मंगलवार, 27 मई 2014

फेसबुक के ज्यादा करीब होते हैं अकेलेपन के शिकार

जिंदगी से निराश्ा और अकेलेपन के शिकार लोगों में सोश्ाल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर संवेदनश्ाील निजी जानकारियां साझ्ाा करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती हैं।
चार्ल्स स्टर्ट यूनिवर्सिटी (सीएसयू) के श्ाोधकर्ता लंबे समय से अकेलेपन और सोश्ाल नेटवर्किंग पर खुद को जाहिर करने के संबंधों का पता लगा रहे थे। स्कूल ऑफ कंप्यूटिंग एंड मैथेमैटिक्स के सहायक प्रोफेसर यसलेम अल सग्गाफ और सीएसयू रिसर्च ऑफिस के श्ोरॉन नीलसन ने 600 से अधिक महिलाओं फेसबुक यूजर्स की प्रोफाइल का अध्ययन किया। इस सभी महिलाओं ने अपनी प्रोफाइल को पब्लिक किया हुआ था, जिसे सब देख सकते थे।
पुरूष भी कम नहीं
अल सग्गाफ के मुताबिक, पुरुषों में भी फेसबुक पर खुद को ज्यादा से ज्यादा जाहिर करने की प्रवृति कम नहीं होती। उन्होंने कहा, हमने खुद को अकेला बताने वाले 308 यूजर्स की जानकारियां इकट्ठा कीं। इसके बाद 308 ऐसे यूजर्स से बातचीत की जो फेसबुक को एक-दूसरे से संपर्क में रहने के लिए इस्तेमाल करते हैं। श्ाोधकर्ताओं ने पाया, 'अकेले लोगों ने फेसबुक पर निजी जानकारियां ज्यादा बांटीं। अकेलेपन के श्ािकार 79 प्रतिश्ात से अधिक यूजर्स ने अपनी पसंदीदा किताब, पसंदीदा फिल्म जैसी निजी जानकारियां साझ्ाा कीं थीं। 98 प्रतिश्ात ने अपना रिलेश्ानश्ािप स्टेटस सबके बीच साझ्ाा किया था।" यह श्ाोध जर्नल कंप्यूटर्स इन ह्यूमन विहेवियर में प्रकाश्ाित हुआ है।  

स्वभाविक है नाइट इटिंग सिंड्रोम

एजेंसी : ऐसे लोग जो रात में खाने के लिए उठते हैं वे इसके लिए अपने जीन को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं।
एक नए अनुसंधान से इस निष्कषर््ा पर पहुंचा गया है कि नाइट इटिंग सिंड्रोम उस समय हो सकता है जब जीन के चलते खाने के पैटर्न के साथ्ा नींद की दोष्ापूणर््ा तालमेल बैठता है। इससे खाने का समय बदल जाता है जो अधिक खाने और वजन बढ़ने से जुड़ा हुआ है। करीब एक से दो फीसद लोग इससे जूझ्ाते हैं। इसका लक्षण्ा रात में सोने के दौरान उठ जाना और बगैर कुछ खाए सो नहीं पाना। यह अध्ययन सेल रिपोर्ट्स में प्रकाश्ाित की गई है।

कम कैलोरी के भोजन से मंद हो सकता है स्तन कैंसर

आइएएनएस : स्तन कैंसर की वृद्धि पर अंकुश्ा लगाने का एक नया तरीका खोजा गया है। संयमित कैलोरी से फैलते स्तन कैंसर को धीमा किया जा सकता है। यह एक गैर विष्ााक्त तरीका है।
थ्ाॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी के एक एसोसिएट प्रोफेसर निकोल सिमोन ने कहा कि कम कैलोरी वाला भोजन स्तन के ऊतकों में एपीजेनेटिक को बढ़ाता है जो एक्ट्रासेलुलर मैट्रिक्स को मजबूत रखता है। उन्होंने कहा कि एक मजबूत मैट्रिक्स ट्यूमर के आसपास एक तरह का पिंजरा तैयार करता है। इससे श्ारीर के नए स्थ्ाानों पर कैंसर कोश्ािकाओं के लिए फैलाव में अधिक कठिनाई आती है। उल्लेखनीय है कि ट्यूमर वृद्धि पर अंकुश्ा लगाने के लिए अक्सर स्तन कैंसर रोगियों को हार्मोन थ्ोरेपी और कीमोथ्ोरेपी के दुष्परिण्ााम को प्रभावहीन करने के लिए स्टेरायॅड उपचार कराना पड़ता है। हालांकि दोनों ही उपचार रोगियों के पाचन में बदलाव का सबब बन सकते हैं जिससे उनमें मोटापा हो सकता है। सिमोन ने कहा कि इस वजह से एक महिला के कैंसर के उपचार में पाचन को देखना महत्वपूणर््ा है। इस अध्ययन का स्तन कैंसर श्ाोध और उपचार जर्नल में प्रकाश्ाित किया गया है।

रोबोट करेंगे अंतरिक्ष में मरम्मत का काम

आइएएनएस : जल्द ही अंतरिक्ष में मरम्मत के लिए स्पेसवॉक की मुश्किल प्रक्रिया इतिहास बन जाएगी। धरती पर इंसानों का बहुत सा काम संभालने के बाद अब अंतरिक्ष में भी रोबोट इंसान की जगह लेने जा रहे हैं। कनाडा का एक रोबोट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेश्ान (आइएसएस) में कनाडार्म2 के कैमरे और इसके मोबाइल बेस की मरम्मत कर रहा है।
डेक्सटर मरम्मत के इस हफ्ते भर के अभियान में लगा है। गुरुवार तक यह कनाडार्म2 में कैमरा बदलने और ठीक करने के काम को पूरा कर लेगा। कनाडा की अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि अंतरिक्ष में रोबोट द्वारा स्वयं की मरम्मत करने का यह पहला उदाहरण्ा है। एजेंसी के मिश्ान कंट्रोल सुपरवाइजर मैथ्यू केरन ने कहा कि निश्चित ही इन रोबोट की मदद से स्पेसवॉक की संख्या में कमी लाई जा सकेगी। इन रोबोट का नियंत्रण्ा कनाडा स्पेस एजेंसी के मुख्यालय और नासा के मिश्ान कंट्रोल सेंटर से किया गया है। एजेंसी ने कहा कि स्पेसवॉक एक जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए बहुत सारे संसाधनों की जरूरत पड़ जाती है, जबकि रोबोट के मामले में यह काफी आसान हो जाता है।
हर क्षेत्र में मददगार रोबोट
अस्पतालों में - यूरोप के बहुत से अस्पतालों में आपरेश्ान का काम रोबोट्स की मदद से
सेना में - अमेरिकी सेना सीमा पर सैनिकों की जगह रोबोट तैनात कर रही है
होटलों में- जापान की एक कंपनी ने ऐसा रोबोट विकसित किया है जो खाना बनाने में निपुण्ा है।
घ्ार के काम में मददगार- घ्ार के कामों में मदद के लिए तमाम तरह के रोबोट्स जापानी कंपनियां बाजार में बेचना श्ाुरू कर चुकी हैं

पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा होती हैं डिप्रेशन की शिकार

आइएएनएस : महिलाओं के डिप्रेश्ान (अवसाद) संबंधी बीमारियों से ग्र्रस्त होने की आश्ांका ज्यादा होती है। हालिया श्ाोध के मुताबिक, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के मस्तिष्क में हार्मोन एस्ट्रोजन अधिक पहुंचता है जिससे उनमें अवसाद व चिड़चिड़ापन ज्यादा रहता है। ये समस्याएं युवावस्था की श्ाुरुआत से ही सामने आने लगती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया के श्ाोधकर्ता थियोडोर के मुताबिक, इस श्ाोध के नतीजे किश्ाोरावस्था की श्ाुरुआत में चिड़चिड़ेपन, व्याग्रता और सीजोफ्रेनिया जैसे मनोविकारों को समझ्ाने में सहायता मिलेगी। आमतौर पर महिलाओं में चिंता और अवसाद की दिक्कत ज्यादा रहती है तो पुरुषों में  सीजोफ्रेनिया की आश्ांका अधिक रहती है। श्ाोधकर्ताओं ने आठ से 22 वर्ष की आयुवर्ग के 922 प्रतिभागियों के मस्तिष्क में रक्त के प्रवाह के स्तर में बढ़ोतरी को समझ्ाने के लिए मैग्नेटिक रीजोनेंस इमेजिंग (एमआरआइ) का इस्तेमाल किया गया। थियोरोड ने पाया कि महिलाओं में भावनाओं व सामाजिक दबाव को नियंत्रित करने के दौरान मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है और जिस भाग में रक्त का प्रवाह बढ़ता है वह बौद्धिक गतिविधियों से संबंधित है। यह श्ाोध जर्नल नेश्ानल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाश्ाित हुआ है।