शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

दाएं मुड़ें

नीना, ' हैलो सोनम! मेरे चित्रों की प्रदर्शनी लगी है, देखने आओगी न?
सोनम, ' मेरे भी एक चित्र की प्रदर्शनी पिछले माह लगी थी, कृति कला की दीर्घा में।"
नीना, ' मगर मुझे तो दिखी नहीं।"
सोनम, ' अरे! वह गैलरी में नहीं मुख्य द्वार पर लगी थी।"
नीना, ' बधाई हो! क्या विषय था चित्र का?"
सोनम, ' मैंने एक गत्ते पर लिखा था, दाएं मुड़ें।" 

सिर और पांव का अंतर

संगीत अध्यापिका के पद के लिए नियुक्ति हो रही थी इंटरब्यू के दौरान प्रश्न पूछा गया कि शास्त्रीय संगीत और डिस्को में क्या अंतर है?
आवेदक युवती ने उत्तर दिया, ' सिर और पांव का अंतर है।
साक्षात्कारकर्ता ने पूछा, ' वह कैसे?"
युवती ने जवाब दिया, ' शास्त्रीय संगीत में लोग सिर हिलाते हैं और डिस्को में पांव।"



गुड खाएं और सेहत बनाएं

चाहे भोजन पचाने की प्रक्रिया हो या फिर कुछ मीठा खाने की चाहत, गुड़ के सेवन के फायदे जानने के बाद आप इसका सेवन जरूर करेंगे। जानिए, गुड़ के ऐसे फायदों के बारे में जो दर्द से लेकर पाचन और कफ जैसी कई समस्याओं से आराम दिलाने में आपकी मदद करेगा।
पाचन में फायदेमंद
गुड़ रक्त साफ करता है मेटाबॉलिज्म ठीक करता है। रोज एक गिलास पानी या दूध के साथ गुड़ का सेवन पेट को ठंडक देता है और पाचन ठीक रखता है।
एनीमिया का उपचार
गुड़ आयरन का प्रमुख स्रोत है इसलिए यह एनीमिया के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद है। खासतौर पर महिलाओं के लिए इसका सेवन बहुत जरूरी है।
त्वचा के लिए फायदेमंद
गुड़ रक्त से टॉक्सिन दूर करता है जिससे त्वचा दमकती है और मुहांसे की समस्या नहीं होती है।
जुकाम और कफ
गुड़ की तासीर गर्म है इसलिए इसका सेवन जुकाम और कफ से आराम दिलाता है। जुकाम के दौरान अगर आप कच्चा गुड़ नहीं खाना चाहते हैं तो चाय या लड्डू में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
तुरंत ऊर्जा के लिए
बहुत अधिक थकान या कमजोरी महसूस करने पर गुड़ का सेवन तुरंत ऊर्जा देता है। चूंकि यह बहुत जल्दी पच जाता है इसलिए इससे ब्लड में शुगर का स्तर भी तुरंत नहीं बढ़ता है।
दमा का उपचार
गुड़ शरीर के ताप पर नियंत्रण करता है और इसमें एंटी एलर्जिक तत्व हैं इसलिए दमा के मरीजों के लिए इसका सेवन काफी फायदेमंद है।
जोड़ों के दर्द में आराम
रोज गुड़ के एक टुकड़े का अदरक के साथ सेवन, जोड़ों के दर्द से दूर रखता है। 

ऐसे हडि्डयां मजबूत होंगी

उम्र कोई भी हो, मजबूत हडि्डयां स्वस्थ शरीर की जरूरत होती हैं।  हडि्डयां कैल्शियम के अलावा कई तरह के मिनरल से मिलकर बनी होती हैं। अनियमित जीवनशैली की वजह से या फिर बढ़ती उम्र में ये मिनरल खत्म होने लगते हैं। हडि्डयां घिसने और कमजोर होने लगती हैं। धीरे-धीरे मरीज काम करने में असमर्थ होता जाता है। मामूली चोट लगने से भी उसे फ्रैक्चर होने की आशंका बढ़ जाती है। हार्मोनल बैलेंस बिगड़ने, असंतुलित भोजन और बढ़ती उम्र के कारण भी हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं, लेकिन सही देखभाल की जाए, तो हडि्डयों को कमजोर होने से बचाया जा सकता है।
...तो अलर्ट हो जाएं
कमर या जोड़ों में दर्द, मामूली चोट लगने पर भी हडि्डयों में फ्रैक्चर, रह-रहकर न सहे जाने वाला दर्द, हडि्डयों को दबाने पर मुलायम लगना और उनमें दर्द होना, ये सब
ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण हैं। यह हडि्डयों की ऐसी परेशानी है, जिससे हडि्डयां धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं। शुरुआत में इसका पता नहीं चलता। फ्रैक्चर होने पर ही इसका पता चल पाता है। इस तरह के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत मेडिकल सलाह लेनी चाहिए।
बच्चों को बचाएं 
नवजात बच्चों से लेकर बढ़ते बच्चों में कैल्शियम की जरूरत अधिक होती है। मजबूत हडि्डयों के लिए विटामिन डी की जरूरत होती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स और स्कर्वी जैसे रोग हो सकते हैं। छोटे बच्चों के हाथ-पैरों में टेढ़ापन और बड़ा सिर होना विटामिन डी की कमी को ही दर्शाता है। सूर्य की रोशनी विटामिन डी का सबसे बेहतर स्रोत  है। बच्चों को चारदीवारी में रखने की बजाय उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। माता-पिता को चाहिए कि वे कम से कम जंक फूड बच्चों को दें और उन्हें दूध जरूर पिलाएं।
महिलाओं की मुश्किल 
महिलाओं को कैल्शियम की ज्यादा जरूरत होती है। मेनोपॉज के बाद उनकी हडि्डयां कमजोर होने लगती हैं। ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारी में हडि्डयां उम्र के साथ मुलायम होकर चिटकने लगती हैं। इस समस्या से लड़ने के लिए महिलाओं को नियमित व्यायाम करने के अलावा अपने आहार में मेवा, दूध, हरी सब्जियां और कैल्शियम सप्लीमेंट जरूर शामिल करना चाहिए।
युवा भी अछूते नहीं
20 से 35 साल की उम्र के युवा लोग भी अब हडि्डयों से जुड़ी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। इन्डोर वर्क, असंतुलित लाइफस्टाइल, खानपान, ध्ाूम्रपान और शराब का सेवन जिंदगी का हिस्सा बन रहा है। शारीरिक गतिविधियां न होने और एक्सरसाइज न करने से मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और हडि्डयां ऐसे में संवेदनशील हो जाती हैं। खासतौर पर रीढ़ की हड्डी पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है, जिससे युवाओं में स्लिप डिस्क की समस्या देखने को मिलती है। कमर का दर्द तो एक आम बात हो गई है।
उम्रदराजों का दर्द 
उम्रदराज लोगों में जोड़ों के दर्द की समस्या अधिक देखने को मिलती है। कई लोग तो गठिया के मरीज होते हैं। गठिया एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसे नियंत्रण में रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। रोज व्यायाम को प्रमुखता दें और हो सके तो कम से कम 2 किमी पैदल चलने की कोशिश करनी चाहिए।
अपनाएं ऑलिव ऑयल
जैतून का तेल आपकी हडि्डयों के लिए सुरक्षा चक्र का काम कर सकता है। एक नए शोध में पता चला है कि दो साल तक ऐसा खाना खाने से, जिसमें फल, सब्जियां और जैतून का तेल भरपूर मात्रा में होता है, हडि्डयां मजबूत होती हैं। बढ़ती उम्र के साथ ऑस्टियोपोरोसिस के बढ़ते खतरे को कम करने में भी जैतून का तेल वाला खाना उपयोगी साबित हुआ है। 

भारतीय-अमेरिकी एमिली ने जीता मिस न्यूजर्सी यूएसए का खिताब

अमेरिका में इस साल आयोजित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल की सुंदरियां बाजी मार रही हैं। हाल ही में नीना दावुलुरी के मिस अमेरिका चुने जाने के बाद भारतीय अमेरिकी एमिली शाह ने 'मिस न्यूजर्सी यूएसए-2014' का खिताब अपने नाम किया है। पिछले महीने मिस अमेरिका का खिताब जीतने वाली नीना भारतीय मूल की पहली सुंदरी हैं। रविवार को आयोजित हुई इस प्रतियोगिता में 130 से ज्यादा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था। इनमें एमिली सबसे कम की प्रतिभागी थीं। 18 वर्षीय एमिली अगले साल आयोजित होने वाली मिस अमेरिका प्रतियोगिता में न्यूजर्सी का प्रतिनिधित्व करेंगी। इस प्रतियोगिता की विजेता 2014 में मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेगी।
एमिली ने हॉलीवुड फिल्म 'द ग्रेट न्यू वंडरफुल' में दिग्गज अभिनेता नसीरूद्दीन शाह के साथ काम किया है। वहीं बॉलीवुड फिल्म 'आउट ऑफ कंट्रोल' में रितेश देशमुख और 'तारा रम पम' और 'जानेमन' में अन्य भारतीय कलाकारों के साथ काम किया है। वह लॉस एंजिलिस निवासी प्रशांत शाह की बेटी हैं जो कई बॉलीवुड प्रोडक्शन हाउस से जुड़े हुए हैं। इनमें करण जौहर, राकेश रोशन और शाहरुख खान का प्रोडक्शन हाउस शामिल है। एमिली मिस टीन व‌र्ल्ड 2012 की उपविजेता रह चुकी हैं। उनकी योजना एक्शन फिल्मों में काम करने की है। फिलहाल वह हॉलीवुड फिल्म 'रन ऑल नाइट' में स्टंट टीम की सहायक के तौर पर काम कर रही हैं। इस फिल्म में लियाम नीसन और एड हैरिस प्रमुख भूमिकाओं में हैं।

एंट्री टैक्स फ्री होंगे वाहन

मोटर वाहनों से रोड टैक्स, गुड्स टैक्स और स्पेशल सेस जैसे टैक्सों के अलावा और कोई टैक्स नहीं वसूला जाएगा। यानी वाहनों पर एंट्री टैक्स, मैकेनिकल टैक्स और सर्विस टैक्स लगाना अब संभव नहीं होगा। मगर साढ़े सात टन से अधिक सकल भार वाले मालवाहक वाहनों पर 500 रुपया प्रति टन/प्रति वर्ष के हिसाब से न्यूनतम लाइफटाइम टैक्स वसूला जाएगा।
ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट काउंसिल (टीडीसी) की 35वीं बैठक में राज्यों ने केंद्र के इन प्रस्तावों को मान लिया है। इसके अलावा दोपहिया वाहनों, कारों और टैक्सी/मैक्सी के एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण  की स्थिति में टैक्स की दरों और टूरिस्ट बसों को नेशनल परमिट के तौरतरीकों पर भी राज्य सहमत हो गए हैं। मंजूर प्रस्ताव के मुताबिक दो साल तक के नए दोपहिया वाहनों और कारों को दूसरे राज्य में स्थायी रूप से ले जाने पर नए राज्य में पूरा टैक्स वसूला जाएगा। वहीं, पहले वाले राज्य में वसूला गया टैक्स रिफंड होगा। दो साल से पुराने दोपहियों के दूसरे राज्य में स्थायी  स्थानांतरण पर वहां कोई टैक्स नहीं लगेगा। इसी तरह, दोपहियों को अस्थायी रूप से दूसरे राज्य में ले जाने पर टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
टैक्सी/मैक्सी और 10 लाख रुपए या इससे अधिक कीमत की लक्जरी कारों/एलएमवी को स्थायी रूप से दूसरे राज्य में ले जाने पर वहां वाहन की उम्र व कीमत के अनुसार रियायती दर पर टैक्स वसूला जाएगा। सभी राज्यों में रिफंड एवं टैक्स की गणना  एक ही तरह से होगी। टैक्सी/ मैक्सी को  अस्थायी रूप से दूसरे राज्य में ले जाने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। मगर परमिट शुल्क  अधिक होगा। परमिट जारी करने के लिए जल्द से जल्द एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाएगा। राज्य सरकारें सभी वाहनों पर एक समान न्यूनतम दर से अधिक टैक्स वसूलने के लिए स्वतंत्र होंगी।
एक से दूसरे राज्यों के बीच कांट्रैक्ट कैरिज के रूप में चल रही टूरिस्ट बसों को नेशनल  रमिट जारी करने के मसले पर विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाएगा। यह दो महीने में अपनी रिपोर्ट देगी। नेशनल परमिट बस में सीटों की संख्या और सालाना परमिट शुल्क  के आधार पर दिया जाएगा। वाहनों के थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के मामले में दीर्घ अवधि के वन टाइम प्रीमियम पर भी विचार किया जाएगा। इस प्रीमियम की वसूली एवं सरकारों को भुगतान की जिम्मेदारी वित्तीय संस्थाएं
वहन करेंगी।

महंगा नहीं, नेचुरल है यह

जमाना कोई भी हो, सभी में हर कोई खूबसूरत दिखना चाहता है। आखिर चाहे भी क्यों न, यह है ही इतना अहम। लेकिन, महंगाई के दौर में खूबसूरती बरकरार रखने वाले प्रोडेक्ट लेना आसान नहीं है। दरअसल, आसमान छूती कीमतें कई लोगों की पहुंच से इनको दूर बना देती है। ऐसे में आप कुछ घरेलू नुस्खे आजमा कर अपनी खूबसूरती में चार चांद चला सकते हैं, वह भी एक दम नेचुरल तरीके से। चलिए जानते हैं खूबसूरती बढ़ाने के कुछ ऐसे नुस्खों के बारे में जो हर तरह की त्वचा की समस्याओं को दूर करने में हमेशा मददगार होते हैं।
अंडे की जर्दी
चेहरे से झुर्रियां हटाना हो या बालों की कंडिशनिंग, अंडे की जर्दी का इस्तेमाल हमारी खूबसूरती से जुड़ी कई समस्याओं का हल रहा है।
टी बैग
सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन आंखों के नीचे कालापन दूर करने और चेहरे की स्क्रबिंग के लिए टी बैग का इस्तेमाल दुनिया भर में होता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को निखारने में बहुत मदद करते हैं।

शहद
रूखी त्वचा के लिए शहद किसी संजीवनी से कम नहीं है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को मॉश्च्युराइज तो करते ही हैं। साथ ही दाग-धब्बे भी दूर करते हैं।  

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

बिना सेहत बिगाड़े लें चटकारेदार भोजन का लुत्फ

क्या आप डाइट पर हैं और आपके दोस्त ने आपको किसी रेस्तरां में पार्टी दी है। या फिर आप इस दुविधा में हैं कि स्वाद को तरजीह दें या सेहत को।  बेशक, आपके लिए पार्टी का मतलब स्वाद होता है।
चटकारेदार भोजन होता है, लेकिन क्या सेहत को बिल्कुल ही दरकिनार कर देना चाहिए। इसका जवाब तो यही होगा- बिल्कुल नहीं।  अक्सर जब कभी भी रेस्तरां में खाने की बात आती है तो लोगों की प्राथमिकता स्वाद होती है। जुबान का जायका सेहत पर भारी पड़ सकता है। ऐसे भोजन को ही तरजीह दी जाने लगती है, जिसे चटकारे लेकर खाया जा सके। लेकिन, ऐसा नहीं है कि रेस्तेरां में जाकर आप केवल स्वाद के पीछे भागें। अगर आपकी प्राथमिकता पोषक तत्व है तो उस पर टिके रहें और उसी के हिसाब से अपने भोजन का चुनाव करें। याद रखें कि आहार योजना में एक दिन की चूक आपकी सेहत पर लंबे समय तक असर डाल सकती है। आपको चाहिए कि मेन्यू में से ऐसे आहार चुनें जो भरपूर पोषण दें और आपके वजन को भी ना बढ़ाए। जानिए रेस्तरां में भी कुछ हेल्दी फूड खाने के आसान टिप्स
पोषण की जानकारी
रेस्तरां में कुछ भी मंगाने से पहले उसके न्यूट्रीशन के बारे में जानकारी लेना ना भूलें। आप जो भी खाना ऑर्डर कर रहे हैं, वह आपकी सेहत पर क्या प्रभाव डालेगा, इस बारे में जानना जरूरी है। रेस्तरां में खाया एक दिन का खाना आपके फिटनेस कार्यक्रम को ना बिगाड़ दे, इसके लिए ऑर्डर से पहले खाने में कितनी कैलोरी है इसके बारे में पता लगा लें। ऑर्डर करते समय ध्यान रखें कि खाने में पोषण ज्यादा व कैलोरी कम होना चाहिए।
पहले से सोच लें
ज्यादातर फास्ट फूड की विस्तृत जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध रहती है। आप चाहें तो बाहर खाने जाने से पहले भोजन में मौजूद कैलोरी के बारे में  ऑनलाइन पता कर सकते हैं। इससे आप खाने की पौष्टिकता के बारे में भी पता कर सकते हैं।
* सामग्री की जानकारी :
मंगाए गए खाने में कौन-कौन सी सामग्री मिली हुई है या कौन-सी चीज कितनी मात्रा में है- यह जानना जरूरी है। खाने में फैट की मात्रा आपकी सेहत को बिगाड़ सकती है, इसलिए फैट की जानकारी अवश्य लें। अत्यधिक फैट हृदय रोग का कारण बन सकता है। इसलिए मंगाए गए खाने के बारे में किसी भी तरह की जांच करते वक्त संकोच ना करें। अगर खाने में ट्रांस फैट अधिक हो तो ऐसे खाने से परहेज करना चाहिए क्योंकि आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है।
स्टीम भोजन लें 
यदि हो सके तो तले हुए भोजन की जगह भाप में पकाई हुई डिशेज् खाएं। यह स्वास्थ्य के लिहाज से आपके लिए बेहतर होंगी। आजकल इटैलियन फूड काफी लोकप्रिय है। पास्ता जैसी चीजें भी बच्चों में लोकप्रिय हैं जबकि होटल में मिलने वाला पास्ता फैटी चीजों से बना होता है।
 विकल्प है बहुत
बाहर खाने वाले अक्सर चटपटा और तैलीय भोजन खाना पसंद करते हैं, जबकि यह उनके स्वास्थ्य के नजरिए से हानिकारक है। बाहर जाकर छोले-भटूरे, गुलाब जामुन आदि का ऑर्डर करने की बजाय सेंडविच के संग सलाद ऑर्डर करना ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। टमाटर, खीरा, हरी मिर्च आदि ये सब पौष्टिक तत्वों से भरपूर होते हैं।
चाइनीज से बचें 
देश में चाइनीज भोजन बहुत पसंद किया जाता है लेकिन इससे बचना चाहिए। ऐसी सभी डिशेज् से बचना ही बेहतर होगा जो सॉस के साथ खाई जाती हैं। बेहतर यही होगा कि किसी रेस्तरां में खाने से पहले यह जानकारी लें कि कम कैलोरी वाली कौन-कौन सी चीजें वहां उपलब्ध हैं। 

मां का दूध बचाए एचआईवी से

मां का दूध बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है। कई शोधों से यह साफ हो चुका है कि ब्रेस्टफीडिंग मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी है। अब एक नए शोध से पता चला है कि जो बच्चे स्तनपान करते हैं उनका बड़े होकर एचआईवी से ग्रस्त होने का खतरा कम होता है। एचआईवी एक खतरनाक रोग है। वैज्ञानिक इसके उपचार के लिए काफी समय से नई खोज कर रहे हैं। वैज्ञानिकों ने पहली बार पता लगाया कि मां के दूध में एक प्रोटीन पाया जाता है, जो बच्चों को एचआईवी वायरस के खतरे से बचाता है। इस प्रोटीन का नाम टेनएस्किन-सी या टीएनसी है।
इस नए शोध के भविष्य में एचआईवी के उपचार की दवा बना
ने में भी मददगार साबित होने की उम्मीद है। ड्यूक यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि मां के दूध में पाया जाने वाला टीएनसी प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व एचआईवी वायरस से बचाव करते हैं।
अध्ययन करने वाले सेलई परमार ने कहा कि कई दवाएं मां से बच्चे में जाने वाले दुष्प्रभावों के असर को कम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि हर महिला को एचआईवी की समस्या नहीं होती। परमार ने कहा कि यह अपने आप में इस तरह की पहली शोध है जिसमें एचआईवी और मां के दूध के बारे में बताया गया है।  

परेशानी का सबब न बन जाए साइबर बुलीइंग

इंटरनेट ने एक ओर जहां हमारी जिंदगी आसान बनाई है, वहीं निजी जिंदगी में इसकी दखलंदाजी ने मुश्किलें भी बढ़ा दी है। खासतौर पर बच्चे और युवा वर्ग इंटरनेट हस्तक्षेप से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। साइबर बुलीइंग दखलंदाजी का सबसे डरावना हथियार है।
ब्रिटिश संस्था 'एंटी बुलीइंग अलायंस" के नए सर्वे के मुताबिक आधे से ज्यादा बच्चे और युवा रोजाना की जिंदगी में इसका शिकार बन रहे हैं। साइबर बुलीइंग बच्चों के मानसिक व शैक्षणिक विकास पर बहुत बुरा असर डाल रही है। इसके बावजूद अभिभावक और शिक्षक मानते हैं कि उनके पास इससे निपटने का समाधान नहीं है। सर्वे में शामिल करीब 55 फीसद बच्चों ने स्वीकार किया कि साइबर बुलीइंग उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।
साठ फीसद अभिभावक अपने बच्चों के साथ ऐसा होने की बात स्वीकारते हैं। बच्चों को इससे बचाना अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। 49 फीसद माता-पिता मानते हैं कि उनके बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों का पता लगाना मुश्किल काम है।  

अब आप रहेंगे हमेशा जवान

यह एक ऐसा विषय है, जो हर किसी में सिरहन पैदा कर देता है। दरअसल, हर कोई चाहता है कि वह हमेशा जवान रहे। लेकिन, बुढ़ापे के साथ आने वाली झुर्रियों के साथ वह समझौता कर लेता है। ज्यादातर का मानना होता है कि यह तो दुनिया का दस्तूर है। जो पैदा होता है, उसे बुढ़ावा आता ही है। हालांकि, यह सच है, मगर अपने लिए कुछ किया जाए तो इसको दूर रखा जा सकता है। कुछ सामान्य से नुस्खे हैं, जिनको अजमाया जाय तो झुर्रियां आपसे दूरी बनाकर रखेंगी और आपकी त्वाजा आपको जवान बनाए रखेगी।

  • दूध की ठंडी मलाई (आधा चम्मच) में नींबू के रस की चार पांच बूंदें मिलाकर झुर्रियां पर सोते समय अच्छी तरह मलें। सुबह उठने के बाद गुनगुने पानी से चेहरा अच्छे से साफ करें। इसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा अच्छी तरह धोएं और बाद में तौलिए से साफ कर लें। इसके बाद फिर कुछ मलाई दोनों हथेलियों पर लेकर तब तक मलें, जब तक कि मलाई घुलकर त्वचा में न समा जाए। बीस मिनट या आधा घंटे बाद पानी से चेहरा साफ कर लें। इस दौरान चेहरे पर साबुन का प्रयोग न करें। कुछ दिनों तक नियमित प्रयोग से झुर्रियां दूर हो जाएंगी और चेहरे के काले दाग भी मिट जाएंगे। 
  • यदि आप चाहते हैं कि चेहरे पर झुर्रियों हों ही न ऐसा करने के लिए अंकुरित चने व मूंग को सुबह व शाम खाएं। इनमें विद्यमान विटामिन 'इ"  झुर्रियां मिटाने और युवा बनाए रखने में विशेष सहायक होता है। 
  •  पके हुए पपीते का एक टुकडा काटकर चेहरे पर घिसें या गूदा मसलकर चेहरे पर लगाएं। कुछ देर बाद चेहरा पानी से धो लें। कुछ दिन लगातार ऐसा करने से चेहरे की झुर्रियां व धब्बे दूर हो जाएंगे। इससे मुहांसे भी खत्म हो जाते हैं। 
  • खीरे को गोलाई में काटकर आंखों के नीचे-ऊपर लगा दें। माथे पर कुछ लंबे टुंकडे लगाकर तनाव-रहित होकर कुछ देर लेट जाएं। इस क्रिया को प्रतिदिन एक बार करने से लगभग दो सप्ताह में चेहरे से झुर्रियां कम होने लगती हैं। 
  •  गाजर का आधा गिलास रस प्रतिदिन दो-तीन सप्ताह तक पीने से भी झुर्रियां कम होती हैं। 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

दोस्ती बनाए सेहतमंद

दोस्त, इस एक शब्द में ही सबसे स्ट्रॉन्ग सर्पोट की पूरी की पूरी दुनिया समाई होती है। सच्चा दोस्त वही होता है मौका-बेमौका आपकी मदद करें और जीवन की किसी भी कठिन परिस्थितियों से बाहर निकालने में आपको सहयोग दें
। केवल इतना ही नहीं दोस्तों का साथ न सिर्फ आपको दिल से खुश रखने में मदद करता है, बल्कि यह आपको सेहतमंद भी बनाए रखता है।
जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में इस बात का दावा किया गया है कि एक सप्ताह में कम से कम दो बार अपने घनिष्ठ मित्रों से मिलने से आपकी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिक रोबिन डरबर दावा करते हैं कि एक सप्ताह में यदि चार करीबी दोस्तों के साथ मुलाकात कर समय बिताया जाए तो यह स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक होता है।
सोशल ग्रुप यानी बैटर सपोर्ट
रिपोर्ट में बताया गया कि सामाजिक समूह को पसंद करने वाले व उसे बरकरार रखने वाले पुरुष किसी भी तरह की बीमारियों से काफी जल्दी ठीक हो जाते हैं। सोशल मीडिया, मैसेजेस् और फोन आदि के माध्यम से पुरुष अपनी दिनचर्या का पांचवा हिस्सा अपने सामाजिक समूह से बातचीत करने में गुजारते हैं। वहीं शोध बताता है कि दोस्ती की गुणवत्ता को बरकरार रखने व इसके जरिए होने वाले फायदे का लाभ लेने के लिए व्यक्ति को मेल-जोल बढ़ाना चाहिए।
अनुभवों के आधार पर अध्ययन  
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस शोध को काफी लोगों से पूछताछ और उनके अनुभवों के आधार पर किया गया है। जिसके परिणाम भी सकारात्मक ही प्राप्त हुए हैं। इस अध्ययन में बताया गया है कि जब सामाजिक समूहों का आकार बढ़ जाता है, तो उनमें हंसी का माहौल भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।
हंसी है सबसे बेहतर टॉनिक
हंसने से शरीर में 'एंडोर्फिन" का प्रवाह होता है, जो स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायता करता है। यही नहीं हंसने से ब्लड सर्क्युलेशन भी ठीक रहता है। पूर्व में यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में बताया था कि हंसने का संबंध शरीर के ब्लड सर्क्युलेशन से होता है। इसके अलावा कई शोधों में यह साबित हो चुका है कि हंसने से शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है, जो शरीर को रोगों से लड़ने में सहायता करती है। हंसना जीवन के लिए किसी बेहतर टॉनिक से कम नहीं है। हंसने से शरीर में एंटी-वायरल व संक्रमण को रोकने वाली कोशिकाएं बढ़ जाती है।  

... तो निकल जाएगा दर्द का दम

मांसपेशियों में खिंचाव तभी होता है, जब उन पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाला जाए। यदि आप भी एक्सरसाइज करने के अभ्यस्त नहीं हैं, दौड़ना भी आपकी दिनचर्या में नहीं है, माउंटेन क्लाइंम्बिंग जैसी गतिविधियों से भी दूर रहते हैं, लेकिन अचानक आपको ऐसा कुछ करना पड़े तो मांसपेशियां जवाब दे जाती हैं। उनमें असहनीय दर्द होने लगता है। तो कई बातों को ध्यान में रख सकते हैं।
इसके अलावा कई बार सामान्य दिनचर्या में भी मांसपेशियां में खिंचाव हो सकता है। राह चलते हुए टखने का मुड़ जाना, इसी का एक उदाहरण है। यहां ऐसे कुछ नुस्खे दिए जा रहे हैं, जिन्हें आजमाकर आपको दर्द से राहत मिल सकती है।
 चहलकदमी करें
मांसपेशियों में दर्द हो तो बिस्तर से उठने का मन नहीं करता, लेकिन ऐसे में आराम करने से अच्छा होगा कि थोड़ी चहलकदमी की जाए। गहरी सांस लीजिए और दोनों हाथों को सीधा ऊपर उठाएं। यह प्रक्रिया कई बार दोहराएं।
ऐसा करने से आपकी मांसपेशियों में रक्तप्रवाह में सुधार होता है, जिससे आप रिलैक्स महसूस करेंगे।
 मसाज 
मांसपेशियों में खिंचाव या झटका लगने से वह सिकुड़ जाती हैं, जिससे उनमें रक्त प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता। सही तरीके से दर्द वाली जगह पर मसाज करने से भी राहत मिलती है। इससे रक्त प्रवाह में सुधार होता है।
थकान भरी शारीरिक गतिविधियों के बाद ग्लाइकोजेन के ग्लूकोज में परिवर्तित होने की प्रक्रिया के दौरान बॉडी एनर्जी को बर्न करती है। ऐसे में ऑक्सीजन की कमी से भी मांसपेशियों में खिंचाव की समस्या हो सकती है।
स्ट्रेचिंग
यह सही है कि मांसपेशियों में दर्द हो, तो हिल
ना-डुलना मुश्किल होता है, लेकिन जितना आप सहन कर सकें,  मसल्स को आराम से स्ट्रेच करें। ऐसा 30 मिनट करना चाहिए। इससे भी दर्द में राहत मिलती है।
खूब पानी पीएं
एक्सरसाइज करते वक्त या फिर किसी दूसरी शारीरिक गतिविधि में खूब पसीना निकलता है। कैफीन उत्पादों और अल्कोहल के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इससे डिहाइड्रेशन हो सकता है।
प्रोटीन
भारी-भरकम शारीरिक गतिविधियों के बाद मसल्स को प्रोटीन की जरूरत होती है, ताकि शरीर में एनर्जी का स्तर बना रहे। ऐसे में प्रोटीनयुक्त नेचुरल खाद्य उत्पादों का सेवन करना चाहिए। 

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

... तो गुटखा नहीं गटक पाएगा किसी की जान

केंद्र ने सभी प्रकार के गुटखा उत्पादों के निर्माण और इसकी बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से समुचित आदेश देने की अपील की है। सरकार ने दलील दी कि गुटखा में तंबाकू न होने के बावजूद यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और नशे की लत को बढ़ावा देता है। देश की 35 फीसद व्यस्क आबादी तंबाकू की आदी है।
केंद्र की ओर से जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश हुए अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए गुटखा के उत्पादन और इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की। सरकार ने कहा कि यदि पान मसाला और गुटखा पर पूर्ण प्रतिबंध लगता है तो यह एक महत्वपूर्ण  कदम होगा। पीठ को न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) के रूप में सहयोग कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने भी सरकार के रुख का समर्थन करते हुए गुटखा उत्पादों पर रोक लगाए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि तमाम कंपनियां पान मसाला और तंबाकू की अलग-अलग बिक्री कर नियमों का मजाक बना रही हैं। हाल में केंद्र ने कहा था कि तंबाकू उत्पाद जनित बीमारियों के रोकथाम पर जितना खर्च होता है उसके मुकाबले इन उत्पादों से प्राप्त होने वाला राजस्व बहुत कम है। गुटखा उत्पादों पर प्रतिबंध के कार्यान्वयन को लेकर इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
दिया था।

कहीं हर समय तो नहीं रहती आंखों में जलन

आजकल धूल भरे वातावरण और गैजेट्स के इस्तेमाल के बीच आंखों की समस्या आम हो गई है। यदि आपकी आंखों में भी जलन और पानी आने जैसी समस्या है तो यह उनकी कमजोरी का भी लक्षण हो सकता है। इस तरह की समस्या 'ड्राई आई सिंड्रोम" के कारण भी हो सकती है।
ठंड में होती है ज्यादा परेशानी 
ड्राई आई सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के लिए जाड़ों के मौसम में परेशानी बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की आंखों में पानी आता रहता है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, इनमें मौसम से लेकर हार्मोन में बदलाव के साथ ही अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी शामिल हैं।
ये भी होते हैं लक्षण
किसी व्यक्ति की आंखें पर्याप्त आंसू उत्पादित न करें या किसी के आंसू जल्दी सूख जाएं तो उसे भी ड्राई आई सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। आंखों में खुजली, धुंधला दिखाई देना और आंखों में चुभन महसूस होना भी इसके ही संकेत हैं। खुजलाने पर आंखें लाल भी हो सकती है। नेत्र विशेषज्ञों का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ आंखों में पानी निकलने में मददगार कुदरती तंत्र कमजोर पड़ने लगता है, जिससे आंखें सूखी पड़ जाती हैं।
हार्मोन परिवर्तन का भी असर
उम्र की अधिकता से होने वाले हार्मोन परिवर्तन भी आंखों की तरलता पर विपरीत असर डालते हैं। मगर यह चौंकाने वाली बात होती है कि ड्राई आई सिंड्रोम के रोगी की आंखें अधिक तरल दिखाई देती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक सूखी होने के कारण आंखें जरूरी तरलता बनाए रखने के लिए अधिक आंसू स्रावित करती हैं।  

मेथी दाना नहीं मैजिक कहें-मैजिक

अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, गठिया जैसे रोग हों या फिर फर्टिलिटी की परेशानी, इन सबमें मैथी के छोटे-छोटे सुनहरे दाने काफी फायदेमंद होते हैं।
मैथी में प्रोटीन, विटामिन 'सी", नियासिन, पोटेशियम और डायोसजेनिन जैसे तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद हैं, जो आपकी सेहत से जुड़ी कई तरह की समस्याओं से निजात दिलाने में आपके लिए सहयोगी हो सकते हैं।
मैथी का साग हो या मैथी दानें, जानिए इसके क्या हैं फायदे-
रोगों का उपचार
मैथी की गर्म तासीर इसे सर्दियों में जुकाम, दमा, ब्रोंकाइटिस, गठिया जैसे रोगों से दूर रखने में मदद करती है इसलिए इस मौसम में इन रोगों के मरीज इसका सेवन नियमित तौर पर कर सकते हैं।

 कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण
जो लोग प्रतिदिन 50 ग्राम मैथी का सेवन करते हैं, वह अपने कोलेस्ट्रॉल को 14 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं। इतना ही नहीं, इसके नियमित सेवन से हार्ट अटैक का खतरा 25 प्रतिशत तक घट जाता है।
 डायबिटीज में फायदेमंद
मैथी रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करती है। रोज 500 मिलीग्राम मैथी के सेवन से टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों को आराम मिलता है।
त्वचा के लिए फायदेमंद
मैथी के दानों का पाउडर या पेस्ट त्वचा पर लगाने से एग्जिमा और जले के निशान को दूर किया जा सकता है।

 एसिडिटी
नियमित रूप से मैथी का सेवन शरीर के मेटाबॉलिज्म को ठीक करता है और गैस्ट्रेइन्टेस्टाइनल समस्याओं से दूर रखता है। मैथी के दाने के सेवन से एसिड रिफ्लक्स, सीने में जलन और एसिडिटी जैसी समस्याओं में तुरंत आराम मिलता है।
 अच्छे फिगर के लिए 
वजन कम करने और हार्मोनल बैलेंस में मदद मिलती है। प्रतिदिन तीन ग्राम मैथी का सेवन इस मामले में महिलाओं के लिए फायदेमंद है।
डिलेवरी के दौरान फायदा  
मैथी का सेवन डिलेवरी के दौरान महिलाओं के लिए फायदेमंद हो सकता है। हालांकि गर्भावस्था के दौरान इसका सेवन गर्भपात का खतरा भी
बन सकता है क्योंकि इसकी गर्म तासीर से लेबर पेन बढ़ता है। इसके अलावा, इसके सेवन से डिलेवरी के बाद दूध की मात्रा भी बढ़ती है। 

किसने कहा-हंसना मना है













नाइट बल्ब बढ़ा सकता है वजन

क्या आपको भी बिस्तर पर लेटने के बाद देर तक नींद नहीं आती है? या फिर अच्छी नींद लेने और सेहतमंद लाइफ स्टाइल के बावजूद भी आपका वजन बढ़ता ही जा रहा है? इसकी वजह आपका नाइट बल्ब भी हो सकता है।ब्रिटेन में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि कमरे में लाल रंग का नाइट बल्ब जलाकर सोने से नींद जल्दी आती है, लेकिन इसका एक साइड इफेक्ट भी है। इसी शोध में यह भी माना गया है कि कमरे में सोते वक्त आर्टिफिशियल लाइट जलाने से वजन बढ़ने या अनिद्रा की समस्या भी हो सकती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि रात में नाइट बल्ब जलाकर सोने वाले लोगों को मोटापे से लेकर डायबिटीज, डिप्रेशन और कैंसर तक का खतरा हो सकता है। यूरोपियन कमिशन के शोध के अनुसार- 'रात में आर्टिफिशियल लाइट में सोने से न सिर्फ नींद ओर मोटापे की परेशानी हो सकती है बल्कि ब्रेस्ट कैंसर, गैस्ट्रोइन्टेस्टाइनल समस्याएं, मानसिक रोग और कार्डियोवास्कुलर रोग की आशंका अधिक होती है।
इसके अलावा नाइट बल्ब के इस्तेमाल को लेकर और भी कई शोध हुए हैं जिसमें कुछ चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं।
नाइट बल्ब की शरीर को आदत नहीं  है 
यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट हेल्थ सेंटर के शोधकर्ताओं का मानना है कि चूंकि मनुष्य की आधुनिक प्रजाति दो लाख साल पुरानी है और बल्ब का इस्तेमाल पिछले सौ सालों से ही हो रहा है, इसलिए यह हमारे शरीर के लिए स्वाभाविक नहीं है।
उनका मानना है कि आर्टिफिशियल लाइट के इस्तेमाल से 24 घंटे की बायोलॉजिकल क्लॉक प्रभावित होती है जिससे सेहत संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
मोटापा बढ़ता है
शोध में यह भी पाया गया कि नाइट बल्ब के अधिक इस्तेमाल वाले लोगों के शरीर में इन्सुलिन, ग्रेलिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन का संतुलन बिगड़ता है, जिससे मोटापे का रिस्क बढ़ सकता है।
नीली लाइट है सबसे खतरनाक
शोध के अनुसार न सिर्फ नीली लाइट बल्ब बल्कि टीवी स्क्रीन, कम्प्यूटर आदि से निकलने वाली नीली लाइट, जो आमतौर पर हमें सफेद प्रतीत होती है, हमारी आंखों और बॉडी क्लॉक को सबसे अधिक प्रभावित करती है।
यही वजह है कि इस लाइट में सोने वाले या देर तक कम्प्यूटर या टीवी के सामने रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

चांद बन करें 'चांद" की पूजा

करवाचौथ की शाम, हाथों में पूजा की थाली और चांद के इंतजार में सजी-धजीं सुहागिनें। चांद की पूजा के लिए महिलाएं पूरे उत्साह और उमंग के साथ तैयारी करती हैं।...और करें भी क्यों न, यह उनका अनूठा पर्व जो रहता है, जिसका वे बड़े उत्साह से साल भर इंतजार करती हैं। तो फिर यकीनन आपने भी सारी तैयारियां कर ही ली होंगी लेकिन इन सबके बीच कहीं कोई कमी न रह जाए। इसलिए इस मौके पर अपने हाथों का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि पूरी पूजा में सबसे ज्यादा नजर आपके हाथों पर ही रहती है। इसलिए अपने हाथों को खूब सजाइए और दीजिए कुछ अलग और खास लुक।
मेंहदी से सजे-संवरे हाथ
ऐसा माना जाता है कि मेंहदी की रंगत पति-पत्नी के प्यार को बढ़ाती है, तभी तो करवाचौथ के आने से पहले ही मार्केट में मेंहदी की रंगत की रौनक नजर आने लगती है। इन दिनों ज्वैल मेंहदी, अरेबियन मेंहदी और स्टोन मेंहदी चलन में है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि मेंहदी का रंग हाथों पर खूबसूरती से नहीं चढ़ पाता या फिर एक से दो दिन में फीका पड़ जाता है, ऐसे में आप सिर्फ अपनी हथेलियों को ही इस पारंपरिक शगुन से सजाएं।
नेल आर्ट
हाथों की शोभा बढ़ाने में नाखूनों की साज-सज्जा पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसे में नेल्स की खूबसूरती बढ़ाने के लिए आप नेल आर्ट करवा सकती हैं। गोल्डन व सिल्वर बीड्स, स्टोन, स्वरोस्की व बेशकीमती कढ़ाई से सजा पहनावा इस दिन की जान होता है। अपने पहनावे से मैच करते इन खूबसूरत नगीनों को आप अपने नेल्स पर भी सजा सकती हैं। इसके अलावा इस आर्ट में नाखूनों को सजाने के लिए उन पर फूल-पत्तियां, रंगीन पंख, मोती, फर आदि का प्रयोग भी किया जाता है।
 नेल कल्चर

  • यदि आपके नाखून छोटे हैं या बढ़ते ही टूट जाते हैं, तो ऐसे में आप नेल कल्चर तकनीक का सहारा ले सकती हैं। इस तकनीक के तहत टूटे हुए नाखून को फिर से नेचरल शेप में लाया जा सकता है। 
  • नेल कल्चर किए गए नाखून दिखने में और काम करने में बिल्कुल नेचरल नाखून की ही तरह नजर आते हैं। इन नाखूनों को एक्रिलिक पाउडर और कुछ तरल पदार्थों से बनाया जाता है। इससे आपके नेल्स को मनचाहा आकार व लंबाई मिल जाती है। 
  • नेल कल्चर किए गए नाखूनों पर आप पर्मानेंट नेल आर्ट करवा सकती हैं। इसमें नाखूनों पर फूल-पत्तियां, डॉल्फिन, तितली आदि डिजाइन बनाएं जाते हैं और ऊपर से स्टड्स लगाकर इसे और भी आकर्षक बनाया जाता है।

नेल पियर्सिंग
पर्मानेंट नेलआर्ट में 2-3 घंटे का समय लगता है। किसी खास फिंगर को स्पेशल लुक देने के लिए आप नेल पियर्सिंग भी करवा सकती हैं। इसमें नेल्स में छेद करके बाली या घुंघरू से सजाया जाता है, जिससे नाखून बेहद एट्रैक्टिव नजर आते हैं। करवाचौथ के दिन आप अपने नेल्स पर ऐसी कलाकृति जरूर करवाएं, जिसे देख वो अपने आप को आपका हाथ थामने से रोक नहीं पाएंगे।
चूड़ियां
कांच की ये चूड़ी जहां एक तरफ सुहाग का प्रतीक होती है तो वहीं दूसरी तरफ हाथों की खूबसूरती को उजागर भी करती है। इस दिन अपनी साड़ी या लहंगे से मैच करती डिजाइनर चूड़ियां जरूर पहनें।  

पहला सुख निरोगी काया

                                                      पहला सुख निरोगी काया
दूजा सुख घर में हो माया
तीजा सुख कुलवंती नारी
चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी
पंचम सुख स्वदेश में वासा
छठवां  सुख राज हो पासा
सातवां सुख संतोषी जीवन,
ऐसा हो तो धन्य हो जीवन .

अब स्मार्ट दांत रखेगा माउथ एक्टिविटी पर नजर

मुंह की सुंदरता पूरी तरह से दांतों पर टिकी होती है। यदि दांत खराब तो कुछ अच्छा नहीं लगता। इसके अलावा आपका खानपान भी पूरी तरह से दांतों पर ही निर्भर होता है। मगर उसकी देखरेख करने में हर कोई कोताही बरत लेता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक ऐसा स्मार्ट दांत बनाया है,जो आपकी खानपान की गतिविधियों पर नजर रखेगा। इसके साथ ही इस बात का भी खयाल रखेगा कि आप कितने समय तक खाते-पीते और चबाते हैं या आपने खाने में कितनी सॉफ्ट या हार्ड सामग्री का सेवन किया है। यह स्मार्ट दांत यह भी बताने में समर्थ होगा कि आप कितनी जोर-जोर से बातें करते हैं।
बैटरी संचालित संवेदी उपकरण
यह अनूठा उपकरण नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है, इन वैज्ञानिकों ने बेतार दांत भी बनाया है जो बैटरी से संचालित होता है और संवेदी है। उन्हें उम्मीद है कि यह दांत मुंह के भीतर की एक्टिविटी की सूचना को आसानी से बता देगा, जिसे कम्प्यूटर पर एकत्रित किया जा सकेगा।
94 प्रश सही सूचना करता है एकत्रित 
वैज्ञानिकों का कहना है कि सामान्य दांत की तरह दिखने वाला स्मार्ट दांत 94 प्रतिशत तक सही सूचना एकत्र करता है। दंत विशेषज्ञों का कहना है कि वैज्ञानिकों द्वारा यह निर्मित दांत एक तरह से ऐसा जासूस है, जो मुंह के भीतर चलने वाली हर गतिविधि को अपनी मेमोरी में कैद करेगा। यह स्मार्ट दांत न सिर्फ मुंह के भीतर की गतिविधियों की निगरानी करेगा बल्कि आपके खाने-पीने के साथ ही स्मोकिंग की प्रवृत्ति का भी हिसाब-किताब भी रखेगा और बताएगा कि आपने कितना समय इन सब कामों में बिताया।  

जी ललचाए रहा न जाए...

मन को कितना भी समझाएं, लेकिन खाने की प्लेट पर आपकी पसंदीदा डिश देखते ही आप अपना सारा नियंत्रण खो बैठते हैं और
जरूरत से ज्यादा खा ही लेते हैं। वजन बढ़ने से परेशान हर किसी की कमजोरी शायद कुछ ऐसी ही है।
अगर आप हर बार अपनी डाइटिंग की कोशिश में नाकाम होते हैं तो इसकी सही वजह वैज्ञानिकों ने खोज निकाली है। हाल में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने माना है कि फैटी डाइट लेने से गैस्ट्रिक नस प्रभावित होती है, जिसकी वजह से वह मस्तिष्क को भूख खत्म होने के संकेत अच्छी तरह नहीं भेज पाती है।
ऑस्ट्रेलियन शोध की मानें तो पेट से दिमाग को जोड़ने वाले यह गैस्ट्रिक नस जो भोजन लेना है या नहीं, यह संकेत देती है, इसकी निक्रिष्यता ही ओवरडाइटिंग की वजह है। बहुत अधिक फैटी डाइट इस नस को नुकसान पहुंचाती है और यह सही तरह से काम नहीं कर पाती है।
शोधकर्ता अमांडा पेज के अनुसार अधिक फैटी डाइट लेने वाले लोगों को पेट भरने का पता सामान्य लोगों की अपेक्षा देर से चलता है, यही वजह है कि वे अपनी डाइट पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं और मोटापे का शिकार होते हैं।
'जर्नल ऑफ ओबेसिटी" में प्रकाशित इस शोध में माना गया है अधिक फैटी डाइट भूख से जुड़े हार्मोन 'लेप्टिन" को प्रभावित करती है और यह हार्मोन गैस्ट्रिक नस को प्रभावित करता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि डाइट में अगर बहुत फैटी चीजें से परहेज किया जाए तो भोजन पर नियंत्रण करना और मोटापा घटाना आसान हो सकता है। 

इंटरनेट के जरिए न खोजें बीमारी का इलाज

 आधुनिक समय में इंटरनेट ने एक क्लिक पर हर जानकारी हाजिर कर दी है। मगर क्या आपको पता है कि जहां तक जानकारी लेने और जिज्ञासाओं को शांत करने का सवाल है तब तो अच्छा है, मगर जब लोग इसके जरिए कुछ अतिरिक्त ज्ञान लेने लंबे  तो वह खतरनाक हो सकता है। जी हां, यह अतिरिक्त ज्ञान उस तरह का है कि आप इंटरनेट पर बीमारियों के लक्षण और उसका इलाज देखते हुए बिना चिकित्सीय सलाह के ही दवा लेने लग जाएं।
यह शोध ब्रिटेनवासियों पर किया गया है। इसके अनुसार मामूली जुकाम या बुखार किसी गंभीर बीमारी का लक्षण हो सकता है। ऐसी आशंका लगभग हर डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ जताते हैं। मगर बड़ी संख्या में ब्रिटेनवासी अपने लक्षणों के आधार पर खुद की बीमारी का पता लगाने और उसका इलाज खोजने की कोशिश करते हैं, जो किसी बड़े जोखिम से कम नहीं है।
यह खुलासा स्वास्थ्य क्षेत्र की एक निगरानी संस्था 'द इंफर्मेशन स्टैंडर्ड" ने अपने अध्ययन में किया है। इसके मुताबिक 10 में से 4 मरीजों ने फिजीशियन से देरी से सलाह लेने की बात कबूली। इनमें से आधे लोगों ने यह भी माना कि साधारण फिजीशियन की बजाए उन्होंने इंटरनेट पर
अपनी बीमारी के लक्षणों की पहचान करना बेहतर समझा। हैरत की बात यह है कि छह में से एक मरीज ने तब डॉक्टरी सलाह ली, जब उन्होंने पाया कि वे किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आने वाले थे।
इस अध्ययन में यह भी खुलासा किया गया है कि ज्यादातर मरीज चिकित्सकीय सलाह से इसलिए बचते हैं क्योंकि वे चिकित्सक का ज्यादा समय बर्बाद नहीं करना चाहते। इसके अलावा अपना समय भी चिकित्सक के पास जाकर नष्ट नहीं करना चाहते हैं। वे मानते हैं कि इंटरनेट पर जो जानकारी मिल गई वह सही है और इससे ही उन्हें आसानी से फायदा हो जाएगा, मगर सच में ऐसा होता नहीं है।  

मस्तिष्क से जुड़ा है हिस्टीरिया रोग

यह एक ऐसा रोग है, जिसमें बिना किसी शारीरिक कमी के रोगी में  रह-रहकर बार-बार न्यूरो व मस्तिष्क से जुड़े गंभीर लक्षण पैदा होते हैं। चूंकि रोगी शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है। इसलिए लक्षणों व तकलीफ से जुड़ी सभी प्रकार की जांचें जैसे कैट स्केन, सीने का एक्स-रे, ईसीजी, आंख या गले से जुड़ी जांचों में कोई भी कमी नहीं निकलती है।
कारण 

  • तनाव : हिस्टीरिया रोग प्राय: रोगी के चेतन या अचेतन मन में चल रहे किसी तनाव के चलते ही होता है। ये लक्षण बनावटी तौर पर जानबूझकर रोगी द्वारा पैदा नहीं किए जाते हैं। अक्सर तनाव से बाहर निकलने का रोगी के पास जब कोई रास्ता शेष नहीं रह जाता, तब ही उसे रह-रहकर हिस्टीरिया के दौरे पड़ने लगते हैं। यह रोग दस में से नौ बार महिलाओं में होता है, विशेषकर उन महिलाओं में जिन्हें तनाव से निपटने के लिए सामाजिक या पारिवारिक सहयोग नहीं मिलता।
  • कमजोर व्यक्तित्व : प्राय: स्वभाव से ऐसे रोगी बहुत जिद्दी होते हैं और जब इनके मन के अनुरूप कोई बात नहीं होती तब वे बहुत परेशान होते हैं, जिद पकड़ लेते हैं और आवेश में आकर चीजें फेंकते हैं व स्वयं को नुकसान पहुंचाते हैं। वे विपरीत परिस्थितियों में बदहवास हो जाते हैं। उनकी सांस उखड़ने लगती है व अचेत हो सकते हैं।

लक्षण

  • दौरे पड़ना : रह-रहकर हाथ, पैरों व शरीर में झटके आना, ऐंठन होना व बेहोश हो जाना।
  • अचेत हो जाना : रोगी अचानक या धीरे-धीरे अचेत हो सकता है। इस दौरान उसकी सांसें चलती रहती हैं, शरीर बिल्कुल ढीला हो जाता है लेकिन दांत कसकर भिंच जाते हैं। यह अचेतन अवस्था कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों तक बनी रह सकती है। उसके बाद रोगी स्वयं उठकर बैठ जाता है और ऐसा व्यवहार करता है जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं। 
  • उल्टी सांसें चलना : रोगी जोर-जोर से गहरी-गहरी सांसें लेता है। रह-रहकर छाती व गला पकड़ता है और ऐसा प्रतीत होता है कि रोगी को सांस आ ही नहीं रही है और उसका दम घुट जाएगा।
  • हाथ पैर न चलना : कभी-कभी रोगी के हाथ व पैर ढीले पड़ जाते हैं और रोगी कुछ समय (घंटों) के लिए चल-फिर नहीं पाता है।
  • अचानक गले से आवाज निकलना बंद हो जाना : ऐसे में रोगी इशारों से या फुसफुसा के बातें करने लगता है। कभी कभी हिस्टीरिया से ग्रस्त रोगी को अचानक दिखाई देना भी बंद हो जाता है।
  • उपरोक्त लक्षण दौरे के रूप में एक साथ या बदल-बदलकर कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों तक रहते हैं फिर स्वत: ठीक हो जाते हैं। इलाज के अभाव में यही दौरे दिनभर में दस-दस बार पड़ते हैं, तो कभी 2-3 महीनों में एक दो बार ही हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं।

इलाज

  • चूंकि हिस्टीरिया के सभी लक्षण किसी न किसी मस्तिष्क या न्यूरो की गंभीर बीमारी जैसे प्रतीत होते हैं। ऐसे में रोगी का किसी कुशल डॉक्टर की सहायता से जांच करना जरूरी होता है। जांचों में जब कोई कमी नहीं निकलती तब मनोचिकित्सक की सहायता से इस रोग का इलाज कराना चाहिए।
  •  इस रोग का सीधा संबंध चेतन व अचेतन मन में चल रहे तनाव से होता है। ऐसे में दवा के विपरीत इलाज में मनोचिकित्सा का प्रमुख स्थान है।
  •  मनोचिकित्सा के दौरान रोगी में व्याप्त तनाव की पहचान व उससे निपटने के लिए सही विधियां बताई जाती हैं। 

जब करें आंखों का मेकअप

आंखों के मेकअप से पहले इससे जुड़ी खास बातों का ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि आपकी आंखंे अनमोल है। इन्हें किसी भी तरह का नुकसान नहीं होना चाहिए। इस सीजन के लिए बेज, गोल्डन और लाइलैक शेड्स बेस्ट हैं। इनके साथ टरक्वॉयज और फूशिया कलर आंखों को खास आकर्षण देता है।
जानें आंखों के मेकअप से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में

  1. न्यूट्रल शैडो को आइलिड की क्रीज पर यानी आइरिस के ऊपर लगाएं। अगर कलर ऐड करना चाहती हैं तो वनीला या लाइट कलर से एक स्ट्रोक दें और अच्छी तरह ब्लेंड करें। 
  2. दोबारा लिड पर लाइट कलर से स्ट्रोक दें। फिर थोड़ा डार्क कलर क्रीज लाइन पर लगाएं। अपर और लोअर लैश लाइन पर भी डार्क कलर से कवर दें। 
  3. ब्राउन आइलाइनर आंखों के भीतरी कोने से थोड़ी दूर से शुरू करते हुए बाहरी कोनों से थोड़ा बाहर तक लगाएं। ताकि आंखें बड़ी नजर आएं। 
  4. डिफाइनिंग मस्कारा लगाना न भूलें। इसका डबल कोट लगाएं। मस्कारा लगाने से पहले लैश को कर्ल जरूर कर लें। 

कुछ और टिप्स 

  • आई पेंसिल शार्पन करने से पहले फ्रीज कर लें ताकि वह टूटे नहीं।
  • मोटे क्रेयॉन पेंसिल का इस्तेमाल करें, जो क्रीमी पाउडर टेक्सचर वाली हो। इससे वह आसानी से फैल जाएगा। 
  • आंखों के चारों ओर लाइनर लगा लेने से यानी पूरी आंख पर लाइनर का इस्तेमाल करने से वे छोटी नजर आती हैं न कि बड़ी, तो लगाते समय इस बात का ध्यान रखें।

पिंक आई मेकअप
इसके लिए आंखों को ब्लैक आई पेंसिल से अच्छी तरह से हाईलाइट कर लें, फिर आईलिड पर शिमर वाला पिंक शेड लगाएं और पर्ल कलर को मिलाकर आईलिड के ऊपर वाले हिस्से में लगाएं। ऊपर और नीचे दोनों पलकों में गाढ़ा मस्कारा लगाएं, साथ में शिमर वाली लिपस्टिक लगाएं।
 पिकॉक टच आई मेकअप 
आंखों को पिकॉक टच का लुक देने के लिए आप सबसे पहले मोटा और डार्क काजल और ब्लैक या ब्लू आईलाइनर लगाएं। फिर उसके बाद पर्ल और ग्रीन कलर के आईशैडो को आपस में मिलाकर आईलिड पर लगाएं। शैडो को लगाने की शुरुआत कान की तरफ वाली आंखों के कोने से करें और फिर उसे ब्लैंड करते हुए उसे दूसरे कोने तक ले जाएं। आईशैडो को आंखों के चारों तरफ लगाएं यानी काजल के नीचे भी हल्का-सा लगाएं। अब इसके बाद ऊपर और नीचे की पलकों में ब्लैक और ग्रीन शेड का मस्कारा एक-एक करके लगाएं इस तरह के आई मेकअप के साथ ब्राउन कलर की लाइट शेड की लिपस्टिक ज्यादा अच्छी लगेगी।
स्मोकी आई लुक मेकअप
स्मोकी आईलुक देने के लिए आंखों में पहले ब्लैक कलर का काजल और आईलाइनर लगाकर आंखों को थोड़ा बड़ा आकार दें। फिर उसके बाद ब्लैक और ब्राउन आईशैडो को एक साथ मिलाकर आईलिड पर लगाएं। अब इसके बाद व्हाइट गोल्ड या कॉपर कलर से हाईलाइटिंग करें और ऊपर-नीचे की पलकों पर मस्कारा लगाएं।  इसके साथ ऑरेंज शेड की लाइट लिपस्टिक  यूज करें।  

इंतजार से बढ़ती है उस चीज की अहमियत

 यूं तो इंतजार का नाम लेते ही यह काफी लंबा लगने लगता है...। मगर हमेशा से माना गया है कि इंतजार का फल सब्र होता है, और यह सही भी जिसे एक शोध में पाया गया है। यह इंतजार कहीं भी हो सकता है, किसी के आने का, कहीं जाने का और ऐसी किसी भी जगह जहां लंबी कतार के बिना जाना संभव ही न हो सके। मगर इस इंतजार के दौरान अक्सर जो सबसे बड़ी बात सामने आती है वह यह कि इंतजार करते-करते व्यक्ति का धैर्य जवाब दे जाता है। मगर जो लोग इंतजार कर लेते हैं उन्हें समय रहते वह अवसर तो मिल जाता है, जिसके लिए वे कतारों में लगे थे बल्कि इसके साथ उनमें संयम और धैर्य भी बढ़ जाता है।
जी हां, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस द्वारा किए नए शोध में पाया गया है कि रेलवे टिकट बुक कराना हो, डॉक्टर से परामर्श लेना हो या फिर टेलीफोन का बिल जमा कराना हो, ऐसे में कई बार आपको लंबी लाइनों में खड़े होकर इंतजार करना पड़ता है। कई बार इससे
आपके मन में झुंझलाहट भी पैदा हो जाती है। मगर शोध कहता है कि कतारों में खड़े होकर इंतजार करना आपके लिए अच्छा होता है, क्योंकि लंबी लाइनों में खड़े होकर इंतजार करने से लोगों का संयम यानी धैर्य बढ़ता है और इसका असर उनके व्यवहार पर पड़ता है। अध्ययन से यह भी पता चला कि इससे आर्थिक मामलों से जुड़े बेहतर फैसले लेने की क्षमता भी बढ़ती है। अध्ययनकर्ताओं ने बताया कि जब कोई लंबी लाइन में खड़े होकर किसी चीज का इंतजार करता है, तो इससे उसके मन में उस चीज की अहमियत बढ़ जाती है।
किसी चीज की अहमियत बढ़ने से व्यक्ति के मन में उस चीज की कद्र बढ़ती है और उनका संयम भी बढ़ता है। इसके मुकाबले जिन लोगों को बिना इंतजार और मेहनत किए कोई चीज मिल जाती है, वे उसकी अहमियत नहीं समझते। अध्ययन के परिणाम 'जर्नल ऑफ ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर एंड ह्यूमन डिसीजन प्रोसेस" के नए अंक में प्रकाशित किए जा चुके हैं।
भारत के लिए नया नहीं
वैसे हमारे मुल्क में तो 'संतोषी सदा सुखी" और 'धीरज मोटी बात छे" जैसे ब्रह्म वाक्य पीढ़ियों से दीवारों पर लिखे जाते रहे हैं। और नानी दादियों द्वारा बच्चों को सिखाए जाते रहे हैं।  

ब्रेन सेल्स की सफाई के लिए जरूरी है पर्याप्त नींद

 स्वस्थ रहने के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है। इससे न सिर्फ दिमाग चुस्त रहता है बल्कि डिमेंशिया तथा अन्य दिमागी बीमारियों से बचाव भी होता है। वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में पाया कि नींद के दौरान मृत कोशिकाएं दिमाग की ब्लड वेसल्स के जरिए शरीर के ब्लड सर्क्युलेशन सिस्टम में जाती हैं और अंत में लिवर में पहुंच जाती हैं। इस तरह नींद में इन कोशिकाओं की सफाई हो जाती है।
अमेरिका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि क्यों लोग अपने जीवन का एक तिहाई भाग सोने में बिताते हैं। वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में एक चूहे पर प्रयोग कर पाया कि नींद की प्रक्रिया के दौरान ब्रेन की ब्लड वेसल्स के जरिए निर्जीव कोशिकाएं निष्क्रिय होकर शरीर से बाहर निकल जाती हैं और ताजगी प्रदान करती हैं।
खास किस्म का प्रोटीन मौजूद
शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के बाद पाया कि इन निर्जीव कोशिकाओं में एक खास किस्म का प्रोटीन तत्व 'एमीलॉइड बीटा" भी शामिल होता है, जो भूलने की बीमारी अल्जाइमर को बढ़ाने में सहायक होता है। वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को तर्क सहित स्पष्ट करते हुए कहा कि नींद लेते समय मस्तिष्क की कोशिकाएं 60 प्रतिशत तक सिकुड़ जाती हैं, जिसके कारण शरीर में मौजूद अन्य द्रव तथा रसायन पहले से कहीं अधिक तेजी से निर्जीव कोशिकाओं को शरीर से बाहर करने में मदद करते हैं।
दस गुना तेजी से कार्य
रोचेस्टर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मैकन नेदरगार्ड ने कहा कि नींद लेते समय ब्रेन शरीर को ताजगी प्रदान करता है तथा इन निर्जीव कोशिकाओं की भूमिका का अंत कर वह दोनों कार्य एक साथ करता है। उन्होंने बताया कि नींद के समय मस्तिष्क यह कार्य दस गुना अधिक तेजी से करता है।  

अपने बदलते व्यवहार पर जरा ध्यान दें...

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि नींद के दौरान आपने किसी को फोन पर मैसेज किया हो और सुबह उठकर कुछ याद ही न आए? अपने व्यवहार में आ रहे इस बदलाव पर अगर अब तक आपने गौर नहीं किया है, तो अब इसे गंभीरता से लें।
'द अटलांटिक"
में प्रकाशित एक अध्ययन की मानें तो नींद में चलने या बात करने की तरह नींद में मैसेज करना यानी 'स्लीप टेक्सटिंग" भी एक मानसिक रोग हो चुका है।
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ डेटिंस्ट्री के प्रोफेसर माइकल गेल्ब ने अपने अध्ययन के आधार पर दावा किया है कि देर रात तक टेक्सटिंग या मैसेजिंग की वजह से कई बार आप नींद में ही मैसेज करते हैं और जागने के बाद आपको कुछ याद ही नहीं रहता है। यह सोने और जागने के बीच की स्थिति होती है, जिस वजह से आपको अपनी ही गतिविधि याद नहीं रह पाती है।शोधकर्ताओं का मानना है कि आमतौर पर यह स्थिति बहुत अधिक मैसेज करने वाले उन लोगों के साथ सोने के दो घंटे की भीतर होती है। इस दौरान नींद हल्की होती है जिसे 'रेपिड आई मूवमेंट" के नाम से जाना जाता है। इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह आगे चलकर याददाश्त व नींद संबंधी समस्याओं की बड़ी वजह हो सकता है।
हालांकि शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि काउंसलिंग और दवाओं के जरिए भी इस समस्या का उपचार किया जा सकता है लेकिन बचाव सबसे अच्छा विकल्प है।
क्या किया जाए 
माइकल कहते है कि ऐसी स्थिति के दौरान जरूरी है कि हम सोने से पहले फोन बंद करें, मैसेजिंग को नियंत्रित करें और समाजिक होने के लिए दूसरी गतिवधियों पर बल दें। 

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

लतीफा: मैं जानवरों का डॉक्टर हूं

डॉक्टर, मरीज से बोला, ' शायद आपको आंखों की परेशानी है।"
मरीज, 'डॉक्टर साहब आपने बिना पूछे ही कैसे जान लिया कि हमको आंखों की बीमारी है?"
डॉक्टर, ' क्योंकि तुमने बाहर बोर्ड नहीं पढ़ा कि मैं जानवरों का डॉक्टर हूं।" 

लतीफा: जो सजावट के काम आए

बच्चे बारात में शामिल होकर लौटे थे।
एक ने दूसरे से सवाल किया, ' दूल्हा किसे कहते हैं?"
दूसरे ने जवाब दिया, ' जो शादी में सजावट के काम आए।" 

साथी के साथ जाएं स्लीमिंग क्लास

हर किसी काम में यह बात पक्के तौर पर कही जाती है कि एक से भले दो। जहां दो लोगों का साथ होता है, वहां हर काम बड़ी आसानी से हो जाता है। यकीनन यह बात शायद हर फील्ड में लागू होती है। यही वजह है कि एक नए शोध में स्लीमिंग क्लास जाने में भी किसी के साथ होने को ज्यादा फायदेमंद बताया गया है।
नए अध्ययन से यह पता चला है कि स्लिमिंग क्लास में दूसरे लोगों को वजन कम करने की कोशिश करते हुए देखना भी आपके लिए फायदेमंद रहता है। सर्वे से यह भी पता चला है कि सिर्फ खानापान पर ध्यान देने और वसायुक्त चीजों से दूर रहने से आपको ज्यादा फायदा नहीं होता। बल्कि किसी का साथ इस मामले में ज्यादा मायने रखता है।
अक्सर ऐसा माना जाता है कि और डॉक्टर भी यही सलाह देते हैं कि स्लिम रहने के लिए वसायुक्त आहार में कमी और व्यायाम लाभकारी होता है। नए अध्ययन से पता चला है कि वजन घटाने के लिए प्रयासरत लोगों को अपने जैसे लोगों के संपर्क में रहने से फायदा मिलता है।
स्लिमिंग क्लास में अन्य लोगों के साथ आपकी उपस्थिति भी आपको और अधिक प्रेरित करती है। वहीं जो लोग केवल आहार के माध्यम से ऐसा करते हैं वह धीरे-धीरे वजन कम करने में दिलचस्पी खोने लगते हैं। खासकर तब जब उनका वजन जल्दी से न घट रहा हो।  

बहुत खास होती है मुस्कुराहट

'किसी की मुस्कुराहटों पर हों निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार"। गानों के इन बोलों को तो अमूमन सभी लोगों ने सुना होगा, जिसके निहितार्थ भी इसमें बखूबी छिपे हुए दिखाई देते हैं। वैसे ही खुद खुश होना और दूसरों को खुशियां देना जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है। मगर क्या आपको पता है यह मुस्कुराहट रोगों से भी दूर रखने में मदद करती है।
जी हां, ब्लड प्रेशर गंभीर समस्याओं में से एक है। इसके उपचार के लिए लोग डॉक्टरी सलाह व दवाओं की मदद लेते हैं, लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि आपकी एक मुस्कुराहट ही ब्लड प्रेशर को कम कर देती है।
अध्ययन के मुताबिक इंसान के शरीर में मौजूद हैप्पीनेस का एक जीन डोपामाइन द्वारा कंट्रोल होता है। डोपामाइन वह हार्मोन है, जो लोगों को खुश रखता है। प्रसन्ना रखने वाला यह हार्मोन ब्रेन के लिए विशेष टॉनिक माना जाता है। यह आपके जीवन में आलस्य से लेकर सृजनात्मकता और आवेगशील होने से लेकर नशीले पदार्थों का आदी बनने सहित हर बात से संबंधित होता है। बस जरूरी है इसके सही दिशा में उपयोगभर की। वैज्ञानिकों का मानना है कि मुस्कुराहट भरे चेहरों वाले व्यक्तित्व में इस विशेष हार्मोन की वजह से चेहरे पर अद्भुत चमक दिखाई देती है और ऐसे व्यक्ति ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की चपेट में आने से बचे रहते हैं।
यह जीन एक एजेंट का निर्माण करता है, जो ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अध्ययन से नई थैरेपी विकसित की जा सकेगी। इससे ब्लड प्रेशर को काबू करने में आसानी होती है। 

TENSIONCHHOD2 : ...और चेहरे पर आ जाएगा निखार

TENSIONCHHOD2 : ...और चेहरे पर आ जाएगा निखार: ढेर सारे मेकअप और कई सारे प्रोडक्ट इस्तेमाल करने के बाद भी आपको मनचाहा परिणाम नहीं मिल रहा। इसका सबसे बड़ा कारण हो सकता है स्किन टाइप के वि...

बीमार हैं तो ऑफिस जाने से करें परहेज

सर्दी-जुकाम और बुखार होने पर भी काम का दबाव कई बार अधिकांश लोगों को ऑफिस जाने पर मजबूर कर देता है। लेकिन शोधकर्ताओं की मानें तो ऐसी अवस्था में उन्हें घर पर रूककर आराम करना चाहिए। बीमारी में ऑफिस जाने से सेहत और ज्यादा खराब हो सकती है। साथ ही इससे सहकर्मियों के भी संक्रमित होने का खतरा पैदा होता है।
ब्रिटेन के मशहूर माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. चार्ल्स का कहना है कि बीमारी की शुरुआती अवस्था में अक्सर लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं और वे काम पर निकल जाते हैं। लेकिन इससे स्थिति और खराब हो सकती है। ऐसा करने से शरीर को आराम करने का मौका नहीं मिलता और बीमारी बढ़ने लगती है। सहयोगियों के संपर्क में आने पर उनके भी बीमार होने की आशंका बढ़ सकती है।
काम होता है प्रभावित
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया इरविन स्कूल ऑफ मेडिसीन की शोधकर्ता कैथरीन कमिंस के मुताबिक बीमारी की हालत में आमतौर पर लोग दवा लेकर काम करना जारी रखते हैं। इससे उन्हें बीमारी से कुछ हद तक आराम मिलता है लेकिन काम प्रभावित होता है।
घर पर रहना ज्यादा अच्छा 
दवा के असर से लोगों पर सुस्ती छाई रहती है, जिससे वे सही तरीके से अपना काम नहीं कर पाते हैं। इस वर्ष की शुरुआत में एरिजोना यूनिवर्सिटी की ओर से भी ऐसा अध्ययन हुआ था, जिससे शोधकर्ताओं ने बीमारी के दौरान घर पर ही रहने की सलाह दी थी। उन्होंने बताया कि बीमारी की हालत में जब लोग ऑफिस आते हैं तो ऑफिस की चीजों को छूते हैं, जिससे वे संक्रमित हो जाती हैं। उन चीजों पर जब स्वस्थ लोगों के हाथ लगते हैं तो उनके भी संक्रमण की गिरफ्त में आने का खतरा पैदा होता है। हालांकि,
उनका यह भी कहना है कि हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमताल कर और हाथों को अच्छी तरह से साफ रखकर इस खतरे से बचा जा सकता है। 

...और चेहरे पर आ जाएगा निखार

ढेर सारे मेकअप और कई सारे प्रोडक्ट इस्तेमाल करने के बाद भी आपको मनचाहा परिणाम नहीं मिल रहा। इसका सबसे बड़ा कारण हो सकता है स्किन टाइप के विपरीत ट्रीटमेंट करवाना या प्रोडक्ट का चुनाव। ऐसे में अगर आप त्वचा के अनुसार खुद पर ध्यान दें तो त्योहारों के मौसम में आपके चेहरे पर नैचरल ग्लो नजर आएगा।
किस तरह त्योहारों या खास मौकों के लिए आप अपनी त्वचा के अनुसार खुद को संवार सकते हैं। इन्हें कुछ यूं जाना जा सकता है-
 ड्राइ स्किन के लिए
बदलते मौसम में ड्राइ स्किन वाले लोगों को त्वचा का अधिक खयाल रखना चाहिए क्योंकि सर्दियों में उनकी त्वचा तेजी से नमी खोती है। बेहतर होगा कि वे ऑयल बेस क्रीम और मॉइश्राइजर का प्रतिदिन इस्तेमाल करें। बहुत गर्म पानी के बजाय हल्के गर्म पानी से नहाएं और तुरंत बाद मॉइश्राइजर लगाएं। टोनर या अल्कोहल बेस कॉस्मैटिक्स से दूर रहें।
 ऑयली स्किन के लिए
इस मौसम में ऑयली स्किन का ख्याल रखना आसान है क्योंकि यह अधिक ऑयली भी नहीं होती और इसमें नमी भी रहती है। हां, रोज दिन में दो बार फेसवॉश से चेहरा साफ करना और टोनर का इस्तेमाल करने का रुटीन जारी रखें।
नॉर्मल स्किन के लिए
ऐसी स्किन सर्दियों में ड्राइ और गर्मियों में ऑयली हो जाती है। इसे हेल्दी बनाए रखने के लिए फेस वॉश से साफ करने के बाद मॉइश्चराइजर तो लगाएं ही पर रोज चेहरा टोनर से भी साफ करें। जिससे ऑय बैलेंस रहेगा।
कुछ जरूरी उपाय  

  • दिन में कम से कम आठ ग्लास पानी जरूर पीएं।
  • मेकअप हमेशा क्लींजर से साफ करें।
  • त्वचा की स्क्रबिंग और मॉइश्चराइजिंग पर ध्यान दें।
  • विटामिन ए, बी1 और बी2 से भरपूर डाइट लें। यानी हरी सब्जियां, डेयरी उत्पाद, अंडा, मीट या सलाद जरूर लें। 

माइक्रेन को मुसीबत न बननें दें

आज की भागमभाग भरी जिंदगी में माइग्रेन के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। वहीं हाल ही में हुआ एक शोध माइग्रेन मरीजों के लिए चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि इसमें बताया गया है कि माइग्रेन के मरीजों को अवसाद का खतरा दूसरों की अपेक्षा दोगुना होता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के शोधकर्ताओं की मानें तो माइग्रेन के मरीजों में अवसाद की आशंका अधिक होती है। पुरुषों में सामान्यत: अवसाद के मामले 3.4 प्रतिशत होते हैं जबकि माइग्रेन के मरीज पुरुषों में अवसाद के मरीज 8.4 प्रतिशत अधिक होते हैं।
इसी तरह सामान्य महिलाओं को अवसाद की समस्या 5.7 प्रतिशत होती है जबकि माइग्रेन की मरीज महिलाओं को अवसाद के मामले 12.4 प्रतिशत तक अधिक होते हैं।
30 साल से कम उम्र में ज्यादा खतरा
शोधकर्ता प्रोफेसर एस्मे फुलर थॉमसन के अनुसार-शोध में हमें चौंकाने वाली बात यह भी मिली की 30 साल से कम उम्र की माइग्रेन की मरीज महिलाओं में अवसाद का रिस्क छह गुना अधिक होता है जबकि 65 साल की उम्र की महिलाओं में अवसाद का खतरा कम होता है।
शोध के दौरान कनाडा से 67,000 सैंपल इकट्ठा किए गए, जिसमें 6000 सैंपल माइग्रेन के मरीजों के हैं।
हर 7 में से 1 को माइग्रेन
इससे पहले भी माइग्रेन पर हुए एक शोध में माना जा चुका है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को माइग्रेन की समस्या अधिक होती है। इस शोध के अनुसार हर 16 में से एक पुरुष को माइग्रेन होता है, जबकि हर सात में से एक महिला माइग्रेन की मरीज है। इस शोध की मानें तो माइग्रेन से महिलाओं में अवसाद का प्रतिशत भी अधिक होगा। इस शोध का विस्तृत विवरण 'डिप्रेशन रिसर्च एंड ट्रीटमेंट जर्नल" में प्रकाशित हुआ है।