बुधवार, 17 अप्रैल 2013

अजब आज्ञाकारी पुत्र (कहानी)


धर्मेंद्रसिंह राजावत
सीएपी मनोहर राणा और उनकी पत्नी चंदावती राणा अपने बेटे रॉकी की कारगुजारियों से खासे परेशान थे। उनकी परेशानी को उनके पड़ोस में रहने वाले जयनारायण मिश्रा के बेटे मोहित ने और बढ़ाकर नासूर बना दिया था। दरअसल, आए दिन जहां रॉकी की शिकायतें मिलतीं थीं, वहीं मोहित की तारीफ करने वालों की कमी नहीं थी। राणा दंपति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह आखिर करें तो क्या करें। वह खासे चिंता में डूबे थे कि किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई।
चंदावती, ' कौन है?"
उधर से आवाज आई, 'मैडम जी! मैं काम वाली सुमनबाई।"
आवाज सुनकर चंदावती दरवाजा खोलने चल दीं। लेकिन, दिमाग में रॉकी और मोहित को लेकर ही विचार चल रहे थे। उन्होंने दरवाजा खोला और सुमनबाई अंदर आकर अपने काम में जुट गई। चंदावती फिर से सोफे पर जाकर गहरी चिंता में डूब गईं। इस बीच मनोहर किसी से फोन पर बात करने में व्यस्त हो गए। कुछ समय बाद यकायक चंदावती चिल्लाईं।
'क्यों जी कहां फोन पर बक-बक कर रहे हो? मैं यहां बच्चे के बारे में सोच-सोचकर मरी जा रही हूं और आपको कोई फिक्र ही नहीं।"
मनोहर ने फोन पर बात करना बंद किया और झल्लाते हुए बोले-
'क्यों-क्या हो गया? क्या किसी से बात करना भी बंद कर दूं? बच्चे के लिए मैंने कुछ नहीं किया जो मुझे ताना मार रही हो। मैं उसकी और आपकी हर डिमांड पूरी करता हूं। अब वह आपके लाड-प्यार में बिगड़ गया है तो मैं क्या करूं?"
चंदावती, 'चलो, यह सब छोड़ो और मेरी बात ध्यान से सुनो। मैंने उसके बारे में कुछ सोच लिया है।"
मनोहर बड़े उत्सुक होकर बोले, 'जल्दी बताओ। क्या सोचा है आपने?"
चंदावती, ' मिश्राजी के यहां भी तो सुमन ही काम करने जाती है। उससे पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्या है कि मोहित की सभी इतनी तारीफ करते हैं।"
मनोहर, 'इसमें सुमन क्या बताएगी।"
चंदावती, ' अरे ! आप समझे नहीं। मेरा मतलब है कि उससे जानते हैं कि उनके घर में उसके माता-पिता उसको ऐसा क्या सिखाते हैं, जो हम रॉकी को नहीं सिखाते।"
मनोहर, 'हां! यह सही कह रही हो।"
चंदावती ने सुमनबाई को आवाज लगाई, 'यहां आओ सुमन"
सुमन अपना काम छोड़कर उनके पास आई तो बड़े ही प्यार से उससे मोहित और मिश्राजी के घर की दिनचर्या के बारे में पूछना शुरू किया।
सुमन, 'मैडमजी ! मैं कुछ ज्यादा तो जानती नहीं, पर हां मोहित हर किसी की आज्ञा का पालन करता है। यह बात उसको मिश्राजी और मैडमजी ने बचपन से ही सिखाई है।"
चंदावती, 'ये बात है। तब तो मैं अपने बेटे को हर हाल में आज्ञाकारी बनाऊंगी। फिर देखना मोहित से ज्यादा मेरे बेटे की तारीफ होगी।"
इसी बीच रॉकी स्कूल से आ गया। कुछ समय बाद राणा दंपति ने उससे बात की।
चंदावती, 'रॉकी ! तुम्हारी बहुत शिकायतें मिल रही हैं। अब यह सब नहीं चलेगा।"
रॉकी कुछ कहता उससे पहले ही मनोहर बोले, 'तुम्हें हमारी एक बात माननी पड़ेगी। इसके बदले तुम जो कहोगे वह हम लोग करेंगे।"
रॉकी, 'ठीक है। बताओ क्या करना है?"
चंदावती, 'तुमसे कोई कुछ कहे तो वह काम तुम्हें हर हाल में करना है। एक आज्ञाकारी बेटे की तरह।"
रॉकी, 'ठीक है।"
अभी एक दिन ही गुजरा था कि पास वाली गली में रहने वाले सक्सेनाजी शिकायत लेकर आ गए। रॉकी ने उनके बेटे से साथ मारपीट की थी। उनकी शिकायत से आगबबूला चंदावती ने तुरंत ही रॉकी को तलब कर लिया।
चंदावती, 'क्यों तुमने मारपीट की है?"
रॉकी, 'हां ! मैंने राहुल को मारा है।"
चंदावती, 'कल ही समझाया था कि एक आज्ञाकारी बेटा बनना है न की लड़ने-झगड़ने वाला। मगर, तुम सुधरोगे नहीं। क्यों मारा तुमने?"
रॉकी, 'रामू को राहुल मार रहा था। राहुल से लड़ने में रामू ने मेरी मदद मांगी तो मैंने राहुल की पिटाई कर दी।"
चंदावती, 'मगर, तुम्हें झगड़े में पड़ने की जरूरत क्या थी?"
रॉकी, 'आपने ही तो कल कहा था कि कोई कुछ काम के लिए कहे तो उसको कर दिया करो। एक आज्ञाकारी बेटे की तरह। इसीलिए मैंने रामू की मदद कर दी।"
चंदावती ने सक्सेनाजी से रॉकी की तरफ से माफी मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा। उनके जाने के बाद रॉकी को समझाया कि कोई किसी काम के लिए कहता है तो वह काम कर देना चाहिए, मगर वह अच्छा काम हो। लड़ाई-झगड़े वाला नहीं।
इस वाकये को अभी तीन दिन ही गुजरे थे कि बाजार से सब्जी खरीदने गया रॉकी खाली झोला लिए लौट आया। खाना पकाने के लिए उसकी राह देख रहीं चंदावती इस बात को लेकर उस पर बरस पड़ीं।
चंदावती, 'सब्जी क्यों नहीं लाया?"
रॉकी, 'रुपए ही नहीं थे।"
चंदावती, 'जो रुपए दिए थे वह कहां किए?"
रॉकी, 'वह तो मैंने एक भिखारी को दे दिए।"
चंदावती, ' क्यों?"
रॉकी, 'आपने ही तो कहा था कि कोई कुछ कहे तो वह काम कर दिया करो। लेकिन, लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए। भिखारी ने कहा कि भूखे को भोजन के लिए रुपए दोगे तो भगवान आपका भला करेगा। इसलिए मैंने उसे रुपए दे दिए। अब रुपए ही नहीं बचे थे तो सब्जी किससे लेता।"
चंदावती, 'तेरे पास दिमाग है या नहीं?"
रॉकी, 'आपने तो आज्ञा का पालन करने के लिए कहा था दिमाग लगाने के लिए नहीं।"
इसी बीच मिश्रा जी भी आ गए।
मिश्रा, ' भाभी जी! बुरा न मानें तो एक बात कहूं। "
चंदावती, ' कहिए न।"
मिश्रा, ' लाड़-प्यार करना गलत नहीं है, मगर बेलगाम छोड़ देना किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता है। और यह संस्कार बच्चों को बचपन से ही देने चाहिए। बच्चों की जरूरतें पूरी करनी चाहिए, मगर उनको यह भी बताना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत।"

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