शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

डैंड्रफ से ऐसे रह सकते हैं सुरक्षित

डैंड्रफ (रूसी) से होने वाली खुजली और सफेद फ्लेक्स कभी-कभी तो इतना परेशान कर देते हंै कि आपको लोगों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता है। बाजार में मिलने वाले एंटी डैंड्रफ शैंपू आपकी समस्या का अस्थाई इलाज तो कर देते हैं लेकिन इससे जड़ से पीछा छुड़ना चाहते हैं तो कुछ घरेलू नुस्खे आजमा सकते हैं।  
* एस्प्रिन :
दो एस्प्रिन को लेकर उसका पाउडर बना लें और उसे शैम्पू में मिक्स करके बालों में लगाएं और जब झाग हो जाए तो थोड़ी देर के लिए छोड़ दें उसके बाद बालों को धो लें। उसके बाद फिर नॉर्मल शैम्पू से सिर धो लें। एस्प्रिन में सैलिसिलेट्स होते हंै जो किसी भी डैंड्रफ शैम्पू में प्रमुखता से पाई जाने वाली सामग्री है।
* नेचरल ऑयल :
डैंड्रफ की एक वजह होती है ड्राय स्कैल्प। इसलिए स्कैल्प को नमी प्रदान करने के लिए आप नारियल तेल, बादाम तेल या फिर जैतून के तेल से सिर की मसाज कर सकते हैं। बस आपको सिर की मसाज करने से पहले ऑयल को गर्म कर लें। ऑयल गर्म करते समय ध्यान रखें कि तेल सिर्फ इतना गर्म हो कि आप उसे आराम से सिर पर लगा सकें। चंपी के बाद सिर को टॉवल से कवर करके रातभर के लिए छोड़ दें और दूसरे दिन शैम्पू से सिर धो लें। किसी भी आम शैम्पू से सिर धोया जा सकता है।
* विनेगर :
विनेगर को इस्तेमाल करके स्कैल्प को फ्लेकी होने से रोका जा सकता है। सिर धोने के बाद दो कप एपल सिडार विनेगर को दो कप पानी में मिक्स करके बालों में अच्छे से रिंस कर लें। इसके अलावा सफेद विनेगर को स्कैल्प पर रातभर लगाकर छोड़ दीजिए और दूसरे दिन सामान्य शैम्पू से सिर धो लीजिए।
* बेकिंग सोडा :
कुछ दिन बालों को शैम्पू से ना धोकर बेकिंग सोडा से धोइए। स्कैल्प पर बेकिंग पाउडर को रब कीजिए और अच्छे से धो लीजिए। नेचरल ट्रीटमेंट बाकी किसी भी ट्रीटमेंट से बेस्ट होता है क्योंकि इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं होता है और नियमित रूप से इस्तेमाल करने पर समस्या जड़ से खत्म हो जाती है।  

दिल रहेगा हेल्दी

दिल हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, इसलिए दिल के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। आइए जानें, दिल को स्वस्थ रखने के कुछ उपायों के बारे में।
* सेहत के अनुरूप लें आहार :
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसीन के प्रोफेसर डॉ. डीके तनेजा के अनुसार स्वस्थ दिल के लिए कम वसा वाले आहार जैसे ब्रेड स्टिक या राइस क्रैकर्स अच्छे होते हैं। स्वस्थ दिल के लिए फास्ट फूड को पूरी तरह से अपने आहार से दूर रखना चाहिए।
* दिल का साथी सब्जियां :
हरी सब्जियां हृदय के लिए लाभकारी होती हैं और इसलिए प्रतिदिन अपने आहार में हरी सब्जियों और रेशेदार खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए।
* सुरक्षित दिल के लिए दूध के उत्पाद :
कम्युनिटी हेल्थ और एपिडेमियालॉजी की पत्रिका में छपे शोध के अनुसार दूध से हृदय से संबंधी समस्याओं और स्ट्रोक का खतरा कम होता है और यह सुरक्षित भी होता है इसलिए दूध और पनीर के पदार्थ लेने चाहिए।
* स्वस्थ दिल के लिए मछली का सेवन :
चिकित्सिकों का मानना है कि मछली का तेल हृदय में किसी भी प्रकार की सूजन से बचाव करता है। लेकिन साथ ही चिकित्सक यह भी मानते हैं कि शैलफिश में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बहुत अधिक होती है और इसका उपयोग जितना हो सके कम करना चाहिए।
* फ्रेंडली फैट :
सैचुरेटेड फैट जैसे कि जैतून, तिल और सोयाबीन के तेल वसा के अच्छे प्रकार हैं। मुख्यत: जैतून का तेल मोनोसैचुरेटेड फैट का अच्छा स्रोत होता है। ऐसे फैट के प्रयोग से ना केवल आपकी कैलोरीज् कम होती हैं बल्कि आप अच्छे फैट का उपयोग भी करते हैं। 

मस्से के घरेलू डॉक्टर

कहते हैं चेहरे पर तिल उसकी खूबसूरती पर चार चांद लगाता हैं, लेकिन जब तिल बहुतेरे हों या फिर मस्सा हो जाए तो यह चांद पर दाग की तरह ही है। ऐसे में इसे हटाने के लिए आमतौर पर कॉस्मेटिक सर्जरी का सहारा लेते हैं।
अगर आप मस्से से परेशान हैं लेकिन इसके लिए कॉस्मेटिक सर्जरी का रास्ता नहीं चुनना चाहते तो इन घरेलू उपायों को जरूर आजमाएं।
* एस्पिरिन :
एस्पिरिन को तोड़कर कर इसका पाउडर बना लें। इसमें पानी मिलाकर पेस्ट तैयार करें और मस्से पर 15 मिनट तक लगाकर छोड़ दें और फिर पानी से साफ करें। नियमित रूप से मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं।
* विनेगार और गर्म पानी :
एक कटोरे में गुनगुना पानी लें और उसमें ह्वाइट विनेगार मिलाएं। कुछ देर के लिए इसमें रुई डालें और फिर इसे मस्से पर लगाकर 30 मिनट तक छोड़ दें। इसके बाद इसे साफ पानी से धो लें।
* बेकिंग सोडा :
बेकिंग सोडा में पानी मिलाकर इसका पेस्ट तैयार करें और मस्से पर लगाकर एक घंटे के लिए छोड़ दें। इसके बाद गुनगुने पानी से इस हिस्से को साफ करें। हफ्तेभर लगातार इसके इस्तेमाल से आप बदलाव महसूस करेंगे।
* लहसुन का पेस्ट :
लहसुन को पीसकर इसका पेस्ट तैयार करें। इसे रुई की मदद से मस्से पर लगाकर रातभर छोड़ दें। सुबह इसे अच्छी तरह साफ करें।
* प्याज का पेस्ट :
लाल प्याज को बारीक काटें और नमक मिलाकर इसका पेस्ट तैयार करें। इसे मस्से वाली त्वचा पर लगाकर तीन घंटे के लिए छोड़ दें और फिर पानी से साफ करें। इससे भी काफी हद तक मस्से की समस्या से निजात मिलती है।
विद्या का रस
विद्या या मोरपंखी पौधे का रस निकाल कर मस्सों पर लगाने से भी मस्से झड़ जाते हैं। इसे अंग्रेजी में थूजा कहते हैं। होमियोपैथी में थूजा नाम से इसका अर्क भी मिलता है।  

मसालेदार खाना- थोड़ा अच्छा भी, थोड़ा बुरा भी

क्या आप जानते हैं कि मसालेदार भोजन आपका वजन कम कर सकते हैं। भारतीय मसाले जैसे- हल्दी, लाल मिर्च, काली मिर्च आदि खाने से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ होते हैं और वजन भी कम होता है। इन मसालों में वसा और कैलोरी की मात्रा भी बहुत कम होती है। कुछ मसाले जैसे लाल मिर्च भी भूख को दबा देती है। एक बार जब आप ये मसाले खाएंगे तो आपको कुछ समय के लिए भूख नहीं लगेगी।
* अल्सर हो सकता है :
यदि आप यह समझते हैं कि मोटापा कम करने के लिए मसालेदार खाना चाहिए तो यह आपकी गलतफहमी है, इससे अल्सर होने की आशंका बढ़ जाती है। मसाला खाने से मेटाबॉलिज्म का स्तर बढ़ जाता है। लेकिन ज्यादा मसालेदार खाने से पेट में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है जिससे अल्सर हो सकता है। ठंड के मौसम में अल्सर के ज्यादा मरीज मिलते हैं क्योंकि इस मौसम में लोग ज्यादा मसाला खाते हैं।
* दिल के लिए :
मसालेदार भोजन दिल के लिए भी फायदेमंद होता है। मसालों में खासकर मिर्च खाने से दिल मजबूत होता है। इसके अलावा लाल मिर्च रोग-प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करती है। लेकिन आप इस बात को ध्यान में रखें कि आपका शरीर कितना मसाला सहन कर सकता है।
* बहुत गरम होता है :
यह तो सच है कि मसाला खाना शरीर के लिए फायदेमंद होता है लेकिन इसके बहुत नुकसान भी हैं। मसालेदार खाने से भूख समाप्त हो जाती है, बुखार भी हो सकता है, मसूढ़ों में सूजन और नाक से खून भी निकल सकता है। मिर्च और मसाला गर्भवती महिलाओं और बवासीर के रोगियों को तो बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।
* अन्य फायदे और नुकसान :
स्पाइसी फूड कब्ज की समस्या को दूर करता है। यह शरीर की गंदगी को बाहर फेंकता है और शरीर को साफ-सुथरा बनाता है। यदि आप साइनस, सिरदर्द, मितली या कफ से पीड़ित हैं तो स्पाइसी फूड खाइए। जो लोग ज्यादा मसालेदार भोजन करते हैं उन्हें ज्यादा पसीना आता है और उनके दांत भी गंदे रहते हैं।
कुल मिलाकर इन तथ्यों का सार यह है कि बैलेंस डाइट में आप उचित मात्रा में मसालों का उपयोग करेंगे तो यह आपके लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद साबित होंगे। और यह तो सभी को मालूम है कि अति हर चीज की बुरी है।  

भूमध्य आहार श्ौली बचाएगी डायबिटीज से

दिल से जुड़ी कई बीमारियों और डायबिटीज के मरीजों के लिए एक अच्छी खबर है। श्ाोधकर्ताओं ने दावा किया है कि भूमध्य आहार श्ौली अपना कर टाइप-2 डायबिटीज की आश्ांका को 30 प्रतिश्ात तक कम किया जा सकता है। यह श्ाोध 'एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन" में प्रकाश्ाित हुआ है।
श्ाोधकर्ताओं के मुताबिक हृदय संबंधी बीमारियों और डायबिटीज से बचने के लिए लोगों को भूमध्य आहार जैसे फल, सब्जी, साबुत अनाज, मछली, ऑलिव ऑयल और मेवों का इस्तेमाल श्ाुरूकर देना चाहिए। इस आहार श्ौली का पालन करने के दौरान व्यायाम और वजन कम करने के अन्य उपाय जारी रखे जा सकते हैं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में सहायक प्रोफेसर पीटर कोहेन ने बताया कि इस आहार श्ौली के अपने अतिरिक्त फायदे हैं। श्ाोध के दौरान स्पेन में 3,541 प्रतिभागियों को श्ाामिल किया गया। श्ाोध की श्ाुरुआत में किसी भी प्रतिभागी को डायबटीज की समस्या नहीं थी लेकिन दिल से जुड़ी कुछ बीमारियां थी। श्ाोधकर्ताओं ने पाया कि भूमध्य आहार लेने के एक निश्चित समय के बाद प्रतिभागियों में डायबिटीज की आश्ांका काफी कम पाई गई। भूमध्य आहार में विभिन्ना तरह की सब्जियां, फल, मेवा, जैतून का तेल, समुद्री भोजन जैसे मछली आदि का सेवन शामिल होता है।  

ठंड में बरतें सावधानी...

अगर आप हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हैं या आपके घर में कोई ऐसा मरीज है तो सर्दियों में आपको अधिक एहतियात बरतने की जरूरत है। कई शोधों में यह माना जा चुका है कि ब्लड प्रेशर सर्दियों में अधिक होता है जबकि गर्मियों में कम। ऐसे में इस मौसम की कड़कती ठंड में हाई बीपी के मरीजों को दिल के दौरे या स्ट्रोक की समस्या सबसे अधिक होने की आशंका होती है।
* क्यों बढ़ता है बीपी :
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ठंडे तापमान की वजह से शरीर के ब्लड वेसल्स पतले होने लगते हैं जिसमें रक्त संचार के लिए अधिक प्रेशर लगता है और व्यक्ति का ब्लड प्रेशर हाई रहता है।
डॉक्टरों का मानना है कि ठंड में हाई बीपी 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए सबसे अधिक खतरनाक होता है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह खतरा और भी बढ़ता है।
* कैसे करें बचाव :
ठंड में हाई बीपी की समस्या आपको कम परेशान करे इसके लिए इस मौसम में कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी हैं। मसलन,
*नियमित तौर पर अपने बीपी की जांच करें।
*बीपी की दवाओं में इस मौसम में कोताही न बरतें।
*ठंड से बचाव के लिए शरीर को पूरी तरह ढंक कर रखें, जिससे शरीर को बाहर का तापमान कम प्रभावित करें।
*बहुत अधिक नमक व ऑयली डाइट से बचें।
*शराब और धूम्रपान से बचें। 

क्या आप भी वजन कम करना चाहते हैं?

क्या आप भी कई दिनों से अपना वजन कंट्रोल करने की कोशिश में लगे हुए हैं और सफलता नहीं मिल रही। तो आपको जरा अपने डाइनिंग टेबल पर सजी क्रॉकरी पर ध्यान देना होगा। जी हां, क्योंकि यह क्रॉकरी भी आपका वजन कम करने में मदद कर सकती है। यकीन नहीं होता है मगर यह सच है। हाल में वजन कम करने को लेकर प्रकाशित एक खबर में कहा गया है कि आप यदि वजन कम करना चाहते हैं तो जिस प्लेट में खाते हैं उसका रंग बदल दें!
'फीमेलफर्स्ट डॉट सीओ डॉट यूके" ऑनलाइन पत्रिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि लोग सफेद रंग की प्लेट की जगह पर किसी चमकीले रंग की प्लेट में खाना खाते हैं तो इससे खाने की मात्रा कम हो जाती है।  श्ाोध में पता चला है कि खाना और प्लेट के रंगों से तो कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन इस बात से फर्क पड़ता है कि दोनों के रंगों में कितना अंतर है।
इसके मुताबिक यदि लोग सफेद प्लेट में चावल खाते हैं तो वे अधिक मात्रा में खा लेते हैं। वैसे ही यदि टोमेटो सॉस के साथ लाल सुर्ख पास्ता को यदि लाल प्लेट में खाया जाए तो वह भी बहुत ज्यादा खाने में आता है। इसके विपरीत विभिन्ना तरह के रंगीन भोजन को उससे भिन्ना रंग वाली प्लेटों में रखा जाए तो उसकी मात्रा उतनी नहीं लगती है। यानी कि चावल को यदि लाल प्लेट में खाया जाए और पास्ता को सफेद में तो वह कम मात्रा में खाए जाएंगे।
पोषण्ा विश्ोषज्ञ मेलिना जंपोलिस के हवाले से 'फोर्ब्स पत्रिका" ने कहा है कि इस तरीके से लोग अपना वजन घटा सकते हैं। यदि ऐसा कुछ है तो आप भी इसे ट्राय तो कर ही सकते हैं।  

वाकई जादू है धूप...

सर्दियों की गुनगुनी धूप में बैठना किसे अच्छा नहीं लगता होगा। कड़ाके की सर्दी में थोड़ी-सी भी धूप के आते ही मन बेहद सुकून पाता है। उस प्राकृतिक गर्मी से ठंड तो एक ही पल में भाग जाती है। केवल यही नहीं धूप को विटामिन 'डी" का सबसे उत्तम स्रोत माना जाता है। धूप में उचित समय बिताने से न सिर्फ हमारी हड्डियां मजबूत होती हैं बल्कि हम भी पूरी तरह से स्वस्थ रहते हैं। प्रकृति की इस देन को जादू कहना गलत न होगा क्योंकि सूर्य की रश्मियों से मिलने वाली ऊर्जा लोगों को ऊर्जावान बनाती है। पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, जीव-जंतु सबके जीवन के लिए यह बेहद जरूरी है।
धूप से शरीर को कई सारे पोषक तत्व मिलते हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। मगर हाल ही में किए ताजा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने धूप और मानसिक स्वास्थ्य के संबंधों को जानने की कोशिश की है। जिसमें उन्होंने धूप के इंसानी दिमाग पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बताया है। शोधकर्ताओं के अनुसार सर्दियों में ली गई धूप मानसिक रोगों से बचाव करती है। सर्दियों में सूरज की रोशनी से कई मानसिक रोगों का खतरा कम हो जाता है। लेकिन अधिकतर लोगों के लिए इस धूप का आनंद और लाभ लेना मुमकिन ही नहीं हो पाता। वे धूप निकलने से पहले ही दफ्तर चले जाते हैं और फिर शाम को भी धूप ढलने के बाद ही दफ्तर से निकल पाते हैं।
*सैड से पीड़ित होने का खतरा :
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस कारण लोग धूप के संपर्क में नहीं आ पाते और उनको मानसिक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने इस डिस्ऑर्डर को 'सीजनल अफेक्टिव डिस्ऑर्डर" (सैड) नाम दिया है। सैड नामक इस डिस्ऑर्डर की वजह से लोगों को बैचेनी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है।
*2000 वयस्कों से बातचीत :
 शोधकर्ताओं ने एक सर्वे के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला। इस सर्वे में तकरीबन 2000 वयस्कों से बातचीत की और उनसे पूछा गया कि पूरे दिन में वह कितनी बार सूरज की रोशनी में आ पाते हैं। इनमें से अधिकांश लोगों ने बताया कि उन्हें ऑफिस के चलते सारा दिन धूप नसीब नहीं होती।
यही वजह है आज के युवाओं में विटामिन 'डी" की डेफिशिएन्सी ज्यादा देखी जा रही है। ऑफिसों में पूरे समय एयर कंडीशनर में बैठे रहने के कारण प्राकृतिक माहौल से कर्मचारी वैसे ही दूर हो जाते हैं। ऊपर से आज का खानपान उन्हें कई तरह की समस्याओं से ग्रस्त कर रहा है।
*थोड़ा समय निकालें :
शोधकर्ताओं का कहना है कि भले ही पूरा दिन काम की व्यस्तता में चला जाए लेकिन पूरे दिन में 10 से 15 मिनट धूप में बैठना शरीर को ऊर्जावान बनाने के लिए जरूरी है। ऐसा करते हुए हम अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता आसानी से बढ़ा सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।  

सर्दियों में कुछ इस तरह हो नौनिहालों की देखभाल

सर्दी के मौसम में यदि थोड़ी-सी भी लापरवाही बरती गई तो बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। सर्दी में छोटे बच्चों को काफी दिक्कत आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि बच्चों के हाथ और पैर बचाकर रखे जाएं तो उन्हें सर्दी से लगने से बचाया जा सकता है। कई लोगों में भ्रम की स्थिति होती है कि बच्चों को रोज न नहलाया जाए लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों को रोज नहलाने से वे बैक्टीरिया से दूर रहेंगे। इसके अलावा उन्हें पानी भी खूब पिलाना चाहिए।
डॉक्टरों के मुताबिक इतना पानी पिलाएं ताकि वे कम से कम छह से सात बार टॉयलेट जरूर जाएं। पानी नहीं पिलाने से उनमें डिहाइड्रेशन की दिक्कत हो सकती है।
*नहलाने से पहले मालिश :
बच्चों को रोजाना जरूर नहलाना चाहिए। इससे वे कीटाणु से दूर रहेंगे और सर्दी-जुकाम से भी बचे रहेंगे। सिर, हाथ और पैर ढंक कर रखंे।
1.दो महीने से बड़े बच्चों को हर रोज नहलाएं। यदि बच्चा बीमार है तो उसे एक दिन छोड़कर नहलाएं। जिस दिन नहीं नहला रहे हैं, उस दिन गरम पानी के तौलिए से उसका बदन जरूर पोंछे।
2.डेढ़ साल से छोटे बच्चों को बाथरूम की बजाय कमरे में नहलाएं। बाथरूम का तापमान थोड़ा कम रहता है।
3.नहाने से पहले बच्चों के शरीर में नारियल के तेल से मालिश करना चाहिए। मालिश के 20 मिनट बाद बच्चों को नहलाएं। मालिश के लिए बादाम, जैतून और अन्य तेल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
2. खाना खाने के तुरंत बाद मालिश नहीं करें। उसके बाद कपड़े पहना दें। फिर नहलाएं। नहाने के लिए गुनगुना पानी होना चाहिए।
*सोते वक्त ज्यादा कपड़े न पहनाएं :
1.बच्चों को कपड़े लेयर में पहनाएं। सिर में टोपी जरूर हों। पैर में ऊनी मोजे और हाथ में दस्ताने।
2.गरम कमरे से सीधे बच्चों को बाहर न ले जाएं। अगर हीटर और ब्लोअर चलाए हुए हैं तो बाहर जाने से 10 मिनट पहले बंद कर दें।
3.बच्चों का बिस्तर गरम होना चाहिए। पतली रजाई या पतला कंबल बिछा सकते हैं।
4.सोते वक्त बच्चों को ज्यादा कपड़े न पहनाएं। इससे रात के वक्त बच्चा बैचेन हो सकता है।
* गरम तरल पदार्थ पिलाते रहें :
1. सर्दियों में छोटे बच्चों में सबसे बड़ी दिक्कत डिहाइड्रेशन की होती है। इसलिए डेढ़ साल से ऊपर के बच्चों को लगातार गुनगुना पानी, गरम दूध, चाय और सूप भी पिलाते रहें।
2. इससे कम उम्र के बच्चों को पानी, मां का दूध पिलाएं और काजू-बादाम पीसकर दें।
3. एक साल से छोटे बच्चों को शहद की बूंदें भी चटा सकते हैं।
4. बच्चों को तला भोजन बिलकुल न दें।
* जल्द से जल्द बाल विशेषज्ञ को दिखाएं :
1. सर्दी-जुकाम होने पर बच्चों को भाप दें। कम से कम तीन बार।
2. तरल पदार्थ उसे जरूर देते रहें। पानी भी गुनगुना दें।
3. बच्चों को जल्द से जल्द बाल विशेषज्ञ को दिखाएं। 

सोमवार, 20 जनवरी 2014

आंखों से नींद चुरा लेता है वाई-फाई

डेनमार्क की स्कूली छात्राओं के दल ने एक हैरतअंगेज वैज्ञानिक तथ्य का खुलासा किया है। इन्होंने अपने साधारण वैज्ञानिक प्रयोग के जरिए यह साबित किया है कि वाई-फाई उपकरण इंसान की सेहत पर बुरा असर डालते हैं। इससे निकलने वाली रेडियो तरंगों से नींद तक उचट जाती है। डेनमार्क के हेलर्प स्कूल की इन छात्राओं का कहना है कि सोते समय मोबाइल फोन पास रखने से उन्हें पूरे दिन क्लास में ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हुई। कुछ छात्राओं की तो नींद भी बाधित हुई।
*पौधों पर किया प्रयोग :
छात्राओं ने यह प्रयोग पौधों पर भी किया। उन्होंने वायरलैस रूटर का इस्तेमाल किया, जिनसे मोबाइल जैसी ही रेडियो तरंगें निकलती हैं। छात्राओं ने वाई-फाई रूटर के बगल में रखकर जब पौधे उगाने की कोशिश की तो अधिकतर बीज मर गए। इसके लिए उन्होंने कमरे में छह पौधों की ट्रे रखी, जहां वाई-फाई रूटर या मोबाइल नहीं था। वहीं दूसरे कमरे में वाई-फाई रूटर के साथ पौधों की छह ट्रे रखीं। देखा कि 12 दिनों में वाई-फाई रूटर के कमरे में रखे गए पौधे के बीज मर गए जबकि दूसरे कमरे के बीज अंकुरित हो गए थे।
इससे पहले अध्ययन में यह कहा गया था कि वायरलेस रेडियो सिग्नल के पास उगे पेड़ों के पत्ते सूख जाते हैं। यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि एक वर्ष तक वाई-फाई रूटर के नजदीक रहने पर कोई व्यक्ति उतनी ही रेडियो तरंगें झेलता है, जितना 20 मिनट के फोन कॉल से निकलती हैं। इसके अलावा वाई-फाई रूटर से घर में इस्तेमाल होने वाले माइक्रोवेव के मुकाबले एक लाख गुना हानिकारक तरंगें निकलती हैं।
*ये सावधानियां भी बरतें :
वायरलेस रेडियो तरंगें कुछ दूरी के बाद खत्म हो जाती हैं। वाई-फाई तरंगों के प्रभाव से बचने के लिए लैपटॉप को मेज पर रखकर काम करना बेहतर होगा न कि गोद में। इसके अलावा रूटर से तीन फुट की दूरी भी अच्छी रहेगी।  

कम नींद से होता है ब्रेन टिशु को नुकसान

कई बार ऐसा होता है कि जब हम सुबह सोकर उठते हैं और हमें महसूस होता है जैसे सिर में जोर से चोट लगी हो। वैज्ञानिकों की मानें तो इसके लिए नींद की कमी जिम्मेदार है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि एक रात भी पूरी नींद नहीं होने पर ब्रेन में ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी सिर में चोट लगने पर होती है।
स्वीडन स्थित 'उपासला यूनिवर्सिटी" के नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि हानिकारक रसायनों की बढ़ती सक्रियता ब्रेन के टिशुज् पर भी बुरा असर डालती है।
*केमिकल रिएक्शन बढ़ जाती है :
शोधकर्ताओं के अनुसार सिर में चोट लगने पर एनएसई" और 'एस-100" नामक रसायन की सक्रियता बढ़ जाती है। नींद में कमी होने पर भी इसी रसायन की सक्रियता बढ़ती है इसलिए दोनों स्थिति में लोगों को एक-सा अनुभव होता है। उन्होंने युवा उम्र के पुरुषों पर निष्कर्ष कर यह निष्कर्ष निकाला है। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा।
एक समूह को पर्याप्त नींद लेने की छूट दी गई जबकि दूसरे समूह को सोने नहीं दिया गया। इसके बाद दोनों समूहों के मुस्तिष्क की स्कैनिंग की गई। जिन लोगों ने जागकर रात गुजारी थी उनमें 'एनएसई" और 'एस-100बी" रसायन प्रतिक्रिया अधिक थी। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि नींद की कमी से इस रसायन की सक्रियता उतनी नहीं बढ़ती जितनी सिर में चोट लगने की वजह से बढ़ जाती है। मगर फिर भी कुछ हद तक इंसान के मस्तिष्क पर इसका असर देखा जा सकता है। दिनभर सक्रिय रहने के दौरान मस्तिष्क में कुछ जहरीले तत्व जमा हो जाते हैं जिनमें 'एनएसई" और 'एस-100बी" रसायन भी शामिल हैं। सोने के दौरान मस्तिष्क इनकी सफाई करता है ठीक से सो नहीं पाने के कारण इन हानिकारक तत्वों का खात्मा नहीं हो पाता, जो मस्तिष्क के लिए घातक हो सकता है। पूर्व अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि नींद में लगातार कमी अल्जाइमर और पार्किंसन्स जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।  

इलाज से बेहतर है बचाव

सर्दियों का लुत्फ अपनी जगह है लेकिन दमा, जुकाम से लेकर गठिया तक के मरीजों के लिए इस मौसम में तकलीफ बढ़ने की कई वजहें हैं। ऐसे में अगर आप इस मौसम में बिल्कुल चुस्त-दुरुस्त रहना चाहते हैं तो इन उपायों से आप इस मौसम में बेहतर बचाव कर पाएंगे।
* पोषण से दूर न रहें :
सर्दियों में बीमारियों से बचने के लिए सबसे पहला कदम है डाइट। यदि डाइट संतुलित और आवश्यकतानुसार होगी तो बीमारियां दूर भागेंगी। सर्दियों की डाइट में विशेषकर ऐसे पदार्थों को शामिल करना चाहिए, जिनमें विटामिन-सी भरपूर मात्रा में हो। विटामिन-सी शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मददगार होता है। इसके लिए आप डाइट में मौसमी, संतरा, नीबू, शिमला मिर्च ब्रोकली शामिल कर सकते हैं। यदि आप इन्हें कच्चा नहीं खा सकते तो इनका जूस बनाकर सेवन करें।
* एक्सरसाइज नहीं भूलना :
सर्दियों में भी रोगमुक्त रहना है तो एक्सरसाइज से मुंह न मोड़ें। एक शोध के मुताबिक सर्दियों में नियमित व्यायाम का असर लंबे समय तक रहता है और यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बनाए रखता है। व्यायाम आपकी डाइट को भी बनाए रखता है।
व्यायाम करने से आपको भूख ज्यादा लगेगी और भूख ज्यादा लगने से आप ज्यादा खाएंगे। ज्यादा खाने से शरीर को आवश्यक पोषक तत्व मिलेंगे, जो संक्रमण से लड़ने में सहायक होंगे। अमेरिका में किए गए एक शोध के दौरान सामने आया कि तेज चाल से चलने वाले लोगों में बीमार होने की प्रवृत्ति में अन्य लोगों की तुलना में 40 प्रतिशत तक कमी आई।
सप्ताह में पांच दिन रोजाना बीस मिनट व्यायाम करने से अन्य दिनों की तुलना में सर्दियों में लोग कम बीमार पड़ते हैं। लेकिन पानी में तैरने जैसे व्यायाम से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है और तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर भी बढ़ सकता है।
* साफ-सफाई का ध्यान :
अमेरिका के मेयो क्लीनिक के एक शोध के अनुसार सर्दियों में ज्यादा बैक्टीरिया और वायरस हाथों के माध्यम से ही शरीर के अंदर पहुंचते हैं। बीमारियों को फैलने से रोकने का सबसे अच्छा उपाय है कि छींकने या खांसने के बाद हाथों को एंटीबैक्टीरियल साबुन से अच्छी तरफ साफ करें। खाना खाने से पहले और बाद में अच्छे तरीके से हाथ धोना न भूलें।
* अच्छी नींद :
अच्छी नींद की कमी आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर डालती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से आप आसानी से सर्दियों में होने वाली बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। ब्राजील में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि कम नींद लेने से हमारे शरीर में सफेद रक्त कोशिकाएं कम हो जाती हैं और शरीर संक्रमण से लड़ने में कमजोर होता है।
आप अपना रोजाना सोने का समय निर्धारित करें। हल्का संगीत सुनें, सोने से पहले गर्म पानी से स्नान करें, रात में सोने से पहले कम्प्यूटर का प्रयोग बिल्कुल न करें, क्योंकि यह दिमाग में मेलाटोनिन का स्तर बढ़ा देता है।
* सोशल एक्टिविटी :
सर्दियों में आप आराम करने की बजाय सोशल एक्टिविटी में बिजी रहें तो यह आपके स्वास्थ्य के लिए ज्यादा अच्छा है। यह आपका तनाव तो कम करता ही है साथ ही आपके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बनाए रखता है। यदि आप सर्दियों में रजाई के लोभ में पड़ गए तो यह सेहत पर बुरा असर डाल सकता है। सर्दियों में आराम को तवज्जो देने के बजाय काम करते रहें, दोस्तों को रात के खाने पर बुलाएं, घूमें, फिल्म देखने जा सकते हैं या फिर पार्क में भी टहल सकते हैं। 

इन उपायों से कम करें बिजली का बिल

ठंड में रात भर हीटर तापने या ब्लोअर के आगे बैठना जहां आपके के बिजली के बिल को दोगुना कर देता है, वहीं हर समय ऐसा संभव भी नहीं है। ऐसे में अगर आप घर गर्म रखने के लिए अपने घर के भीतर ये बदलाव करेंगे तो बिजली का बिल भी कम आएगा और ठंड में काम करने में आपको दिक्कत भी नहीं होगी।
* मोटे पर्दे लगाएं :
घर की 40 प्रतिशत ठंड का हिस्सा खिड़की और दरवाजे से आने वाली हवाओं का होता है। ऐसे में बचाव के लिए खिड़कियों पर मोटे फैब्रिक के पर्दे लगाएं, जिससे हवा से वाकई बचाव हो सके। अगर आपके घर में नेटेड पर्दे हैं तो इन्हें मोटे पर्दों के साथ कॉम्बिनेशन में भी लगा सकते हैं।
* हीटर जलाते वक्त रखें ध्यान :
हीटर आप सारी रात नहीं जला सकते। इससे वातावरण की नमी भी खत्म होती है और आक्सीजन की कमीं भी होती है। बिजली का बिल तो बढ़ता ही है। ऐसे में एक से दो घंटे भी अगर आप हीटर जलाते हैं तो इससे थोड़ी दूरी पर एक बाल्टी में पानी रखें। जिससे ड्राइनेस भी न हो और हीटर बंद करने के बाद भी कमरे का तापमान बना रहेगा।
* मैट और कालीन :
घर के हर कोने में कालीन हो ऐसा जरूरी नहीं है लेकिन बिस्तर के आसपास और लिविंग रूप में आप कालीन की जगह कॉटन मैट या चटाइयों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे फर्श की ठंड से आप बचे रहेंगे।
* कमरे हमेशा खोलकर न रखें :
जिन कमरों में आप बैठें नहीं हैं उन्हें बेवजह खोलकर न रखें। उनके दरवाजे हो सके तो बंद करके रखें, जिससे कमरे की गर्माहट बनी रहे। दिन में हो सके तो धूप निकलने पर खिड़की या दरवाजे जरूर खोलें, जिससे धूप से कमरा प्राकृतिक रूप से थोड़ा गर्म हो सके।  

गर्भनिरोधक दवाओं से स्तन कैंसर का खतरा

गर्भ निरोधक दवाओं का नियमित रूप से सेवन महिलाओं की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के शोध का दावा है कि जो महिलाएं नियमित तौर पर इन दवाओं का सेवन करती हैं, उनमें ब्रेस्ट कैंसर का खतरा ज्यादा होता है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर दावा किया है कि जो महिलाएं नियमित तौर पर गर्भ निरोधक दवाएं लेती हैं उन्हें दूसरों की अपेक्षा ब्रेस्ट कैंसर का खतरा 9.5 गुना अधिक होता है। शोध के अनुसार महिलाओं में बढ़ते ब्रेस्ट कैंसर के मामलों के पीछे गर्भ निरोधक गोलियों के अलावा, जल्दी मासिक चक्र का शुरू होना, देर से शादियां और कम समय तक ब्रेस्ट फीडिंग जैसे कारण भी माने गए हैं। शोध के दौरान 640 महिलाओं का परीक्षण किया गया, जिसमें 320 महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की मरीज हैं। शोधकर्ता डॉ. उमेश कपिल के अनुसार शोध में हमने पाया कि लंबे समय तक गर्भ निरोधक गोलियों के सेवन से महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सबसे अधिक बढ़ा, जो 11.0 प्रतिशत है। उनका मानना है कि इन दवाओं में मौजूद एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरॉन को लंबे समय तक लेने से शरीर में हार्मोनल असंतुलन होता है जिसकी वजह से ब्रेस्ट कैंसर की आशंका बढ़ जाती है।  

प्रेग्नेंसी में विटामिन 'डी" की खुराक जरूरी

प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं में विटामिन 'डी" की उचित मात्रा बच्चों की वृद्धि में लाभदायक होती है। हाल ही एक नए शोध में बताया गया है कि गर्भवती महिलाओं द्वारा उचित  मात्रा में लिया विटामिन 'डी" बच्चे में उम्र के साथ मसल्स को मजबूत करने में मददगार होता है। जिन माताओं में विटामिन 'डी" की कमी होती है उनके बच्चों के मसल्स कमजोर होते हंै। जिसका असर बचपन से लेकर वयस्क होने तक दिखाई देता है।
यह शोध गर्भावस्था के दौरान विटामिन 'डी" और बच्चों के विकास को ध्यान में रखते हुए किया गया है। ब्रिटेन की साउथैंपटन यूनिवर्सिटी के सीनियर लेक्चरर निकोलस हार्वे ने बताया कि मसल्स स्ट्रेंथ न होने का असर बचपन में तो दिखाई देता ही है बल्कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ डायबिटीज, गिरने के लक्षण और फ्रेक्चरर होने की आशंकाएं ज्यादा बढ़ जाती हैं। इसके तहत शोधकर्ताओं ने तकरीबन ऐसी 678 गर्भवती महिलाओं का चयन किया, जिनकी गर्भावस्था अंतिम दौर में थी। उनमें विटामिन 'डी" का स्तर मापा गया। इसके बाद देखा गया कि जिन मांओं ने विटामिन 'डी" की भरपूर खुराक ली और जिनमें विटामिन 'डी" का स्तर उचित मात्रा में था। उनके बच्चों में मसल्स स्ट्रेंथ कमजोर होने की आशंका न के बराबर थीं। वहीं दूसरी ओर ऐसी मांएं जिनमें विटामिन 'डी" का स्तर कम था, उनके बच्चों में इस संदर्भ में कई तरह की समस्याएं देखी गईं। यह शोध 'जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्रॉइनोलॉजी एंड मेटाबोलिज्म" में प्रकाशित किया गया है। सामान्यत: महिलाओं में विटामिन 'डी" का स्तर कम देखा जाता है। यही वजह है कि उन्हें गर्भावस्था में अतिरिक्त विटामीन डी लेने की सलाह दी जाती है। जिसका असर उनके होने वाले बच्चे पर भी पड़ता है और दोनों ही स्वस्थ रहते हैं।  

विटामिन 'ई" के सेवन से नहीं बढ़ता अल्जाइमर

अल्जाइमर के मरीजों के लिए विटामिन 'ई" फायदेमंद है। विटामिन 'ई" की नियमित खुराक अल्जाइमर के रोगियों में कार्य करने की गति को बढ़ा सकती है। अध्ययनकर्ताओं ने अल्जाइमर के मरीजों में अल्फा टोकोफेरोल और एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी नैदानिक (क्लीनिकल) प्रगति को धीमा करने में प्रभावी बताया है। अल्फा टोकोफेरोल, वसा में घुलनशील एक विटामिन है। मिनीपोलिस वीए हेल्थ केयर सिस्टम के मौरिस डब्ल्यू डिस्केन ने कहा कि हमने एसिटाइलकोलिन की क्रिया को रोकने वाले एंजाइम के अवरोधक का सेवन करने वाले अल्जाइमर मरीजों में विटामिन 'ई" एवं मेमैनटाइन की प्रभावशीलता एवं सुरक्षा स्तर को परखा। इस जांच में 14 चिकित्सा केंद्रों से 613 मरीज शामिल हुए । प्रतिभागियों ने प्रतिदिन 2,000 आईयू विटामिन 'ई" या प्रतिदिन 20 ग्राम मेमैनटाइन या विटामिन 'ई" और मेमैनटाइन को संयुक्त रूप से या एक ऐसे मिश्रण का सेवन किया, जिसमें किसी तरह की दवा नहीं होती। चिकित्सा विज्ञान की शोध पत्रिका 'जर्नल ऑफ द अमेरिका मेडिकल एसोसिएशन" में प्रकाशित इस अध्ययन में दावा किया गया है कि बिना दवा वाले मिश्रण की अपेक्षा विटामिन 'ई" का सेवन करने वाले मरीजों में कायात्मक पतन अपेक्षाकृत धीमा था। अन्य औषधियों ने इस प्रयोग में किसी तरह की चिकित्सकीय प्रगति नहीं दिखाई। 

नट्स का सेवन रखता है एलर्जी से दूर!

अक्सर देखा गया है कि बच्चे नट्स  खाने में बड़ी आनाकानी करते हैं। कभी-कभार तो ऐसा भी होता है कुछ बच्चों को नट्स से एलर्जी रहती है। इस बात को विस्तृत रूप से जानने के लिए हाल ही में किया गया शोध मददगार हो सकता है। इसमें कहा गया है कि उन बच्चों को नट्स (मेवा-बादाम आदि) खाने में कोई एलर्जी नहीं होती है जिनकी मांएं गर्भावस्था के दौरान इनका सेवन करती हैं।
जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) पीडिएट्रिक्स में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है। करीब 8000 बच्चे और उनकी मां का विश्लेषण करने के बाद अमेरिकी शोधकर्ता इस नतीजे तक पहुंचे हैं। इनके मुताबिक गर्भावस्था के दौरान कुछ खान-पान की चीजों के इस्तेमाल से बच्चे भी उन चीजों के प्रति सहज रूप से आदी हो जाते हैं। हालांकि यह नतीजा उन अध्ययनों से मेल नहीं खाता है, जिसमें बताया गया है कि बादाम के सेवन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
* नतीजे पर आम सहमति नहीं :
इस अध्ययन के लेखक डॉक्टर लिंडसे फ्रेजयिर बोस्टन स्थित डाना फेबर चिल्ड्रन कैंसर से जुड़े हैं। उनके मुताबिक अगर गर्भावस्था के दौरान कोई मां बादाम आदि का सेवन करती हैं तो उनके बच्चों में उनसे एलर्जी की आशंका एक तिहाई कम हो जाती है।
सूखे मेवे में अखरोट, बादाम, पिश्ता, काजू, पीकान, पहाड़ी बादाम और मूंगफली आते हैं। शोधकर्ताओं ने इसके आधार पर यह भी उम्मीद जताई है कि मेवे और बादाम के सेवन से एलर्जी को दूर किया जा सकता है। हालांकि एलर्जी को दूर भगाने में अन्य दूसरे कारक भी अहम होंगे।
गायज् एंड सेंट थॉमस एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के चिल्ड्रन एलर्जिस्ट कंसल्टेंट डॉक्टर एडम फॉक्स ने कहा कि अभी तक इस अध्ययन को लेकर एकसमान राय नहीं मिल रही है, इसलिए मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को न तो नट्स (बादाम आदि) खाने से परहेज करना चाहिए और न ही इसका खूब इस्तेमाल करना चाहिए।
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Consuming nuts keeps you away from allergies!

It has often been observed that children are very reluctant to eat nuts. Sometimes it happens that some children are allergic to nuts. Recent research can be helpful to know this in detail. It states that those children whose mothers consume them during pregnancy do not have any allergies in eating nuts (dry fruits etc.).

The study has been published in the Journal of American Medical Association (JAMA) Pediatrics. American researchers have reached this conclusion after analyzing about 8000 children and their mothers. According to them, children also become naturally addicted to those things by using certain food items during pregnancy. This result, however, does not match those studies which reported that almond intake has no effect.

 No consensus on the outcome:

The author of this study, Doctor Lindsey Frazier, is associated with Boston-based Dana Faber Children's Cancer. According to him, if a mother consumes almonds etc. during pregnancy, the chances of allergies in their children are reduced by one third.
Dry fruits include walnuts, almonds, pishtas, cashews, pecans, mountain almonds and peanuts. Researchers have also hoped on the basis that allergies can be overcome by the consumption of nuts and almonds. However, other factors will also be important in warding off allergies.
Dr. Adam Fox, the Children's Allergist Consultant of the Guys and St. Thomas NHS Foundation Trust, said that as of now there is no consensus about the study, so currently women are neither nuts (almonds) during pregnancy according to international provisions. Food should not be avoided nor should it be used extensively.


Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

प्याज की महक से माइग्रेन का खतरा

प्याज काटते वक्त आंखों से आंसू आना एक आम बात है मगर शायद आपको यह जानकार आश्चर्य हो सकता है कि प्याज की महक आपकी सेहत के लिए काफी खतरनाक भी हो सकती है! जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में सामने आया है कि यह माइग्रेन की बड़ी वजह हो सकता है। एक ब्रिटिश शोध में शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि प्याज, फैटी फूड और क्लीनर की महक भी माइग्रेन के लिए ट्रिगर हो सकते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल के शोध की मानें तो 50 प्रतिशत से अधिक माइग्रेन के मरीज महक के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं और उनकी इस स्थिति को 'ऑस्मोफोबिया" कहते हैं।
शोध में यह भी माना गया है कि माइग्रेन की मरीज 70 प्रतिशत महिलाओं को सिरदर्द की समस्या के पीछे प्याज से लेकर होम क्लीनर तक कई तरह की महक शामिल है।
उनका मानना है कि प्याज की महक का प्रभाव दिमाग के उस हिस्से पर अधिक पड़ता है, जहां दिमाग महक और भावनाओं को नियंत्रित करता है। यही वजह है कि इसके संपर्क में आते ही संवेदनशील लोगों में माइग्रेन का दर्द शुरू हो जाता है।
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Onion fragrance threatens migraine

Tearing the eyes while cutting onions is a common thing, but perhaps you may be surprised to know that the smell of onions can also be very dangerous for your health! Yes, a recent research has revealed that it can be a major cause of migraine. Researchers in a British research have claimed that onions, fatty foods and the smell of cleaners may also be triggers for migraines.

According to research from the University of Liverpool, more than 50 percent of migraine patients are susceptible to fragrance and call this condition "osmophobia".

Research has also assumed that 70 percent of migraine patients have a variety of smells, from onions to home cleaners, behind the headache problem.

They believe that the smell of onion has more effect on the part of the brain where the brain controls the smell and emotions. This is the reason that migraine pain starts in sensitive people as soon as it comes in contact.

Dharmendra Singh Rajawat www.movetonature.blogspot.com