मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

जानलेवा संक्रमण के इलाज की उम्मीद

वैज्ञानिकों ने मानव में जानलेवा संक्रमण्ाों के इलाज की दिश्ाा में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रोटीन की पहचान की है, जो कि ब्रेन कैंसर, इबोला, इंफ्लुएंजा, हेपेटाइटिस और सुपरबग बैक्टीरिया जैसी बीमारियों के इलाज में महत्वपूणर््ा हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने प्रोटीन जीआरपी-78 और इससे संबद्ध प्रोटीनों को लक्ष्य करते हुए यह प्रयोग किया। वर्जीनिया राष्ट्रमंडल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पॉल डेंट ने कहा कि जीआरपी-78 और संबद्ध प्रोटीनों पर लक्ष्य करने से कैंसर सेल को मिटाया जा सकता है। इसके जरिए हमने वायरस की वृद्धि को रोकने में भी कामयाबी हासिल की। यह चेपरोन समूह का प्रोटीन है। चेपरोन का काम प्रोटीन के अंदर अमीनो एसिड को आकार देना और उन प्रोटीनों को सक्रिय रखने का होता है। नए श्ाोध से ऐसे संक्रमण्ाों का इलाज संभव हो सकता है, जिन्हें अब तक असाध्य माना जाता है।
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Hope for treatment of fatal infection

Scientists have achieved a major breakthrough in the treatment of fatal infections in humans. Scientists have identified a protein that may be important in treating diseases such as brain cancer, Ebola, influenza, hepatitis, and superbug bacteria.
Scientists carried out the experiment, targeting the protein GRP-78 and its associated proteins. Professor Paul Dent of Virginia Commonwealth University stated that aiming at GRP-78 and associated proteins can eradicate cancer cells. Through this we also succeeded in stopping the growth of virus. It is a protein of the chaperone group. The function of the chaperone is to shape the amino acids inside the protein and to keep those proteins active. With the new diagnosis, it is possible to treat such infections, which till now are considered incurable.


Dharmendra Singh   movetonature.blogspot.com

मांसाहार से कैंसर की आशंका

वैज्ञानिकों ने मांस (रेड मीट) में पाए जाने वाली एक ऐसी शर्करा  की पहचान की है, जो कि कैंसर का कारण हो सकती है। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक समेत वैज्ञानिकों के एक दल ने अपने अध्ययन में पाया कि मांस में पाई जाने वाली न्यूजीसी शर्करा  कैंसर के विकास का कारण हो सकती है। यह शर्करा  मनुष्य के अतिरिक्त लगभग सभी स्तनधारी जीवों में पाई जाती है। चूहे पर किए गए परीक्षण में पाया गया कि यह शर्करा  उसमें तेजी से कैंसर के विकास का कारण बनी। वैज्ञानिकों का कहना है कि रेड मीट (गाय, सुअर और भेड़) का सेवन करने से यह शर्करा  मनुष्य के शरीर में पहुंचती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रमुख शोधकर्ता अजीत वार्की ने कहा कि निह संदेह मांस की सीमित मात्रा पोषण का स्रोत होती है। इस प्रयोग से हमें मांस के सेवन और बीमारियों के बीच संबंध का बेहतर पता चल सकेगा।
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Non-veg cancer threat

Scientists have identified a sugar found in meat (red meat) that may be the cause of cancer. A team of scientists, including a scientist of Indian origin, found in their study that the newgc sugars found in meat can be the cause of cancer development. This sugar is found in almost all mammalian organisms except humans. Tests conducted on rats found that this sugar caused rapid cancer development in it. Scientists say that by consuming red meat (cow, pig and sheep), this sugar reaches the human body. University of California lead researcher Ajit Varki said that a limited amount of meat is a source of nutrition. With this experiment, we will get to know better the relation between meat consumption and diseases.

Dharmendra Singh   movetonature.blogspot.com

जन्म के साल से भी तय होता है मोटापा

वैज्ञानिकों ने पाया है कि किसी व्यक्ति में मोटापे के लिए उसके जन्म का साल भी काफी हद तक जिम्मेदार है। उनका कहना है कि जिस जीन के कारण्ा मोटापा बढ़ता है वह व्यक्ति के जन्म वर्ष से प्रभावित होता है। किसी खास वषर््ा में वह ज्यादा प्रभावी तो दूसरे साल में कम असरदार होता है। मसलन 1942 से पहले जन्मे लोगों में मोटापे का खतरा उसके बाद पैदा होने वाले लोगों की तुलना में कम रही। एक हालिया अध्ययन में श्ाोधकर्ताओं ने उपरोक्त निष्कर्ष निकाला। उनका मानना है कि ऐसा लोगों में मोटापे के लिए जिम्मेदार एफटीओ जीन की मौजूदगी के कारण्ा होता है, जो किसी खास वषर््ा में ज्यादा सक्रिय रहता है। श्ाोध में यह भी पता चला है कि हाल में मोटापे के मामलों में आई तेजी के पीछे एक कारण्ा पर्यावरण्ा में आया बदलाव भी है। मैसाच्युसेट्स जनरल हॉस्पिटल (एमजीएच) के मनोरोग चिकित्सा विभाग के श्ाोधकर्ता जेम्स नील्स रोसेनकिस्ट ने बताया,'फ्रैमिंघम हृदय अध्ययन में श्ाामिल प्रतिभागियों को देखकर हमें पता चला कि मोटापे के लिए जिम्मेदार एक जीन और बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआइ) के बीच पारस्परिक संबंध प्रतिभागियों के जन्म के वषर््ा के साथ्ा-साथ्ा बढ़ता गया।" उन्होंने कहा,'अपनी तरह के इन पहले नतीजों से पता चलता है कि जीन के प्रकार और व्यक्ति की श्ाारीरिक बनावट का संबंध उसके जन्म के वषर््ा पर निर्भर हो सकता है, फिर भले ही मामला एक परिवार में पैदा होने का क्यों न हो?" श्ाोधकर्ताओं ने यह अध्ययन 1971 और 2008 के बीच 27 से 63 वषर््ा के प्रतिभागियों से एकत्र आंकड़ों के आधार पर किया। अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों के बीएमआइ और उनमें आनुवांश्ािक रूप से आए एफटीओ जीन के प्रकार को आठ बार मापा गया। जहां 1942 से पहले जन्म लेने वाले लोगों के बीएमआइ और मोटापे के लिए जिम्मेदार जीन के बीच कोई संबंध ज्ञात नहीं हुआ, वहीं 1942 के बाद पैदा होने वाले लोगों में यह पारस्परिक संबंध दोगुना मिला। जर्नल पीएनएएस अर्ली एडीश्ान में प्रकाश्ाित अध्ययन में यह भी बताया गया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद प्रौद्योगिकी का प्रयोग बढ़ने, उच्च कैलोरीयुक्त भोजन और श्रम के कार्यों में कमी आने के कारण्ा भी मोटापे के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई।
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Obesity is determined by year of birth

Scientists have found that the year of birth is also largely responsible for obesity in a person. He says that the gene that causes obesity is affected by the person's birth year. It is more effective in a particular year and less effective in the second year. For example, people born before 1942 had lower risk of obesity than those born after that. In a recent study, researchers concluded the above. They believe this is due to the presence of the FTO gene responsible for obesity in people, which is more active in a particular year. It has also been found in the research that one of the reasons behind the recent increase in obesity cases is the change in the environment. Researcher James Niels Rosenkist of the Department of Psychiatry at Massachusetts General Hospital (MGH) said, "By looking at the participants in the Framingham Heart Study, we found that the correlation between a gene responsible for obesity and the body mass index (BMI) was related to the participants." With the year of birth grew. "He said, 'These first results of its kind show that Screen type and concerned Shaaririk makes the person may depend on his birth Vsrra, even if the case may be to be born into a family? " Scholars conducted the study between 1971 and 2008 based on data collected from participants aged 27 to 63. During the study, the participants' BMI and the type of FTO gene that came genetically in them were measured eight times. While no association between BMI and the genes responsible for obesity was known to those born before 1942, this correlation was found to be doubled among those born after 1942. The study, published in the journal PNAS Early Edison, also reported that after World War II, there was an increase in obesity cases due to increased use of technology, high calorie food and decreased labor.

Dharmendra Singh   movetonature.blogspot.com

रविवार, 21 दिसंबर 2014

ईश्वर एक सोच और धर्म एक व्यवस्था

  धर्मेंद्र सिंह राजावत
ईश्वर का कोई साकार रूप नहीं है। मुझे नहीं लगता है कि किसी ने उसको देखा होगा। अलबत्ता, उसका अहसास ज्यादातर लोगों ने किया होगा। क्योंकि, वह व्यक्ति के मानसिक तंत्र को कंट्रोल करने वाला सिस्टम है। एक सोच है। यही वजह है कि साइंस उसको नहीं मानता, क्योंकि साइंस सोच को परिभाषित नहीं कर सकता। आप जरा दिमाग पर जोर डालिए। हमारे दिमाग को जब ईश्वर की मौजूदगी का अहसास होता है तो हमें एक सार्थक ऊर्जा मिलती है। उसकी आस्था हमें इस बात का विश्वास दिलाती है कि हम अपने मिशन में फतेह होंगे। उसके द्वारा दंड देने का डर हमें बुरा करने से रोकता है। यही सोच तो ईश्वर है। हां, धर्म और समाज के ठेकेदारों ने उसे अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित कर जटिल जरूर बना दिया है।
जिस तरह मानसिक तंत्र को कंट्रोल करने वाला सिस्टम, सोच ईश्वर कहलाता है, ठीक उसी तरह सामाजिक व्यवस्था को कंट्रोल करने वाला सिस्टम धर्म कहलाता है। मेरा मानना है कि धर्म की स्थापना इसी उद्देश्य के साथ की गई होगी, मगर जिस तरह समाज के ठेकेदारों ने ईश्वर का उपयोग किया ठीक उसी तरह से धर्म का भी। उन्होंने उसे अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया। धर्म किसी को किसी का विरोधी नहीं बनाता। वह इंसान को इंसान के और इंसान को प्रकृति के खिलाफ नहीं करता। हां, इतना हो सकता है कि इतनी भीड़ में वह आपको पहचान देता हो, मगर इसका अभिप्राय अच्छे-बुरे से बिलकुल नहीं हो सकता। मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, मगर मजहब के ठेकेदारों का क्या?
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God one thinking and religion one system

Dharmendra Singh Rajawat

There is no true form of God. I don't think anyone would have seen that. However, most people would have realized it. Because, it is the system controlling the mental system of the person. Is a thought. This is the reason that science does not believe it, because science cannot define thinking. Insist on your mind. When our mind feels the presence of God, we get a meaningful energy. His faith gives us the confidence that we will be in our mission. The fear of punishing him prevents us from doing evil. This thinking is God. Yes, the contractors of religion and society have made it complex by defining it according to their convenience.

Just as the system controlling the mental system is called thinking God, similarly the system controlling the social system is called religion. I believe that religion should have been established with this purpose, but just as the contractors of the society used God, in the same way, religion too. He defined it at his convenience. Religion does not make anyone hostile to anyone. He does not do man against man and man against nature. Yes, it is possible that he recognizes you in such a crowd, but it can not mean good or bad at all. Religion does not teach hatred among themselves, but what about the contractors of the religion?

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बुधवार, 10 दिसंबर 2014

ब्रेस्ट कैंसर का पता लगाने में जिंक टेस्ट मददगार

एक सामान्य खून परीक्षण्ा से श्ारीर के जिंक में बदलावों की जांच प्रेारंभिक अवस्था में ब्रेस्ट कैंसर का पता लगाने में मदद कर सकती है। यह एक श्ाोध में पता चला है। प्रमुख श्ाोधकर्ता और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े फियोना लार्नर ने कहा, 'एक दश्ाक पहले यह जाना गया था कि ब्रेस्ट कैंसर के ऊतकों में उच्च सांद्रता वाले जिंक होते हैं, लेकिन इसके सटीक आण्ाविक तंत्र को लेकर रहस्य बना रहा।" उन्होंने बताया, 'हमारे श्ाोध से पता चला कि पृथ्वी विज्ञान में सामान्य तौर पर उपयोग में आने वाली पद्धतियां न केवल जिंक बल्कि ब्रेस्ट कैंसर को समझने में हमारी मदद कर सकती हैं।" इस श्ाोध का प्रकाश्ान मेटालोमिक्स जर्नल में किया गया है।
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Zinc test helpful in detecting breast cancer

Examining changes in the body's zinc from a normal blood test can help detect breast cancer in early stages. It is revealed in a research. Fiona Larner, a leading scholar and associated with Oxford University, said, "A decade ago it was known that breast cancer tissue contains high concentrations of zinc, but the mystery about its exact molecular mechanism remained." Research showed that the methods commonly used in Earth science help us understand not only zinc but also breast cancer. Can. This research has been published in the journal Metallomics.

Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

आलू का अर्क नियंत्रित कर सकता है मोटापा

आलू प्रेेमियों के लिए खुश्ाखबरी! श्ाोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि आलू का एक सामान्य अर्क उच्च वसा युक्त भोजन से बढ़ने वाले वजन को सीमित कर सकता है।
मैकगिल यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने बताया कि इस अर्क के लाभ की वजह उच्च सांद्रता वाले पॉलीफेनोल्स हैं। ये एक लाभकारी रासायनिक घटक हैं जो फलों और सब्जियों में भी पाए जाते हैं। एक श्ाोधकर्ता लुइस एगेलोन ने बताया, 'हम लोग इन निष्कर्षों से अचंभित हैं। वास्तव में हमारा ख्याल था कि यह सही नहीं हो सकता है। हमने यह सुनिश्चित करने के लिए दूसरे मौसम में पैदा हुए आलू से तैयार अर्क का दोबारा परीक्षण्ा किया।" श्ाोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष चूहों पर किए गए अपने परीक्षण्ाों से निकाला है। यह अध्ययन मोलीक्यूलर न्यूट्रिश्ान जर्नल में प्रकाश्ाित किया गया है।
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Potato extract can control obesity

Good news for potato lovers! Scholars have discovered that a common potato extract may limit weight gain from high-fat food.
Scholars at McGill University reported that the benefit of this extract is due to the high concentration of polyphenols. These are a beneficial chemical ingredient found in fruits and vegetables as well. Luis Egelon, an investigator, said, 'We are taken aback by these findings. Actually we thought that this could not be right. We re-tested extracts prepared from second-season potato to make sure. "The researchers have drawn this conclusion from their own trials on mice. The study has been published in the Journal of Molecular Nutrition.

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मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

क्यों भाता है सबको मीठा भोजन

 हमें मीठा खाना इतना अच्छा क्यों लगता है ? वैज्ञानिकों ने इसका जवाब खोज लिया है। शोकर्ताओं ने मनुष्य के दिमाग में एक ऐसी प्रणाली का पता लगाया है जो लोगों को ग्लूकोजयुक्त मीठे भोजन के लिए उकसाती है। मीठा यानी ग्लूकोज शरीर के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।
वैज्ञानिकों ने अपने शो में पाया कि हमारे दिमाग में ग्लूकोकिनास नाम का एक एंजाइम होता है। यह लीवर और पेनक्रियाज यानी पाचक ग्रंथी में ग्लूकोज की मौजूदगी को भांपने में मदद करता है। यह एंजाइम ही हमारी मीठा खाने की इच्छा जगाने में मुख्य भूमिका अदा करता है। शोकर्ताओं का कहना है कि किसी व्यक्ति के भोजन में बदलाव लाकर उसकी मीठा खाने की इच्छा को कम-ज्यादा करना संभव होगा।

दिमाग को चाहिए मीठा

मुख्य शोकर्ता इम्पीरियल कॉलेज के जेम्स गार्डनर ने कहा कि हमारा दिमाग ऊर्जा के लिए ग्लूकोज यानी मीठे पर पूरी तरह निर्भर है। इसलिए हमारे मन में मीठे भोजन के प्रति गहरी चाह होती है।

चूहों पर किया प्रयोग

शोकर्ताओं ने पाया कि जब चूहों को 24 घंटे तक खाना नहीं दिया गया तो उनके दिमाग के पाचन प्रणाली को संचालित करने वाले ग्लूकोकिनास की सक्रियता में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके बाद उन्हें ग्लूकोज के घोल के साथ-साथ चाऊ नाम की अन्ना की गोलियां परोसी गई। जब वैज्ञानिकों ने चूहों के हायपोथेलेमस में एक विषाणु के का इस्तेमाल करते हुए ग्लूकोकिनास की गतिवि को बढ़ाया तो चूहों ने चाऊ के बजाए ग्लूकोज यानी मीठे पर ावा बोलना पसंद किया। जब ग्लूकोकिनास की मात्रा घटाई गई तो उन्हंे ग्लूकोज कम पसंद आया।

पहली बार पता चला

गार्डनर ने कहा कि यह तो सभी जानते हैं कि दिमाग आम तौर पर शरीर में ऊर्जा ग्रहण  के लिए प्रतिक्रिया देता है, मगर यह पहला मौका है जब वैज्ञानिकों ने दिमाग की ऐसी प्रणाली का पता लगाया जो एक खास पोषक तत्व के प्रति प्रतिक्रिया देती है। उन्होंने कहा कि जब आप भोजन के बारे में विचार करें तो केवल कैलोरी के बारे में न सोचें बल्की विभिन्ना पोषक तत्वों के बारे में सोचें। यह शो क्लीनिकल इन्वेस्टिगेशन जरनल में प्रकाशित हुआ है।
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Why everyone likes sweet food  

Why do we like sweet food so much? Scientists have found the answer. The exploiters have discovered a system in the human mind that provokes people to eat glucose-rich food. Sweet means glucose is the main source of energy for the body.
Scientists in their show found that our brain contains an enzyme called glucokinase. It helps in sensing the presence of glucose in the liver and pancreas. It is this enzyme that plays a major role in arousing our desire to eat sweet. The showers say that by changing the food of a person, it will be possible to reduce his desire to eat sweet.


Mind needs sweet

James Gardner of Imperial College, the main showrunner, said that our brain is completely dependent on glucose for energy. Therefore, we have a deep desire for sweet food.

Experiments on mice

Shores found that when rats were not fed for 24 hours, a rapid increase in the activation of glucokinases that operated their brain's digestive system was recorded. After this, he was served Anna's pills named Chow along with glucose solution. When scientists increased the activity of glucokinase by using a virus in mice's hypothalamus, the mice preferred to use glucose instead of chow. He liked less glucose when the amount of glucokinase was reduced.

First discovered

Gardner said that everyone knows that the brain normally responds to energy in the body, but this is the first time scientists have discovered a system of the brain that responds to a particular nutrient. He said that when you think about food, do not just think about calories but think of different nutrients. The show has been published in the Clinical Investigation Journal.


Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

सोमवार, 24 नवंबर 2014

अकेले होने की वजह आनुवांशिकी

अगर आप भी दुनिया में अब तक अकेले हैं, प्रेमी-प्रेमिका बनाने में रुचि नहीं रखते या फिर शादी करने का मन नहीं करता तो यह आपकी किस्मत का नहीं आपके जीन का किया धरा है। दरअसल, वैज्ञानिकों ने जीन 5-एचटीए1 नामक जीन की पहचान की है जो आपको किसी के करीब जाने से रोकता है।
वैज्ञानिकों ने अपने शोध में उस जीन की पहचान की जिसकी उपस्थ्ािति से किसी के अविवाहित या किसी से संबंध न होने की संभावना 20 फीसद तक बढ़ जाती है। माना जा रहा है कि यह जीन मस्तिष्क के अच्छा महसूस कराने वाले रसायन सेरोटोनिन के स्राव को कम करके व्यक्ति को करीबी रिश्तों में असहज बना देता है। वैज्ञानिकों ने करीब 600 छात्रों के बालों के जरिए एक खास जीन 5-एचटीए1 का अध्ययन किया। यह जीन दो प्रारूपों 'जी" और 'सी" में पाया जाता है। जिन लोगों में 'जी" प्रारूप था, उनमें दूसरे की तुलना में अकेले रहने की संभावना ज्यादा पाई गई। 'जी" प्रारूप वाले लोगों में सेरोटोनिन का स्राव कम होता है और उनके लिए किसी से करीबी रिश्ता रख पाना ज्यादा असहज होता है। साथ ही ऐसे लोगों के तनावग्रस्त होने की आशंका ज्यादा होती है।
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Genetics cause of being alone

If you are still alone in the world, are not interested in making a lover or girlfriend or do not feel like getting married, then it is not your luck but your genes. Indeed, scientists have identified a gene called gene 5-HTA1 that prevents you from getting close to anyone.
Scientists in their research identified a gene whose presence increases the probability of someone being single or unrelated to them by 20 percent. This gene is believed to reduce the secretion of serotonin, the brain's feel-good chemical, to make a person uncomfortable in close relationships. Scientists studied a particular gene 5-HTA1 through the hair of about 600 students. This gene is found in two formats 'G "and' C". People who had the 'G "format were more likely to live alone than others. People with the' G" format had lower serotonin secretion and were more uncomfortable to have a close relationship with. Also, there is a greater possibility of such people getting stressed.


Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

इंसान के जीन में ही होती है बेवफाई

कोई इंसान बेवफा नहीं होता बल्कि उसके जीन ही उसे बेवफा बना देते हैं। नए श्ाोध में वैज्ञानिकों का कहना है कि एक खास किस्म का जीन किसी के धोखा देने की आदत की वजह होता है। इतना ही नहीं बेवफाई की ये आदत खानदानी भी हो सकती है।
ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि बेवफाई की आदत माता-पिता या दादा-दादी से आनुवांश्ािक तौर पर भी मिल सकती है। उन्होंने एक ऐसे खास जीन की पहचान भी की जिसमें बदलाव के कारण्ा किसी महिला में धोखा देने की आदत बन जाती है। अध्ययन के प्रमुख डॉ. ब्रेंडन जीश्ा ने कहा, 'हमारे श्ाोध में यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि लोगों की जेनेटिक संरचना इस बात पर प्रभाव डालती है कि उनकी अपने साथ्ाी के अतिरिक्त किसी अन्य से संबंध बनाने की कितनी संभावना है।"
उन्होंने कहा, 'किसी विश्ोष्ा जीन के बारे में पता लगाना मुश्किल है क्योंकि मनुष्य के व्यवहार के पीछे हजारों जींस की भूमिका होती है। लेकिन हमें महिलाओं में उनकी बेवफाई के लिए जिम्मेदार एक विश्ोष्ा जीन के प्रमाण्ा मिले हैं। ये जीन है एवीपीआरआइए। हालांकि इस दिश्ाा में और अध्ययन किए जाने की जरूरत है।" यह अध्ययन 18 से 49 की उम्र के 7,300 से ज्यादा जुड़वां लोगों पर किया गया। विश्लेष्ाण्ा में श्ाोधकर्ताओं ने पाया कि 63 फीसद पुरुष्ाों और 40 फीसदी महिलाओं में बेवफाई आनुवांश्ािक जीन के कारण्ा थ्ाी। वहीं महिलाओं में एक खास जीन एवीपीआरआइए में बदलाव का उनकी बेवफाई की आदत पर असर देखा गया।
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Infidelity occurs only in the genes of humans

A human is not infidel but his genes make him unfaithful. In the new research, scientists say that a certain type of gene is the cause of one's habit of cheating. Not only this, this habit of infidelity can also be dynastic.
Scholars at the University of Queensland, Australia, found in their study that infidelity habits can be inherited genetically from parents or grandparents. He also identified a particular gene in which change caused habit of cheating in a woman. The head of the study, Dr. Brendan Jiesha, said, "It became perfectly clear in our research that people's genetic structure affects how likely they are to be related to someone other than their own partner."
He said, 'It is difficult to find out about any Vishwa gene because thousands of jeans have a role behind human behavior. But we have found evidence of a Vishwas gene responsible for their infidelity in women. This gene is AVPRIA. However, further studies need to be done in this direction. "The study was conducted on more than 7,300 twins between the ages of 18 and 49. Analysts found that 63 percent of men and 40 percent of women had infidelity genetic genes. At the same time, a change in a particular gene AVPRIA in women was seen to have an effect on their infidelity habit.


Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

मुश्किलों में याद आते हैं भगवान

'दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय"। यह पंक्ति करीब चार सौ साल पहले हमारे संत कबीर ने कह दी थी, लेकिन पश्चिमी जगत को एक अंरराष्ट्रीय अध्ययन के जरिए शायद अब जाकर इस 'रहस्य" का पता चला।
इस बारे में हुए अंतरराष्ट्रीय शोध के न्यूजीलैंड में रहने वाले सह लेखक ने बताया कि जीवन के मुश्किल दौर में लोगों का भगवान और धर्म के प्रति झुकाव बढ़ जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड के मनोविज्ञान विभाग के रसेल ग्रे ने एक बयान में कहा- जब जीवन में मुश्किलें या अनिश्चिताएं बढ़ती हैं तो लोग भगवान में भरोसा करने लगते हैं। बेहद कठोर और अनिश्चित परिस्थितियों से घिर चुके लोगों को समाज में घुलना-मिलना भी काफी मददगार साबित होता है। अध्ययन में कहा गया है कि जिन समाजों में पानी और भोजन की उपलब्धता कम होती है वहां भगवान की बातें ज्यादा होती हैं।
विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के जोसेफ बुलबुलिया ने कहा कि इसके पहले हुए अध्ययनों का निष्कर्ष था कि मजबूत सामाजिक समूहों के निर्माण में धर्म बड़ी भूमिका निभाता है, लेकिन सामाजिक संबंधों के बनने की अवधारणा का अभी तक कोई व्यवस्थित परीक्षण नहीं हुआ है।
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God remembers in difficulties


"Do all you can do in sadness, do not do anything in happiness"
A co-author living in New Zealand, an international research about this, said that in the difficult times of life, people have an inclination towards God and religion. Russell Gray of the University of Auckland's Department of Psychology said in a statement - when difficulties or uncertainties increase in life, people begin to trust God. It is also helpful to get people involved in the society, surrounded by extremely harsh and uncertain circumstances. It has been said in the study that in societies where there is less availability of water and food, there is more talk of God.

Joseph Bulbulia of Victoria University said that earlier studies concluded that religion plays a large role in building strong social groups, but there has been no systematic test of the concept of social relationships being formed yet.

Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

कॅरिअर को प्रभावित करता है जीवनसाथी का व्यक्तित्व


(प्रे)। आपके वेतन में बढ़ोतरी, तरक्की और कॅरिअर की दूसरी कामयाबियों में आपका जीवन साथी महत्वपूणर््ा भूमिका निभा सकता है। यह तथ्य एक नए शोध में सामने आया है।
 वाश्ािंगटन यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर जोश्ाुआ जैक्सन के मुताबिक हमारा शोध यह दर्श्ााता है कि आपकी  व्यावसायिक कामयाबी में केवल आपके व्यक्त्ाित्व का प्रभाव ही नहीं पड़ता बल्कि आपके जीवनसाथी का व्यक्तित्व भी मायने रखता है। उनका कहना है कि इस तरह के अनुभव एकांकी नहीं है, जब आपका जीवनसाथी तरक्की या वेतन में बढ़ोतरी के लिए आपसे खतरा उठाने को कहता है। जैक्सन के मुताबिक इसके बजाय जीवनसाथी के व्यक्तित्व की छोटी-छोटी चीजें एक साथ इकट्ठा होकर आपको ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे आपको तरक्की मिले।
ऐसे किया गया शोध
यह शोध 19 से 89 वर्ष की उम्र के लगभग 5000 विवाहित लोगों पर पांच साल तक किया गया। इसमें नमूने के तौर पर श्ाामिल किए 75 फीसद लोगों के जीवनसाथी वर्किंग थे। शोधकर्ताओं ने उनका पांच कारकों के आधार पर मनोवैज्ञानिक टेस्ट किया, इसमें खुलापन, बहिर्मुखता, समप्रियता और कर्त्तव्यनिष्ठा आदि गुण्ा श्ाामिल थे। इन गुण्ाों का प्रभाव देखने के लिए उनके जीवनसाथी के कार्यस्थल पर कुछ बिंदुओं (काम में संतुष्टि, वेतन में वृद्धि और तरक्की) के आधार पर उनकी सालाना रिपोर्ट देखी गई। शोध के नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों को इन बिंदुओं के आधार पर कामयाबी मिली, उनके जीवनसाथी के क त्तव्यनिष्ठा में सबसे ज्यादा अंक थे, और यह स्त्रियों और पुरुषों दोनों के लिए सही पाया गया।
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Career personality affects career

(Pti). Your life partner can play an important role in increasing your salary, progress and other career successes. This fact has been revealed in a new research.

 According to Washua University Assistant Professor Joshua Jackson, our research shows that your professional success not only affects your personality but also your spouse's personality. They say that such experiences are not monogamous when your spouse asks you to take a risk for an increase in salary or salary. According to Jackson, instead of the small things of the life-partner's personality, they gather together to inspire you to do things that will make you progress.


Research done like this


The research was carried out for about 5000 married people between the ages of 19 and 89 for five years. 75% of the people included in this sample were working partners. Researchers conducted psychological tests based on five factors, including openness, extrovert, prominence, and dedication. To see the impact of these qualities, their annual reports were viewed based on certain points (satisfaction in work, increase in salary and promotion) at their spouse's workplace. The results of the research found that those who achieved success on the basis of these points had the highest scores in their spouse's sexuality, and found this to be true for both women and men.


Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

बुधवार, 17 सितंबर 2014

शेर-ओ-शायरी ः तेरा तराना

                                                      ख्वाबों की खाक में एक चिंगारी अब भी है।
दफन हो गईं यादों से यारी अब भी है।।
क्या पता किस मोड़ पर आप टकरा जाएं।
इसलिए उजड़े चमन में बहार अब भी है।।

गुम हो गई खिलखिलाहट की आहट मौजूद अब भी है।
जो भुला दिए उन लम्हों का वजूद अब भी है।।
ढूंढ़ कर तो देख बहाना कोई मिलने का ।
बंद आंखों में तेरा तराना अब भी है।।

                                               धर्मेंद्र सिंह  राजावत

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Sher-o-shayari thy terana

There is still a spark in the dream
Yari is still there from the memories buried.
Don't know at which point you bump into.
So there is still spring in the desolate chaman.

The sound of the lost blossom still exists.
Those moments that were forgotten still exist.
Seek and find an excuse to meet someone.
Your eyes are still closed in the eyes.


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Dharmendra Singh Rajawat                     www.movetonature.blogspot.com

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

नियमित ध्यान लगाइये, माइग्र्रेन से छुटकारा पाइए

प्रेट्र : नियमित रूप से ध्यान लगाने से माइग्रेन की समस्या से राहत मिल सकती है। हालिया शोध के तहत यह बातें कही गई हैं। वेक फोरेस्ट बैपटिस्ट में न्यूरोलॉजी के सहायक प्रोफेसर रिबेका इरविन वेल्स के मुताबिक, तनाव सिर दर्द और माइग्रेन का प्रमुख कारण है। नए शोध में हमने पता लगाया है कि माइंडफुलनेस बेस्ड स्ट्रेस रिडक्शन (एमबीएसआर) से युवाओं में माइग्रेन की समस्या से स्थायी रूप से राहत मिलती है।

युवाओं पर शोध
- 19 युवाओं को शोध में शामिल किया गया था।
- दस लोगों को एमबीएसआर का उपचार दिया गया और अन्य नौ को सामान्य चिकित्सीय सहायता.

क्या रहा परिणाम
- पहले समूह को हर सप्ताह कम से कम पांच दिन 45 मिनट के लिए एमबीएसआर तकनीक के जरिये ध्यान लगाने को कहा गया।
- इन युवाओं में पहले के मुकाबले माइग्रेन के दर्द में कमी आई
- हर महीने माइग्रेन की समस्या में 1.4 प्रतिशत की कमी आई।
क्या है एमबीएसआर
 स्वास्थ्य की विभिन्न् समस्याओं के लिए एमबीएसआर को पूरक दवाओं के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। एमबीएसआर तकनीक के तहत दवाओं का इस्तेमाल कम कर दिया जाता है और शारीरिक गतिविधियों को बढ़ा कर मरीज के आत्मबल को बढ़ाया जाता है।
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Get regular attention, get rid of migraine

PTI: Regular meditation can provide relief from migraine problem. These things have been said under recent research. According to Rebecca Irwin Wells, assistant professor of neurology at Wake Forrest Baptist, stress is the leading cause of headaches and migraines. In new research, we have discovered that Mindfulness Based Stress Reduction (MBSR) provides permanent relief from migraine problem in youth.


Research on youth
- 19 youth were included in the research.
Ten people were given treatment for MBSR and the other nine received general medical assistance.

What the result

- The first group was asked to meditate for 45 minutes at least five days every week through the MBSR technique.
- Migraine pain decreased in these young people than before
- Migraine problem decreased by 1.4 percent every month.

What is MBSR
 MBSR has been used as supplementary medicine for various health problems. The MBSR technique reduces the use of drugs and enhances the patient's self-confidence by increasing physical activity.

Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

बुधवार, 20 अगस्त 2014

दुनिया का पहला इको फ्रेंडली मंदिर ब्रिटेन में

उत्तर पश्चिम लंदन में दुनिया का पहला इको फ्रेंडली मंदिर बनाया गया है। इस हिदू मंदिर में सौर पैनल और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं।
किंग्सबरी में बने स्वामीनारायण मंदिर में भारतीय वास्तुकला और आधुनिक पर्यावरण संवेदी तकनीक का प्रयोग किया गया है। मंदिर की छत पर सौर पैनल के साथ वर्षा जल संचयन की व्यवस्था भी है। इसे दुनिया का पहला इको फ्रेंडली मंदिर माना जा रहा है। मंदिर को मंगलवार को लोगों के लिए खोल दिया गया। इस अवसर पर मंदिर के वैश्विक धार्मिक प्रमुख आचार्य स्वामीश्री महाराज उपस्थित रहे। इससे पहले भारत और स्कॉटलैंड के 150 से ज्यादा वादकों ने शांति मार्च निकाला। भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, पूर्वी अफ्रीका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिभागियों ने नृत्य, संगीत और कला का अनूठा उदाहरण पेश किया। लंदन के मेयर बोरिस जॉनसन ने इस नए मंदिर को विलक्षण और प्रभावशाली बताया।

सांभारः प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया
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World's first eco friendly temple in Britain

The world's first eco friendly temple has been built in North West London. Arrangements like solar panels and rain water harvesting have been made in this Hindu temple.
The Swaminarayan temple at Kingsbury uses Indian architecture and modern environmental sensing techniques. There is also a system of rainwater harvesting with solar panels on the roof of the temple. It is considered to be the first eco friendly temple in the world. The temple was opened to the public on Tuesday. Acharya Swamishri Maharaj, the global religious head of the temple, was present on the occasion. Earlier, more than 150 players from India and Scotland took out a peace march. Participants from India, Britain, America, East Africa, Europe and Australia set a unique example of dance, music and art. London Mayor Boris Johnson described the new temple as unique and impressive.



Logistics: Press Trust of India

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Dharmendra Singh    movetonature.blogspot.com

भारतीय मूल की महिला को दक्षिण अफ्रीका में शीर्ष सम्मान

जोहांसबर्ग, प्रेट्र : भारतीय मूल की दक्षिण्ा अफ्रीकी श्ािक्षाविद लीला पटेल को विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय ने अफ्रीकी देश्ाों की श्ाीषर््ा महिला श्ाोधार्थ्ाी के सम्मान से नवाजा है। विटवाटर्सरैंड यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाली लीला पटेल फिल्ाहाल अफ्रीका में सामाजिक विकास केंद्र में सामाजिक विकास अध्ययन की प्रोफेसर हैं। इस केंद्र की स्थ्ाापना उन्होंने 2002 में की थ्ाी।
यह वाष्र्ािक अवार्ड उस क्षेत्र में मास्टर या डाक्टर्स की डिग्री रखने वाली उन महिलाओं के काम को मान्यता देता है, जिनमें महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। पटेल ने 1994 में नेल्सन मंडेला की रिहाई के बाद देश्ा में समाज कल्याण्ा के क्षेत्र में आगे आकर काम किया थ्ाा। इसी साल देश्ा में चुनाव हुए थ्ो। चुनाव से एक साल पहले उनकी किताब आई थ्ाी, जिसमें उन्होंने समाज कल्याण्ा के जिन कानूनों की बात की थ्ाी, उन्हें तीन साल बाद संसद ने स्वीकार किया थ्ाा। उन्हें 2005 में सामाजिक कल्याण्ा विभाग का महानिदेश्ाक बनाया गया थ्ाा। इसी साल आई उनकी दूसरी किताब में दुनिया से गरीबी कम करने के विकल्प पर चर्चा की गई थ्ाी। 

बच्चों के नदी तैरकर स्कूल जाने पर गुजरात को नोटिस

नई दिल्ली, प्रेट्र: गुजरात के छोटा उदयपुर जिले के पांच गांवों के बच्चे अपनी जान जोखिम डालकर श्ािक्षा हासिल करने को मजबूर हैं। दरअसल इन गांवों से होकर गुजरती हिरन नदी पर कोई पुल नहीं होने की वजह करीब 125 बच्चों को तैरकर नदी उस पार सरकारी स्कूल जाना पड़ता है। इस बारे में आई एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि गुजरात सरकार के मुख्य सचिव से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया है। आयोग ने मामले को बाल अधिकारों का उल्लंघ्ान माना है। ग्रामीण्ाों का आरोप है कि वे लंबे समय से नदी पर पुल के निर्माण्ा की मांग कर रहे हैं, लेकिन प्रश्ाासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।

रविवार, 10 अगस्त 2014

वैज्ञानिकों ने बनाई दिमाग की तरह काम करने वाली चिप

न्यूयॉर्क(प्रेट्र)। भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक समेत श्ाोधकर्ताओं के एक दल ने मानव मस्तिष्क की तरह काम करने वाली एक चिप ईजाद की है। इस कंप्यूटर चिप का आकार एक पोस्टेज स्टांप जितना है।
इस चिप में 5.4 अरब ट्रांजिस्टर लगे हैं जो कि 10 लाख न्यूरॉन और 25.60 करोड़ न्यूरल कनेक्श्ान के समतुल्य क्षमता रखते हैं। दिमाग के अंदर की प्रक्रियाओं की नकल करने के लिए अलग-अलग चिप को एक-दूसरे के साथ्ा ठीक उसी तरह जोड़कर सर्किट बनाया जा सकता है, जैसा मस्तिष्क के अंदर होता है। लाइव साइंस में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि श्ाोधकर्ताओं ने 'ट्रूनॉथर््ा" चिप की मदद से तस्वीरों के अंदर व्यक्तियों और वस्तुओं को पहचानने का प्रयोग सफलतापूर्वक किया। पारंपरिक कंप्यूटरों में ऐसा करना बेहद चुनौतीपूणर््ा कार्य है। अध्ययन के प्रमुख श्ाोधकर्ता धर्मेंद्र मोधा ने कहा, 'हमने दिमाग नहीं बनाया है। मस्तिष्क की रचना और कार्यप्रण्ााली से सीखने का प्रयास किया है।" धर्मेंद्र कैलिफोर्निया स्थ्ाित आइबीएम रिसर्च के कॉग्निटिव कंप्यूटिंग ग्रुप के प्रमुख श्ाोधकर्ता हैं।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

लैब में बदला तितली के पंखों का रंग

प्रेट्र : वैज्ञानिकों ने पहली बार प्रयोगश्ााला में तितली के पंखों का रंग बदलने में कामयाबी हासिल की है। अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने भूरे रंग के पंखों वाली तितली के पंखों को बैंगनी में बदल दिया।
यूनिवर्सिटी में परिस्थ्ािति विज्ञान और विकासमूलक जीवविज्ञान के पूर्व प्रोफेसर एंटोनिया मोंतेरो के मुताबिक, हमने बिना यह जाने कि तितली के पंखों के लिए यह रंग पाया जा सकता है या नहीं, उसके लिए एक रंग की कल्पना की और फिर इसके लिए क्रमानुसार तितलियों का चयन किया। मोंतेरो और उनकी टीम ने बाइसाइकल्स एनायनना के पख्ंाों का रंग भूरे से बैंगनी किया। इस तितली का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इसकी कजन स्पेसीज में स्वतंत्र तौर पर दो बार बैंगनी रंग पाया गया थ्ाा।
अभी इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि प्रकृति में रंग कैस्ो पैदा होता है, हालांकि श्ाोधकर्ताओं ने हाल के वर्ष्ाों में विस्तृत रूप से इस प्रक्रिया का अध्ययन किया है।
रंग बदलने की प्रक्रिया के तरीकों में ज्यादातर वैज्ञानिक पहले प्रकृति में एक मनचाहा रंग पाने का प्रयास करते हैं और बाद में लैब में इसकी नकल करते हैं। 

बैक्टीरिया भी करते हैं सोशल नेटवर्किंग

प्रेट्र : सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन ये सच है। एक अध्ययन में पाया गया कि बैक्टीरिया भी एक दूसरे के साथ्ा संवाद स्थ्ाापित करते हैं। इस संवाद के जरिए ही वे मनुष्य समेत अन्य प्रजातियों को अपनी चपेट में लेने में सक्षम होते हैं। वैज्ञानिकों ने अपने श्ाोध में पाया कि संक्रमण्ा फैलाने के वक्त बैक्टीरिया एक दूसरे के साथ्ा मिलकर काम करते हैं। इस खोज से इस बात का पता लगाने में सफलता मिलेगी कि जानवरों की बीमारियां मनुष्यों को कैसे संक्रमित करती हैं। बैक्टीरिया माहौल में ढलने के लिए कुछ अण्ाु मुक्त करते हैं और इसी के जरिए एक दूसरे से संपर्क करते हैं। वैज्ञानिकों ने कहा कि ऐसे बैक्टीरिया जो अपने पनपने के लिए वातावरण्ा बनाने के लिए एक दूसरे का सहयोग करने में सक्षम होते हैं, वे मनुष्य समेत बहुत सी प्रजातियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इस खोज के जरिए ऐसी बीमारियों को वर्गीकृत करना आसान होगा जो ज्यादा प्रजातियों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। ऐसी बीमारियां मनुष्यों को आसानी से प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे वर्गीकरण्ा से स्वास्थ्य संबंधी खतरों को पहचानने और उनसे निपटने में आसानी होगी। मनुष्यों में पाए गए नए संक्रमण्ाों में से ज्यादातर ऐसी बीमारियों से फैले हैं जो कि जानवरों से मनुष्यों में आई हैं। इनमें एंथ्ा्राक्स और सुपरबग एमआरएसए जैसे बेहद गंभीर और कठिनाई से नियंत्रित होने वाले संक्रमण्ा श्ाामिल हैं। यह श्ाोध यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग की अगुवाई में करीब 200 बैक्टीरिया के जेनेटिक कोड के विश्लेष्ाण्ा के जरिए किया गया।  

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

एक पेड़ पर उगा दिए चालीस तरह के फल

प्रेट्र : एक अमेरिकी क लाकार ने आड़ू, बेर, खुबानी और चेरी जैसे गुठली वाले चालीस तरह के फल एक ही पेड़ पर उगाए हैं। सिराकस यूनिवर्सिटी के कला विभाग के एसोश्ािएट प्रोफे सर सैम वेन एकेन ने यह कारनामा कर दिखाया है। एकेन ने कुछ समय पहले ही एक प्रोजेक्ट में सब्जियां और फूल एक साथ्ा तैयार किए थ्ो। इस पर उनसे इनका बगीचा तैयार करने का आग्रह भी किया गया थ्ाा। जब उन्हें इसके लिए अनुदान दिया गया तो उन्होंने एक ही पेड़ पर पूरा बगीचा उगाने का विचार किया।
उगाने की इस प्रक्रिया में पेड़ों की कलम इकट्ठा करना श्ाामिल होता है। उसके बाद इन कलमों को पेड़ पर समान आकार के कट बनाकर उनमें पट्टी से बांध दिया जाता है। इसके बाद उस जगह से ही यह नई कलम पानी और हवा लेकर श्ााखा बन जाती है। गुठली वाले फलों में एक जैसी गुण्ासूत्र संरच्ाना होने के चलते ही ऐसा करना संभव है। एकेन के मुताबिक, जैसे-जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ा, मैने पाया कि गुठली वाले फलों की सैकड़ों प्रजातियां हैं जबकि हमें पंसारी की दुकान पर महज तीन या चार मिलती हैं। तब मैंने तय किया कि मैं एक पेड़ पर 40 फल्ा तैयार करूंगा।

रविवार, 1 जून 2014

गुजरात मॉडल की एक और तस्वीर

इससे पहले 11 मई 2014 को भी नईदुनिया के राष्ट्रीय संस्करण के पेज 6 पर गुजरात की हकीकत प्रकाशित की जा चुकी है।  

मंगलवार, 27 मई 2014

फेसबुक के ज्यादा करीब होते हैं अकेलेपन के शिकार

जिंदगी से निराश्ा और अकेलेपन के शिकार लोगों में सोश्ाल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर संवेदनश्ाील निजी जानकारियां साझ्ाा करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती हैं।
चार्ल्स स्टर्ट यूनिवर्सिटी (सीएसयू) के श्ाोधकर्ता लंबे समय से अकेलेपन और सोश्ाल नेटवर्किंग पर खुद को जाहिर करने के संबंधों का पता लगा रहे थे। स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग एंड मैथेमैटिक्स के सहायक प्रोफेसर यसलेम अल सग्गाफ और सीएसयू रिसर्च ऑफिस के श्ोरॉन नीलसन ने 600 से अधिक महिलाओं फेसबुक यूजर्स की प्रोफाइल का अध्ययन किया। इस सभी महिलाओं ने अपनी प्रोफाइल को पब्लिक किया हुआ था, जिसे सब देख सकते थे।
पुरूष भी कम नहीं
अल सग्गाफ के मुताबिक, पुरुषों में भी फेसबुक पर खुद को ज्यादा से ज्यादा जाहिर करने की प्रवृति कम नहीं होती। उन्होंने कहा, हमने खुद को अकेला बताने वाले 308 यूजर्स की जानकारियां इकट्ठा कीं। इसके बाद 308 ऐसे यूजर्स से बातचीत की जो फेसबुक को एक-दूसरे से संपर्क में रहने के लिए इस्तेमाल करते हैं। श्ाोधकर्ताओं ने पाया, 'अकेले लोगों ने फेसबुक पर निजी जानकारियां ज्यादा बांटीं। अकेलेपन के श्ािकार 79 प्रतिश्ात से अधिक यूजर्स ने अपनी पसंदीदा किताब, पसंदीदा फिल्म जैसी निजी जानकारियां साझ्ाा कीं थीं। 98 प्रतिश्ात ने अपना रिलेश्ानश्ािप स्टेटस सबके बीच साझ्ाा किया था।" यह श्ाोध जर्नल कंप्यूटर्स इन ह्यूमन विहेवियर में प्रकाश्ाित हुआ है।  

स्वभाविक है नाइट इटिंग सिंड्रोम

एजेंसी : ऐसे लोग जो रात में खाने के लिए उठते हैं वे इसके लिए अपने जीन को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं।
एक नए अनुसंधान से इस निष्कषर््ा पर पहुंचा गया है कि नाइट इटिंग सिंड्रोम उस समय हो सकता है जब जीन के चलते खाने के पैटर्न के साथ्ा नींद की दोष्ापूणर््ा तालमेल बैठता है। इससे खाने का समय बदल जाता है जो अधिक खाने और वजन बढ़ने से जुड़ा हुआ है। करीब एक से दो फीसद लोग इससे जूझ्ाते हैं। इसका लक्षण्ा रात में सोने के दौरान उठ जाना और बगैर कुछ खाए सो नहीं पाना। यह अध्ययन सेल रिपोर्ट्स में प्रकाश्ाित की गई है।

कम कैलोरी के भोजन से मंद हो सकता है स्तन कैंसर

आइएएनएस : स्तन कैंसर की वृद्धि पर अंकुश्ा लगाने का एक नया तरीका खोजा गया है। संयमित कैलोरी से फैलते स्तन कैंसर को धीमा किया जा सकता है। यह एक गैर विष्ााक्त तरीका है।
थ्ाॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी के एक एसोसिएट प्रोफेसर निकोल सिमोन ने कहा कि कम कैलोरी वाला भोजन स्तन के ऊतकों में एपीजेनेटिक को बढ़ाता है जो एक्ट्रासेलुलर मैट्रिक्स को मजबूत रखता है। उन्होंने कहा कि एक मजबूत मैट्रिक्स ट्यूमर के आसपास एक तरह का पिंजरा तैयार करता है। इससे श्ारीर के नए स्थ्ाानों पर कैंसर कोश्ािकाओं के लिए फैलाव में अधिक कठिनाई आती है। उल्लेखनीय है कि ट्यूमर वृद्धि पर अंकुश्ा लगाने के लिए अक्सर स्तन कैंसर रोगियों को हार्मोन थ्ोरेपी और कीमोथ्ोरेपी के दुष्परिण्ााम को प्रभावहीन करने के लिए स्टेरायॅड उपचार कराना पड़ता है। हालांकि दोनों ही उपचार रोगियों के पाचन में बदलाव का सबब बन सकते हैं जिससे उनमें मोटापा हो सकता है। सिमोन ने कहा कि इस वजह से एक महिला के कैंसर के उपचार में पाचन को देखना महत्वपूणर््ा है। इस अध्ययन का स्तन कैंसर श्ाोध और उपचार जर्नल में प्रकाश्ाित किया गया है।

रोबोट करेंगे अंतरिक्ष में मरम्मत का काम

आइएएनएस : जल्द ही अंतरिक्ष में मरम्मत के लिए स्पेसवॉक की मुश्किल प्रक्रिया इतिहास बन जाएगी। धरती पर इंसानों का बहुत सा काम संभालने के बाद अब अंतरिक्ष में भी रोबोट इंसान की जगह लेने जा रहे हैं। कनाडा का एक रोबोट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेश्ान (आइएसएस) में कनाडार्म2 के कैमरे और इसके मोबाइल बेस की मरम्मत कर रहा है।
डेक्सटर मरम्मत के इस हफ्ते भर के अभियान में लगा है। गुरुवार तक यह कनाडार्म2 में कैमरा बदलने और ठीक करने के काम को पूरा कर लेगा। कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि अंतरिक्ष में रोबोट द्वारा स्वयं की मरम्मत करने का यह पहला उदाहरण्ा है। एजेंसी के मिश्ान कंट्रोल सुपरवाइजर मैथ्यू केरन ने कहा कि निश्चित ही इन रोबोट की मदद से स्पेसवॉक की संख्या में कमी लाई जा सकेगी। इन रोबोट का नियंत्रण्ा कनाडा स्पेस एजेंसी के मुख्यालय और नासा के मिश्ान कंट्रोल सेंटर से किया गया है। एजेंसी ने कहा कि स्पेसवॉक एक जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए बहुत सारे संसाधनों की जरूरत पड़ जाती है, जबकि रोबोट के मामले में यह काफी आसान हो जाता है।
हर क्षेत्र में मददगार रोबोट
अस्पतालों में - यूरोप के बहुत से अस्पतालों में आपरेश्ान का काम रोबोट्स की मदद से
सेना में - अमेरिकी सेना सीमा पर सैनिकों की जगह रोबोट तैनात कर रही है
होटलों में- जापान की एक कंपनी ने ऐसा रोबोट विकसित किया है जो खाना बनाने में निपुण्ा है।
घ्ार के काम में मददगार- घ्ार के कामों में मदद के लिए तमाम तरह के रोबोट्स जापानी कंपनियां बाजार में बेचना श्ाुरू कर चुकी हैं

पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा होती हैं डिप्रेशन की शिकार

आइएएनएस : महिलाओं के डिप्रेश्ान (अवसाद) संबंधी बीमारियों से ग्र्रस्त होने की आश्ांका ज्यादा होती है। हालिया श्ाोध के मुताबिक, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के मस्तिष्क में हार्मोन एस्ट्रोजन अधिक पहुंचता है जिससे उनमें अवसाद व चिड़चिड़ापन ज्यादा रहता है। ये समस्याएं युवावस्था की श्ाुरुआत से ही सामने आने लगती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया के श्ाोधकर्ता थियोडोर के मुताबिक, इस श्ाोध के नतीजे किश्ाोरावस्था की श्ाुरुआत में चिड़चिड़ेपन, व्याग्रता और सीजोफ्रेनिया जैसे मनोविकारों को समझ्ाने में सहायता मिलेगी। आमतौर पर महिलाओं में चिंता और अवसाद की दिक्कत ज्यादा रहती है तो पुरुषों में  सीजोफ्रेनिया की आश्ांका अधिक रहती है। श्ाोधकर्ताओं ने आठ से 22 वर्ष की आयुवर्ग के 922 प्रतिभागियों के मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह के स्तर में बढ़ोतरी को समझ्ाने के लिए मैग्नेटिक रीजोनेंस इमेजिंग (एमआरआइ) का इस्तेमाल किया गया। थियोरोड ने पाया कि महिलाओं में भावनाओं व सामाजिक दबाव को नियंत्रित करने के दौरान मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है और जिस भाग में रक्त का प्रवाह बढ़ता है वह बौद्धिक गतिविधियों से संबंधित है। यह श्ाोध जर्नल नेश्ानल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाश्ाित हुआ है।

शनिवार, 24 मई 2014

दुनिया की सबसे शक्तिशाली मांओं में दो भारतीय मूल की महिलाएं

 आइएएनएस : दक्षिणी कैरोलिना रिपब्लिकन की गवर्नर निक्की हाले और सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस के लिबरल थ्ािंक टैंक की प्रमुख नीरा टंडन को दुनिया की सबसे शक्तिशाली मांओं में श्ाुमार किया गया है। वर्किंग मदर मैगजीन ने 2014 में दुनिया की 50 सबसे शक्तिशाली  मांओं की सूची तैयार की है।
भारत से आए भारतीय माता-पिता की संतान निक्की रंधावा हाले ने कई राजनीतिक आधारों को पार कर इस सूची में जगह बनाई है। वर्किंग मदर मैगजीन ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि निक्की सबसे कम उम्र में गवर्नर बनने के साथ्ा ही दक्षिण्ा कैरोलिना की पहली महिला गवर्नर भी हैं। निक्की 2010 में गवर्नर बनी थ्ाीं। निक्की के अलावा गवर्नर के पद पर एकमात्र भारतीय मूल के बॉबी जिंदल हैं। जिंदल लुइसियाना के गवर्नर हैं। गवर्नर बनने से पहले निक्की 2005 से 2010 तक दक्षिण्ा कैरोलिना के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कार्यरत रही थ्ाीं। वहीं, हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपति पद के चुनावी अभियान के दौरान पॉलिसी डायरेक्टर रही टंडन को इससे पहले फॉर्च्यून ने राजनीति की सबसे ताकतवर महिलाओं की सूची में भी श्ाामिल किया थ्ाा।  

जिसे कीट-पतंगा समझा, वो ड्रोन भी हो सकता है

आइएएनएस : चौंकिएगा मत अगर कभी आपको पता लगे कि आपके आसपास उड़ रहे कीट-पतंगो में कोई ड्रोन भी है। जी हां, पिज्जा डिलीवरी से लेकर आपके कुत्ते को मॉर्निंग वॉक कराने वाला ड्रोन अब आपको इस नए रूप में भी दिखाई दे सकता है। बचाव कार्यों के वक्त इन छोटे पतंगो के आकार के ड्रोन का प्रयोग किया जाएगा या फिर किसी बड़ी जगह की छानबीन के लिए चिड़िया की तरह उड़ते ड्रोन का इस्तेमाल करने की तैयारी है। सटीक लैंडिंग और बेहतर नियंत्रण्ा के कारण्ा ये उड़ने वाले रोबोट भविष्य में श्ाहरी इलाकों में छानबीन का श्ाानदार माध्यम बन सकेंगे। दुनियाभर के श्ाोधकर्ता इस समय अगली पीढ़ी का ड्रोन बनाने के लिए चिड़िया, चमगादड़, पतंगों और सांपों से प्रेरण्ाा ले रहे हैं। श्ाोधकर्ता इस प्रयास में हैं अगली पीढ़ी के ड्रोन तपती गर्मी, जमा देने वाली ठंड, बारिश्ा या तूफान में भी काम करने में सक्षम हों। हंगरी की एक श्ाोधकर्ता टीम ने एक ऐसी पद्धति इजाद की है जिसके जरिए एक से ज्यादा ड्रोन एक साथ्ा चिड़िया की तरह उड़ान भर सकेंगे। इस पद्धति को हाल ही में एक कार का पीछा करते नौ क्वाडकॉप्टरों पर सफलतापूर्वक परखा भी गया थ्ाा। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के श्ाोधकर्ताओं ने मिलीमीटर के आकार के ड्रोन भी तैयार किए हैं। इनका इस्तेमाल अति सघ्ान क्षेत्रों में किया जा सकेगा। इन छोटे उड़ने वाले रोबोट के सामने सबसे बड़ी समस्या तेज हवाओं और चक्रवात से आती है। श्ाोधकर्ता इस परेश्ाानी के निदान के लिए पतंगों के उड़ान के तरीकों का अध्ययन कर रहे हैं। 

शनिवार, 10 मई 2014

हकीकत गुजरात मॉडल की


गुजरात में आज भी लोग गड्डा खोद कर पानी पीते हैं। यह हकीकत है गुजरात मॉडल की। यदि विश्वास नहीं है तो 11 मई का नईदुनिया का राष्ट्रीय संस्करण  पढ़िए। पेज नंबर छह पर प्रकाशित खबर मोदी के दावों की पोल खोल रही है।