गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013


जवां दिखने की चाहत पूरी करेगी बस एक गोली

हर कोई चाहता है कि बढ़ती उम्र कभी उसके चेहरे से न झलक पाए। इस चाहत में लोग कई तरह के नुस्खों की मदद लेते हैं, लेकिन फिर भी वे अपनी इस चाहत को पूरा करने में सफल नहीं हो पाते हैं। हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी गोली बनाने का दावा किया है जो आपकी जवां दिखने की चाहत को पूरा कर सकता है! वैज्ञानिकों का कहना है कि इस गोली के सेवन से चेहरे की झुर्रियों को कम करने में मदद मिलती है, जिससे बढ़ती उम्र में भी जवां दिखा जा सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक इस गोली में पेड़ों से प्राप्त तत्वों और विटामिन का इस्तेमाल किया गया है। इसके इस्तेमाल से चेहरे की झर्रियों को दस फीसदी तक कम किया जा सकता है।
फिलहाल इस गोली का परीक्षण जर्मनी में चल रहा है। शोध में जिन महिलाओं ने इस गोली का सेवन किया उनके चेहरे की झुर्रियां दस प्रतिशत कम हो गईं। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह गोली त्वचा के रुखेपन को खत्म करती है जिससे झुर्रियां हट जाती हैं।
ये उपाय भी आपनाए जा सकते हैं

  • अंडे के सफेद हिस्से से झुर्रियों वाले हिस्से पर मालिश करने से इस समस्या से जल्द निजात पाई जा सकती है
  • खीरा काटकर उसे मलने से भी झुर्रियों से छुटकारा मिलता है
  • हल्दी या चंदन का लेप भी इस समस्या को दूर करने में काफी हद तक मददगार होता है
  • जैतून, बादाम या नारियल के तेल से भी त्वचा की मालिश झुर्रियों को हटा सकती है।  

रविवार, 29 सितंबर 2013

अच्छी खबर: भारतीय कवि ने जीता आयरलैंड का पुरस्कार

देश में राजनीति के शर्मसार करने वाले हालातों के बीच विदेश से एक अच्छी खबर आई है। भारतीय मूल के अमेरिकी कवि
रफीक कथवाड़ी को 41वें प्रसिद्ध पैट्रिक कावानाग पोएट्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। वह यह पुरस्कार पाने वाले पहले गैर आयरिश व्यक्ति हैं। कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले रफीक की 20 अप्रकाशित कविताओं के पहले संग्रह  'इन अनदर कंट्री" को पैट्रिक पोएट्री अवार्ड के लिए चुना गया। इस पुरस्कार के दुनियाभर से 112 दावेदार थे। ये कविताएं अंग्रेजी में लिखी गई हैं। इस पुरस्कार के लिए आमतौर से आयरलैंड में जन्मे, यहां की नागरिकता वाले या लंबे समय से आयरलैंड में रह रहे कवियों को प्राथमिकता दी जाती रही है। कथवाड़ी पहले गैर आयरिश कवि हैं जिन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया। उन्हें पुरस्कार के रूप में एक हजार यूरो (84495 रुपये) की राशि दी जाएगी। पुरस्कार की घोषणा के बाद कथवाड़ी ने कहा, यह पुरस्कार आयरलैंड की नए बहुसंस्कृतिवाद की छवि को दर्शाता है। ज्यादातर न्यूयॉर्क और श्रीनगर में अपना समय बिताने वाले कथवाड़ी पिछले तीस साल से कविताएं लिख रहे हैं। उन्होंने इकबाल की उर्दू कविताओं को नया दृष्टिकोण देते हुए अनुवाद किया है।