गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

दही और कम वसायुक्त पनीर से कम होता है डायबटीज का खतरा

लंदन, प्रेट्र : डायबटीज के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर है। हालिया श्ाोध के मुताबिक, दही और कम वसा युक्त पनीर के सेवन से डायबटीज का जोखिम एक तिहाई तक कम हो सकता है। यह श्ाोध जर्नल डायबटोलोजिया में प्रकाश्ाित हुआ है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के श्ाोधकर्ताओं के मुताबिक, दही का सेवन नहीं करने वालों की तुलना में इसका अधिक मात्रा में सेवन करने वाले लोगों में टाइप-2 डायबटीज का जोखिम 28 फीसद तक कम हो सकता है। दही और कम वसा वाले पनीर जैसे डेयरी पदार्थों के सेवन से डायबटीज से संबंधित अन्य जोखिम भी 24 फीसद तक कम हो सकते हैं। प्रमुख श्ाोधकर्ता व कैंब्रिज एपिडीमियोलॉजी यूनिट की डॉक्टर नीता फोरूही ने कहा, श्ाोध के नतीजे बताते हैं कि विश्ािष्ट खाद्य पदार्थ टाइप 2 डायबटीज की रोकथाम में महत्वपूणर््ा भूमिका निभा सकते हैं। श्ाोध के तहत ब्रिटेन के नोरफोक में रहने वाले 25 हजार महिलाओं व पुरुषों की खाने पीने की आदतों का विस्तृत अध्ययन किया गया। 11 साल से टाइप 2 डायबटीज से पीड़ित 753 प्रतिभागियों और 3502 अन्य प्रतिभागियों के एक सप्ताह के दौरान खाने पीने की वस्तुओं के आंकड़े इकट्ठे किए गए। इससे श्ाोधकर्ता वसायुक्त डेयरी खाद्य पदार्थों का सेवन करने वालों और वसा रहित खाद्य पदार्थों का सेवन करने वालों में डायबटीज के जोखिम का अध्ययन आसानी से कर पाए।

कीटनाशक के संपर्क में आने से अल्जाइमर्स का खतरा

कीटाणुनाशक दवाओं के संपर्क में आने से याददाश्त कम हो सकती है। अमेरिकी शोधकर्ताओं के अनुसार कीटनाशक दवा डायक्लोरो डायफिनाइल ट्रायक्लोरोएथेन (डीडीटी) के अधिक संपर्क में आने से अल्जाइमर्स होने का खतरा बढ़ जाता है। अल्जाइमर्स से पीड़ितों में भ्रमित रहने, बेवजह आवेश में आने, मूड में अचानक बदलाव आने और दीर्घकाल में याददाश्त चले जाने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। 'जामा न्यूरोलॉजी" में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि अल्जाइमर्स के रोगी के शरीर में डीडीटी का स्तर किसी स्वस्थ इंसान की तुलना में चार गुना अधिक होता है।
*बड़ी मात्रा में होता है प्रयोग :
भारत समेत कई देशों में डीडीटी का इस्तेमाल मलेरिया के लिए जिम्मेदार मच्छरों को मारने के लिए अभी भी किया जाता है। इसके अलावा कुछ खास तरह की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए भी इन कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। अल्जाइमर्स रिसर्च यूके का कहना है कि अल्जाइमर्स और डीडीटी के संबंध की अभी और पड़ताल करने की जरूरत है।
*कई देशों में प्रतिबंधित :
अमेरिका में डीडीटी के इस्तेमाल पर 1972 में प्रतिबंध लग चुका है। कई अन्य देशों में भी इस पर प्रतिबंध है। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन मलेरिया की रोकथाम के लिए डीडीटी के इस्तेमाल पर अभी भी जोर देता है। डीडीटी इंसानों के शरीर में भी पाया जाता है जहां यह डीडीई (डायक्लोरो-डायफिनाइल-डायक्लोरो-एथिलीन) में तब्दील होता है। रटगर्ज और इमोरी यूनिवर्सिटी में शोधकर्ताओं के एक दल ने अल्जाइमर्स से पीड़ित 86 मरीजों के ब्लड में डीडीई के स्तर की जांच की। अल्जाइमर्स के मरीजों में डीडीई का स्तर तीन गुना अधिक मिला। लेकिन फिर भी यह मामला अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, क्योंकि कुछ ऐसे लोगों में भी डीडीई की मात्रा अधिक पाई गई जो एकदम स्वस्थ हैं।  

यूं बढ़ता जाता है संक्रमण का प्रभाव

सर्दी-खांसी और बुखार से निजात पाने के लिए लोग दवाओं का सहारा लेते हैं। यह दवाइयां भले ही आपकी तबीयत में सुधार ले आएं, लेकिन आपके आसपास रहने वालों पर भारी पड़ सकती है। हाल ही में हुए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह दावा किया है। उनके मुताबिक सर्दी-जुकाम और बुखार के लिए ली जाने वाली दवाएं वायरस को फैलने का मौका देती हैं, इसलिए अन्य लोग भी इस बीमारी की गिरफ्त में आ जाते हैं। बुखार होने पर शरीर का तापमान बढ़ जाता है। माना जाता है कि यह शरीर के प्रतिरोधी तंत्र को संक्रमण के खिलाफ लड़ने के लिए सक्रिय बनाता है। साथ ही सर्दी-जुकाम के वायरस को भी फैलने से रोकता है। एस्पिरिन और पैरासिटामॉल जैसी दवाएं लेने पर भी शरीर का तापमान गिरने लगता है। इससे बुखार तो जरूर कम होता है लेकिन सर्दी-खांसी के वायरस तेजी से फैलते हैं। ये बीमार व्यक्ति के आसपास मौजूद लोगों को अपनी चपेट में ले सकते हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि 20 में से एक व्यक्ति इसी कारण बीमारी की गिरफ्त में आता है। ऐसे में दवा लेकर घर पर रहकर आराम करने की सलाह दी जाती है। 

अच्छी नींद का विचार भी देता है दिमाग को धार

दिमाग को दुरुस्त रखने के लिए नींद सबसे जरूरी है। ऐसा तो सभी जानते हैं लेकिन हाल ही में हुए एक शोध से यह बात सामने आई है कि अच्छी नींद के बारे में सोचने मात्र से ही दिमाग तेज हो सकता है!
यकीन नहीं होता ना, मगर यह सच है। कोलेराडो कॉलेज के शोधकर्ताओं के अनुसार भरपूर नींद लेने के बजाय अगर आप अच्छी नींद के बारे में सोच भी लें तो इससे आपकी याददाश्त और दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शोधकर्ता क्रिस्टीना ड्रैगनिक और क्रिस्टी एर्डल ने छात्रों पर किए शोध से यह बात मानी कि जो छात्र अच्छी नींद न हो पाने के बाद भी यह मानकर चलते हैं कि उनकी नींद अच्छी हुई है, वे परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। शोधकर्ताओं ने इस मानसिक अवस्था को 'प्लेसबो स्लीप" नाम दिया है और यह भी माना है कि इसका हमारे मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
यह शोध 'जर्नल ऑफ एक्सपरिमेंटल साइकोलॉजी लर्निंग, मेमोरी एंड कॉग्नीशन" में प्रकाशित हुआ है। हालांकि इससे शरीर को क्या नकारात्मक परिणाम भुगतना पड़ सकता है, इस पर शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं। इसलिए यह नहीं मान सकते हैं कि यह नींद का पूरी तरह सेहतमंद विकल्प हो सकता है। 

दुनिया की सबसे गुस्सैल बिल्ली की मौत

लॉस एंजिल्स(एजेंसी)। इंटरनेट की दुनिया में बेहद लोकप्रिय बिल्ली कर्नल म्याउ की मौत हो गई है। पर्शियन-हिमालयन प्रजाति की यह बिल्ली सिर्फ दो साल की थी। फेसबुक के अलावा उसकी वेबसाइट और यूट्यूब चैनल पर उसे चाहने वालों की संख्या लाखों में है।
कर्नल म्याउ के फेसबुक अकाउंट को पसंद करने वाले लोगों की संख्या साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा है। उसे दुनिया की सबसे गुस्सैल बिल्ली कहा जाता था। इसके अलावा उसका फर भी बेहद खास था। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने उसे दुनिया की सबसे लंबे बालों वाली बिल्ली का खिताब दिया था।
बिल्ली की मौत की खबर उसके फेसबुक अकाउंट पर जारी की गई। हालांकि उसके मौत के कारणों का अब तक पता नहीं चल सका है। उसकी देखभाल करने वाले मौत के कारण जानने की कोशिश कर रहे हैं।  

विटामिन 'ई" का ज्यादा सेवन फेफड़ों के लिए नुकसानदायक

हाल ही एक शोध में विटामिन 'ई" के लिए अनुपूरक आहार के सेवन से बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं ने चूहों पर किए गए अपने अध्ययन में पाया कि ऑक्सीकरण रोधी पदार्थ के रूप में सर्वाधिक इस्तेमाल किए जाने वाले दो पदार्थों, जिसमें विटामिन 'ई" भी शामिल हैं, के कारण फेफड़े के कैंसर पर रोकथाम की बजाय यह बीमारी और तेजी से बढ़ती है।
अध्ययन के मुख्य लेखक तथा स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में आण्विक जीवविज्ञानी मार्टिन बर्गो और सह लेखक ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि इस शोध का मुख्य संदेश यह है कि ये ऑक्सीकरण रोधी पदार्थ कैंसर के खतरे को कम नहीं करते बल्कि कुछ तरह के कैंसर रोगों को कुछ हद तक बढ़ाने का काम ही करते हैं।
बर्गो ने अपने सहयोगी के साथ ऐसे चूहों पर यह शोध किया, जिन्हें जीन संबंधी परिवर्तन के जरिए फेफड़े के कैंसर से संक्रमित होने वाला बना दिया गया था। एक शोध पत्रिका के अंक में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार उन्होंने पहले चूहों को एन-एसीटिलसिस्टीन (एनएसी) नामक ऑक्सीकरण रोधी पदार्थ देने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने विटामिन 'ई" जैसा दूसरा सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला ऑक्सीकरण रोधी का प्रयोग चूहों पर किया। उन्होंने निर्धारित सीमा से पांच से पचास गुना अधिक तक ये पदार्थ चूहों को रोजाना दिए।
उल्लेखनीय है कि हम जो अनुपूरक आहार लेते हैं उसमें भी मनुष्य के लिए निर्धारित प्रतिदिन ली जाने वाली विटामिन 'ई" की मात्रा चार से 20 गुना  तक अधिक होती है। वैज्ञानिकों ने दोनों ऑक्सीकरण रोधी पदार्थों का प्रभाव एक जैसा पाया। फेफड़े की सामान्य समस्या से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए विटामिन-ई की अत्यधिक मात्रा वाले ये अनुपूरक आहार घातक परिणाम वाले हो सकते हैं।  वैज्ञानिकों ने इस तरह के रोगियों की विटामिन-ई के जरिए उपचार करने की सामान्य परिपाटी पर भी चिंता व्यक्त की।  

संगीत से मिल सकता है कैंसर मरीजों को लाभ

एक ताजा शोध के अनुसार कैंसर का इलाज करा रहे किशोरों और युवाओं को 'म्यूजकि थैरेपी" से लाभ मिल सकता है। यह शोध 'कैंसर जर्नल" में प्रकाशित हुआ है।
11 से 24 साल के बीच की उम्र वाले किशोरों और नौजवानों के एक समूह ने तीन हफ्तों में एक म्यूजिक वीडियो बनाया। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने इस दौरान इस समूह के अनुभवों का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस दौरान मरीजों की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि हुई और उनके परिवार एवं दोस्तों के साथ उनका संबंध भी बेहतर हुआ।
समूह के सभी मरीज हाई रिस्क स्टेम-सेल ट्रांसप्लांट चिकित्सा करा रहे थे। म्यूजिक वीडियो बनाने के लिए युवाओं को गीत लिखने, संगीत रचने और अपनी कहानी बनाने के लिए वीडियो इमेज इकट्ठा करने के लिए कहा गया।
*संबंधों में लाभ :
संगीत, उन तमाम कारकों में से एक है, जिनसे कैंसर का इलाज करा रहे लोगों को मदद मिलती है। एक म्यूजिक थेरैपिस्ट ने इस समूह की मदद की। थेरैपिस्ट ने समूह के लोगों को महत्वपूर्ण चीजों को पहचानने में मदद की। उन्होंने समूह के लोगों को अपने विचारों को सामने रखने में भी सहायता की।
इस समूह ने जब वीडियो बना लिया तो उसे 'प्रीमियरों" के जरिए अपने मित्रों एवं रिश्तेदारों के साथ साझा किया।
इस 'म्यूजिक थैरेपी" के सेशन के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि जिस समूह ने म्यूजिक वीडियो बनाया था वह प्रतिरोध क्षमता एवं इलाज का सामना करने के मामले में दूसरे समूह से बेहतर रहा, जिसने ऐसी चिकित्सा नहीं ली।
इस म्यूजिक थैरेपी के 100 दिन बाद भी समूह ने शोधकर्ताओं से कहा कि वे अपने परिवार के साथ बेहतर संवाद कर पा रहे हैं और अपने मित्रों से ज्यादा बेहतर तरीके से जुड़े हुए हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार 'म्यूजिक थैरेपी" उन कई उपायों में एक है, जिनसे किशोरों और वयस्कों को कैंसर के इलाज का सामना करने में मदद मिलती है।
इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता इंडियाना स्कूल ऑफ नर्सिंग के डॉक्टर जॉन हासे के अनुसर बचाव के इन उपायों से किशोरों और वयस्कों को बीमारी के इलाज का सामना करने में मदद मिलती है, उनमें आशा का संचार होता है और कैंसर के बावजूद जीवन का एक अर्थ प्राप्त होता है।
* क्या संगीत में खास :
डॉक्टर हासे कहते हैं कि किशोर और युवा लोग जिनमें प्रतिरोध क्षमता थी उनमें अपनी बीमारी से ऊपर उठ सकने की क्षमता भी थी। उन्हें कैंसर का सामना करने का भरोसा और कौशल हासिल हुआ। इन लोगों में दूसरों से जुड़ने और मदद करने की इच्छा का भी विकास हुआ।
शोधकर्ताओं ने जब इन मरीजों के अभिभावकों से बात की तो उन्हें पता चला कि इस वीडियो से अभिभावकों को भी कैंसर को लेकर अपने बच्चों के अनुभवों के बारे में एक लाभदायक अंतरदृष्टि मिली।
इस शोध में काम करने वाले म्यूजिक थैरेपिस्ट शेरी रॉब बताती हैं कि संगीत आखिर क्यों युवाओं को प्रेरित करने में विशेष तौर पर लाभदायक है।
वे कहती हैं कि जब बाकी सब कुछ अनिश्चित हो तो ऐसे में उनके जाने-पहचाने गाने उनके लिए अर्थवान साबित होते हैं।  वे इन गानों से जुड़ाव महसूस करते हैं।  

समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों में दमे का खतरा

समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका रहती है लेकिन हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में अस्थमा का खतरा भी हो सकता है। शोध की मानें तो समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे यानी प्रीमैच्योर बेबीज् को दमा का खतरा अधिक होता है।
ब्रिटेन की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी और नीदरलैंड के मैस्ट्रिच यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर यह दावा किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विद्याभ्यास से पूर्व के शिशुओं और स्कूल जाने वाले बच्चों में दमा विकसित होने के लक्षण समान होते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक यह समझना महत्वपूर्ण है कि समय पूर्व जन्मे बच्चों में दमे का खतरा क्यों होता है क्योंकि बचपन में होने वाले दमा को जल्द ठीक किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि चिकित्सकों और माता-पिता को समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों में दमा के बढ़ते खतरों के प्रति जागरूक होने की जरूरत है, ताकि शीघ्र उपचार और बचाव संभव हो सके। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि समय से पूर्व जन्में बच्चों पर नजर रखकर और इलाज के तरीके में बदलाव लाकर हम भविष्य में होेने वाली दमा सहित सांस की गंभीर बीमारियों के खतरों को कम कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हमारे परिणाम, समय से पूर्व जन्मे बच्चों में दमा और दमे जैसी बीमारियों से बचाव करने और उनके उपचार में मदद करेंगे।  

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के बाद का भार

घुटने की बढ़ती तकलीफ के मद्देनजर नी रिप्लेसमेंट सर्जरी कई लोगों के लिए शानदार विकल्प बनकर उभरी है। इस सर्जरी ने न केवल कई सारे लोगों को फिर से अपने पैरों पर खड़े होने की ताकत दी है बल्कि लोग दिनचर्या में होने वाली कठिनाई और दर्द से भी निजात पा सके हैं। मगर इसका एक पहलू और भी हैं। पिछले दिनों एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि इस सर्जरी के बाद कई लोगों का वजन बढ़ जाता है और इसकी वजह रोगी खुद ही होता है।
अध्ययन का कहना है कि असल में सर्जरी के पहले रोगी काफी हद तक दर्द की आदत बना चुका होता है। साथ ही वह रोजमर्रा के कामों और गतिविधियों में भी खुद को काफी नियंत्रित कर चुका होता है। ऐसे में सर्जरी के बाद जब उसे दर्द में राहत मिल जाती है और वह आराम से चल-फिर सकने की हालत में होता है, तब भी वह खुद को इस नियंत्रण से बहुत ज्यादा बरी नहीं कर पाता और ना ही अपनी पुरानी आदतों को बदलता है। नतीजा जहां वह नियमित एक्सरसाइज करके फिट रह सकता है लेकिन वह ऐसा नहीं करता और उसके वजन में वृद्धि होने लगती है। इसलिए डॉक्टर्स नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के बाद कई सारे व्यायाम बताते हैं, जिनका पालन मरीज अस्पताल तक तो करता है लेकिन घर आकर उन्हें भूल जाता है। इस वजह से सर्जरी के बाद चार-पांच सालांे के भीतर ही मरीज अपना वजन बढ़ा लेता है और उसके हृदय रोग, डायबिटीज जैसी बीमारियों से ग्रस्त होने या इन बीमारियों से होने वाले खतरों की आशंका बढ़ जाती है। साथ ही वह फिर से चलने-फिरने में मुश्किल और दर्द भी महसूस कर सकता है। यह सर्जरी घुटनों के जवाब दे जाने पर अपनाए जा सकने वाले सबसे अच्छे विकल्पों में से एक हो सकती है, बशर्ते आप खुद इसका पूरा फायदा उठाना जानते हों।  

ब्रेकफास्ट कीजिए, स्वस्थ रहिए...

लंदन (प्रे)। स्वस्थ रहने के लिए हमेशा से खान-पान पर ध्यान दिए जाने की हिदायत दी जाती है। मगर ज्यादातर लोग इसबारे में उदासीन रहते हैं, जिसका खामियाजा स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आता है। हाल ही एक शोध में इस बात के लिए सावधान किया गया है कि जो किशोर बहुत खराब या काफी लंबे समय के अंतराल में ब्रेकफास्ट करते हैं, उनमें मेटाबोलिक सिंड्रोम विकसित होने की आशंका ज्यादा होती है। मेटाबोलिक सिंड्रोम में कई तरह की हेल्थ प्रॉब्लम्स एक साथ हो सकती हैं जैसे-हार्ट अटैक, स्ट्रोक और डायबिटीज।
स्वीडन की उमिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो किशोर बेहद पुअर ब्रेकफास्ट लेते हैं उनमें वयस्क अवस्था में या यूं कहें कि तकरीबन 25 साल बाद तक कई तरह की समस्याएं घेर लेती हैं। इस शोध में पाया गया कि प्रारंभिक उम्र से जो किशोर ब्रेकफास्ट ठीक तरह से नहीं लेते, उन्हें बढ़ती उम्र के साथ कई तरह की स्वास्थ्यगत समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह अध्ययन 'जर्नल पब्लिक हेल्थ न्यूट्रीशन" में प्रकाशित हुआ है।
*ब्रेकफास्ट कैम्पेन :
ब्रेकफास्ट स्वास्थ्य के लिए कितना जरूरी है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड की कई हस्तियों ने मिलकर पिछले दिनों मुंबई में 'ब्रेकफास्ट कैम्पेन" की शुरुआत की थी। जिसका मकसद लोगों को नाश्ते को लेकर जागरूक करना है ताकि वे लंबे समय तक भूखे रहने से बच सकें और किसी तरह की बीमारियों की चपेट में न आए।  

इनके लिए रोना भी है फायदेमंद

कई बार बच्चों के रोने की वजहें पता ही नहीं चल पाती हैं। ऐसे में उन्हें क्या दिक्कत होती है, यह घर में हर किसी के लिए अनसुलझी पहेली की तरह हो जाता है। लेकिन आपको जानकर अचरज होगा कि रोने की वजह बच्चों के लिए सिर्फ परेशानी ही नहीं है बल्कि सेहत के लिए इसके कई फायदे भी हैं।
बच्चों का रोना उनके शारीरिक और मानसिक विकास का जरूरी हिस्सा है। बच्चों के लिए रोना क्यों जरूरी है, जानिए इसके रोने के फायदे।
* पहली बार क्यों रोता है शिशु :
पहली बार बच्चों का रोना न सिर्फ सेहतमंद तरीके से प्रजनन का संकेत है बल्कि रोने के साथ-साथ उनके फेफड़े भी सांस लेने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। यानी पैदा होने के बाद जब पहली बार बच्चा रोए तो मान लें कि ऑल इज वेल।
* मांसपेशियों की कसरत :
रोते हुए बच्चों को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो उसकी मांसपेशियों को तना हुआ पाएंगे। दरअसल रोने के दौरान बच्चों की मांसपेशियों की कसरत होती है, जिससे उनके शरीर का लचीलापन बढ़ता है और मांसपेशियां मजबूत होती हैं।
* संचार का माध्यम :
बच्चा अगर न रोए तो उसकी जरूरत को समझना कितना मुश्किल हो सकता है, इसका अंदाजा लगाकर देखिए। कई बार किसी असुविधा को जाहिर करने या आपका आकर्षण पाने के लिए बच्चे रोते हैं और आपके ध्यान देने पर वे अपने आप सामान्य हो जाते हैं।
* मानसिक विकास में मददगार :
बच्चों का रोना और आपका उसे चुप कराना उसके मानसिक विकास के लिए भी जरूरी है। इससे उसे सुरक्षित होने का अहसास मिलता है और वह मानसिक तौर पर महफूज महसूस करता है। 

कैसे करें नन्हे-मुन्नाों की आंखों की हिफाजत

शरीर के सबसे खास और नाजुक अंगों में होती हैं आंखें। अगर इनका खयाल न रखा जाए तो छोटी-सी परेशानी जिंदगीभर की तकलीफ बन सकती है। छोटे बच्चों की आंखें ज्यादा संवेदनशील होती हैं, इसलिए उन्हें लेकर ज्यादा सावधानी बरतना जरूरी है।
आइए जानते हैं नवजात बच्चों की आंखों में पाई जाने वाली बीमारियां कौन-कौन सी और उसका इलाज क्या है।
* आंख का इंफेक्शन :
नवजात बच्चों में जन्म के तीन से चार हफ्ते के अंदर जन्मजात इंफेक्शन हो सकता है, जिसे 'ऑप्थेलमिया नियोनेटोरम" कहते हैं। यह बच्चों के जन्म के समय होने वाली लापरवाही के कारण होता है। बच्चों की आंख से पानी आना, आंख का चिपकना, आंख की पलकों पर सूजन आना, आंख का लाल होना इसके लक्षण हो सकते हैं। डाक्टर के परामर्श से ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी-बायोटिक आई ड्रॉप डालने और आंख की सफाई रखने से यह इंफेक्शन ठीक हो जाता है।
* कॉर्निया का इंफेक्शन :
आंख के बीच में गोलाकार काले रंग का दिखने वाला भाग कॉर्निया कहलाता है। यह पारदर्शी होता है। इसमें इंफेक्शन होने पर इसकी पारदर्शिता खत्म हो जाती है और इसके पीछे आइरिस दिखाई नहीं पड़ती। आंख की पुतली पर इन्फेक्शन आंख के लिए घातक होता है। इसमें आंख में दर्द, आंख का चिपकना और लाल होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। इस स्थिति में फौरन डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। कॉर्निया का इंफेक्शन गंभीर समस्या है। इसमें देरी करने पर आंख की पुतली पर घाव होने की आशंका रहती है। इससे आंखों की रोशनी भी जा सकती है।
* बंद हो जाती है आंसू नली :
आंख के भीतर से आंसू की एक नली नाक के नीचे के हिस्से में खुलती है। इस नली को नेजोलेक्राइमल डक्ट कहते हैं। इस नली के द्वारा आंख में लगातार बनने वाले आंसू नाक के रास्ते से गले में लगातार जाते रहते हैं। जब यह नली बंद हो जाती है, तो बच्चों की आंख से लगातार पानी बाहर गिरता रहता है, जिससे आंख में इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है और आंख चिपकने लगती है। कंजंक्टिवाइटिस बीमारी जल्दी-जल्दी होने लगती है।
यह बीमारी आमतौर पर जन्म के एक हफ्ते बाद देखने को मिलती है। इसमें बच्चों की नाक के दोनों तरफ दिन में तीन से चार बार आंसू की नली के ऊपर मालिश करते हैं और आई ड्रॉप का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा करने पर ज्यादातर बच्चों में यह समस्या ठीक हो जाती। तीन-चार महीने में जिन बच्चों में यह समस्या ठीक नहीं होती है, उनका एक छोटा-सा ऑपरेशन होता है, जिससे यह नली खुल जाती है। यह जन्मजात बीमारी है।
पैदा होने के बाद पहले महीने में बच्चों में आंसू नहीं बनते इसलिए इस बीमारी का पता तीसरे महीने के पास आते-आते ही लगता है, जब आंसू बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक आम समस्या है और जन्म के समय करीब 20 फीसद बच्चों में यह पाई जाती है।  

इनसे हो सकती है डाइटिंग बेअसर

ऐसे कई कारण हैं जब कुछ लोगों के लिए डाइटिंग काम नहीं करती है। इनमें से कुछ कारण डाइटिंग की मूल अवधारणा में होते हैं। अगर आप नियमित रूप से कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करना चाहते हैं तो आप में ज्यादा शक्ति होना चाहिए। लेकिन हममें से ज्यादातर लोगों के पास न ही समय होता है और न ही ऊर्जा। आइए जानते हैं कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारण जिसकी वजह से आपका वजन कम नहीं हो रहा है, वह भी डाइटिंग करने के बावजूद।
* बहुत ज्यादा व्यस्त होना :
डाइटिंग के असर न करने का मुख्य कारण यह है कि ज्यादातर लोग बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हंै और खान-पान के नियम का स्थाई रूप से अनुसरण नहीं कर पाते। ज्यादातर प्रोग्राम के लिए नियमित योजना की जरूरत होती है। ऐसे में हम कई बार डाइटिंग को बरकरार नहीं रख सकते।
* जरूरत से ज्यादा खाना :
धीरे-धीरे खाएं और भूख लगने की निशानियों पर ध्यान दें। अपने शरीर की जरूरतों का ध्यान रखें और अपने वजन को बनाए रखें।
* इच्छाशक्ति चाहिए :
लाइफस्टाइल में बदलाव नहीं डाइटिंग के लिए जरूरी है कि आप नियमों का सख्ती के साथ पालन करें। इसके लिए बहुत ज्यादा इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। हममें से ज्यादातर लोगों में इसका अभाव देखने को मिलता है। अगर आप डाइटिंग में सफल होना चाहते हैं और स्वस्थ रहना चाहते हैं तो आपको तयशुदा नियमों का पालन तो करना होगा।
* भूखे रहना नहीं है उपाय :
डाइटिंग के लिए एक खास किस्म का पैटर्न प्रचलन में है। इसमें एक दो हफ्ते का इंडक्शन फेज होता है। आमतौर पर इस फेज में भोजन बिल्कुल भी नहीं लिया जाता है। बेशक इससे आपका वजन कम होगा, मगर इस प्रक्रिया में आप बीमार भी पड़ सकते हैं। वहीं जब आप धीरे-धीरे भोजन की मात्रा बढ़ाना शुरू करेंगे तो वजन का फिर से बढ़ जाने का खतरा बना रहेगा। आप अपने आपको किसी भी चीज से जबरन वंचित न करें। जहां तक हो सके अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
* खाना आनंददायक होता है :
अपने पसंदीदा भोजन को पूरी तरह से छोड़ने की बजाय उसे सोच-समझ कर खाएं। दूसरी बात यह है कि जब किसी भोजन को खाने के बाद उसका स्वाद बहुत अच्छा न लगने लगे तो उसे खाना बंद कर दें। बिना उद्देश्य के भोजन का सेवन न करें। इससे आपको जल्द ही कुछ बदलाव नजर आने लगेंगे।
* भोजन का आनंद भी लें :
इसे नियंत्रित भी करें और साथ ही यह सीखने की कोशिश भी करें कि कैसे भोजन का आनंद लेकर भी इसे नियंत्रित किया जा सकता है। जल्द ही आप यह पाएंगे कि आपने अपनी जिंदगी को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर लिया है। 

ऐसे रखें फर्नीचर का खयाल

मॉडर्न किचन की बात हो या फिर बेडरूम की, अब वुडन फर्नीचर हर कमरे की शान बन चुके हैं। अलमारी और दराज ही नहीं लकड़ी के बने डिजाइनर मल्टी यूज शोकेस भी घर की खूबसूरती का अहम हिस्सा बन चुके हैं। यही कारण है कि लोग वुड वर्क पर दिल खोलकर खर्च करने लगे हैं। घर की खूबसूरती की बात है, तो जाहिर है कोई समझौता नहीं करना चाहेगा। ढेर सारा खर्च करके पूरे घर में वुड वर्क तो करा दिया, लेकिन अब इसकी केयर के बारे में भी तो सोच लें।
*केबिनेट पर चिकनाई नहीं :
अलमारी या सोफे को चमकाने के लिए फर्नीचर वैक्स का इस्तेमाल न करें। इस चिकनाई की वजह से धूल-मिट्टी चिपकती रहती है, जिससे आपका फर्नीचर चमकने के बजाय खराब होने लगता है। इसलिए अपनी अलमारी आदि को चिकनाई से दूर रखें। बेकिंग सोडा में पानी मिलाकर गाढ़ा-सा घोल बना लें। अब इस घोल को दाग लगे हुए स्थान पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़े। फिर उसे हल्के से पोंछ दें।
-फर्नीचर पर जमे तेल को हटाने के लिए बराबर-बराबर मात्रा में अमोनिया और गर्म पानी लें और एक स्पंज उसमें डुबोकर एक्स्ट्रा पानी निकालें और चिकनाई को पोंछें। उसके तुरंत बाद ही किसी सूखे कपड़े से फर्नीचर को पोंछ दें, ताकि वो नमी न सोख पाएं।
-घर में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर फर्नीचर वॉर्निश वुड के होते हैं, इसलिए इनको धूल और गंदगी से दूर रखना जरूरी है। इन्हें वेक्यूम क्लीनर या सूखे और नर्म कपड़े से साफ करते रहें। लकड़ी के फर्नीचर को पानी या अन्य लिक्विड जैसे अल्कोहल, खाने की चीजें आदि से बचाएं। पानी या अन्य लिक्विड लकड़ी के फर्नीचर पर दाग बनाते हैं।
-महीने में एक बार नीबू के रस से सफाई करने से भी फर्नीचर में नई चमक आ जाती है। पुराने फर्नीचर को आप मिनरल ऑयल से पेंट करके भी नया बना सकती हैं।
अगर संभव हो, तो वुडन फर्नीचर को हर साल वैक्स्ड या वॉर्निश करवाएं। इससे फर्नीचर नमी नहीं सोखता है।
* किचन की हो नियमित सफाई :
-अगर सही तरीके से किचन में लगे केबिनेट की सफाई करें और तुरंत फैली हुई गंदगी को साफ करें, तो इस पर गंदगी लंबे समय तक टिक नहीं पाती। इसलिए सूखे कपड़े से रोज लकड़ी के केबिनेट को साफ करें।
-खाना बनाते समय किचन में चिमनी या एग्जॉस्ट फैन जरूर यूज करें। इससे किचन में केबिनेट पर चिकनाई नहीं जमेगी। केबिनेट के बाहरी हिस्से को साफ तो करें ही, साथ ही हर छह महीने में दराज की भी सफाई करें। सामान को हटाकर हर शेल्फ को शैंपू मिले पानी में तौलिया भिगोकर पोंछे। इसके तुरंत बाद सूखे कपड़े से इसे पोंछकर सुखा दें।
-केबिनेट को महक से बचाना हो, तो हर केबिनेट में बेकिंग सोडा को एक छोटे से डिब्बे में बंद करके रखें, ताकि हमेशा ताजी खुशबू मिले।
* ताकि दरवाजे से आवाज न आए :
सर्दियों में नमी की वजह से दरवाजों से आवाज आती है। दराज की स्लाइडिंग में भी भारीपन आने लगता है। आपके केबिनेट से चरचराने की आवाज आ रही हो, तो कॉटन में सरसों या तारपीन का तेल डुबोकर स्लाइडिंग को पोंछ दें, लेकिन पेट्रोलियम वाले प्रोडक्ट से दूर रहें। 

स्तन कैंसर के इलाज के बाद योगाभ्यास फायदेमंद

न्यूयॉर्क (एजेंसी)। एक श्ाोध में पता चला है कि स्तन कैंसर के उपचार के बाद यदि नियमित तौर पर कम से कम तीन महीने तक योगाभ्यास किया जाए तो थकान और सूजन में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
अमेरिका की ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोरोग और मनोविज्ञान के प्रोफेसर जेनिस कीकाल्ट-ग्लासेर का दावा है कि कुछ महीनों तक नियमित योगाभ्यास से स्तन कैंसर से ठीक हुए लोगों को काफी लाभ मिल सकता है। यही नहीं यह थकान और सूजन से पीड़ित लोगों के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। 'क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी जर्नल" में प्रकाश्ाित श्ाोध के मुताबिक इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए श्ाोधकर्ताओं ने दो सौ लोगों से छोटे-छोटे समूहों में 12 सप्ताह तक हफ्ते में दो दिनों तक योगाभ्यास करने को कहा। जबकि महिलाओं के एक समूह को सामान्य दिनचर्या जारी रखने और योगा नहीं करने के लिए कहा गया।
*क्या निकला निष्कर्ष :
श्ाोध से पता चला कि जिन महिलाओं ने नियमित योगाभ्यास किया उनमें थकान की समस्या में 57 फीसद की कमी और सूजन 20 फीसद तक घट गई। इसमें श्ाामिल होने वाली सभी महिलाएं श्ाोध के पहले ही स्तन कैंसर उपचार से गुजर चुकी हैं। 

साफ हो जाएगा पेस्ट से जुड़ा मिथक!

टूथपेस्ट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। दिन की शुरुआत इसी से होती है। बाजार बढ़ने के साथ ही टूथपेस्ट की इतनी किस्में आ चुकी हैं कि आप अपनी सुविधा और स्वाद के लिहाज से इसका चयन कर सकते हैं। लेकिन क्या आपने भी टूथपेस्ट खरीदने से पहले उसे  पलटकर ये देखा है कि उसके पीछे कैसे रंग का निशान है? नहीं, तो फिर इन बातों को भी जान लीजिए-
* हर टूथपेस्ट पर होता है एक निशान :
शायद ही आपने गौर किया हो लेकिन खाने-पीने की चीजों की ही तरह टूथपेस्ट पर भी सूचक रंग होते हैं। जैसे मांसाहारी खाने पर लाल स्पॉट होता है और शाकाहारी पर हरा वैसे ही टूथपेस्ट पर भी निशान होते हैं।
* कैसे होते हैं ये निशान? :
आप सोच रहे होंगे कि इससे पहले  ऐसे किसी निशान को तो कभी नहीं देखा, तो आपको बता दें कि टूथपेस्ट के बिल्कुल निचले हिस्से पर पीछे की ओर ये मार्क होते हैं। जो, लाल, हरे और काले रंग के होते हैं। कई लोग इन्हें 'कलर स्क्वॉयर" कहते हैं लेकिन असल में यह आई मार्क होते हैं। आमतौर पर इसे टूथपेस्ट में रसायन की मात्रा से जोड़कर देखा जाता है, पर सचाई कुछ और ही है।
* क्या सोच है लाल और हरे रंग को लेकर?
लोग ऐसा सोचते हैं कि जिन टूथपेस्ट में पीछे की ओर लाल रंग का आई मार्क होता है, वह यह दर्शाता है कि उस टूथपेस्ट में केमिकल की मात्रा अधिक और प्राकृतिक तत्वों की मात्रा कम है। जबकि आई मार्क अगर हरा है तो वह पूरी तरह से प्राकृतिक है।
* काले/नीले रंग का मतलब?
लोगों को लगता है कि अगर आपके टूथपेस्ट में आई मार्क काले रंग का है तो इसका मतलब यह है कि आपका टूथपेस्ट पूरी तरह से रासायनिक है। मगर सचाई कुछ और ही है। हालांकि आई मार्क को लेकर मतभेद हैं। एक ओर जहां लोग इसे रसायन और प्राकृतिक तत्वों की मात्रा से जोड़कर देखते हैं वहीं असल में ये पैकिंग के दौरान लगाई जाने वाली एक पहचान है। ताकि उत्पाद टूथपेस्ट को पहचान मिल सके कि वह कहां बना है और उसकी उचित श्रेणी बताई जा सके।  

तांबा दिलाता है घातक संक्रमण से राहत

तांबे के फायदों के बारे में तो सभी लोग जानते ही हैं लेकिन हाल ही में तांबे की मदद से प्रसव के बाद हुई सर्जरी के कारण एक महिला में फैले संक्रमण को ठीक कर कमाल का उदाहरण पेश किया गया है।
दरअसल ब्रिटेन के सरी शहर की 30 वर्षीय एक महिला गेमा के शरीर में अपने पहले बच्चे को जन्म देते समय संक्रमण फैल गया था। शिशु का जन्म सिजेरियन हुआ जिस कारण महिला के जख्म ड्रग प्रतिरोधी सुपरबग एमआरएसए से संक्रमित हो गए। संक्रमण के कारण जख्म काफी गंभीर हो गए और उनमें बदबू आने लगी थी। इस संक्रमण को दूर करने के लिए काफी मेहनत व पैसा खर्च किया गया लेकिन ज्यादा लाभ नहीं हुआ। गेमा ने बताया कि कुछ समय पहले ही 5 हजार रुपए में खरीदे एक पायजामे को पहनकर उनके जख्म पूरी तरह से भर गए। दरअसल फैब्रिक से बने इस पायजामे में तांबे के धागों का प्रयोग किया गया है। साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बिल केविल इस संदर्भ में बताते हैं कि कपड़े में तांबे की मौजूदगी भी विषाणुओं को मारने में सक्षम होती है।
*सदियों से हो रहा है प्रयोग :
विषाणुओं को दूर करने के लिए तांबे का प्रयोग सदियों से चला आ रहा है। प्राचीन मिस्रवासी जख्मों की मरहम-पट्टी के लिए तांबे का प्रयोग किया करते थे। यही नहीं रोम और यूनान के नाविक भी पानी को सड़ने से बचाने के लिए उसमें तांबे का सिक्का डालकर रखते थे।
आज भी पानी को शुद्ध रखने के लिए तांबे के बर्तन में रखने में हिदायत दी जाती है। इसके अलावा कई घरों में आज भी तांबे के बर्तनों का उपयोग विशेषकर इसलिए ही किया जाता है ताकि बीमारियों से दूर रहा जा सके।  

सर्दियों में चाहिए बालों को एक्स्ट्र्रा पोषण

अमूमन सर्दियों में ठंड की वजह से हम बालों की प्रॉपर केयर नहीं कर पाते हैं। इस कारण से इन दिनों बालों से संबंधित समस्याएं ज्यादा होती हैं। जैसे बालों में रूखेपन की समस्या, रूसी और दोमुंहे बाल। लेकिन क्या आप चाहते हैं कि आपके बाल भी ठंड से ऐसे ही बेहाल हों। अगर नहीं, तो बालों की सुरक्षा का इंतजाम अभी से ही करना शुरू कर दें।
*साफ-सफाई से न करें परहेज :
सर्दियों में सबसे पहले बालों को हाइजीन फ्री करना जरूरी होता है। सप्ताह में कम-से-कम एक या दो बार शैंपू जरूर करें। लेकिन बालों को बार-बार धोने से बचें, क्योंकि इससे प्राकृतिक तेल की जगह कृत्रिम तेल बालों को कवर कर लेता है और इससे स्कैल्प में खुजली अथवा रूसी की समस्या हो सकती है। गर्म पानी से नहाने या बाल धोने से बचें। गर्म पानी से आपके बालों को नुकसान पहुंच सकता है। बालों को धोते समय ठंडे या हल्के गर्म पानी का इस्तेमाल करें। सर्दियों में बाल रूखे और बेजान हो सकते हैं, इसलिए ठंड की समस्याओं से बचने के लिए डीप कंडिशनिंग जरूरी है। बालों को धोने के बाद लीव-इन-हेयर कंडिशनर भी बालों में लगाया जा सकता है। इससे आपके बाल सीधे एवं चमकदार बने रहते हैं।
* बालों को सुखाते वक्त रखें ध्यान :
 गीले बालों को सुलझाते समय चौड़े दांतों वाले कंघे का यूज करें। लेकिन ध्यान रखें, गीले बालों में बहुत अधिक कंघी करने से टूटने का डर अधिक होता है। इसलिए ज्यादा कंघी करने से बचें। गीले बालों को सुखाने के लिए ब्लो ड्रायर्स का इस्तेमाल करने से बचें। हां, मुलायम तौलिए से बालों को हल्का रगड़ते हुए पोछा जा सकता है। बाल बनाते समय हेयर स्प्रे का कम-से-कम इस्तेमाल करें। इन दिनों आप बालों पर स्टाइलिंग टूल्स का जितना कम इस्तेमाल करेंगी, आपके बाल उतने अधिक सेहतमंद बने रहेंगे।
* बालों के लिए ये ट्रिक्स :
स्कार्फ या कैप पहनना ठंड से ही आपको नहीं बचता, बल्कि ठंड से बालों की सुरक्षा भी करता है। इससे आपके बाल टूटते भी नहीं हैं और दोमुंहे भी नहीं होते। लेकिन कैप कभी भी टाइट न पहनें, ताकि स्कैल्प में खून का संचार बना रहे।
अगर आप नॉन-वेजिटेरियन हैं, तो अंडे का सेवन बालों के लिए सही रहेगा। अंडे का प्रोटीन बालों को मजबूत, शाइनी और हेल्दी बनाता है। सर्दियों में बालों को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है। अंडे के अलावा आप मछली, मीट आदि खा सकते हैं। अगर आप वेजिटेरियन हैं, तो राजमा, सोयाबीन को अंकुरित करके खा सकते हैं।
शैंपू करते समय स्कैल्प को लगभग पांच मिनट तक अंगुलियों से मसाज करें। इससे ब्लड सर्क्युलेशन बढ़ता है। इससे बालों में ग्रोथ अच्छी होती है और बाल घने भी होते हैं।
सर्दियों में बालों के लिए हेयर मास्क भी अच्छा रहता है। अगर आपके बाल ड्राई हैं, तो रात में सोने से पहले जैतून या नारियल के तेल को हल्का गर्म कर बालों में मसाज करें। इससे बालों में नमी बनी रहती है और बाल मजबूत भी होते हैं। 

इंसुलिन का सही इस्तेमाल कैसे करें

कई बार नियमित इंसुलिन का डोज लेने के बावजूद ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण से बाहर रहता है। गलतफहमी में लोग इसे बेअसर मान लेते हैं और इंसुलिन का इस्तेमाल ही बंद कर देते हैं। ऐसे में समस्या और गंभीर हो जाती है।
इंसुलिन खरीदते वक्त यह सुनिश्चित कर लें कि वह सही है या नहीं। हालांकि इसे देखकर असली-नकली का पता लगाना मुश्किल है। कई बार हम इंसुलिन के रंग से उसके असली-नकली होने का अंदाजा लगा सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए किसी अधिकृत केमिस्ट से ही इसे खरीदें और इसका बिल लें। इसके साथ ही यह भी जांच लें कि इंसुलिन के स्टोरेज में तापमान के मानक का ध्यान रखा गया है या नहीं। इसकी क्वालिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए।
* क्या रखें सावधानी :
केमिस्ट की दुकान से घर तक लाने और घर में इसे स्टोर करने में भी तापमान का ध्यान रखना जरूरी है। कई बार लोग इसे स्कूटर पर दूर-दूर से गर्मी में लेकर आते हैं या गाड़ी में इंसुलिन रख लेते हैं। पार्किंग में धूप में गाड़ी खड़ी रहने से इंसुलिन खराब हो जाती है। सही तापमान मेनटेन न होने से भी इंसुलिन का असर कम हो जाता है और इस्तेमाल के बावजूद आपकी समस्या बढ़ती रहती है। डायबीटीज को नियंत्रण में रखने के लिए डॉक्टर की सलाह पर इंसुलिन लेने से हिचकिचाएं नहीं, क्योंकि इसके बिना आपकी समस्या बढ़कर किडनी, लिवर, आंखों और हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगों को अपनी चपेट में ले सकती है और आपका जीवन मुश्किल में डाल सकती है।
* किसे पड़ती है इंसुलिन की जरूरत :
शुगर के वे मरीज, जिनको दिल की बीमारी हो या लकवा का अटैक हो चुका हो, आंखों की बीमारी हो, इंफेक्शन हो, टीबी हो या ऑपरेशन होनेवाला हो। डायबीटीज से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को। जब दवाओं से डायबीटीज कंट्रोल में न आ रहा हो। किसी वजह से मरीज सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता है तो मरीज को दो इंजेक्शन एक साथ कभी भी नहीं लगाने चाहिए। कभी मरीज को लगता है कि आज खाने पर कंट्रोल नहीं हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा बढ़ा सकता है।
* इंसुलिन लेने का सही तरीका :
- डायबीटीज के मरीज सिरिंज और इंसुलिन की शीशी के बजाय इंसुलिन पेन का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।
- इंसुलिन का इंजेक्शन हमेशा खाने से पहले लगाना चाहिए। सुबह नाश्ता करने से और रात में डिनर करने से 15-20 मिनट पहले इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना चाहिए। दो इंजेक्शनों के बीच 10-12 घंटों का फासला होना जरूरी है। खाने के एकदम साथ न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। इंसुलिन को ठंडी और साफ जगह पर रखें। 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

चेहरे पर छह नहीं महज चार भाव ही आते हैं

लंदन, प्रेट्र : आम धारण्ाा के विपरीत मनुष्य के चेहरे पर छह नहीं महज चार भाव ही आते हैं। हालिया श्ाोध के तहत यह दावा किया गया है। अब तक समझ्ाा जाता रहा है कि मनुष्य अपने चेहरे की भाव भंगिमाओं के जरिए खुश्ाी, दुख, भय, गुस्सा, आश्चर्य और अप्रसन्न्ता के भावों को प्रकट कर सकता है।
डॉक्टर पॉल एक्समन के मुताबिक, दुनियाभर में समान रूप से पहचाने जाने वाले छह तरह के भाव हैं, जिन्हें चेहरे की कुछ खास भाव भंगिमाओं के जरिए पेश्ा किया जाता है। इन पर धर्म, भाषा और संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ता। जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो ने इस सूची को छह से घ्ाटा कर चार कर दिया है। श्ाोधकर्ताओं ने भय और आश्चर्य के भावों को एक साथ मिलाने का फैसला किया है क्योंकि इन दोनों ही भावों में आंखें फैल जाती हैं। वहीं गुस्से और अप्रसन्न्ता के भावों में नाक सिकुड़ जाती है और इस पर झ्ाुर्रियां आ जाती हैं।
यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है जिसमें विभिन्न् हरकतों और भावों के प्रदशर््ान के दौरान चेहरे की विभिन्न् मांसपेश्ाियों का अध्ययन किया गया। इसके लिए एक अनोखे जनरेटिव फेस ग्र्रामर प्लेटफॉर्म की मदद ली गई। श्ाोधकर्ताओं के मुताबिक, खुश्ाी और गम के समय चेहरे पर आने वाले भाव एक दूसरे से बिल्कुल अलग होते हैं। जबकि भय और आश्चर्य, गुस्से और अप्रसन्न्ता के भाव बिल्कुल एक जैसे ही होते हैं। जनरेटिव फेस ग्र्रामर प्लेटफार्म के तहत विभिन्न् भाव भंगिमाओं में चेहरे की थ्रीडी फोटो ली जाती है और उसका अध्ययन किया जाता है। यह श्ाोध जर्नल करंट बायोलॉजी में प्रकाश्ाित हुआ है। 

जब भेड़ से बड़े चूहे घूमेंगे पृथ्वी पर

लंदन, प्रेट्र : भविष्य में भेड़ या इससे भी बड़े आकार के चूहे पृथ्वी पर घूम सकते है। इन्हें बड़े स्तनपायियों के लुप्त होने का लाभ मिलेगा। इन चूहों का वजन 50 से 80 किग्र्रा तक हो सकता है। हाल ही में श्ाोधकर्ताओं ने यह अनुमान लगाया है।
ब्रिटेन की लीसेस्टर यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं के मुताबिक, ईको स्पेस (पारिस्थितिकीय क्षेत्र) में बदलाव के कारण्ा चूहों का आकार लगातार बढ़ता चला जाएगा। बड़े स्तनपायियों के लुप्त होने से इनकी संख्या बड़ी तेजी से बढ़ेगी। यूनिवर्सिटी में भू-विज्ञान विभाग के डॉक्टर जान जालाविक के मुताबिक, लोगों को अपने आस पास चूहे देखने की आदत हो चुकी है। भविष्य में इनका वैश्विक प्रभाव बढ़ेगा। इस समय तक चूहों का आकार भेड़ या इससे भी बड़ा हो सकता है।
जालाविक ने कहा, 'चूहे अपने आस पास के माहौल के हिसाब से आसानी से ढल जाते हैं। ये दुनियाभर के ज्यादातर द्वीपों पर पाए जाते हैं। ये ऐसे द्वीपों पर भी फैल गए हैं जहां ये पहले नहीं थे। चूहों ने अन्य प्रजातियों के जानवरों की संख्या को भी कम कर दिया है। इससे ईकोस्पेस में उनके लिए स्थान बढ़ता जा रहा है। इससे निकट भविष्य में उनका आकार बड़ी तेजी से बढ़ सकता है। 

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

बेगुण नहीं होते बैंगन

खाने में बैंगन को अगर आप सिर्फ स्वाद के लिहाज से पसंद करते हैं और इसे बादी मानकर डाइट में शामिल करने से बचते हैं तो इसके फायदे जरूर जानें। जानिए, बैंगन के ऐसे फायदों के बारे में जो सेहत से जुड़ी आपकी कई समस्याओं को दूर करने में मददगार हो सकते हैं।
* संक्रमण से दूर रखता है :
बैंगन में एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में होते हैं। इसमें मौजूद क्लोरोजेनिक एसिड शरीर को रोगों से दूर रखता है और प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है। यू कहें कि बैंगन का सेवन करने वाले लोगों को संक्रमण होने की आशंका कम होती है। इसमें आयरन की अधिकता है जो शरीर को मजबूत बनाने में मददगार है।
* दिल का मर्ज :
नियमित रूप से बैंगन के सेवन से शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है, जिससे दिल के रोगों का रिस्क कम होता है। यह कोलेस्ट्रॉल का स्तर तो सामान्य करता ही है, साथ ही ब्लड प्रेशर भी सामान्य रखता है। इसके नियमित सेवन से हाई बीपी और हार्ट अटैक का खतरा कम होता है।
* दिमाग तेज करता है :
बैंगन आपके दिमाग की सेहत के लिए भी फायदेमंद है। बैंगन में फाइटोन्यूट्रिएंट नामक तत्व होते हैं, जो दिमाग की कोशिकाओं की क्षति रोकते हैं। इससे याददाश्त बेहतर होती है और दिमाग तेजी से काम करता है।
* एंटीबैक्टीरियल तत्व :
बैंगन में विटामिन सी बहुत अच्छी मात्रा में है, जो प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है और शरीर को संक्रमण से मुक्त रखने में मदद करता है।
* सिगरेट छुड़वाने में मददगार
प्राकृतिक तरीके से सिगरेट छोड़ना चाहते हैं तो डाइट में बैंगन का सेवन अधिक करें। निकोटिन रिप्लेसमेंट थैरेपी के तहत इसमें मौजूद निकोटिन की सीमित मात्रा सिगरेट छोड़ने वाले लोगों के लिए मददगार हो सकती है। 

हर समय 'व्हाट्सएप" पर रहना अच्छा नहीं!

मेलबोर्न (प्रे)। आज की आधुनिक दिनचर्या में सोशल नेटवर्किंग साइट्स के बिना हर व्यक्ति अपना जीवन अधूरा-सा महसूस करता है। नित नई एप्लीकेशन के चलते उसे इनमें रहने का चस्का इस कदर लग जाता है कि वह इसी ताने-बाने के बीच अपनी जिंदगी जीने लगता है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है 'व्हाट्सएप"। आजकल जिसे देखो वही व्हाट्सएप पर लगा रहता है। केवल इतना ही नहीं गाड़ी पर चलते समय या पैदल जाने के दौरान भी ये लोग व्हाट्सएप से जुदा नहीं हो सकते। अगर आप भी इस श्रेणी में शामिल हैं तो खुद को कुछ सुधारिए...नहीं तो यह आदत कहीं न कहीं आपको नुकसान पहुंचा सकती है।
*पॉश्चर और बैलेंस में गड़बड़ी :
नए अध्ययन के अनुसार चलते समय भी लगातार मोबाइल से मैसेज भेजना न सिर्फ दुर्घटना को बुलावा देता है बल्कि यह आपके पॉश्चर और बैलेंस को भी बिगाड़ देता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि जो लोग चलते समय मैसेज भेजते या पढ़ते हैं उनका अपने आसपास की ओर ध्यान नहीं जाता है और वे संतुलन भी नहीं बना पाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी द्वारा किए इस अध्ययन में 26 लोगों को शामिल किया गया और उनकी गतिविधियां नोट की गईं। इसमें पाया गया कि जो लोग चलने के दौरान मोबाइल का प्रयोग कर रहे थे, उनकी चाल और पॉश्चर में काफी बदलाव देखा गया।
*इतने बेपरवाह न बनिए :
अमेरिका के वर्जीनिया में स्थित 'सेंटर फॉर वल्नरेबल रोड यूजर सेफ्टी" संस्थान के एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि वाहन चलाते समय युवाओं द्वारा मोबाइल पर बात करना, एसएमएस पढ़ना, खाना-पीना या साथी यात्रियों से बात करना दुर्घटना के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। संस्थान के चार्ली क्लॉर ने अपने अध्ययन में कहा कि नौसिखिए चालक जैसे-जैसे वाहन चलाने में सहज होते जाते हैं, जोखिम भरे दूसरे कार्यों में अधिक लिप्त पाए जाते हैं। इन नए-नए चालक प्रमाण-पत्र पाए लोगों द्वारा वाहन चलाने के अतिरिक्त दूसरे कार्यों में संलिप्तता कहीं अधिक चिंता का विषय है, क्योंकि अधिकांश दुर्घटनाओं या दुर्घटना होते-होते बचने वाली घटनाओं में सर्वाधिक समय यही कारण सामने आया है।
वर्जीनिया के परिवहन संस्थान द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि नौसिखिया वाहन चालकों का प्रतिशत 6.4 है, लेकिन 11.4 फीसद दुर्घटनाओं में ऐसे ही चालक लिप्त पाए गए तथा पुलिस द्वारा दर्ज किए गए 14 फीसद दुर्घटना के मामलों में भी इन्हीं की संख्या शामिल है।  

खाने में आएगा और भी स्वाद...

कभी-कभी आप इतना टेस्टी खाना बना लेती हैं कि लोग लम्बे वक्त तक उस टेस्ट को याद रखते हैं और आपकी तारीफ करते नहीं थकते। हैरानी आपको तब होती है कि जब आपको लगने लगता है कि आप पिछली बार की तरह दोबारा टेस्टी खाना नहीं बना पाएंगी।
* खाना किसके लिए बना रही हैं :
जब भी आप खाना बनाएं तो इस बात का ध्यान में रखें कि खाना आप किसके लिए पका रही हैं। खाना जब भी बनाएं तो टेस्ट ऐसा होना चाहिए कि बच्चों से लेकर बुजुर्ग हर एक की पसंद उसमें शामिल हो जाए। अगर बच्चा है तो उसके खाने में कुछ ऐसी वैराइटीज् होना चाहिए, जिसे देखते ही वह खाने के लिए तैयार हो जाए। उसका खाना ज्यादा स्पाइसी नहीं होना चाहिए। अगर आप किसी मिडिल एज पर्सन के लिए खाना पका रही हैं तो आपको खाने के टेस्ट में तड़के और तेल का सही पता होना चाहिए।
* बैलेंस को बिगड़ने न दें :
कई बार आप मैग्जीन या न्यूजपेपर पढ़कर रेसिपी तैयार करती हैं। अगर रेसिपी में सामग्री दो लोगों को ध्यान में रखकर दिया गया है और आप चार लोगों के लिए रेसिपी बना रही हैं तो आपको सामग्री के अनुपात का ध्यान रखना होता है। रेसिपी में सामग्री डालते वक्त अनुपात का ख्याल रखें, इससे न सिर्फ खाने का टेस्ट बेहतर होता है बल्कि उसका रंग भी उभरकर आता है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि ज्यादा मसाले और तेल डालने से खाना अच्छा बनेगा। मसाले, तेल और नमक जैसी चीजों का अनुपात अगर थोड़ा भी बिगड़ा तो इसका सीधा असर टेस्ट पर पड़ता है। अगर आप मसाला भून रही हैं तो यह ध्यान रखें कि आपको किस तरीके से मसाला भूनना है और कितना भूनना है। उसी तरह आपको रोटी या पूड़ी बनानी हों तो आपको आटे की रैपिंग का सही अंदाजा होना चाहिए। आटा गूंथते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि वह बहुत टाइट या बहुत सॉफ्ट ना हो।
* कुकिंग पॉट से भी पड़ता है फर्क :
खाने के टेस्ट को बढ़ाने के लिए आपको अच्छे से पता होना चाहिए कि आपके लिए खाना किस कुकिंग पॉट में पकाना ज्यादा सही रहेगा। इससे आपके खाने में अच्छा टेस्ट और फ्लेवर दोनों में ही निखार आता है। जैसे अगर आप कोई भी ग्रीन वेजिटेबल बना रही हैं, तो उसे टेस्टी बनाने के लिए आयरन के पॉट में ही पकाएं या आप पनीर की सब्जी पका रही हैं तो कोशिश करें कि कढ़ाई में ही पकाएं। जिससे इसकी ग्रेवी में टेस्ट लाया जा सके। वहीं इससे हटकर छोले पकाने के लिए कुकर के बजाय भगोने को प्रिफरेंस दें।
* सही टेम्परेचर से बढ़ेगा टेस्ट :
कुकिंग टेम्परेचर वो फैक्टर है जो पल भर में खाने का टेस्ट अच्छा और बुरा दोनों बना देता है। किसी भी रेसिपी को सजेस्टेड टेम्परेचर पर ही कुक करें। जैसे आप इंडियन फूड बना रही हैं तो ऑयल मीडियम हॉट होना चाहिए। अगर आप किसी चीज को उबाल रही हैं तो लो मीडियम टेम्परेचर पर उसे उबालना चाहिए। इससे खाने का ओरिजिनल फ्लेवर बना रहता है।
* टेस्ट पर रखें नजर :
जब आपका खाना पक रहा हो तो एक बार उसे चखकर देख लें। कहीं ऐसा तो नहीं कि खाने में आप जो टेस्ट चाहती हों उससे अलग टेस्ट आ रहा हो। खाने में मीठा, नमकीन, तीखा, खट्टे टेस्ट में क्या चैंजेस आए हैं इसका खास ख्याल रखें। जरूरत पड़ने पर उसमें कुछ चीजें और भी मिला सकती हैं। 

ठंड में पहनें स्टाइलिश बूट्स

विंटर्स में स्टाइलिश आउटफिट्स के साथ अगर बूट्स को पेयर कर लिया जाए तो यह आपके स्टाइल स्टेटमेंट को और ग्लैमरस बना देगा। बाजार में आपको काफी तरह के बूट्स मिल जाएंगे लेकिन अपनी पसंद के साथ आपको अपनी पर्सनालिटी का भी ध्यान रखकर बूट्स का सिलेक्शन करना चाहिए। हर बॉडी शेप पर, हर लेंथ के बूट्स सूट नहीं करते। जानिए, किस टाइप के बूट्स अपकी बॉडी शेप पर सूट करेंगे।
* नी हाई बूटीज् :
इस सीजन में फ्लैट हील वाले नी-हाई बूट्स सबसे ज्यादा पॉप्युलर हैं। ये कम्फर्टेबल होने के साथ-साथ फैशनेबल और स्टाइलिश भी लगते हैं। शॉर्ट स्कर्ट और स्टॉकिंग्स के साथ ये आपको एलीगेंट और ग्लैमरस लुक देगें।
* लेस अप बूटीज् :
गर्ल्स इस टाइप के बूट्स को काफी प्रिफर करती हैं। यह बूट्स आपको फ्लैट्स और हील्स, दोनों में ही मिल जाएंगे। लेस-अप बूटीज् आपकी पर्सनालिटी में एटिट्यूड और कॉन्फिडेंस एड करते हैं।
* कैप टो एंकल बूट्स :
शाइनी मेटैलिक कैप-टो पेयर पार्टी के लिए बेस्ट होते हैं। अगर आपका आउटफिट सिंपल और सोबर है तो ये बूट्स आपके ओवरऑल लुक में ग्लैमर एड करेंगे। इन्हें बॉयज और गर्ल्स दोनों ही पहन सकते हैं।
* मिड काफ स्लाउच बूट :
ये बूट्स कैजुअल वियर के लिए परफेक्ट होते हैं। विंटर्स में आप जिप वाले मिड-काफ स्लाउच बूट्स को स्किनी प्रिंटेड पैंट्स और जैकेट के साथ पेयर कर सकती हैं। इन्हें पहनने से आप हॉट या स्टफी भी फील नहीं करेंगे।
* फ्लैप फ्रंट बूट्स :
इन बूट्स का भी ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ रहा है। इनका अल्ट्रा कूल लुक आपके स्टाइल को और भी बेहतर बनाता है। ये ईवनिंग पार्टीज के लिए मोस्ट प्रिफर्ड बनते जा रहे हैं। इन बूट्स को आप किसी भी सीजन में कैरी कर सकते हैं।  

क्यों लगती है इतनी भूख

पेट में चूहे दौड़ रहे हैं? अरे नहीं, ये आपके हंगर हार्मोन्स हैं, जो आपको कुछ खाने के लिए उकसा रहे हैं। इनके नाम हैं ग्रेलिन, कोर्टिसोल और लेप्टिन। जब भी आपका पेट खाली होता है, ये हार्मोन आपको सूचना देना शुरू कर देते हैं।
अच्छी बात यह है कि इन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है और आप ज्यादा खाने से बच सकते हैं।
* पूरी नींद, कम फैट :
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में किए गए शोध के अनुसार एक रात भी पर्याप्त नींद न ले पाना ग्रेलिन के स्तर को बढ़ा सकता है, इससे भूख बढ़ जाती है। हो सकता है कि हर रात आप पूरे सात घंटे की नींद न ले पाएं, लेकिन अगर आप अपनी भूख कम करना चाहते हैं तो पर्याप्त नींद को नजरअंदाज न करें।
* बेवक्त न लगे भूख :
तला भोजन खाने की बजाय कच्चे फल और सब्जियों का सेवन करें। हेल्दी फूड ग्रेलिन को बढ़ने से रोकता है। यह वसा की मात्रा को स्टोर करता है। इससे आपको वक्त-बेवक्त भूख लगने की समस्या नहीं होती और आप फैटी फूड का सेवन करने से बच जाते हैं।
* हार्मोन्स देते हैं मस्तिष्क को संदेश :
जब भी आपको भूख लगती है। आप कुछ खाते हैं और भूख खत्म हो जाती है। इस दौरान शरीर में एक सूचना प्रक्रिया भी चलती है, जिसके बारे में हमें पता नहीं होता।
*धीरे-धीरे करें भोजन :
भोजन का सेवन करने के बाद हमारा शरीर भूखा नहीं रहा, यह बात मस्तिष्क तक पहुंचाने में हार्मोन्स को 20 मिनट का समय लगता है। इसलिए यह सलाह दी जाती है कि भोजन धीरे-धीरे करना चाहिए, हड़बड़ी में कतई नहीं।
दिमाग को शांत रखें। तनाव न सिर्फ इच्छाशक्ति को कमजोर करता है, बल्कि कोर्टिसोल के स्तर को भी बढ़ाता है। इस वजह से भी ज्यादा भूख लगती है।
जब भी बेचैनी हो, तो व्यायाम करें, गहरी सांस लें, संगीत सुने, किसी दोस्त से बात करें। तनाव में ऐसा कोई भी पसंदीदा कार्य करें जो आपका ध्यान खाने से हटा सके।  

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

चेहरे के मनोभाव पढ़ लेगा नया सॉफ्टवेयर

न्यूयॉर्क, प्रेट्र : अमेरिकी कंपनी ने एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित किया है जो मनुष्य के चेहरे के मनोभावों को पढ़कर बता सकेगा कि कोई व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा है। इतना ही नहीं सॉफ्टवेयर यह भी बता सकेगा कि कोई व्यक्ति झ्ाूठी हंसी हंस रहा है।
फेसेट नाम के इस सॉफ्टवेयर में हंसी, दुख, गुस्से, भय जैसे सातों तरह के मनोभावों का पता लगाने के लिए एक सामान्य डिजिटल कैमरे का इस्तेमाल किया गया है। कैलिफोर्निया स्थित कंपनी इमोश्ोंट के सह संस्थापक व प्रमुख श्ाोधकर्ता मरियान बार्टलेट ने बताया, आमतौर पर लोगों के कहने, करने और सोचने में काफी अंतर होता है। वे कहते कुछ हैं , सोचते कुछ हैं और करते कुछ हैं। यह सॉफ्टवेयर महज एक तस्वीर के जरिए व्यक्ति के चेहरे पर मौजूद मनोभावों को पढ़कर इस अंतर को काफी हद तक कम कर सकता है। किसी वीडियो के दौरान फेसेट का इस्तेमाल ज्यादा सटीक नतीजे दे सकता है। वीडियो के दौरान सॉफ्टवेयर के लिए सूक्ष्म मनोभावों को पकड़ना भी आसान हो जाता है। यहां तक की चेहरे पर कोई भाव नहीं होने की स्थिति में भी सूक्ष्म मनोभाव उभरते रहते हैं। इन्हें आंखों से पहचानना संभव नहीं है लेकिन सॉफ्टवेयर की मदद से इनका अध्ययन किया जा सकता है। बार्टलेट ने कहा, फेसेट झ्ाूठी हंसी को भी पकड़ लेगा। लोग जब वास्तव में हंसते हैं तो ओरबीक्युलरीज ओकुली ना की एक मांसपेश्ाी सिकुड़ती है जिससे चेहरे पर झ्ाुर्रियां पैदा होती हैं। यह सॉफ्टवेयर चेहरे पर पड़ी झ्ाुर्रियों के आधार पर बता सकता है कि हंसी झ्ाूठी है या सच्ची।

बेसमय सोने से बिगड़ती है जीन्स की रिद्म

लंदन (प्रे)। यह सभी जानते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए अच्छी नींद जरूरी है लेकिन अनिद्रा और बेसमय सोने से हमारे श्ारीर पर इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। एक नए श्ाोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि जब सोने के समय में बदलाव होता है तो उससे हमारे जीन की दैनिक लय बिगड़ती है। यह मुख्यत: नाइट शिफ्ट्स करने वालों में आसानी से देखी जाती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ सर्रे के श्ाोधकर्ताओं ने 22 प्रतिभागियों को 28 घंटे के एक दिन वाले कृत्रिम वातारण्ा में रखा। इस नियंत्रित वातारण्ा में प्राकृतिक रोश्ानी और अंधेरे के चक्र का अभाव रहा। नतीजतन उनके नींद से उठने के चक्र में प्रतिदिन चार घंटे की देरी हुई। इसके बाद श्ाोधकर्ताओं की टीम ने प्रतिभागियों के जीन की लय का मूल्यांकन करने के लिए उनके खून के नमूने लिए। इसमें पता चला कि सोने के समय में गड़बड़ी के दौरान जीन की संख्या में छह गुना कमी आई। अपने सामान्य चक्र पर पहुंचने के लिए उन्हें एक दिन में 12 घंटे तक सोना पड़ा। प्रतिभागियों के रक्त नमूना जांच के मुताबिक इस एक प्रयोग के बाद ही प्रतिभागियों की 'सिरकेडिन रिद्म" प्रदर्शित करने वाले जीन्स में छह गुना कमी आ गई। इस रिद्म का समय लगभग 24 घंटे होता है।
इस श्ाोध के नतीजे यह भी दर्श्ााते हैं कि नींद के चक्र द्वारा जीन का नियंत्रण्ा हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ सर्रे के स्लीप रिसर्च सेंटर के प्रोफेसर डर्क-जेन डिक ने कहा कि इस श्ाोध की मदद से हमें रात्रि पाली या नींद के समय में गड़बड़ी के चलते नकारात्मक स्वास्थ्य को समझने में मदद मिल सकती है। यह श्ाोध 'प्रोसिडिंग ऑफ द नेश्ानल एकेडमी ऑफ साइंसेज् जर्नल" में प्रकाश्ाित हुआ है।
*क्या है सिरकेडिन रिद्म :
शोधकर्ताओं का कहना है कि हमारे जीन्स में करीब छह फीसद की अपनी 'सिरकेडिन रिद्म" होती है। यह रिद्म बॉडी क्लॉक को मैनेज करती है। इसका अर्थ यह है कि दिन के किसी अन्य समय में इनकी क्रियाशीलता दूसरे जीन्स के मुकाबले अधिक होती है। जो जीन्स दिन में अधिक क्रियाशील होते हैं वे इम्यून सिस्टम से संबंधित हो सकते हैं वहीं रात वाले जीन्स अन्य जीन्स को रेग्युलेट करते हैं।
*प्राकृतिक क्रिया होती है बाधित :
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर हम लोगों पर शिफ्ट के लिए दबाव डालते हैं तो हम एक प्राकृतिक प्रक्रिया को बुरी तरह से बाधित करते हैं। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आखिर क्यों शिफ्ट की नौकरी हृदय समस्याओं की एक बड़ी वजह होती है।
*क्या कहता है शोध :
-नाइट शिफ्ट की नौकरी करीब 1500 जीन्स को नुकसान पहुंचा सकती है।
-इस तरह की नौकरी हृदय की समस्याओं का बड़ा कारण होती है।
-सोने के वक्त में बाधा स्तन कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज और अन्य कई जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ा देती है।
-यह बाधा अगर लंबे समय तक चलती रहे, तो इसका शरीर पर काफी बुरा असर पड़ता है।
-मानव शरीर में कुल 24 हजार जीन्स होते हैं और करीब 1400 सोने की आदत बदलने से प्रभावित हो सकते हैं।  

दिल के मरीजों की दवा है गुनगुनी धूप

सर्दियों के मौसम में गुनगुनी धूप न सिर्फ आपको गर्माहट का एहसास दिलाती है बल्कि दिल की दवा भी होती है। जनाब, यह किसी शायर की कल्पना नहीं है बल्कि वैज्ञानिकों का दावा है।
हाल ही एक शोध में माना गया है कि धूप की मदद से हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों का बीपी कम करने और उन्हें हार्ट अटैक व स्ट्रोक से बचाने में मदद मिल सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ हैंपटन एंड ईडनबर्ग के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि धूप त्वचा और खून में नाइट्रोजन ऑक्साइड के कणों को छानने में मदद करती है, जिससे ब्लड प्रेशर कम हो जाता है।
शोधकर्ता व प्रोफेसर मार्टिन फ्लीसिक के अनुसार नाइट्रोजन ऑक्साइड के त्वचा में प्रवेश को अगर रोका जाए तो यह खून तक नहीं पहुंच पाता है और ब्लड सर्क्युलेशन तेज नहीं होता। इससे हाई बीपी के मरीजों को हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसे खतरों से बचाव में मदद मिल सकती है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी माना है कि बहुत अधिक धूप में रहना भी त्वचा के कैंसर का रिस्क अधिक है इसलिए बहुत अधिक धूप और अल्ट्रा वॉयलेट किरणों के नुकसान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह शोध 'जर्नल ऑफ इन्वेस्टिगेटिव डर्मेटोलॉजी" में प्रकाशित हुआ है। 

सर्दियों में भी पीएं भरपूर पानी

गर्मियों में प्यास अधिक लगने से लोग प्राय: अधिक पानी पीते हैं मगर सर्दियों में यह मात्रा कम हो जाती है। इसकी एक वजह यही है कि हमें इन दिनों प्यास नहीं लगती। नतीजा यह कि सर्दियों में अक्सर लोग पर्याप्त पानी नहीं पी पाते। आइए हम आपको बताते हैं कि सर्दियों में क्यों पानी पीना जरूरी है।
* महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए :
महिलाओं को सर्दी हो या गर्मी हर मौसम में अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन की समस्या आम होती है। इसी वजह से उनके शरीर को पानी की अधिक जरूरत होती है
* पाचन शक्ति बढ़ाए पानी :
हम जो भी खाना खाते हैं, उसे पचाने के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा शरीर के मेटाबॉलिज्म, और पाचन शक्ति के लिए पानी बहुत जरूरी है। इसलिए सर्दियों में प्यास ना लगने पर भी पानी पिएं।
* टॉक्सिन दूर करें :
शरीर में मौजूद व्यर्थ पदार्थों जैसे यूरिया, सोडियम और पोटेशियम को बाहर करने और तापमान सामान्य रखने के लिए भी पानी की जरूरत होती है।
* पानी की कमी ना होने दें :
अगर आप ज्यादा शारीरिक मेहनत करते हैं तो आपके शरीर को ज्यादा पानी की जरूरत है। पसीना, यूरिन और मेटाबॉलिज्म फंक्शन के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाती है।
* स्वास्थ्य समस्याओं से बचाए पानी :
शरीर में पानी की कमी डिहाइड्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर और इंफेक्शन जैसी बीमारियों को जन्म देती है। पानी की कमी से पाचन क्रिया भी प्रभावित होती है, जिस कारण सिरदर्द और थकान की शिकायत होती है।
* एक्सरसाइज के साथ पानी जरूरी :
कई लोग ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं मगर पानी कम पीते हैं। जबकि उन्हें पानी की ज्यादा जरूरत होती है। एक्सरसाइज के दौरान शरीर से पसीने के रूप में काफी पानी निकल जाता है। ऐसे में शरीर में पानी की कमी न होनें दें।
* त्वचा में नमी के लिए :
सर्दियों में त्वचा में रूखेपन की समस्या होती है। ऐसे में त्वचा की नमी बनाए रखने के लिए पानी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पिएं। रूखी त्वचा पर झुर्रियां भी जल्द पड़ती हैं।
* तरल पदार्थ लेना भी फायदेमंद :
सर्दियों के मौसम में कई तरह की हरी सब्जियां मिलती हैं, जिनसे शरीर को पानी मिलता है। आप चाहें तो खाने से पहले सूप लें और जूस भी ले सकते हैं। इससे भी पानी की कमी पूरी होती है।
* हमेशा साथ रखें पानी :
घर से बाहर निकलने से पहले पानी की बोतल लेना न भूलें। सर्दियों में पानी पीने से न कतराएं। ठंड की वजह से प्यास नहीं लग रही, तो इसका यह मतलब नहीं कि पानी न पिया जाए।  

ठंड में करें आंखों की विशेष हिफाजत

कड़ाके की सर्दियों में यदि आपकी आंखों में जलन हो रही हो, चीजें धुंधली दिखाई दे रही हों या देखने में किसी अन्य तरह की दिक्कत आ रही हो तो इसे आंखों की सामान्य समस्या के तौर पर न लें। तेज सर्दियों में लोगों में ये परेशानियां तेजी से फैलती हैं, लेकिन यह सामान्य समस्या न होकर वास्तव में 'ड्राई-आई सिंड्रोम" नामक बीमारी के लक्षण हैं।
रूह कंपाने वाले इस मौसम में हम पूरे शरीर को तो अच्छी तरह से ढंक लेते हैं, लेकिन शरीर का एक हिस्सा इन दिनों चलने वाली बर्फीली हवाओं से सर्वाधिक प्रभावित होता है, और वह है हमारी आंखें।
चिकित्सकों के अनुसार हमारी आंखों के बाहरी भाग पर एक तरल द्रव्य की महीन परत होती है, जो हमारी आंखों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होता है।
सर्दियों में लेकिन बर्फीली हवाएं हमारी आंखों के इस टीयर फिल्म को वाष्पित कर देती है, जिसके कारण ड्राई-आई की स्थिति उत्पन्ना हो जाती है। इसी वजह से आंखों की रोशनी आंशिक तौर पर प्रभावित होती है, तथा आंखों लगातार दर्द बना रहता है।
चिकित्सकों का कहना है कि सर्दियों में घर से बाहर शुष्क ठंडी हवाओं एवं घर के भीतर शुष्क गर्मी के कारण अमूमन ड्राई-आई सिंड्रोम हो जाता है।
*आंखों में न हो नमी की कमी :
आंखों में नमी की कमी हो जाना आंखों के लिए काफी नुकसानदायक होता है। 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं एवं पुरुषों में यह सर्दियों में होने वाली यह एक सामान्य समस्या है।
*कम्प्यूटर भी एक कारण :
आंखों में ड्राई-आई सिंड्रोम कम्प्यूटर के लगातार इस्तेमाल से भी हो सकता है। जब हम कम्प्यूटर के आगे बैठे हो तो हमें अपनी आंखों को कुछ समय अंतराल पर आधे या एक मिनट के लिए बंद कर लेना चाहिए। इससे बचने के लिए चिकित्सक के परामर्श पर कोई आई ड्रॉप दिन में तीन से चार बार इस्तेमाल करना चाहिए। ताकि इस समस्या से निजात पाई जा सके।
*और क्या करें :
हर किसी को इस मौसम में अपनी पलकों को किसी गरम कपड़े से कुछ मिनटों के लिए ढंकना चाहिए और साथ ही तरल पेय लेना चाहिए। अमेरिकी नेत्ररोग संघ के अनुसार 50 वर्ष से अधिक आयु की लगभग 32 लाख महिलाएं और 17 लाख पुरुष गंभीर ड्राई-आई सिंड्रोम से पीड़ित हैं। 

कई चीजें जो बचा सकती है डायबिटीज के खतरे से

लंदन (प्रे)। लंदन एक नए श्ाोध में पता चला है कि डायबिटीज के खतरे से बचाने में चॉकलेट सहायक हो सकती है। चॉकलेट और रेड वाइन में एक ऐसा यौगिक पाया जाता है, जो इस बीमारी से लोगों को बचा सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया (यूईए) और किंग कॉलेज के श्ाोध के अनुसार जामुन, चाय और चॉकलेट में उच्च स्तर के एंथोसायनिन सहित फ्लेवोनोआइड्स और दूसरे यौगिक पाए जाते हैं। ये यौगिक टाइप-टू डायबिटीज से रक्षा कर सकते हैं। श्ाोध के निष्कर्ष से पता चला है कि इन यौगिकों का अधिक सेवन निम्न इंसुलिन प्रतिरोधक और बेहतर रक्त ग्लूकोज नियंत्रण्ा में सहायक है। यूईए के नारविच मेडिकल स्कूल के प्राोफेसर एडिन कासिडी ने बताया कि हमारा श्ाोध इस प्रकार के यौगिकों के खाने से होने वाले फायदे पर केंद्रित रहा। ये यौगिक अजवाइन, जामुन, लाल अंगूर, श्ाराब और दूसरे लाल या नीले रंग के फल और सब्जियों में पाए जाते हैं। कासिडी ने कहा कि मनुष्यों पर यह पहला व्यापक श्ाोध है जिसमें प्रभावश्ााली बॉयो-एक्टिव यौगिकों के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। ये यौगिक डायबिटीज के जोखिम को कम कर सकते हैं। प्रयोगश्ााला के अध्ययनों से पता चला है कि इस प्रकार के खाद्य पदार्थ टाइप-टू डायबिटीज के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं। श्ाोधकर्ताओं ने अपने इस अध्ययन में दो हजार स्वस्थ महिलाओं को श्ाामिल किया था। यह श्ाोध 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीश्ान" में प्रकाश्ाित की गई है। 

अच्छी नींद से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम

अच्छी नींद वास्तव में किसी बेहतर टॉनिक से कम नहीं है। भरपूर नींद किसी भी रोग को दूर करने में मदद करती है। यही वजह है कि चिकित्सकों द्वारा अक्सर दवाई के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा सोने की बात कही जाती है। हाल ही में हुए एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि रात में अच्छी तरह सोने से पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन पुरुषों में मेलाटोनिन (सोने-जागने की प्रक्रिया में श्ाामिल हार्मोन) की मात्रा अधिक होती है उनमें इसकी कम मात्रा वाले पुरुषों की तुलना में प्रोस्टेट कैंसर होने की आश्ांका 75 प्रतिश्ात कम होती है। मेलाटोनिन केवल रात में बनता है। बोस्टन में हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में महामारी विज्ञान विभाग में डॉक्टरेट कर रहे साराह सी मार्क्ट ने बताया कि नींद की कमी और अन्य कारण्ाों से मेलाटोनिन का स्राव प्रभावित हो सकता है। इससे प्रोस्टेट कैंसर की आश्ांका बढ़ जाती है। इस अध्ययन के परिण्ाामों को 'अमेरिकन एसोसिएश्ान फॉर कैंसर रिसर्च" की बैठक में प्रस्तुत किया गया।
*थोड़ी ज्यादा नींद सेहत के लिए फायदेमंद :
सप्ताहांत में देर तक सोने वालों के लिए यह शायद अच्छी खबर हो सकती है। जी हां, एक अन्य शोध में कहा गया है कि हफ्तेभर में जिन लोगों की नींद पूरी नहीं हो पाती है वे अतिरिक्त नींद लेकर इसकी भरपाई कर सकते हैं। यह दावा अमेरिका की पेनसिल्वेनिया स्कूल ऑफ मेडिसीन के शोधकर्ताओं ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक अतिरिक्त सोना स्वास्थ्य और शरीर के लिए लाभकारी होता है। यह नींद से वंचित लोगों की नींद की कमी पूरी करता है। 'डेली एक्सप्रेस" की रिपोर्ट के मुताबिक रात भर जागने वालों को ऊर्जावान करने के लिए 10 घंटे की नींद भी पर्याप्त नहीं होती। उल्लेखनीय है कि अपर्याप्त नींद से सोचने की क्षमता, तनाव पर नियंत्रण, प्रतिरक्षा तंत्र को स्वस्थ रखने और भावनाओं पर नियंत्रण करने की क्षमता प्रभावित होती है। यही नहीं नींद पूरी न होने पर एकाग्रता में कमी और याददाश्त घटती है। प्रमुख शोधकर्ता डॉ. डेविड डिंगेस के अनुसार लंबे समय तक नींद न पूरी होने पर अतिरिक्त सोना या सुबह दो घंटे की अतिरिक्त नींद लेना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। यह व्यवहार में सतर्कता लाने में भी मददगार होती है।  

मटमैला कंद है जीवन का मूल

जिमिकंद! देखने में मिट्टी का रंग है लेकिन इनके गुण्ा इतने कि कई रोगों से मुक्ति दिला दे। जिमिकंद बवासीर से लेकर कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से बचाए रखता है। हिमाचल प्रदेश्ा के बिलासपुर के जुखाला क्षेत्र में होने वाले जिमिकंद को अब 'पालम" नाम देते हुए प्रमाण्ाित करवा लिया गया है। दावा यह है कि यह जिमिकंद आम जिमिकंद से आगे निकलकर खाने वाले का श्ाारीरिक भला एवं उगाने वाले का आर्थिक भला करता है।
 मुख्यत: श्रीलंका में प्रचुर मात्रा में उगने वाले इस कंद का उत्पादन दक्षिण्ा पूर्वी देश्ाों में अधिक होता है। भारत में पश्चिमी बंगाल में यह अधिक होता है लेकिन 'पालम" प्रजाति हिमाचल की जड़ों का गुण्ागान करवाएगी।
जिमिकंद में रोगों से भिड़ने के सभी गुण्ा कैल्श्ाियम ऑक्सलेट के कारण्ा पाए जाते हैं। पालम की उपज अच्छी और किसानों के लिए फायदेमंद होगी। यह दावा कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के सब्जी वैज्ञानिक डॉ. रविंद्र सिंह का।
डॉ. सिंह के अनुसार जुखाला क्षेत्र के लोग कहते थे कि उनके जिमिकंद में कुछ खास है और पंजाब में यह बाकियों से हटकर ज्यादा कीमत पर बिकता है। बस वहीं से श्ाोध का सूत्र मिला। इस दौरान उन्होंने पाया कि जुखाला के जिमिकंद में बाकी जिमिकंद के मुकाबले तीखापन ज्यादा है। यह कैल्श्ाियम ऑक्सलेट की मात्रा ज्यादा होने के कारण्ा ही होता है। अपनी विश्ोषताओं के कारण्ा अब यह राज्य बीज प्रमाण्ाीकरण्ा एजेंसी से पंजीकरण्ा का हकदार भी हो गया है। त्रासदी यह रही कि यह कुछ हिस्सों में ही उगाकर स्थानीय मंडियों में बेचा जाता रहा। कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. एसके घाबरूव डॉ. रविंद्र सिंह कहते हैं कि यह श्ाोध केंद्र सरकार द्वारा देश्ाभर में स्थानीय स्तर के उन उत्पादों के गुण्ाों की विश्ोष पहचान करने के लिए श्ाोध कार्यक्रम के तहत चार वर्ष पूर्व से जारी है।
*औषधीय गुणों से भरपूर :
इससे पहले प्रदेश्ा सरकार की इस संबंध में गठित समिति ने भी ऐसा करने की स्वीकृति दी थी। अब तक के श्ाोध में खुलासा हुआ है कि प्रदेश्ा में होने वाले जिमिकंद से हटकर जुखाला का जिमिकंद विश्ोष है क्योंकि इसमें औषधीय गुण्ा सबसे ज्यादा हैं। डॉ. सिंह के अनुसार जुखाला जिमिकंद के सैंपल लुधियाना के एक संस्थान में विश्लेषण्ा के लिए भेजे हैं, वहां से और स्पष्ट होगा कि किस रोग के लिए इसमें कितनी प्रतिरोधक क्षमता है। वे कहते हैं कि प्रदेश्ा में पहली पहचानी और प्रमाण्ाित इस किस्म को निचले व मध्य हिमाचल के श्ािवालिक रेंज में उगाया जा सकता है। बंदरों से प्रभावित इलाकों में किसानों के लिए एक नकदी फसल के रूप में बेहतर विकल्प हो सकता है।
*पालम जिमिकंद की विश्ोषताएं :
-जिमिकंद कैंसर रोधी
-कोलेस्ट्रॉल कम करता है
-श्ाुगर के मरीजों के लिए लाभप्रद
-यह एंटासिड है यानी अम्ल नहीं बनने देता
-बवासीर के रोगियों के लिए भी गुणकारी
-कीट व रोग बेहद कम लगते हैं
-उत्पादन भी अन्य प्रजातियों की तुलना में अधिक  

शराब है खराब...

मध्यम आयु के जो पुरुष बहुत अधिक शराब का सेवन करते हैं, उनके मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हालिया शोध में यह बात कही गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं ने पाया कि उम्र के चौथे और पांचवें दशक में जो पुरुष अधिक शराब का सेवन करते हैं, उन्हें आगे चलकर मस्तिष्क संबंधी परेशानियां अधिक होती हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाओं में इसका कोई बड़ा दुष्प्रभाव नजर नहीं आया, भले ही उन्होंने कितनी ही मात्रा में शराब क्यों न पी हो। हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि महिलाएं इस बात में बेरोक-टोक हो जाएं। क्योंकि महिलाओं में शराब के सेवन से दूसरे कई साइड इफेक्ट्स होते हैं।
 वैज्ञानिकों ने सात हजार महिलाओं और पुरुषों पर दस साल तक शोध किया। इस दौरान उनके अल्कोहल के सेवन पर नजर रखी गई, साथ ही वैज्ञानिकों ने उनके संज्ञानात्मक स्वास्थ्य पर भी नजर रखी। कुछ शोधकर्ताओं ने पुरुषों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों जैसे- वर्किंग मैमोरी में दिक्कत, समस्या का समाधान करने की स्किल, कारण तलाशने की क्षमता आदि महिलाओं में भी पाए जाने की बात कही। लेकिन यह नतीजे इतने दृढ़ नहीं थे कि उन्हें सत्य मान लिया जाए। पुरुषों में पर किए गए अध्ययन को पूरी तरह से सटीक माना गया। पुरुष यदि अपनी कार्यक्षमता बनाये रखना चाहते हैं तो उन्हें दिन में 36 ग्राम यानी ढाई पैग से अधिक शराब नहीं पीनी चाहिए। वे पुरुष जो नियमित रूप से इस मात्रा से अधिक शराब का सेवन करते हैं, उनमें मानसिक असक्षमतायें सामान्य पुरुषों के मुकाबले जल्दी शुरू हो जाती हैं। 

कैफीन के सेवन से बढ़ती है याददाश्त

चाय पीकर आप अपनी याददाश्त बढ़ा सकते हैं। चाय किसी के लिए एनर्जी बूस्टर है तो कोई इसे नींद भगाने के लिए पीता है। मगर अब इसके फायदे बस यहीं तक सीमित नहीं है। हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई थी कि चाय पीने से याददाश्त बढ़ती है।
अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध में पाया गया है कि कैफीन का किसी भी व्यक्ति की याददाश्त पर काफी सकारात्मक प्रभाव होता है। साइकोलॉजिकल और ब्रेन साइंसेज् की असिस्टेंट प्रोफेसर मिशेल यासा कहती हैं कि हमने शोध के दौरान पाया कि किसी भी चीज को याद करने के बाद यदि कैफीन का सेवन किया जाता है तो उसे लंबे समय तक याद रखने में काफी मदद मिलती है।
इसके शोधकर्ताओं की मानें तो कैफीन के लॉन्ग टर्म मेमोरी पर पड़ने वाले इस तरह के प्रभाव इससे पहले सामने नहीं आए थे। अब इन पर विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। यह शोध 'जर्नल नेचर न्यूरोसाइंस" में प्रकाशित किया गया है।