बार कुछ पदार्थों को लेकर काफी संवेदनशील हो जाता है। इन पदार्थों का सेवन करते ही उसका असर भी शरीर पर दिखने लगता है। ऐसी ही एक बीमारी है- सीलिएक।
150 लोगों में से किसी एक व्यक्ति को होने वाली इस बीमारी का कारण है शरीर का ग्लूटेन नामक प्रोटीन को अवशोषित न कर पाना। ऐसे में जब भी व्यक्ति ग्लूटेन युक्त किसी खाद्य पदार्थ का सेवन करता है, तो वह बीमार हो जाता है। यह एक गंभीर समस्या है, जिसका सबसे बेहतर उपचार खुद मरीज के पास ही है।
* क्या है यह बीमारी :
सीलिएक छोटी आंत की बीमारी है। इसे गेहूं या अन्य साबुत अनाजों से होने वाली एलर्जी भी कहा जा सकता है। जब खाना ग्लूटेन से निकलता है तो यह पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। ग्लूटेन जौ, राई और गेहूं जैसे खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। सीलिएक से पीड़ित लोगों को गेहूं, जौ और ओट्स में मौजूद ग्लूटेन नामक प्रोटीन से एलर्जी होती है।
दवा या अन्य किसी तरीके से इसका इलाज नहीं किया जा सकता है। ग्लूटेन-फ्री आहार वह आहार है, जिसमें ग्लूटेन प्रोटीन शामिल नहीं होता है। यह आहार सीलिएक के लक्षणों को नियंत्रित करने और जटिलताओं को रोकने में मदद करता है।
* क्या है कारण :
सीलिएक का कोई निश्चित कारण सामने नहीं आ पाया है। शोध और रिसर्च की मानें तो इसे एक अनुवांशिक बीमारी भी कहा जा सकता है। कोई भी व्यक्ति बचपन, किशोरावस्था या वयस्क होने तक किसी भी उम्र में इस बीमारी का शिकार हो सकता है। इसके लक्षण अक्सर किसी तनावपूर्ण दौर से गुजरने के बाद सामने आते हैं, जैसे सर्जरी, बीमारी, इंफेक्शन या बच्चों का जन्म।
* गौर करें लक्षण :
इसके लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ सामान्य लक्षणों की बात करें तो
-दस्त या कब्ज, पेट दर्द और वजन बढ़ना या कम होना।
-चक्कर आना, जोड़ों या हड्डियों में दर्द और एनीमिया।
-महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना।
-त्वचा पर निशान बनना।
* ऐसे करें बचाव :
इससे बचने के लिए गेहूं, राई, जौ या बीयर जैसे पेय पदार्थ या ऐसा कोई भी खाद्य पदार्थ जैसे रोटी, अनाज युक्त नाश्ता, पास्ता और पिज्जा जिसमें गेहूं और गेहूं उत्पाद शामिल हों का सेवन नहीं करना चाहिए। सीलिएक बीमारी से ग्रस्त लोग चावल और मक्का का सेवन कर सकते हैं। 

थोड़ा तो ब्रेक लीजिए जनाब...

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में  व्यक्ति को खुद के लिए ही समय निकालने की फुर्सत नहीं। ऐसे में सबसे अधिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है और उस पर भी यदि आप ऑफिस में भी लगातार एक जैसे बैठे-बैठे काम करते हैं तो यह आपकी जीवनचर्या के लिए और भी नुकसानदायक साबित हो सकता है, क्योंकि लगातार बैठे रहना कई मायनों में आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। विशेषकर महिलाओं में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलते हैं। आइए जानते हैं क्या कहता है नया शोध-
अगर आप भी दिनभर बैठकर काम करती रहती हैं बीच में कोई ब्रेक नहीं लेती हैं तो यह आदत आपके लिए खतरनाक हो सकती है। हाल ही में हुए एक शोध में माना गया है कि जो महिलाएं लंबे समय तक बैठकर काम करती हैं उन्हें कैंसर से लेकर हार्ट अटैक तक का खतरा अधिक होता है। न्यूयॉर्क की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोध की मानें तो दिन में 11 घंटे तक लगातार बैठक काम करने वाली महिलाओं में कम उम्र में मृत्यु की आशंका 12 प्रतिशत अधिक होती है।
*लगातार बैठने से बचें :
शोधकर्ताओं का मानना है कि अधिक देर तक बैठने वाली महिलाओं को बुढ़ापे में दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा 27 प्रतिशत तक अधिक हो सकता है। इतना ही नहीं, दिनभर बैठने वाली हर पांच में से एक महिला में कैंसर की रिस्क होती है। शोधकर्ताओं ने यह भी माना है कि महिलाएं इसकी भरपाई जिम जाकर या कसरत करके नहीं पूरी कर सकती हैं इसलिए जरूरी है कि लगातार बैठने से बचा जाए।
*93 हजार महिलाओं पर किया अध्ययन :
शोधकर्ता रिबेका सीगन के अनुसार अगर आप शारीरिक गतिविधियां अधिक करते हैं और सेहतमंद जीवनशैली को तवज्जो देते हैं तो ही आप लंबी और सेहतमंद उम्र पा सकते हैं। घंटों लगातार बैठना महिलाओं के लिए खुद अपनी मौत को निमंत्रण देने जैसा है। 'अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसिन" में प्रकाशित इस शोध में मेनोपॉज से गुजर चुकी 93 हजार महिलाओं की सेहत का अध्ययन कर शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है।  

इनमें भी मौजूद है शकर

बाजार में मिलने वाली कुछ चीजों को खरीदते समय इस बात का ध्यान नहीं रहता है कि जिसे सेहतमंद मानकर खरीद रहे हैं वह किसी न किसी रूप में नुकसान तो नहीं पहुंचा रही है। कुछ ऐसा ही इन खाद्य पदार्थों के साथ भी है, जिनमें मौजूद शकर आपको नुकसान पहुंचा सकती है खासकर डायबिटीज के मरीजों को।
* दही :
फैट फ्री का मतलब शुगर फ्री नहीं होता, खासतौर पर जब डिब्बा बंद दही की बात की जाए। अक्सर वसा को निकालने के बाद स्वाद और रंगत बनाए रखने के लिए इसमें बड़ी मात्रा में चीनी डाली जाती है। 'एक्शन ऑन शुगर" के अनुसार करीब 150 ग्राम दही, जिसमें वसा 0% हो उसमें 20 ग्राम तक चीनी हो सकती है। इसका मतलब हुआ पांच चम्मच चीनी।
डाइटीशियन डॉक्टर सारा शेनकर कहती हैं कि दिक्कत यह है कि लोग लो फैट (कम वसा वाला) खाना तो चाहते हैं लेकिन चाहते हैं कि यह फैट वाले भोजन की तरह स्वादिष्ट हो।
उनके अनुसार-इसलिए जब वसा को निकाल दिया जाता है तो उसमें कुछ और जैसे की चीनी मिला दी जाती है। अगर लोग सेहतमंद भोजन चाहते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि यह स्वाद और रंगत में थोड़ा अलग हो सकता है।
* पास्ता सॉस :
टमाटरों से बनने वाले पास्ता सॉस से सेहत को होने वाले फायदों को लेकर कई बातें कही जाती हैं, लेकिन दुकान से खरीदे गए सॉस में चीनी भरी हो सकती है। चीनी अक्सर इसलिए मिलाई जाती है ताकि सॉस में अम्ल का स्वाद कम लगे। 150 ग्राम सॉस में करीब 13 ग्राम चीनी हो सकती है। यानी करीब तीन चम्मच।
* सलाद :
कोलेस्ल (एक किस्म का सलाद) में ज्यादातर बारीक कटी हुईं या कसी हुईं सब्जियां होती हैं लेकिन इसमें चीनी मिलाकर भी तैयार किया जाता है। इसके लिए खासतौर पर मेयोनिस सॉस को जिम्मेदार माना जाना चाहिए
* पानी :
यह इस पर निर्भर करता है किस तरह का पानी है। जैसे कि 'परिष्कृत पानी" में विटामिन मिलाए जाते हैं और इसके साथ ही चीनी भी।'एक्शन ऑन शुगर" के अनुसार कुछ ब्रांड के 500 मिलीलीटर पानी में 15 ग्राम तक चीनी होती है। यह करीब चार चम्मच चीनी के बराबर है।
* ब्रेड :
इसके बाद बहुत से लोगों के रोज के भोजन में शामिल पाव या ब्रेड। हालांकि चीनी की मात्रा अलग-अलग होती है लेकिन प्रोसेस्ड ब्रेड की एक स्लाइस में यह तीन ग्राम तक हो सकती है। अगर एक महिला नाश्ते में एक टोस्ट और दिन के खाने में एक सेंडविच लेती हैं तो यह माना जाए कि उन्होंने महिलाओं के लिए स्वीकार्य चीनी की एक चौथाई मात्रा ले ली है। 

बॉडी लैंग्वेज कहती है बहुत कुछ

बातचीत के दौरान व्यक्ति की बॉडी लैंग्वेज भी बहुत मायने रखती है। इससे आप बिना कहे भी बहुत कुछ कह जाते हैं। वैसे खुद को प्रेजेंट करते समय बॉडी लैंग्वेज का काफी महत्व होता है। बॉडी लैंग्वेज से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं, जो बड़े काम की हो सकती हैं-
*हाथ और पैरों को क्रॉस करके न बैठें : बैठते समय खासतौर पर किसी इंटरव्यू के समय ध्यान रखें कि हाथों और पैरों को क्रॉस न करें। इससे आपके डिफेंसिव होने का संकेत मिलता है।
* आई कॉन्टेक्ट बनाकर बात करें: बातचीत में इधर-उधर न देखते हुए सीधे सामने वाले व्यक्ति की आंखों में आंखें डालकर बात करें। इससे आपके आत्मविश्वास का पता चलता है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि आप लगातार घूरें और सामने वाले के लिए असहजता की स्थिति हो जाए।
* कंधों को आगे उचकाते हुए बात नहीं : ऐसा करने से पता चलता है कि आप तनाव में हैं। कंधों को पीछे की तरफ रखते हुए रिलेक्स होकर बात करें या इंटरव्यू फेस करें।
* सिर हिलाकर हामी भरें :
सुनने के क्रम के दौरान यह अहसास दिलाने के लिए कि आप उसकी बातों को ध्यान से सुन रहे हैं, समय-समय पर सिर हिलाकर स्वीकृति या हामी का संकेत देते रहें लेकिन सिर हिलाने की अति नहीं होनी चाहिए।
*अधलेटी अवस्था में नहीं बैठें :
किसी से बातचीत करते हुए सीधे होकर रिलेक्स मुद्रा में बैठें।
*मुस्कान और हंसी : बातचीत के दौरान मजाक या हंसी की बात पर हल्की मुस्कान आपके चेहरे पर होने से आपके मैत्रीपूर्ण रवैये की झलक सामने वाले व्यक्ति को मिलती है।
* चेहरे पर बार-बार हाथ नहीं : इससे आपकी नर्वसनेस का पता चलता है और सामने वाले व्यक्ति का ध्यान भी बंटता है।
* अपने एक्शंस में धीमापन लाएं : चाल में धीमापन लाने से आप खुद को ज्यादा आश्वस्त महसूस कर सकते हैं।
* बैठे-बैठे हाथ-पैर न हिलाएं : इससे आपकी नर्वसनेस का पता चलता है। अपने शरीर के मूवमेंट्स पर नियंत्रण रखें। 

इन्हें अपनाएं तनाव को दूर भगाएं!

आजकल की भागदौड़ वाली जिंदगी में व्यक्ति के जीवन में तनाव होना आम बात है। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन कभी-कभी ये तनाव कई बीमारियों की वजह भी बन जाता है, इसलिए तनाव काफी घातक साबित हो सकता है। अगर हम रोजमर्रा की जिंदगी में अपने लिए कुछ वक्त निकालें तो इस तनाव से छुटकारा पा सकते हैं। हम आपको बता रहे हैं कि कैसे तनाव से बचा जा सकता है।
* नियमित व्यायाम :
तनाव कम करने का सबसे अच्छा तरीका है व्यायाम। नियमित 30 मिनट तक एक्सरसाइज करें, अगर आप रोज कम से कम 30 मिनट भी व्यायाम करें तो आप काफी हद तक तनाव पर काबू पा सकते हैं। इससे आप शारीरिक तौर तो फिट रहेंगे ही साथ ही आपको मानसिक शांति भी मिलेगी। व्यायाम के लिए सुबह का वक्त ज्यादा बेहतर होगा।
* टीवी देखें :
टीवी देखकर भी काफी हद तक तनाव पर काबू पाया जा सकता है। टीवी मनोरंजन का एक बड़ा जरिया है। जब भी आप ज्यादा तनाव महसूस करें अपना पसंदीदा कार्यक्रम देखें आपको जरूर अच्छा महसूस होगा। टीवी देखने से आपका तनाव कम होगा।
* किताबें पढ़ें :
तनाव पर काबू पाने के लिए किताबें पढ़ना भी एक अच्छा उपाय है। आप अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ें जिससे काफी हद तक आपका तनाव कम होगा। किताब पढ़ने की आदत डालनी चाहिए, इससे आपकी जानकारी भी बढ़ती है और तनाव नहीं होता।
* धूम्रपान न करें :
यदि आप यह सोचते हैं कि तनाव से राहत दिलाने में सिगरेट की अहम भूमिका होती है तो यह गलत है। बल्कि असलियत तो यह है कि सिगरेट ही आपका तनाव बढ़ाती है। धूम्रपान से धड़कन तेज हो जाती है जिससे तनाव बढ़ता है। इसलिए धूम्रपान न करें।
* स्वास्थ्यकारक आहार लें :
तनाव का प्रमुख कारण अस्वस्थ खानपान भी है। यदि आप सुबह का नाश्ता नहीं करते हैं तो दिनभर तनाव रह सकता है। इसके अलावा बहुत अधिक फास्ट फूड, हैवी डाइट लेने से भी तनाव बढ़ता है। इसलिए अपने खानपान को सुधरिए, अपने डाइट चार्ट में पौष्टिक आहार को शामिल कीजिए और तनाव से बचिए।
*अधिक काम न करें :
जरूरत से ज्यादा काम करने की वजह से भी तनाव हो सकता है, इसलिए ऑफिस या अन्य जगहों पर जरूरत से ज्यादा काम न करें। काम का दबाव तो हर किसी की जिंदगी में होता है, लेकिन जो लोग काम और परिवार में काम का संतुलन नहीं बैठा पाते और रुटीन में काम के अलावा कुछ नया नहीं कर पाते हैं, उन्हें तनाव और अवसाद होना तो वाजिब ही है।
* काम के दौरान ब्रेक लें :
काम के दौरान छोटे-छोटे ब्रेक लेने से भी तनाव कम होता है और दिमाग को आराम मिलता है। यदि आप लगातार काम कर रहे हैं तो बीच में थोड़ा ब्रेक जरूर लें। थोड़ा टहलें, पानी पियें, बाहर जाएं, खुला आसमान देखें, ताजी हवा में सांस लें, किसी से बात करें। इससे तनाव कम होगा।
* समय को करें मैनेज :
जो लोग अपने काम की लिस्ट नहीं बनाते उनको तनाव होना सामान्य है, क्योंकि वे अपने काम को लेकर उलझ जाते हैं। इसलिए अपने मूल्यवान समय सही तरीके से उपयोग कीजिए, अपनी दिनचर्या और काम के आधार पर समय का प्रबंधन कीजिए। यदि आप ऐसा कर लेते हैं तो आपको तनाव और अवसाद जैसी समस्या नहीं होगी।
* पूरी नींद लें :
तनाव कम करने के लिए पूरी नींद लेना बेहद जरूरी होता है। रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद जरूर पूरी करें। लेकिन ज्यादा देर तक सोने से भी बचें। देर से सोकर उठने वाले व्यक्ति का मेटाबॉलिज्म ठीक नहीं रहता है जिससे उन्हें थकान, तनाव और उदासीनता अधिक सताती है।
* सकारात्मक सोचें :
तनाव की सबसे बड़ी वजह है नकारात्मक सोच, इसलिए निगेटिव की बजाय पॉजिटिव सोच रखें। अपनी तुलना किसी से न करें, जो आपके पास है उसमें ही संतुष्ट रहें। इसके अलावा अपने आसपास के व्यक्तियों के बारे में अच्छी राय बनाइए। ऐसे लोगों से मिलने से बचें, जो आपके बारे में अच्छी सोच नहीं रखते। 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

दुनिया में पहली बार प्रत्यारोपित गर्भाशय से पैदा होगा शिशु

लंदन, प्रेट्र : स्वीडन की एक महिला विश्व में पहली बार प्रत्यारोपित गर्भाशय  से शिशु  को जन्म देगी। डॉक्टरों ने उसके शरीर में भ्रूण (एम्ब्रायो) प्रत्यारोपित करने में सफलता हासिल की है। यह महिला उन नौ महिलाओं में से एक है, जिन्ाके शरीर में पिछले वषर््ा गर्भाशय प्रत्यारोपित किए गए थ्ो।
स्वीडन की रहने वाली इस अज्ञात महिला के शरीर में जन्म से ही  गर्भाशय नहीं थ्ाा। डॉक्टरों ने बाद में उसके शरीर में इसे प्रत्यारोपित किया। 'द टेलीग्राफ" में प्रकाश्ाित समाचार के अनुसार यह गर्भाशय महिला की मां के शरीर से प्रत्यारोपित किया गया। हालांकि पिछले हफ्ते जिस अंडे से पैदा भ्रूण्ा को महिला केगर्भाशय  में प्रत्यारोपित किया गया, वह महिला का खुद का थ्ाा।
गर्भाशय प्रत्यारोपण्ा करने वाली टीम की अगुआई करने वाले गोथ्ोनबर्ग की साहलग्रेंस्का अकादमी के डॉ. मैट्स ब्रैनस्ट्रॉर्म ने बताया, 'बहुत मुमकिन है कि शिशु नौ महीने में गर्भ से बाहर आएगा।" ब्रैनस्ट्रॉम ने बताया कि उनकी टीम ने सितंबर 2012 से अप्रैल 2013 तक नौ महिलाओं के शरीर में सफलतापूर्वक गर्भाशय  प्रत्यारोपित किए। इनमें से आठ उस जन्मजात विकार से ग्रसित थ्ाीं, जो 5,000 महिलाओं में से एक को होता है। इसमें महिला के शरीर में गर्भाश्ाय का विकास रुक जाता है। जबकि नवीं महिला का गर्भाशय  कैंसर की वजह से निकालना पड़ा थ्ाा। 

गले की खिचखिच को कहें अलविदा

गले में खराश या दर्द का सीधा कनेक्शन सर्दी से हो सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर के पास भागने से बेहतर होगा कुछ आसान उपाय अपनाएं।
*नमक के पानी से गरारे :
दुनियाभर में किए गए कई शोध और अध्ययन यह बात साबित कर चुके हैं कि गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारे करने से गले में दर्द और सूजन से राहत मिलती है। डॉक्टर भी अक्सर इस समस्या में यही सलाह देते हैं।
* कफ सिरप भी देता है आराम :
बेशक आपको खांसी की समस्या न हो, लेकिन गले में दर्द या खराश होने पर भी कफ सिरप काफी असरकारक होते हैं। यह ध्यान रखें कि दफ्तर जाते समय या दिन के समय इस उपाय को न आजमाएं, क्योंकि कफ सिरप के सेवन से आराम मिलने के साथ-साथ नींद भी आने लगती है। अगर आयुर्वेदिक कफ सिरप ले तो वह ऐसे दोष से मुक्त होते हैं।
* पेय पदार्थ जरूरी हैं :
जानकार मानते हैं कि इस समस्या के दौरान यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि शरीर में पानी की कमी न हो। पानी की पर्याप्त मात्रा होने से म्यूकस मेम्ब्रेन में नमी बनी रहती है, जो इसे बैक्टीरिया से लड़ने में सक्षम बनाती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने के अलावा, फलों का जूस या सूप का सेवन भी किया जा सकता है। इसके साथ ही हर्बल-टी का सेवन भी कारगर हो सकता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट दवा की तरह काम करते हैं और गले को जल्द राहत पहुंचाते हैं।
* मुंह सूखने न दें :
गले में इंफेक्शन के दौरान कुछ भी खाना-पीना मुश्किल होता है। ऐसे में जिंजर फ्लेवर वाली मेडिकेटेड गोलियां चूसना भी फायदेमंद होता है। इससे आपके मुंह में सलाइवा बनता रहता है, जो गले को आराम देता है। अदरक या आंवले का टुकड़ा मुंह में रख कर चूसने से भी राहत मिलती है।  

बच्चों के साथ बिताएं नींद के पल

बदलती जीवनशैली के कारण पैरेंट्स आजकल बच्चों के पास नहीं सोते। हालांकि इससे बच्चों और अभिभावकों में दूरी बनने लगती है। भागदौड़ की जिंदगी में पैरेंट्स दिनभर तो बच्चों के साथ टाइम बिता नहीं पाते, हालांकि रात को उनके साथ सोने से इस दूरी को कम किया जा सकता है। बच्चों के साथ सोने से क्या फायदे हो सकते हैं हम आपको बताते हैं।
* सुरक्षा का अनुभव :
सोते समय जब बच्चों के साथ उसके माता-पिता होते हैं, तब वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। अकेले सोने पर छोटे बच्चे स्वयं को असुरक्षित महसूस कर सकते हैं, देखा जाता है कि ऐसे बच्चे अक्सर रात को अक्सर नींद से जाग जाते हैं और उनकी नींद पूरी नहीं होती।
* हेल्दी बेड टाइम रूटीन :
समय पर सोने से न केवल नींद अच्छी आती है, बल्कि स्वास्थ्य भी सही रहता है। बच्चों में हेल्दी बैड टाइम रूटीन डालने के लिए पैरेंट्स को रात में बच्चों के साथ ही सोना चाहिए। इससे वे स्वस्थ लाइफस्टाइल अपना सकेंगे।
* मानसिक रूप से करीब :
रात को बच्चों के करीब सोने से आप उनसे दिनभर उन्होंने क्या खास किया, उनका पूरा दिन कैसा गया और अगले दिन की उनकी क्या प्लानिंग है। यह सब बातें आसानी से पूछ सकते हैं। ऐसा करने से बच्चा आपसे अपने दिल की सारी बात बताएगा और किसी बात पर उन्हें कोई परेशानी है, तो आपसे कह देंगे और बिना किसी मानसिक परेशानी लिए आराम से सोएगा।
*बच्चों की साथ समय बिताना :
अगर आपका बच्चा रोजाना आपसे कहानी सुनकर सोना चाहता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि उसकी सोने की इच्छा नहीं है, बल्कि वो आपके साथ कुछ और वक्त बिताना चाहता है। ऐसे में भागदौड़ की जिंदगी में पैरेंट्स दिनभर तो बच्चों के साथ टाइम बिता नहीं पाते, रात को पास सोने से ऐसा हो सकता है।
*अच्छे संस्कार का मिलेगा आधार :
रात को बच्चों के पास सोने से आपको एक फायदा यह भी होगा कि आप उसको कहानी सुनाने के जरिए अच्छे संस्कार डाल सकते हैं। इससे उसके भविष्य निर्माण में सहायता मिलती है। जीवन की विकट परिस्थितियों में उसे वह सीख हमेशा याद रहेगी।
* नर्सिंग मांओं के लिए आसान :
अपने बच्चों के पास सोना नर्सिंग माताओं के लिए बेहतर होता है। इससे बच्चों के साथ उनको भी आराम मिलता है। उनको बार-बार बिस्तर छोड़कर अपने बच्चों को देखने के लिए उठकर नहीं आना पड़ता।
* आत्मसम्मान में वृद्धि :
एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जो बच्चे अपने माता-पिता के पास सोते हैं उनमें आत्मसम्मान में वृद्धि होती है, व्यवहार की समस्याओं का कम अनुभव होता है, साथियों के दबाव में कम रहते हैं और वह ज्यादा खुश और अपनी लाइफ से संतुष्ट होते हैं। 

अब घर पर ही हो सकेगी अल्जाइमर की जांच

न्यूयॉर्क (एजेंसी)। भारत में अल्जाइमर के करीब 32 लाख मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण्ा जगी है। श्ाोधकर्ताओं ने घर पर किए जा सकने वाले ऐसे टेस्ट का विकास किया है, जिससे अल्जाइमर के श्ाुरुआती संकेतों का पता लगाया जा सकेगा। यह टेस्ट अपेक्षाकृत सस्ता है।
ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं द्वारा विकसित ये टेस्ट डॉक्टरों की मदद से घर पर किया जा सकता है, जो मरीज के संज्ञानात्मक नुकसान या डिमेंश्ािया को देखेगा, जिसमें अल्जाइमर भी श्ाामिल होगा। इस टेस्ट का नाम सेल्फ-एडमिनिस्टर्ड गेरो-कॉग्निटीव एग्जामिनेश्ान (एसएजीई टेस्ट) है। जिसे पूरा होने में 15 मिनट से भी कम लगते हैं, जो संज्ञानात्मक क्षमता मापने का सबसे विश्वसनीय टेस्ट माना जा रहा है।
ओहियो राज्य विश्वविद्यालय के श्ाोधकर्ता 45 सामुदायिक कार्यक्रमों में गए, जहां उन्होंने लोगों से श्ाुरुआती संज्ञानात्मक नुकसान या डिमेंश्ािया के लिए साधारण्ा और खुद किया गया टेस्ट देने को कहा।
*1047 लोग हुए शामिल :
इसमें 1047 लोग टेस्ट के लिए साधारण्ा पेन और कागज लेकर बैठे और 28 फीसद लोगों को संज्ञानात्मक नुकसान का श्ािकार पाया गया।
जर्नल ऑफ न्यूरोसाइकिएट्री एंड क्लिनिकल न्यूरोसाइंसेज् में प्रकाश्ाित श्ाोध में कहा गया है कि मरीजों द्वारा एसएजीई टेस्ट घर पर भी किया जा सकता है। मरीज इसके परिण्ााम को डॉक्टरों के साथ साझा कर सकते हैं और इससे डिमेंश्ािया या अल्जाइमर के लक्षण्ाों के बारे में प्रारंभिक चरण में ही पता लगाया जा सकता है। अल्जाइमर और स्ट्रोक भारत में डिमेंश्ािया के दो सबसे आम कारण्ा हैं।  

नई रेडिएश्ान थैरेपी कैंसर इलाज में अधिक कारगर

एक नए शोध से पता चला है कि विकसित रेडिएश्ान थैरेपी सिर और गले के कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए अधिक कारगर साबित हो सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर में किए गए श्ाोध के मुताबिक सिर और गले के कैंसर से पीड़ित जिन मरीजों को इंटेन्सिटी-    मॉड्यूलेटेड रेडिएश्ान थैरेपी (आईएमआरटी) दी गई, उन पर परंपरागत रेडिएश्ान थैरेपी की तुलना में कम हानिकारक प्रभाव देखा गया। आईएमआरटी कैंसर कोश्ािकाओं को अधिक कारगर तरीके से निश्ााना बनाती है। इससे कैंसर कोश्ािकाओं के पास के ऊतक सुरक्षित रहते हैं। एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर में सहायक प्राध्यापक बेथ बीडल ने बताया कि पूर्व के अध्ययनों में भी संकेत मिला है कि आईएमआरटी साइड इफेक्ट के मामले में बेहतर है। कैंसर जर्नल में प्रकाश्ाित अध्ययन में कहा गया है कि आईएमआरटी ट्यूमर पर ही अपना कार्य करती है और इससे ट्यूमर के पास के ऊतकों पर बहुत सीमित प्रभाव पड़ता है। 

'ए" ब्लड ग्रुप वालों को गंजेपन का खतरा!

 अगर आपका ब्लड ग्रुप 'ए" है तो आप गंजेपन के श्ािकार हो सकते हैं। यह थोड़ा अटपटा जरूर लग सकता है, लेकिन है सोलह आने सच। श्ाोध के अनुसार एलोप्शिया यानी गंजापन केवल जीन्स के कारण्ा नहीं होता, बल्कि इस पर ब्लड ग्रुप 'ए" का भी जबरदस्त असर रहता है।
*अप्रैल के अंत तक आएंगे परिणाम :
टाटा मुख्य अस्पताल (टीएमएच) के चर्म रोग विश्ोषज्ञ डॉ.आरपी ठाकुर के श्ाोध में यह सचाई सामने आई है। उन्होंने अब तक 'ए" ब्लड ग्रुप वाले 103 लोगों पर श्ाोध किया है। श्ाोध का अंतिम परिण्ााम अप्रैल माह के अंत तक सामने आएगा। फिलहाल इसका निष्कर्ष इस ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों के लिए चिंता का विषय है।
*2007 से 2012 तक किया अध्ययन :
डॉ. आरपी ठाकुर ने बताया कि अब तक के श्ाोध में जो बातें सामने आई हैं उनमें सबसे ज्यादा गंजेपन के श्ािकार 'ए"-ब्लड ग्रुप के ही लोग पाए गए हैं। उन्होंने चंडीगढ़ के प्लास्टिक सर्जन डॉ. तेजिंदर भट्टी द्वारा किए गए श्ाोध को भी सामने रखा। अलग-अलग ब्लड ग्रुप पर किए गए श्ाोध के परिण्ााम बताते हैं कि 'ए" पॉजीटिव ब्लड ग्रुप के पुरुषों में अन्य ब्लड ग्रुप वालों की अपेक्षा गंजेपन की समस्या अधिक होती है। यह स्टडी वर्ष 2007 से 2012 तक की गई। इसमें बताया गया है कि 'ए" पॉजीटिव ब्लड ग्रुप के लोगों में विटामिन 'बी" खासतौर पर बी-7 (बायोटिन) आत्मसात करने की क्षमता कम होती है, जिसके कारण्ा बालों की मोटाई कम होती जाती है। एक व्यक्ति के लिए पांच एमजी बायोटिन रोजाना लेना जरूरी होता है। 80 फीसद केसों में गंजापन पैदा करने वाले जीन्स मां से श्ारीर में आते हैं। अगर नाना या मामा गंजे हैं, तो 80 फीसद गंजे होने के आसार हैं। मां खुद इस गंजेपन का श्ािकार नहीं होती है। सिर के आगे के हिस्से में एमपीबी जीन्स जड़ों को प्रभावित करते हैं। डॉ. आरपी ठाकुर ने बताया कि श्ाोध के बाद पता चला कि दो हजार लोगों में 995 यानी 49.7 फीसद पुरुष 'ए" पॉजीटिव ब्लड ग्रुप के थे।  

कैलोरी का सेवन कम कर पाएं डायबिटीज से मुक्ति

डायबिटीज की समस्या से निपटने के लिए अपने खान-पान और जीवनशैली को बेहतर बनाना बेहद जरूरी होता है। आपका खान-पान और दिनचर्या आपके स्वास्थ्य पर काफी असर डालती है। हाल ही में हुए एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि रोज ली जाने वाली कैलोरी की मात्रा में कमी कर डायबिटीज की समस्या से निपटा जा सकता है।
न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में हुए इस अध्ययन के अनुसार मध्यम उम्र के लोगों में आमतौर पर होने वाली टाइप-2 डायबिटीज से ब्रिटेन में 30 लाख से ज्यादा लोग पीड़ित हैं। जब अग्नाशय आवश्यक मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता और पहले से शरीर में मौजूद इंसुलिन भी ठीक से अपना काम नहीं कर पाता, तब यह समस्या पैदा होती है।
प्रमुख शोधकर्ता रॉय टेलर के अनुसार अग्नाशय और लिवर के आसपास जमा हुआ फैट इन अंगों के काम करने की प्रक्रिया को बाधित करता है। जिसके कारण शरीर में पर्याप्त इंसुलिन का निर्माण नहीं हो पाता है। खान-पान ठीक करने से यह फैट कम होता है और इंसुलिन बनाने वाले अंग दोबारा से इसका निर्माण शुरू कर देते हैं। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने दो महीनों तक कई सारे लोगों पर परीक्षण किया।  

इन पोषक तत्वों की न करें अनदेखी

संतुलित भोजन लेने की सलाह तो हर कोई देता है लेकिन इसका सही मतलब क्या होता है यह अधिकांश लोगों को मालूम ही नहीं होता । तो फिर जानिए संतुलित आहार ऐसा भोजन होता है जिसमें हर तत्व संतुलित मात्रा में हों। कोई भी तत्व ज्यादा या कम नहीं होना चाहिए।
सेहतमंद तत्वों को लेना अच्छा तो है लेकिन अधिक मात्रा में कोई भी चीज ली जाए तो वह फायदा कम और नुकसान ही अधिक पहुंचाती है। फिर जानते हैं किन-किन पोषक तत्वों से मिल-जुलकर बना होना चाहिए आपका संतुलित आहार।
*आयरन :
आयरन एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। जो शरीर के विभिन्ना अंगों तथा ऊतकों में ऑक्सीजन वहन करने का काम करता है। विडंबना यह है कि आयरन महिलाओं और किशोरियों के आहार में शायद ही मौजूद होने वाले पोषक तत्वों में से एक है। शाकाहारी स्रोतों में हरी पत्तेदार सब्जियां आयरन का एक अच्छा स्रोत हैं अत: उन्हें अपने आहार में प्रतिदिन सलाद या पालक, पुदीना और शलगम की पत्तियां आदि मिलाकर शामिल करने का प्रयास करें। आयरन से भरपूर अन्य सब्जियां हैं, ब्रोकली, टमाटर, मशरूम, चुकंदर, कद्दू, शतावर तथा शकरकंदी।
* विटामिन बी-12 :
विटामिन बी-12 पानी में घुलनशील विटामिन है। इसका मुख्य कार्य पोषक तत्वों को ऊर्जा में परिवर्तित करने का है। यह मस्तिष्क के सामान्य कामकाज और तंत्रिका तंत्र में भी शामिल है। हालांकि पोषक तत्वों का अवशोषण उम्र के साथ कम हो जाता है। 50 साल या इससे बड़ी उम्र के लोग, जो विटामिन बी-12 को मांस और अनाज के रूप लेते हैं या फिर बी-12 के सप्लीमेंट लेते हैं, उनको एक बार अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर ले लेना चाहिए।
*फाइबर :
फाइबर हमारे शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को सुचारू रखने में प्रमुख भूमिका निभाता है। फाइबर भोजन को इकट्ठा करके बड़ी आंत तक ले जाता है। फाइबर ऐसे कार्बोहाइड्रेट हैं, जो पेड़ों के पत्ते, टहनियों और जड़ों का निर्माण करते हैं। फाइबर का सेवन करने के बाद आपको अधिक समय तक भूख नहीं लगती और इनका सेवन बहुत अधिक मात्रा में नहीं किया जा सकता। जई, सेम,जौ और कई फलों में पाए जाते हैं। यह पानी में मिलकर हमारे पाचन तंत्र में जैल जैसी वस्तु बनाते हैं। इससे शकर का अवशोषण धीमी गति से होने लगता है। ऐसे फाइबर का लगातार सेवन करने से शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है।
* पोटेशियम :
शरीर के विभिन्ना अंगों, कोशिकाओं और टिश्यु की सही कार्यशीलता के लिए शरीर में पर्याप्त मात्रा में पोटेशियम जैसे खनिज पदार्थ का होना बहुत जरूरी होता है। पोटेशियम, एक इलेक्ट्रोलाइट के रूप में तथा शरीर में तरल पदार्थ के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। इससे रक्तचाप सामान्य रहता है। पोटेशियम उर्वरता, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को सपोर्ट करता है। वयस्कों में पोटेशियम की दैनिक खपत प्रतिदिन 4700 मिलीग्राम होनी चाहिए। पोटेशियम की कमी फल और सब्जियों से भरपूर आहार की सहायता से पूरी की जा सकती है। सब्जियों और फलों के अलावा पोटेशियम होल ग्रेन और दूध के उत्पादों में भी पाया जाता है।
* फोलिक एसिड :
फोलिक एसिड शैशव और गर्भावस्था के दौरान कोशिका के विभाजन और विकास को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों और वयस्कों दोनों को ही स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और एनीमिया को रोकने के लिए फोलिक एसिड की आवश्यकता होती हैं। पौधे फोलिक एसिड के प्रमुख स्रोत हैं। यह हमारे लिए आवश्यक है कि दैनिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए साबुत अनाज, हरी सब्जियां, सेम और मसूर की दाल, संतरे का रस, दूध और मूंगफली जैसे पोषक तत्वों को अपने आहार में शामिल किया जाए।
* कैल्शियम :
कैल्शियम प्रारंभिक जीवन में मजबूत, सघन हड्डियों के निर्माण और बाद के जीवन में हड्डियों को मजबूत और स्वस्थ रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारी हड्डियां, दांत और नाखून 99 प्रतिशत कैल्शियम से ही बने होते हैं। शेष 1 प्रतिशत कैल्शियम भी हमारे शरीर के लिए बहुत उपयोगी होता है। यह रक्त में पाया जाता है और प्रत्येक कोशिका के बीच एक्स्ट्रा सेल्यूलर फ्लूइड में भी मौजूद होता है। नर्वस सिस्टम को सही ढंग से चलाने और एंजाइम्स को सक्रिय बनाने में भी कैल्शियम अहम भूमिका निभाता हैं। दूध और इससे बनी चीजें कैल्शियम का सबसे अच्छा स्रोत मानी जाती हैं। इसके अलावा सभी हरी पत्तेदार सब्जियों, दालों, सोयाबीन, ओट्स, कॉर्न फ्लेक्स  जैसे सीरियल्स  ब्राउन राइस, चोकर युक्त आटा और रागी में भी पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है।
*विटामिन 'डी" :
विटामिन 'डी "आंतों में कैल्शियम और फॉस्फेट के अवशोषण के लिए जिम्मेदार होता है। विटामिन 'डी" शरीर में  कैल्शियम व फॉस्फोरस के स्तर को बरकरार रखता है। इसमें दोनों पोषक तत्वों को सोख लेने की क्षमता होती है जिससे बच्चों की हड्डियों व दांतों को मजबूती मिलती है। हड्डियों की मजबूती के लिए विटामिन-डी का सेवन अत्यधिक जरूरी है। साथ ही यह कई प्रकार से हमारे शरीर को लाभ पहुंचाता है। दूध और सूर्य की किरणें विटामिन 'डी" का स्रोत हैं। 

प्रयोगशाला में तैयार हुई रीढ़ की हड्डी

बर्लिन (प्रे)। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने प्रयोगश्ााला में प्राकृतिक गुण्ाों वाली  रीढ़ की कृत्रिम हड्डी का विकास किया है, जो स्टेम कोश्ािकाओं के कई गुना वृद्धि में अनुकूल साबित होगी और इससे ल्युकेमिया का उपचार आसान हो जाएगा।
श्ाोधकर्ताओं ने बताया कि इस झिल्लीदार ढंाचे का इस्तेमाल प्रयोगशाला में स्टेम कोश्ािकाओं के उत्पादन के लिए किया जाएगा। इससे आने वाले कुछ वर्षों में ल्युकेमिया का इलाज ढूंढा जा सकेगा। कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ इंटेलीजेंट सिस्टम, स्टुटगर्ट और तुबिनजेन यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने एक ऐसा सिंथेटिक पदार्थ विकसित किया है जो स्टेम कोश्ािकाओं में वृद्धि में मदद करता है। रक्त में मौजूद एरिथ्रोसाइट्स या प्रतिरक्षी कोश्ािकाएं रीढ़ की हड्डी में मौजूद हेमटोपॉएटिक स्टेम कोश्ािकाएं से बदलती रहती हैं। ल्युकेमिया के मरीज की प्रभावित कोश्ािकाओं को हेमटोपॉएटिक कोश्ािकाओं में बदलते रहने रक्त से जुड़ी कई अन्य बीमारियों का उपचार किया जा सकता है। हालांकि ल्यूकेमिया के सभी मरीजों के इलाज के लिए ये तरीका नहीं अपनाया जा सकता।
श्ाोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला  में रीढ़ की हड्डी की कई प्राकृतिक विश्ोषताएं कृत्रिम रूप से विकसित की हैं। रीढ़ की हड्डी की मैट्रिक्स की तरह ही प्रयोगशाला  में तैयार रीढ़ की हड्डी में प्रोटीन का इस्तेमाल किया है।  

यूं अलविदा कहें एलर्जी को

एलर्जी का प्रभाव किसी पर भी कहीं भी पड़ सकता है। यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि एलर्जी से प्रभावित लोगों को घर से बाहर रहते समय अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विशेषकर छुट्टियों को एंजॉय करते समय यदि एलर्जी से संबंधित कोई परेशानी हो तो ज्यादा मुश्किलें हो सकती हैं। तो आइए छुट्टियों या यात्रा के दौरान एलर्जी का सामना करने के कुछ नुस्खे जान लिए जाएं, जिससे सुरक्षित व स्वस्थ रहने में आसानी हो सके।
*खिड़कियां रखें बंद :
यात्रा और एलर्जी का काफी घनिष्ठ संबंध है। ऐसी सलाह दी जाती है कि यात्रा के दौरान हमेशा खिड़कियां बंद रखें जिससे एलर्जेन (एलर्जी पैदा करने वाले तत्व) अंदर ना आ सके। यात्रा करने का अच्छा समय होता है प्रात: सुबह या देर शाम को। आप पीक अवर में यात्रा करना नहीं छोड़ सकते इसलिए यात्रा के दौरान कुछ सावधानियां बरती जाना ज्यादा जरूरी है।
* हवाई यात्रा के दौरान :
हवाई जहाज में यात्रा करने से पहले वायु की गुणवत्ता पर नजर रख आप अपनी यात्रा को एलर्जेन मुक्त बना सकते हैं। समय-समय पर कुछ चबाते रहें और एलर्जी की दवाएं पास में रखना ना भूलें। पानी का सेवन करने से और च्युंगगम यह अन्य कुछ चबाने से आपके नेजल पासेज पर पड़ने वाला तनाव कम होगा।  
* होटल के कमरे ऐसे हों :
एलर्जी के लिए कोई जगह ना छोड़ें होटल में एलर्जी के अनुकूल कमरे देखें। ऐसे कमरे में रहें, जिसमें धूप आती हो। ध्यान रखें आपका कमरा ठंडी जगहों से दूर हो। अगर आपको पोलन एलर्जी (परागकणों से संक्रमण) है तो खिड़कियां खुली रखने के बजाय एयर कंडीशन चला दें।
* यदि पैट हों घर पर :
जब आप किसी ऐसे रिश्तेदार के घर रह रहे हों जहां कि पालतू जानवर हों तो किसी प्रकार की एलर्जी से बचने के लिए एलर्जी की दवाएं रखना ना भूलें।
* दवाएं रखें साथ :
पार्टी के दौरान या कहीं रात के खाने पर या दोपहर के खाने पर जाते समय आप पहले से ही अपनी आहार संबंधी एलर्जी से लोगों को अवगत करा दें, जिससे कि खाना खाते समय आपको किसी प्रकार की कोई समस्या ना हो। अपनी दवाएं साथ रखना ना भूलें।