शनिवार, 20 अप्रैल 2013

ये हैं जिताऊ उम्मीदवार (व्यंग्य)


धर्मेंद्र सिंह राजावत
अपने सहयोगी दलों के मुखिया मुलायम और माया के बयानों से आखिर मैडम डर ही गईं और उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को 2014 का इंतजार करने के बजाय तैयारी में जुट जाने का संदेश सुना दिया। इसके साथ ही उन्होंने अपने रणनीतिकारों के साथ बैठक भी की। भ्रष्टाचार के लिए अभी तक की सबसे कुख्यात रही सरकार की अगुवाकार ने बैठक में सभी को ऐसे पैमानों की लिस्ट तैयार करने को कहा, जिस पर खरे उतरने वाले को ही चुनाव में टिकट दिया जाए। मतलब, जिताऊ उम्मीदवार।
अहमद जी ने उम्मीदवार की कई खूबियों के साथ उसके भ्रष्टाचारी होने की खूबी को खासी तवज्जो दी। इसके साथ ही तर्क दिया कि 'आप" जैसों से निपटने के लिए ये काबिलीयत काफी जरूरी है। द्विवेदीजी ने अन्ना के आंदोलन रूपी ज्वारभाटा (जो कभी भी फट सकता है।) की याद दिलाकर खूसखोर को अपनी लिस्ट में सबसे ऊपर रखा। समिति के अन्य सदस्यों ने भी अपने-अपने तर्कों के साथ पैमाने पेश किए।
मैडम ने सभी की लिस्ट देखकर कहा, ' नहीं-नहीं। यह सब नहीं चलेगा। देश की जनता का रुख समझो। अपनी सरकार की वैसे ही काफी बदनामी हो चुकी है। मैं इस बार कोई रिश्क नहीं लेना चाहती। दिग्गी आप ही बताओ क्या सही रहेगा?"
दिग्गी, 'मैडम ! लिस्ट क्या बनाना। जिताऊ उम्मीदवार की क्या खूबियां होनी चाहिए यह हमें भी मालूम है और आपको भी। दूसरी बात, पीएम बाबा बनेंगे तो फिर आप क्यों इतनी चिंतित हो रही हैं। हम उनके साथ मिलकर काबिल उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार कर लेंगे। इस बार मुकाबला बड़ा है। सरकार बनाना दूसरी बात, पहले प्राथमिकता तो नमो को नाक रगड़वानी है। इसलिए हम सभी सोच-विचार कर ही निर्णय लेंगे"
दिग्गी राजा ने कुछ दिनों बाद बाबा से मुलाकात की और उम्मीदवारों की लिस्ट के बारे में बात कही।
बाबा, 'ठीक है, किस तरह के उम्मीदवार जीत सकते हैं, इस बारे में तय हो जाना चाहिए। मैं किसी तरह का रिश्क नहीं लेना चाहता। वैसे भी इस बार सभी ने बच्चे का मुकाबला महावली से करवा दिया है।"
दिग्गी, 'जीत उसी की होती है, जोकि साम-दाम-दंड-भेद सब आजमाता है। इसलिए टिकट का पैमाना सोच-समझ कर तय होना चाहिए। मेरी व्यक्तिगत राय मानें तो भ्रष्टाचारी, क्रिमनल, मौका परस्त और चरित्रहीन से अच्छे उम्मीदवार नहीं हो सकते हैं।"
दिग्गी की बात सुन बाबा भड़क गए।
बाबा, 'नहीं, नहीं। यह सब अब किसी भी हाल में नहीं चलेगा। वैसे ही कुछ कम बदनामी हो चुकी है सरकार की। टू-जी और कोयला से लेकर खेल तक कुछ बाकी रहा, जो अब  आप रही-सही कसर पूरी करने की तैयारी करवा रहे हो। "
दिग्गी, 'सोच लो। मैं तो कहता हूं कि जो मैं कह रहा हूं वही सही है। फिर आपकी मर्जी।"
बाबा, 'इस बार देश के हालात कुछ और हैं। ऐसे में जोखिम लेना ठीक नहीं है।"
दिग्गी, 'इसीलिए तो कहता रहा हूं। अच्छा! आप ही बताइए? क्या ईमानदारी से कोई उम्मीदवार अपनी सीट जीत सकता है? नहीं न। इसीलिए कह रहा हूं सोच-समझकर निर्णय लो। भावनाओं में मत बहो।"
बाबा, 'अच्छा ठीक है, मगर यह तो बताओ की जब देश में भ्रष्टाचार मुक्त और ईमानदार सरकार की मांग जोरों पर है तो आपके भ्रष्ट, क्रिमनल और चरित्रहीन उम्मीदवार को कोई क्यों वोट देगा?"
बाबा के सवाल पर दिग्गी अपनी हंसी नहीं रोक पाए और फिर मजाकिया अंदाज में बोले, 'इसीलिए सभी आपको राजनीति का बच्चा कहते हैं।"
बाबा ने दिग्गी की ठिठोली पर नाखुसी जाहिर की। दिग्गी भी समझ गए और ज्यादा मजाक नहीं करने में ही अपनी भलाई समझी।
बाबा, 'हां! तो बताओ कैसे जितवाओगे चुनाव और कैसे बनवाओगे सरकार?"
दिग्गी, 'भ्रष्टाचारी और क्रिमनल होने का फायदा हमे चुनाव के दौरान मिलेगा, मगर मौका परस्त होने का फायदा सरकार चलाने के वक्त। हां! चरित्रहीन होने का उम्मीदवार का अपना फायदा है, मगर वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर आपको और हमें भी फायदा पहुंचा सकता है।
बाबा, 'क्या लोग भ्रष्टाचारी और क्रिमनल को चुनेंगे?"
दिग्गी, 'बिल्कुल। भ्रष्टाचारी और क्रिमनल को ही चुनेंगे।"
बाबा, 'कैसे। "
दिग्गी, 'व्यक्ति यदि भ्रष्टाचारी होगा तो निश्चित ही उसने जमकर धन कमाया होगा। चुनाव में सबसे बड़ी जरूरत धन की ही होती है। धन होगा तो मतदाताओं को शराब बांटी जा सकती है। जरूरत पड़ने पर नोट भी बांटे जा सकते हैं। अधिकारी, कर्मचारी, मुखिया और विपक्षी नेता खरीदे जा सकते हैं। क्या यह सभी ईमानदार कर सकता है। नहीं न।"
बाबा ने दिग्गी की बात को खामोश रह कर स्वीकृति दे तो दिग्गी ने बाकी पैमानों की खासीयत बतानी शुरू कर दी।
दिग्गी, 'यदि भ्रष्टाचारी व्यक्ति क्रिमनल होगा तो उसका चुनाव जीतना और आसान हो जाएगा। दरअसल, क्रिमनल व्यक्ति के खिलाफ बहुत कम लोग वोट करने का साहस करेंगे। दूसरा, जब बात बूथ कैप्चरिंग की आएगी तो वह सबसे आगे होगा। साफ-सुधरी छवि के उम्मीदवार में यह सब करने की हिम्मत नहीं होती है।"
बाबा, 'मौका परस्त उम्मीदवार हमारे किस काम का? वह तो हमेशा ही अपनी फिराक में रहेगा?"
दिग्गी, 'माना की वह अपनी फिराक में रहेगा, मगर हम तो उसकी इस फिदरत का फायदा उठाएंगे?"
बाबा, 'कैसे?"
दिग्गी, 'आरे भाई! हमारी सरकार पूर्ण बहुमत में होगी, इसकी संभावना कम ही है न। जब मिली-जुली सरकार बनेगी तो सभी दल अपने-अपने हित साधेंगे। मौका मिलते ही पाला और पैंतरा बदलेंगे। ऐसे में वही उम्मीदवार हमारे काम आएंगे। वह अपनी फितरत से यह आसानी से बता सकेंगे कि कौन सा दल क्या पैंतरा चलने वाला है। फिर हम उससे समय रहते डील कर सकते हैं। हालांकि, चरित्रहीन का क्या फायदा है, यह मैं पहले ही आपको बता चुका हूं, फिर भी आप कहें तो मैं फिर से बताऊं, क्योंकि इस कैटेगिरी के उम्मीदवार आपके लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। खासकर, जब तक आप शादी नहीं करते।"
बाबा ने इसका कोई जवाब नहीं दिया, मगर बाकी के पैमानों पर अपनी सहमति देकर उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार करने के लिए कह दिया। हां, अफसोस जरूर जाहिर किया। यह कह कर कि मैं फालतू में ही गरीबों के घर भटकता रहा। कहीं झोपड़ी में भोजन किया तो कहीं मजदूरी। मैं वाकई बच्चा हूं।
सहमति मिलते ही दिग्गी ने अपना काम शुरू कर दिया है। हां! आपमें यदि उक्त खूबि
यां हों तो दिग्गी राजा से संपर्क कर टिकट पा सकते हो। लेकिन, जल्दी करें, मौका सीमित समय के लिए है।  

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

कशमकश


धर्मेंद्र सिंह राजावत
मेरे दिल में तूफान खड़ा कर
मेरे दिमाग का दरवाजा खोल देती है।
ये कम्बख्त कशमकश बहुत बेरहम है
कलम में भी बेड़ियां डाल देती है।

दिमाग जब दिल का साथ नहीं देता
तो यह दिल को भड़का देती है
बहुत देर से बैठा हूं लिखने के लिए
विचार आने से पहले ये जिरह शुरू कर देती है

मायूस होने लगे दिल को दुलार दूं
या दिमाग को बेहतर करार दूं
अब मुसीबत का पर्दा उतार दूं
या बेबस हाथों को औजार दूं

प्रेमिका के प्यार को आकार दूं
या सीने में उसके खंजर उतार दूं
ये सोचने में घंटों गुजार दूं
या फिर कशमकश में दो-चार दूं

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

अजब आज्ञाकारी पुत्र (कहानी)


धर्मेंद्रसिंह राजावत
सीएपी मनोहर राणा और उनकी पत्नी चंदावती राणा अपने बेटे रॉकी की कारगुजारियों से खासे परेशान थे। उनकी परेशानी को उनके पड़ोस में रहने वाले जयनारायण मिश्रा के बेटे मोहित ने और बढ़ाकर नासूर बना दिया था। दरअसल, आए दिन जहां रॉकी की शिकायतें मिलतीं थीं, वहीं मोहित की तारीफ करने वालों की कमी नहीं थी। राणा दंपति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह आखिर करें तो क्या करें। वह खासे चिंता में डूबे थे कि किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई।
चंदावती, ' कौन है?"
उधर से आवाज आई, 'मैडम जी! मैं काम वाली सुमनबाई।"
आवाज सुनकर चंदावती दरवाजा खोलने चल दीं। लेकिन, दिमाग में रॉकी और मोहित को लेकर ही विचार चल रहे थे। उन्होंने दरवाजा खोला और सुमनबाई अंदर आकर अपने काम में जुट गई। चंदावती फिर से सोफे पर जाकर गहरी चिंता में डूब गईं। इस बीच मनोहर किसी से फोन पर बात करने में व्यस्त हो गए। कुछ समय बाद यकायक चंदावती चिल्लाईं।
'क्यों जी कहां फोन पर बक-बक कर रहे हो? मैं यहां बच्चे के बारे में सोच-सोचकर मरी जा रही हूं और आपको कोई फिक्र ही नहीं।"
मनोहर ने फोन पर बात करना बंद किया और झल्लाते हुए बोले-
'क्यों-क्या हो गया? क्या किसी से बात करना भी बंद कर दूं? बच्चे के लिए मैंने कुछ नहीं किया जो मुझे ताना मार रही हो। मैं उसकी और आपकी हर डिमांड पूरी करता हूं। अब वह आपके लाड-प्यार में बिगड़ गया है तो मैं क्या करूं?"
चंदावती, 'चलो, यह सब छोड़ो और मेरी बात ध्यान से सुनो। मैंने उसके बारे में कुछ सोच लिया है।"
मनोहर बड़े उत्सुक होकर बोले, 'जल्दी बताओ। क्या सोचा है आपने?"
चंदावती, ' मिश्राजी के यहां भी तो सुमन ही काम करने जाती है। उससे पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्या है कि मोहित की सभी इतनी तारीफ करते हैं।"
मनोहर, 'इसमें सुमन क्या बताएगी।"
चंदावती, ' अरे ! आप समझे नहीं। मेरा मतलब है कि उससे जानते हैं कि उनके घर में उसके माता-पिता उसको ऐसा क्या सिखाते हैं, जो हम रॉकी को नहीं सिखाते।"
मनोहर, 'हां! यह सही कह रही हो।"
चंदावती ने सुमनबाई को आवाज लगाई, 'यहां आओ सुमन"
सुमन अपना काम छोड़कर उनके पास आई तो बड़े ही प्यार से उससे मोहित और मिश्राजी के घर की दिनचर्या के बारे में पूछना शुरू किया।
सुमन, 'मैडमजी ! मैं कुछ ज्यादा तो जानती नहीं, पर हां मोहित हर किसी की आज्ञा का पालन करता है। यह बात उसको मिश्राजी और मैडमजी ने बचपन से ही सिखाई है।"
चंदावती, 'ये बात है। तब तो मैं अपने बेटे को हर हाल में आज्ञाकारी बनाऊंगी। फिर देखना मोहित से ज्यादा मेरे बेटे की तारीफ होगी।"
इसी बीच रॉकी स्कूल से आ गया। कुछ समय बाद राणा दंपति ने उससे बात की।
चंदावती, 'रॉकी ! तुम्हारी बहुत शिकायतें मिल रही हैं। अब यह सब नहीं चलेगा।"
रॉकी कुछ कहता उससे पहले ही मनोहर बोले, 'तुम्हें हमारी एक बात माननी पड़ेगी। इसके बदले तुम जो कहोगे वह हम लोग करेंगे।"
रॉकी, 'ठीक है। बताओ क्या करना है?"
चंदावती, 'तुमसे कोई कुछ कहे तो वह काम तुम्हें हर हाल में करना है। एक आज्ञाकारी बेटे की तरह।"
रॉकी, 'ठीक है।"
अभी एक दिन ही गुजरा था कि पास वाली गली में रहने वाले सक्सेनाजी शिकायत लेकर आ गए। रॉकी ने उनके बेटे से साथ मारपीट की थी। उनकी शिकायत से आगबबूला चंदावती ने तुरंत ही रॉकी को तलब कर लिया।
चंदावती, 'क्यों तुमने मारपीट की है?"
रॉकी, 'हां ! मैंने राहुल को मारा है।"
चंदावती, 'कल ही समझाया था कि एक आज्ञाकारी बेटा बनना है न की लड़ने-झगड़ने वाला। मगर, तुम सुधरोगे नहीं। क्यों मारा तुमने?"
रॉकी, 'रामू को राहुल मार रहा था। राहुल से लड़ने में रामू ने मेरी मदद मांगी तो मैंने राहुल की पिटाई कर दी।"
चंदावती, 'मगर, तुम्हें झगड़े में पड़ने की जरूरत क्या थी?"
रॉकी, 'आपने ही तो कल कहा था कि कोई कुछ काम के लिए कहे तो उसको कर दिया करो। एक आज्ञाकारी बेटे की तरह। इसीलिए मैंने रामू की मदद कर दी।"
चंदावती ने सक्सेनाजी से रॉकी की तरफ से माफी मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा। उनके जाने के बाद रॉकी को समझाया कि कोई किसी काम के लिए कहता है तो वह काम कर देना चाहिए, मगर वह अच्छा काम हो। लड़ाई-झगड़े वाला नहीं।
इस वाकये को अभी तीन दिन ही गुजरे थे कि बाजार से सब्जी खरीदने गया रॉकी खाली झोला लिए लौट आया। खाना पकाने के लिए उसकी राह देख रहीं चंदावती इस बात को लेकर उस पर बरस पड़ीं।
चंदावती, 'सब्जी क्यों नहीं लाया?"
रॉकी, 'रुपए ही नहीं थे।"
चंदावती, 'जो रुपए दिए थे वह कहां किए?"
रॉकी, 'वह तो मैंने एक भिखारी को दे दिए।"
चंदावती, ' क्यों?"
रॉकी, 'आपने ही तो कहा था कि कोई कुछ कहे तो वह काम कर दिया करो। लेकिन, लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए। भिखारी ने कहा कि भूखे को भोजन के लिए रुपए दोगे तो भगवान आपका भला करेगा। इसलिए मैंने उसे रुपए दे दिए। अब रुपए ही नहीं बचे थे तो सब्जी किससे लेता।"
चंदावती, 'तेरे पास दिमाग है या नहीं?"
रॉकी, 'आपने तो आज्ञा का पालन करने के लिए कहा था दिमाग लगाने के लिए नहीं।"
इसी बीच मिश्रा जी भी आ गए।
मिश्रा, ' भाभी जी! बुरा न मानें तो एक बात कहूं। "
चंदावती, ' कहिए न।"
मिश्रा, ' लाड़-प्यार करना गलत नहीं है, मगर बेलगाम छोड़ देना किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता है। और यह संस्कार बच्चों को बचपन से ही देने चाहिए। बच्चों की जरूरतें पूरी करनी चाहिए, मगर उनको यह भी बताना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत।"

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मक्खन है या मुसीबत (कहानी)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
सोमवार को दूरसंचार मंत्रालय में सब कुछ सामान्य था सिर्फ पप्पू को छोड़कर। पप्पू जी मंत्रालय में हेडक्लर्क हैं। उनको सभी से हमेशा यही शिकायत रहती है कि उनके साथी उच्चाधिकारियों को मक्खन लगाने में उनसे आगे निकल जाते हैं। लेकिन, आज उनका हाव-भाव देखकर ऐसा लग रहा था मानो उनके मन में खुशी का दरिया हिलोरें ले रहा है। पप्पू में कुछ बदलाव देखकर अपने मन में उठे सवालों के सैलाब को महेश शांत न कर सके और पप्पू के पास जाकर सवाल दाग दिया।
'क्यों पप्पू! आज बहुत खुश लग रहे हो?"
पप्पू ने काफी अचरज भरी निगाह से देखा और उत्तर देने के बजाय उसने भी सवाल दाग दिया।
'क्यों मैं खुश नहीं हो सकता? साहब को उल्टा-सीधा पढ़ा (मक्खन लगाकर) बहुत खुश होते हो। मैंने तो कभी कुछ नहीं पूछा। हां! एक बात साफ समझ लो। न मैं खुश हूं और न ही मैं मंत्री जी को कुछ बताने वाला हूं।"
महेश जी मंत्रालय में बड़े साहब के  पीए हैं। दूसरी पदवी उनको मंत्रालय के साथियों ने सकुनी की दे रखी है। जितना तेज उतना ही शातिर दिमाग। आग की तरह पूरे मंत्रालय में यह खबर फैला दी कि पप्पू आज मंत्री जी से कुछ कहने वाला है। पप्पू क्या कहने वाला है, यह जानने की सभी कर्मचारियों-अधिकारियों की उत्सुकता चरम पर पहुंचती उससे पहले ही मंत्री जी आ पहुंचे। मौका मिलते ही पप्पू भी मंत्री जी के केबिन में जा घुसा। कुछ उत्सुक कर्मचारी कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगे तो कुछ दफ्तर का काम निकालकर मंत्री जी के केबिन में ही पहुंच गए। कुछ संकोच के बाद पप्पू ने अपनी बात शुरू की।
'साहब ! आपकी समस्या का मैंने समाधान ढूंढ निकाला है।"
मंत्री जी, 'किस समस्या का?"
पप्पू , 'सोशल मीडिया का।"
पप्पू के इतने कहने पर मंत्री जी का रिएक्शन ऐसा था मानो नासूर घाव का किसी ने इलाज बता दिया। फिर अचरज भरे अंदाज में सवाल किया।
'क्या कहा पप्पू?"
पप्पू, 'हां साहब ! सही सुना आपने। हमने मीडिया का मुंह बंद करने का मंत्र ढूंढ निकाला है। बहुत उल्टा-सीधा लिखते हैं ये सब। फेसबुक, ट्यूटर और न जाने किस-किस पर। सब के बारे में मुझे खबर है।
मंत्री जी ने खासे उत्सुक होकर पप्पू से सवाल किया
'क्या समाधान ढूंढा है आपने?"
पप्पू, ' साहब !  थोड़ी सी बेइज्जती से बहुत सारी इज्जत बच जाएगी।"
पप्पू की बात सुन मंत्री जी कुछ असहज हो गए। क्षणिक गंभीरता के बाद फिर बोले
'क्या मतलब है आपका?"
मंत्री जी के अंदाज को देखकर पप्पू कुछ झेप गया और सफाई देने के भाव में बोला
'साहब! ग्वालियर की एक अदालत के आदेश के बाद सरकारी और गैर सरकारी के साथ ही कई मीडिया संस्थानों की वेबसाइट्स बिना बताए बंद कर दी गईं थीं।"
पप्पू अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही मंत्री जी ने उसे रोकते हुए फिर सवाल किया
'इसका इससे क्या ताल्लुक?"
पप्पू, 'ताल्लुक है साहब! वेबसाइट्स बंद होने के बाद हुए
हो-हल्ला के बीच एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में एक डॉट.कॉम के संस्थापक ने कहा कि मंत्रालय को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी, जिससे कि हम इस मुद्दे पर बहस करा लेते।"
मंत्री जी ने पप्पू को टोकना चाहा पर उसने अपनी बात जारी रखी।
'सर! यह तो तय है कि बहस में हमारी बेइज्जती ही होती, मगर इसके बाद वेबसाइट्स को बंद तो कर सकते हैं  ऐसा करके हम काफी सारी इज्जत बचा सकते हैं।"
पप्पू की बात सुनकर मंत्री जी ने एक पल के लिए लंबी सांस ली और फिर बोले
' पप्पू तुम सही कह रहे हो। सोशल मीडिया वाले जितनी बेइज्जती कर रहे हैं, उससे तो अच्छा है कि सभी को एक-एक कर बहस का मौका दिया जाए। फिर हमेशा के लिए झंझट खत्म। इसके बाद कोई चिल्लाचोंट नहीं होगी,  फिर जो चाहो लूटो-खसोटो।"
मंत्री जी अपनी और अपनी सरकार की बेइज्जती करने वालों को इसका लाइसेंस देने को राजी हो गए। कुछ दिन बाद ही वह इससे संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले थे कि महेश वह मैगजीन लेकर उनके पास आ गया, जिसमें इससे संबंधित लेख लिखा था।
महेश, 'सर ! लेख आपने पढ़ा है?"
मंत्री जी, ' नहीं।"
महेश, 'लेख में न केवल वेबसाइट्स के प्रतिबंध की आलोचना की गई है बल्कि ऐसा करने से पहले बहस की मांग भी की गई है, मगर इसमें कहीं भी नहीं लिखा है कि इसके बाद वेबसाइट्स बंद करने से उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।"
मंत्री जी ने झपटकर मैगजीन ली और उस लेख को पढ़ा। इसके बाद पप्पू पर खासे नाराज हुए।
मंत्री जी, 'क्यों पप्पू तुम मुझे बेइज्जत होने से बचा रहे थे या मेरी बेइज्जती की व्यवस्था कर रहे थे?"
पप्पू, 'लेख में बहस कराने की मांग की गई थी। मैंने समझा कि इसका मतलब तो यही हुआ कि बहस के बाद वेबसाइट्स बंद कर सकते हैं।"
मंत्री जी, 'तुम जो न समझो वही अच्छा है।"
पप्पू ने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप उनके दफ्तर से निकल आया। पीछे-पीछे महेश भी आ गया।
महेश, 'पप्पू ! नकल के लिए जितनी अकल की जरूरत होती है, उतनी ही मक्खन लगाने के लिए मानसिक मशक्कत की।  ये हुनर है, जोकि हर किसी को नहीं आता। ऐसे तो कोई भी ऐरा-गैरा आए और साहब को मक्खन लगा कर चलता बने। इसके लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। जाओ और मक्खन लगाने की कला सीखो।"
पप्पू, ' बाप रे! ये मक्कन है या मुसीबत।

भुखमरी: जरिया जेब भरने का (व्यंग्य)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
विपक्ष सहित केजरीवाल के हमलों से परेशान मैडम ने कुछ दिनों पहले मंत्रियों की बैठक बुलाई। इसमें उन्होंने सभी से एक ही सवाल किया।
'भ्रष्टाचार और घोटालों से तो जनता को कोई खास सरोकार नहीं है, पर यह बताओ महंगाई और भुखमरी के मुद्दे पर उसको क्या जवाब दिया जाए?"
सभी मंत्री बगलें झांकने लगे। किसी को कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा था।
ऐसे में हर बार की तरह इस बार भी संकट मोचन मनमोहन सिंह ने मोर्चा संभाला।
उन्होंने कहा, 'मैडम हम जनता को जवाब भी देंगे और अपनों की जेब भी भरेंगे।"
सिंह की बात सुन मैडम चौक गईं। बहुत ही आश्चर्य चकित होकर बोलीं। आरे! ऐसा कैसे हो सकता है?
सिंह बोले, 'जरूरी नहीं, जिसने कभी नुकसान  पहुंचाया हो वह कभी भी अपने काम नहीं आएगा।"
मैडल बोलीं, 'मन तुम पहेलियां मत बुझाओ। सीधे सीधे बताओ जनता को क्या और कैसे जवाब दिया जाए।"
सिंह बोले, 'राजू को बुलाओ और उससे कहो कि देश में जिनते भी गरीब या भुखमरे दिखें उनको कपिल के ड्रीम प्रोजेक्ट से एक-एक टैबलेट दे दे। हां ! साथ में डेटा कार्ड जरूर दे, जिससे कि वह फेसबुक पर अपना अकाउंट खोल सकें।"
मैडम बोली, 'मन, मैं गंभीर मुद्दे पर बात कर रही हूं और तुम्हें मजाक सूझ रहा है। भुखमरी से टैबलेट का क्या संबंध।"
सिंह बोल, संबंध है मैडम। बहुत गहरा संबंध"
मैडम, कैसे?
सिंह, 'जब उसे फेसबुक का चस्का लगेगा तो वह भूख-प्यास सब भूल जाएगा। और जब उसे भूल लगेगी ही नहीं तो भुखमरी कहां से आएगी। दूसरा, जब लोग खाना ही नहीं खाएंगे तो खाद्य पदार्थों की कीमतें तो नीचे आएंगी ही। ऐसे महंगाई को भी अपन निपटा देंगे। फेसबुक ने हम-आपको बहुत जख्म दिए हैं, पर अब वह नमक का हक अदा करने को तैयार है।"
मैडम बोलीं, 'मन, यह बात तो आपने सौ टके की कही है। बड़े छुपे रुस्तम हैं आप। सच मैंने आपको ऐसे ही नहीं चुना।"
मैंडम ने फिर सवाल दागा, 'मगर यह तो बता कि इससे अपनों की जेबें कैसे भरेंगी?"
सिंह बोले, 'अरे, मैडम। आप समझी नहीं। अच्छा मुझे ये बताइए, क्या राजू अपने घर से टैबलेट देगा, नहीं न। सरकार खरीदकर देगी। और जब सरकार खरीदेगी तो जेब भरने का एक मौका और मिलेगा न।
मैडम मुस्कराईं और बोली,  'मन आप मेरे मन को ऐसे ही नहीं भाते।"
सिंह फिर बोले, 'मैडम मैं इसका एक और फायदा बताना तो भूल ही गया।"
मैडम ने पूछा, 'क्या?"
सिंह बोले,  'इससे  अपनी इंटरनेशनल इमेज भी बेहतर होगी।"
मैंडम ने फिर सवाल किया, 'कैसे?"
सिंह बोले, 'हम इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर फक्र से कह सकेंगे कि हमारे देश में आईटी ने जबरदस्त तरक्की की है। हमारे यहां भिखारी ही नहीं भुखमरी के करार पर पहुंचने वाले व्यक्ति के पास भी टैबलेट है। चुनाव के समय देश में भी लोगों से कह सकेंगे कि अन्य दल तो लैपटॉप या कंप्यूटर देने का सिर्फ वादा करते हैं, पर हम ने सभी टैबलेट बांटे हैं।

रविवार, 14 अप्रैल 2013

गरीबी मिटाने का उनका नायाब 'फॉर्मूला" ( व्यंग्य )


धर्मेंद्र सिंह राजावत
देश में गरीबी कोई नया मुद्दा नहीं है। इतिहास को यदि परत-दर-परत पलट कर देखा जाए तो पता चलेगा कि यह हमेशा कायम थी। अलबत्ता, देश में अब जो माहौल बना है, उसने गरीब और गरीबी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कुछ दिन पहले की बात है। मैं परिवार के साथ इंडिया गेट गया था। जब मैं परिजनों के साथ खाने-पीने में मशगूल था तभी पास बैठे दो भिखारियों की बातचीत ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वह दोनों भी गरीबी पर ही बातचीत कर रहे थे।
एक भिखारी दूसरे से पूछ रहा था , ''क्यों घंसू तुम दिनभर में कितने रुपए कमा लेते हो?"
घंसू जवाब देता है, '' यही करीब चार-पांच सौ रुपए।"
साथ ही वह भी सवाल दागता है, ''धनिया! तुम कितना कमा लेते हो?""
धनिया जवाब देता है, '' मैं भी करीब तीन-चार सौ रुपए हर रोज कमा लेता हूं।"
जवाब देने के साथ ही वह गंभीर चिंतन में डूब जाता है। उसको उदास देखकर घंसू फिर से सवाल करता है। ''धंधा अच्छा चल रहा है तो फिर उदास होने की जरूरत क्या है? हां! ठीक है, अभी तीन-चार सौ ही कमा पाता है, पर कुछ और मेहनत कर तो ज्यादा भी कमा सकता है।"
धनिया गंभीर भाव के साथ बोला, '' घंसू ! बात धंधे की नहीं है।"
घंसू ने फिर सवाल किया, '' तो फिर बात क्या है?"
धनिया बोला, '' मुझे चिंता इस बात की सता रही है कि कहीं सरकार को हमारी कमाई की जानकारी मिल गई तो क्या होगा। सरकार की नजर में 28 रुपए हररोज कमाने वाला भी गरीब नहीं है, फिर मैं तो उससे 10-15 गुना ज्यादा कमाता हूं। मुझे डर है कि कहीं सरकार हमें क्रीमी लेयर की श्रेणी में न रख दे। दूसरा, चाहे नौकरी करने वाला व्यक्ति हो या फिर व्यापारी, सरकार सभी से टैक्स वसूलने पर आमादा है, बस उसे इस बात की पुख्ता जानकारी मिल जाए कि वह सुकून से दो वक्त की रोटी परिवार को खिला रहा है। मेरी कमाई की जानकारी उसे मिल गई तो मेरा क्या होगा, यही सोच कर मैं परेशान हूं।"
गरीबी के स्तर का आकलन करने वाली सरकार का शायद दोनों भिखारी मखौल उड़ा रहे थे, पर उनकी बात में एक कड़वी सच्चाई भी झलक रही थी। जिस सरकार की नजर में 28 रुपए कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं होगा तो क्या उसको देश में कोई भी व्यक्ति गरीब नजर आएगा?  शायद नहीं। यह सरकार की विफलता, हताशा और खीज का ही नतीजा है, जो गरीब और गरीबी को वह इस तरह परिभाषित कर रही है। कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी और अर्थशास्त्र  के जानकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सत्ता में आने से पहले लोगों से वादा किया था कि वह न केवल महंगाई पर लगाम लगाएंगे बल्कि आमजनता की जेब का बोझ भी कम करेंगे, मगर अब वह महंगाई और गरीबी की बात आते ही उखड़ जाते हैं।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जिससे मैं महंगाई को कम कर दूं। अलबत्ता, उन्होंने 80 सवालों की झड़ी जरूर तैयार कर ली है, जिसमें उलझाकर वह गरीब को अमीर साबित कर सकते हैं। फिर न रहेगा बांस (गरीब) और न बजेगी बांसुरी। गौरतलब है कि गरीबी की परिभाषा को आंकड़ों में उलझाकर  किसी भी गरीब को अमीर साबित करने का सरकार ने एक नायाब फॉर्मूला निकाल लिया है। इसके तहत 80 से अधिक सवाल एक व्यक्ति से पूछे जाएंगे और यदि उसके एक भी जवाब से सरकार संतुष्ट नहीं हुई तो वह व्यक्ति उसकी नजर में गरीब नहीं हो सकता, फिर चाहे उसके पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी और सिर ढकने के लिए छत भी न हो।
सरकार और प्रधानमंत्री को आंकड़ों से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत जानने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह गरीब और गरीब उनका मखौल उड़ाते रहेंगे।