शनिवार, 28 दिसंबर 2013

नौनिहालों को बचाएं शैंपू और लोशन के संक्रमण से

आजकल हर माता-पिता अपने शिशुओं की नाजुक त्वचा के लिए बेबी प्रोडक्ट पर आंख बंद कर भरोसा करते हैं। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध में सामने आया है कि इन उत्पादों में मौजूद नुकसानदायक केमिकल्स-पेराबिन्स बच्चों में गंभीर संक्रमण के कारण हो सकता है।
'एसीएस जर्नल ऑफ साइंस एंड टेक्नालॉजी" में प्रकाशित शोध में पाया गया है कि बच्चों के पर्सनल केयर उत्पाद से लेकर खिलौनों तक में थैलेट्स और पेराबिन नामक केमिकल मौजूद हैं,जो बच्चों के लिए कई स्वास्थ्य संबंधी रोगों का खतरा पैदा कर सकते हैं। बच्चों के उत्पादों में नमी देने के लिए थैलेट्स और इन्हें संरक्षित रखने के दिलए पेराबिन का इस्तेमाल किया जाता है।
इससे पहले भी एक ब्रिटिश शोध में इन केमिकल्स से ब्रेस्ट कैंसर, स्पर्म्स का कम होना और दमा जैसे खतरों की आशंका जताई जा चुकी है।
170 सैंपल्स के जरिए निकाला निष्कर्ष
शोध के दौरान शोधकर्ताओं ने अलग-अलग ब्रांड के बच्चों के पर्सनल केयर सामान व खिलौनों के 170 सैंपल इकट्ठा कर उनका अध्ययन किया है और यह निष्कर्ष निकाला है।
सतर्कता जरूरी
शोधकर्ताओं का मानना है कि बाजार से खरीदते वक्त इन उत्पादों का लेबल अच्छी तरह पढ़ना बहुत जरूरी है, जिससे बच्चों को इन हानिकारक केमिकल्स से बचाना आसान हो सके। आजकल हर प्रोडक्ट पर उसमें समाहित कन्टेंट की जानकारियां दी जा रही हैं, जिस पर ध्यान देते हुए कुछ सावधानी बरती जा सकती है।  

सलाद में चुकंदर हैं सेहत का सिकंदर

चुकंदर न सिर्फ सलाद की खूबसूरती बढ़ाने के लिए जरूरी है बल्कि खून बढ़ाने से लेकर कामेच्छा बढ़ाने तक, यह सेहत से जुड़े कई मामलों में आपके लिए बेहद मददगार हो सकता है।
जानिए, सेहत से जुड़े चुकंदर के ऐसे फायदों के बारे में जिन्हें जानने के बाद आप इसे अपनी डाइट का हिस्सा यकीनन बनाएंगे।
* पीरियड्स में आराम :
इसमें आयरन और फोलिक एसिड की अधिकता होती है, जिससे महिलाओं को पीरियड्स संबंधी समस्याएं नहीं होती हैं। पीरियड्स के दर्द से लेकर अनियमितता तक कई समस्याओं का समाधान इस डाइट में मिल सकता है।
* एनीमिया :
आयरन की प्रचुर मात्रा होने के कारण चुकंदर एनीमिया के मराजों के लिए  फायदेमंद साबित हो सकता है। खासतौर पर गर्भावस्था के समय इसका सेवन जच्चा-बच्चा की सेहत के लिए बहुत जरूरी है।
* ब्लड प्रेशर :
कई शोधों में प्रमाणित हो चुका है कि इसका नियमित सेवन हाइपरटेंशन और दिल के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है। यह ब्लड सर्क्युलेशन ठीक रखता है और फैट्स घटाने में मदद करता है।
* जवां त्वचा के लिए :
यह शरीर से हानिकारक केमिकल्स को हटाता है और खून साफ करता है। इस वजह से त्वचा पर मुहांसे डार्क स्पॉट और रैशेज जैसी समस्या नहीं होती हैं। लंबे समय तक जवां त्वचा के लिए रोज इसका सेवन करें।
* पेट के लिए फायदेमंद :
यह लिवर और पेट के लिए बहुत फायदेमंद है। यह सुपाच्य तो है ही, साथ ही यह लिवर को साफ करने का भी काम करता है। कांस्टिपेशन से आराम के लिए इससे बेहतर डाइट कुछ और नहीं है। 

दूसरों को एक्सरसाइज करते देखने से भी होते हैं हेल्दी

वर्कआउट के नाम पर ही आपको आलस आ जाता है क्या? तो चिंता नहीं सिर्फ दूसरों को जिम में जाता हुआ देखने से भी आप हेल्थ कॉन्शस हो सकते हैं। जी हां, विश्वास नहीं होता ना, मगर यह सच है। हाल ही वेस्टर्न सिडनी की यूनिवर्सिटी में किए एक नए अध्ययन में बताया गया है कि दूसरे लोगों को एक्सरसाइज करते हुए देखने से खुद की हार्ट रेट और अन्य साइकोलॉजिकल गतिविधियों पर असर पड़ता है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप खुद ही एक्सरसाइज कर रहे हों। इसलिए इसे भी हेल्दी रहने का एक जरिया माना गया है।
तब तो अब मोटापे से ग्रसित लोगों को किसी तरह की चिंता की जरूरत ही नहीं हो सकेगी, वे बिना पसीना बहाए ही बहुत जल्दी वजन को कंट्रोल कर सकने में कामयाब होंगे।
 *हैरान करने वाला शोध :
नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि दूसरों को शारीरिक रूप से सक्रिय देखने से भी इंसान फिट रह सकते हैं। यानी आपको खुद कसरत करने की जरूरत नहीं है, आप केवल दूसरों को व्यायाम करते हुए देखकर ही अपना वजन कम कर सकते हैं। यह शोध वाकई हैरान करने वाला है लेकिन शोधकर्ताओं का दावा है कि इसके पीछे पुख्ता वैज्ञानिक आधार मौजूद है। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न सिडनी के शोधकर्ताओं ने पुख्ता निष्कर्ष के लिए कुछ लोगों पर परीक्षण कर इस बात को अंजाम दिया है।
*क्या पाया :
शोधकर्ताओं के अनुसार टीवी पर खेल देखने या लोगों को खेलते हुए देखने से लोगों का हृदय गति, श्वसन और स्कीन ब्लड फ्लो में सुधार आता है। इससे शरीर को ठीक वैसा ही फायदा मिलता है जैसा एक्सरसाइज करने से होता है। यह पहला अध्ययन है कि जसमें शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि दूसरों को शारीरिक रूप से सक्रिय देखकर लोगों की मांसपेशियों में सक्रियता आती है। यह अध्ययन 'जर्नल फ्रंटियर्स इन ऑटोनॉमिक न्यूरोसाइंस" में प्रकाशित किया गया है।  

सेलफोन का इस्तेमाल बढ़ा रहा तनाव

सेलफोन के लगातार इस्तेमाल से होने वाले नुकसान के बारे में तो सभी ने सुना होगा। पूर्व में हुए कई शोधों में सेलफोन के ज्यादा उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में भी बताया जा चुका है। यह आपकी सेहत के साथ ही दिमाग के लिए भी नुकसानदेह होता है। हाल ही में हुए एक अन्य शोध से पता चला है कि छात्रों द्वारा मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल तनाव और परीक्षाओं में कम नंबर आने का कारण बन रहा है।
शोध से यह भी स्पष्ट हुआ है कि मोबाइल का उपयोग करने से छात्रों की खुशियों पर भी असर पड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि सेलफोन का इस्तेमाल छात्रों के ग्रेड प्वाइंट एवरेज (जीपीए) पर नकारात्मक असर और डालता है और तनाव को बढ़ाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि सेलफोन का लगातार इस्तेमाल छात्रों की सफलता जैसे उनके शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित करता है। केंट स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता एंड्रयू लेप, जैकब बार्कले और आर्यन कारपिंकसिकी ने अपने अध्ययन में सेलफोन के असर का पता लगाने के लिए यूनिवर्सिटी के 500 से ज्यादा छात्रों पर अध्ययन किया गया। अध्ययन से निकले परिणामों के आधार पर शोधकर्ताओं ने बताया कि सेलफोन के इस्तेमाल से छात्रों में तनाव का स्तर बढ़ जाता है।  

पिटाई से बच्चे सुधारते नहीं, बिगड़ते हैं

यदि आप भी बच्चों की शरारत से परेशान रहते हैं और अक्सर उन्हें पीटकर सुधारने की कोशिश करते हैं तो अपनी इस आदत को बदल दीजिए। पिटाई से बच्चे सुधरते नहीं बल्कि और बिगड़ जाते हैं। ऐसा करके आप खुद अपने बच्चे को अधिक आक्रामक बना रहे हैं। साथ ही उसके व्यवहार निर्माण को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। जी हां, एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि बच्चों को मारना-पीटना उन्हें अधिक आक्रामक बनाता है। साथ ही वे बुरा बर्ताव करने लगते हैं। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए क्या तरीके अपनाए जाते हैं, इसका उनके व्यवहार पर सीधा और गहरा असर पड़ता है। इससे इस बात पर कोई असर नहीं पड़ता कि बाकी समय में बच्चों के साथ आप कैसा बर्ताव करते हैं।
*पूरी तरह से की जांच-परख :
यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन ऑफ सोशल वर्क में सहायक प्रोफेसर शावना ली के मुताबिक आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि पिता और बच्चों के बीच सकारात्मक रिश्तों के दौरान अगर बच्चों की पिटाई की जाती है तो इससे बच्चे को किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। इस शोध में हमने इस प्रचलित मान्यता को परखा और पाया कि पिटाई से कुछ समय बाद बच्चों के व्यवहार पर नकरात्मक असर पड़ता है। इससे इस बात का भी कोई लेना-देना नहीं है कि माएं अपने बच्चों के साथ कितनी गर्मजोशी से मिलती हैं। उन्होंने आगे कहा कि कई शोध इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि पिटाई से बच्चों में आक्रामकता बढ़ती है, लेकिन इसके बावजूद अनुशासित रखने के नाम पर बच्चों को पिटाई की जाती है।
*3200 से अधिक प्रतिभागी :
इस शोध में 3200 से अधिक प्रतिभागी शामिल थे। इनमें व्हाइट, अफ्रीकन अमेरिकन और हिस्पेनिक परिवारों ने भाग लिया। डेटा तब एकत्रित किए गए जब बच्चों की उम्र एक, तीन और पांच वर्ष थी। मांओं ने बताया कि लगभग कितने अंतराल पर बच्चों की पिटाई होती है और इसके साथ ही उन्होंने बच्चों के आक्रामक बर्ताव और बच्चों के प्रति अपने सकारात्मक व्यवहार के बारे में भी बताया। यह शोध 'जर्नल डेवलपमेंट साइकोलॉजी" में प्रकाशित हुआ है।
*डांटना भी है नुकसानदायक :
इसके अलावा एक अन्य शोध में यह बात भी सामने आई है कि जिन किशोरों पर उनके अभिभावक चिल्लाते हैं, उनमें अवसाद और बेवजह तर्क करने की आदत भी पड़ जाती है। 

विटामिन बी 12 की कमी भी एसिडिटी की वजह

आधुनिक लाइफस्टाइल में अधिकांश लोग खानपान पर सही तरीके से ध्यान नहीं दे पाते हैं। इसके अलावा फास्ट फूड और जंक फूड के चलन ने इस खानपान को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसी वजह से ज्यादातर लोग सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या से परेशान रहते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि इसके अलावा भी कुछ कारण हो सकते हैं कि जिनकी वजह से एसिडिटी की समस्या आपको परेशान किए होती है। इनमें से एक कारण है विटामिन की कमी।
हाल ही हुए एक नए शोध में पता चला है कि जब शरीर में विटामिन बी 12 की कमी होती है तो एसिडिटी की समस्या ज्यादा होती है। 'अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल" में प्रकाशित शोध में इस बात का दावा किया गया है।
*2 लाख मरीजों पर अध्ययन :
केजर परमानेंट डिविजन ऑफ रिसर्च के वैज्ञानिकों ने हार्ट बर्न के दो लाख मरीजों पर अध्ययन किया है, जिनमें 12 प्रतिशत लोगों में विटामिन बी 12 की कमी मिलती है। शोध में पाया गया है कि विटामिन बी 12 को रक्त में घोलने में गैस्ट्रिक एसिड की बड़ी भूमिका है और विटामिन बी की कमी के कारण शरीर में एसिड रिफ्लेक्स की स्थिति आ सकती है। शरीर में अगर विटामिन बी की कमी की भरपाई न हो तो डिमेंशिया, ब्रेन डैमेज, एनीमिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। शरीर को प्रतिदिन 2.4 माइक्रोग्राम विटामिन बी 12 आवश्यकता होती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि हार्टबर्न के मरीज प्रोटोन पंप इनब्हीटर (पीपीआई) का इस्तेमाल करते हैं, उससे भी विटामिन बी की मात्रा में कमी आती है, इसलिए इसकी जगह खानपान में सुधार जैसे बचाव ज्यादा मददगार हो सकते हैं।
खानपान में विटामिन बी 12
अक्सर यह सवाल उठता है कि हमें अपने खानपान में किन चीजों को शामिल करना चाहिए, ताकि शरीर में विटामिन बी 12 की कमी न हो। हालांकि मांसाहारी पदार्थों में विटामिन बी 12 की भरपूर मात्रा होती है, लेकिन शाकाहारी लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए। विटामिन बी 12 के कुछ मुख्य स्रोत हैं। जैसे हमें डेयरी उत्पादों का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए जिनमें दूध, दही, पनीर, चीज, मक्खन, सोया मिल्क आदि महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि में भी विटामिन बी 12 आंशिक रूप से पाया जाता है।
नॉन वेजिटेरियन लोगों को अंडा, मछली, रेड मीट, चिकन आदि से विटमिन बी 12 भरपूर मात्रा में मिल जाता है, परंतु इसका ज्यादा सेवन करने से शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ जाता है, जो नुकसानदेह साबित हो सकता है, इसलिए नॉनवेज का सेवन सीमित और संतुलित मात्रा में करना चाहिए। 

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

थोड़ी सी मौज-मस्ती


टोट बैग : आराम के साथ स्टाइल भी

फैशन के दौर में अब बैग या छोटे पर्स को आप इग्नोर नहीं कर सकतीं, क्योंकि बैग आज जरूरत ही नहीं फैशन स्टेटमेंट का हिस्सा भी बन चुके हैं।
कभी बड़ा बैग, तो कभी छोटा बैग। यही नहीं, बैग के फैब्रिक में भी काफी बदलाव हुआ है। तभी तो सारी महिलाएं फैशन के अनुरूप एक सुंदर बैग अपने साथ जरूर कैरी करना चाहती हंै, ताकि वे कहीं भी बाहर जाते समय अपने जरूरी सामान को ले जा सके।
*आउटफिट्स के साथ हो मैच :
सच तो यही है कि आउटफिट्स से मैच करता हैंडबैग आपके स्टाइल को कंप्लीट भी करता है। इसलिए जब भी अपने लिए बैग खरीदने जाएं, तो अपनी जरूरत को ध्यान में तो रखें ही, साथ ही लेटेस्ट ट्रेंड का भी ध्यान रखें।
लेटेस्ट ट्रेंड की बात करें, तो ब्राइट और स्टाइलिश टोट बैग इन दिनों फैशन में है। टोट बैग्स आज न केवल फैशन स्टेटमेंट बन गए हैं, बल्कि इन्हें काफी सुविधाजनक और ट्रेंडी भी माना जा रहा है।
* क्यों खास है टोट बैग :
-टोट बैग्स असल में एक प्रकार के ओपन बैग्स है, जिनके दोनों ओर हैंडलनुमा स्ट्रैप्स लगे हुए होते हैं। ये ज्यादातर कपड़े या लेदर से बने होते हैं और इनमें आसानी से ढेर सारा सामान कैरी किया जा सकता है।
-टोट बैग्स की अनेक वैरायटी बाजार में है। खासतौर पर कपड़ों और जूट जैसे मैटेरियल से बने टोट बैग ज्यादा चलन में हैं। यही नहीं इन बैग्स को बीड्स, रेशमी लेस, रेशम आदि से सजाकर या इन पर पेंटिंग करके और भी खूबसूरत लुक दिया जा रहा है।
-पहले टोट बैग्स केवल सिंगल जेब या दो जेब वाले, खुले बिना जिप के साधारण स्टाइल में बनाए जाते थे, लेकिन आज समय की मांग के अनुसार इनमें मोबाइल पाउच, साइड वॉलेट आदि जैसे विकल्प भी दिए जा रहे हैं यानी जिप वाली दो-तीन जेबें भी इसमें आपको देखने को मिलेगीं।
* गहरे रंग का चलन :
सर्दियों को ध्यान में रखते हुए ब्राइट कलर का बैग लें, क्योंकि इन दिनों ब्राइट और स्टाइलिश बैग का फैशन है। कलर में हरा, पीला, गुलाबी, इंडिगो और लाल का फैशन है। ये रंग आपको फ्रेश अहसास कराते हैं। इसलिए बिना किसी डर के अपना मनपसंद कलर ले लें। 

कहीं आपकी नींद भी उड़ तो नहीं गई है!

कहते हैं प्यार में अक्सर नींद उड़ जाती है लेकिन अगर आप प्यार में नहीं हैं और फिर भी आपको नींद नहीं आती है तो आपके लिए कई वजहें हो सकती हैं।
जी हां, 'हफिंगटन पोस्ट" में प्रकाशित शोध में 'रिजॉनेट" नामक कंपनी ने एक सर्वेक्षण करवाया। जिसमें किन स्थितियों में लोगों की नींद उड़ती है, इसके खुलासे हुए हैं।
अगर आपको भी रात में ठीक तरह से नींद नहीं आती है तो गौर करें, इनमें से कोई वजह तो नहीं जो आजकल आपकी नींद को उड़ा दे रही है।
* कम आय :
शोध में पाया गया कि नींद न आने से परेशान 40 प्रतिशत लोगों की आय उनकी जरूरतों की अपेक्षा कम है। वहीं 19 प्रतिशत लोगों के बच्चों 15 से 17 साल की उम्र के हैं, जिनके भविष्य की चिंता उन्हें सोने नहीं देती है।
* संबंधों में कड़वाहट :
प्यार में ही नींद नहीं उड़ती बल्कि प्यार खोने पर भी नींद तेजी से उड़ जाती है। शोध के अनुसार 35 प्रतिशत लोगों को तलाक लेने या संबंध तोड़ने की स्थिति में नींद नहीं आती है।
* दवाओं का असर :
शोध के अनुसार- अधिक दवाएं लेने वाले लोगों को अनिद्रा की समस्या अधिक होती है। इतना ही नहीं, 16 प्रतिशत लोग इलाज के दौरान इतने असहज रहते हैं कि उन्हें अनिद्रा की समस्या शुरू हो जाती है।
* बडा ओहदा, बड़ी जिम्मेदारियां :
शोध में पाया गया कि 32 प्रतिशत लोग जो किसी कंपनी में बड़े पद और बड़ी जिम्मेदारियों को संभाल रहे हैं, उन्हें नींद से जुड़ी समस्याओं की रिस्क अधिक रहती है।
* नशे की लत :
शोध के अनुसार धूम्रपान करने वाले 48 प्रतशित लोगों को नींद न आने की समस्या अधिक होती है। नींद न आने की ऐसी ही कोई वजह आपकी भी तो नहीं? यदि है तो उन्हें थोड़ा बदलने की कोशिश कीजिए नहीं तो इसका असर आपके स्वास्थ्य पर आसानी से दिखाई दे जाएगा।  

नॉर्मल डिलिवरी में मदद करेगी 'हिप्नोबर्थ थैरेपी"

महिलाओं के जीवन का सबसे खूबसूरत पल वह होता है, जब वह मां बनती हैं। मगर मां बनने की यह प्रक्रिया महिलाओं के लिए दूसरे जनम से कम नहीं होती। शारीरिक संरचनाओं के आधार पर महिलाओं को प्रैग्नेंसी के दौरान कई तरह की समस्याओं से जूझना होता है और वहीं नॉर्मल डिलिवरी को लेकर चिंताएं भी उत्पन्ना होती है। इन समस्याओं को देखते हुए आधुनिक समय में 'हिप्नोबर्थ थैरेपी" को बढ़ावा दिया जा रहा है। जी हां, नॉर्मल डिलिवरी (सामान्य प्रसव) के लिए गर्भवती महिलाएं इस तकनीक को आजमाकर प्रसव के दर्द को कम कर सकती हैं। डिलिवरी के लिए यह तकनीक बहुत ही आसान मानी जा रही है।
*यूं आई सामने :
'हिप्नोसिस थैरेपी" तब चर्चा में आई, जब दुनिया की मशहूर हस्तियों ने इसे आजमाया। ब्रिटिश राजकुमारी केट मिडल्टन से लेकर किम कार्दिशियन जैसी सेलिब्रिटी भी सामान्य प्रसव के दौरान हिप्नोसिस की नई तकनीक 'हिप्नोबर्थ" को आजमा चुकी हंै। 'फॉक्स न्यूज" में प्रकाशित खबर में इस थैरेपी से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं का पता चला है।
*इस तकनीक का मतलब :
कनेक्टिकट में हिप्नोबर्थ तकनीक पर काम रहीं सिंथिया ओवरगार्ड के अनुसार 'हिप्नोसिस" का मतलब है 'आराम" और 'फोकस"। इस तकनीक से हम गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में स्ट्रेस को कम करने और लेबर पेन के वक्त उनका फोकस बढ़ाने और दर्द से ध्यान हटाने की कोशिश करते हैं। इससे शरीर में फील गुड हार्मोन 'ऑक्सीटोसिन" बढ़ता है और प्रजनन आसान होता है।
*खतरा होता है कम :
ओवरगार्ड का मानना है कि महिलाएं सामान्यतया प्रजनन के दौरान इतनी अधिक डर और असुरक्षा महसूस करती हैं कि उनके शरीर में एड्रेनलाइन का स्तर बढ़ता है, जिससे यूटरस की तरफ ब्लड सर्क्युलेशन कम होता है और डिलिवरी में ज्यादा तकलीफ होती है। लेकिन इस तकनीक को आजमाने से खतरा कम हो जाता है।
*क्या है इस थैरेपी में :
इस थैरेपी के अंतर्गत गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाओं को प्राणायाम, दृश्यों पर ध्यान देने से लेकर हिप्नोटिज्म के कई छोटे-छोटे सेशन दिए जाते हैं, जिससे वे तनावमुक्त रहें। लेबर पेन के दौरान कमरे में मध्यम रोशनी, हल्का संगीत और ध्यान बढ़ाने का सेशन होता है। इसका उद्देश्य प्रसव के दौरान दर्द को कम करना है। यह विधि प्राकृतिक रूप से प्रजनन के दौरान तनाव पर नियंत्रण रखने में कारगर हो सकती है।  

घर को भी दीजिए कंटेम्पररी लुक

यदि आप भी अपने घर की सजावट बदलने की सोच रहे हैं तो खादी और इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स का प्रयोग कर उसे एक अलग लुक दे सकते हैं। खादी कंफर्ट के लिहाज से अच्छी तो है ही, साथ ही जब लोग आपके घर आएंगे तो वो आपके घर के स्वदेशी और पारंपरिक लुक की भी तारीफ करेंगे।
खादी की खासियत यह होती है कि समर्स में वो कूल फीलिंग देती है जबकि विंटर्स में थोड़ी वॉर्म फीलिंग। यही वजह है कि होम डेकोर के लिए भी इसे काफी पसंद किया जाता है। खादी कॉटन हो या फिर खादी सिल्क आप अपनी च्वॉइस के अनुसार किसी भी फैब्रिक को सिलेक्ट कर सकते हैं। साथ ही आप हैंडमेड चीजों से भी अपने घर को एक एथनिक लुक दे सकते हैं।
* बैडिंग्स :
बेड कवर्स, कुशंस और क्विल्ट्स में भी आपके पास बहुत सारी वैराइटीज् के  ऑप्शन्स एंब्रॉयडरी जैसे मंगलागिरी, फुलकारी और काथा में मिल जाएंगे जो होम डेकोर को एक एथनिक लुक देते हैं। सबसे अच्छी बात तो यह है कि खादी से बने टेबल क्लॉथ और नैपकिन टेबल क्लॉथ्स, मैट्स भी डेकोर का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ये खूबसूरत भी दिखते हैं और डेकोर को कंम्पलीट भी करते हैं। ये चीजें आपको कश्मीरी कढ़ाई से लेकर साउथ इंडियन प्रिंट्स तक में मिल जाएंगे।
* परदे :
वाइब्रेंट और कूल कलर्स के साथ-साथ खादी कॉटन के फैब्रिक में आपको इनकी ढेरों वैरायटी मिल जाएगी। ग्रीन, ह्वाइट, यलो जैसे कलर्स जो समर्स के लिए आइडियल माने जाते हैं बहुत ही एलिगेंट और सोबर प्रिंट्स में आपको मिल जाएंगे। अगर आपको ऐसा लगता है कि ये ओल्ड फैशंड लगेंगे तो आपको बता दें कि खादी कर्टन्सस मार्केट में बहुत ही लेटेस्ट पैटर्न में उपलब्ध हैं। अगर थोड़ा रिच लुक चाहते हैं तो कॉटन की जगह आप सिल्क कर्टंस भी यूज कर सकते हैं। मगर इस बात का ध्यान रखें कि इस मौसम में सिल्क कर्टंस को ओवरऑल यूज करने के बजाय कॉटन के साथ मैच कर लें।
* एक्सेसरीज :
एक्सेसरीज आपको पूरी तरह से खादी के बने तो नहीं मिलेंगे लेकिन एक ट्रेडिशनल और इंडियन टच के लिए डिफरेंट तरह के हैंडीक्राफ्ट्स जरूर सिलेक्ट किए जा सकते हैं। इनमें से कुछ  चीजें जैसे टेबल लैम्प्स, पेपर लैम्प्स, फोटो फ्रेम्स जो हैंडमेड होते हैं, डेकोर के लिए यूज किए जा सकते हैं।
फोटो फ्रेम्स तो आपको वुडन, फैब्रिकेटेड और लेदर में भी मिल जाएंगे। यहां तक कि लैम्प शेड्स भी आपको प्रिंटेड पेपर या क्लॉथ के बने मिल जाएंगे। इसके अलावा जूट के बने वाज या लैम्प शेड्स, टेराकोटा या वुडन की सजावटी चीजें या वेस्ट क्लॉथ से बने भी आइटम्स भी आप ले सकते हैं।  

एनीमिया में फायदेमंद है अंजीर

अगर आपका इम्यून सिस्टम मजबूत है तो आपको सेहत संबंधी समस्याओं का सामना कभी नहीं करना पड़ेगा। रोगों से लड़ने की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितनी पौष्टिक और संतुलित चीजों का सेवन करते हैं। आज हम जानते हैं अंजीर के बारे में। ठंड में इसका सेवन काफी लाभदायक होता है। इसमें कैल्शियम और लौह तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह दिमाग को शांत रखता है और शरीर को आराम देता है। डायबिटीज में अंजीर बहुत उपयोगी होता है। सूखे अंजीर में आयरन और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाए जाने के कारण यह एनीमिया में लाभप्रद होता है।
* कौन-कौन से विटामिन :
अंजीर में विटामिन ए, बी1, बी2, कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस, मैगनीज, सोडियम, पोटैशियम और क्लोरीन पाया जाता है।
* कई व्याधियां होती हैं दूर :
इसका सेवन करने से डायबिटीज, सर्दी-जुकाम, अस्थमा और अपच जैसी तमाम व्याधियां दूर हो जाती हैं।
इसके अलावा अंजीर में निम्न खूबियां होती हैं
1. अंजीर पोटैशियम का अच्छा स्रोत है, जो ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद करता है।  
2. अंजीर में फाइबर होता है जो वजन को संतुलित रखता है और ओबेसिटी को कम करता है।
3. सूखे अंजीर में फेनोल, ओमेगा-3, ओमेगा 6 होता है। यह फैटी एसिड कोरोनरी हार्ट डिजीज के खतरे को कम करने में मदद करता है।
4. इसमें पाए जाने वाले फाइबर से पोस्ट मेनोपॉजल ब्रेस्ट कैंसर होने का भय नहीं रहता।
5.अंजीर में कैल्शियम बहुत होता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक होता है।
6. कम पोटेशियम और अधिक सोडियम लेवल के कारण हाइपरटेंशन की समस्या पैदा हो जाती है। लेकिन अंजीर में पोटेशियम अधिक होता है और सोडियम कम होता है इसलिए यह हाइपरटेंशन की समस्या होने से बचाता है।
7.दो अंजीर को बीच से आधा काट कर एक ग्लास पानी में रातभर के लिए भिगो दें। सुबह उसका पानी पीने और अंजीर खाने से ब्लड सर्क्युलेशन बढ़ता है।
* पोषक तत्व कितने :
1 सूखे अंजीर में-
कैलोरी 49
प्रोटीन 0.579 ग्राम
फाइबर 2.32  ग्राम
कुल वसा 0.222 ग्राम
सैचुरेटेड फैट 0.0445 ग्राम
पॉलीअनसैचुरेटेड फैट 0.106 ग्राम
मोनोसैचुरेटेड फैट 0.049 ग्राम
सोडियम 2 मिग्रा   

स्मोकिंग कर सकता है आपके जीन में बदलाव!

अभी तक स्मोकिंग पर बहुत से शोध हो चुके हैं और जिसमें इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कई नेगेटिव इफेक्ट्स को बताया गया है। मगर हाल ही में स्वीडन की उपसाल यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध में शोधकर्ताओं ने पाया कि स्मोकिंग की वजह से लोगों के जीन में कई बदलाव हो सकते हैं। जीन में बदलाव होने के कारण स्वास्थ्य को इसका खामियाजा ज्यादा भुगतना पड़ता है। इसके साथ ही इसका असर बच्चों और अन्य पीढ़ियों में भी दिखाई देता है।
नए शोध के परिणामों के तहत शोधकर्ताओं ने बताया कि स्मोकिंग के कारण जीन में होने वाले बदलाव की वजह से कैंसर और मधुमेह जैसे रोग होने की आशंका भी बढ़ जाती है। उपसाल क्लिनिकल रिसर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने पाया कि स्मोकिंग करने से पुरुषों के प्रतिरोधी तंत्र और स्पर्म्स की क्षमता और गुणवत्ता प्रभावित होती है।
*ऐसे किया शोध :
स्मोकिंग के कारण जीन में हुए परिवर्तनों के बारे में जानने के लिए शोधकर्ताओं ने स्मोकिंग करने वाले और तंबाकू खाने वाले लोगों को शोध में शामिल किया।
इस शोध से पता चला कि स्मोकिंग करने वालों के कई जीन में परिवर्तन हुए। जबकि तंबाकू सेवन करने वाले लोगों के जीन में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला।
*क्या निकला निष्कर्ष :
उपसाल यूनिवर्सिटी और उपसाल क्लिनिकल सेंटर के शोधकर्ता और इस इस शोध के प्रमुख असा जॉनसन ने बताया कि जीन पर तंबाकू सेवन का सीधा-सीधा असर नहीं होता जबकि इसके जलने के बाद पैदा होने वाले तत्व जीन पर प्रभाव डालते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि स्मोकिंग पर लगाम लगाते हुए इससे होने वाले साइड इफेक्ट्स से बचा जा सकता है और काफी हद तक स्वास्थ्यगत फायदे मिल सकते हंै।





   

विटामिन 'डी" बचाए स्तन कैंसर से

बदलती जीवनशैली के कारण स्तन कैंसर काफी बढ़ गया है। स्तन कैंसर का नाम सुनते ही डर लगने लगता है, क्योंकि कैंसर एक ऐसा रोग है जो तेजी से फैलता है। परंतु अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। ब्रिटेन के विशेषज्ञों का कहना है कि विटामिन 'डी" के सेवन से स्तन कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है।
लंदन की सर्जन एवं प्रो. केफाह मोकबेल के अनुसार इससे हर साल एक हजार जीवन बचाए जा सकते हैं। वैसे तो धूप विटामिन 'डी" का सबसे बड़ा स्रोत है। लेकिन महिलाएं अक्सर अपनी दिनचर्चा में इससे महरूम हो जाती है।
प्रो. मोकबेल का दावा है कि 20 साल की आयु के बाद महिलाओं को प्रतिदिन विटामिन 'डी" की एक गोली का सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से स्वस्थ महिलाओं में भी स्तन कैंसर होने की आशंका काफी घट जाती है।
महिलाओं में अक्सर विटामिन 'डी" की कमी देखी जाती है। इसे सामान्य स्तर पर बनाए रखकर कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। अध्ययन के अनुसार विटामिन 'डी" की गोलियों का खर्च काफी कम है और लाभ काफी अधिक क्योंकि इससे बड़ी परेशानी की आशंका काफी कम हो जाती है। एक अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में हर साल 50 हजार महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ रही हैं। इसमें 1200 मौत के मुंह में चली जाती हैं।
*इम्यून सिस्टम के लिए लाभकारी :
अध्ययन के अनुसार वैसे तो विटामिन 'डी" हड्डियों की मजबूती में अहम भूमिका अदा करता है। लेकिन अब यह भी माना जाता है कि विटामिन 'डी" इम्यून सिस्टम और कोशिका विभाजन को नियंत्रित करने में भी लाभकारी है। यह दोनों कैंसर की रोक के अहम कारक हैं।
अमेरिका के हार्वर्ड स्कूल और पब्लिक हेल्थ के अनुसार विटामिन 'डी" की कमी से कई बड़ी बीमारियों जैसे ऑस्टियोपोरोसिस, हृदय रोग, फ्लू, कई प्रकार के कैंसर, टीबी और स्केरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।
हालांकि इस पर शोध कर कर रहे शोधकर्ताओं ने यह माना कि सोरायसिस के लिए केवल यही कारक जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन सोरायसिस के लिए यह कारक जिम्मेदार हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस रोग के इलाज के लिए उन्हें अभी अधिक अध्ययन की आवश्यकता है लेकिन इस प्रकार की सावधानियों को बरतने से इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

जल्द बूढ़े हो जाते हैं डिप्रेशन में रहने वाले

कई शोधों से यह साफ हो चुका है कि डिप्रेशन में रहने से आप कई प्रकार के रोगों का शिकार हो सकते हैं। बहुत से लोगों का भी यह मानना है कि डिप्रेशन इंसान को मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर बना देता है।
हाल ही एक शोध से साफ हुआ है कि शारीरिक समस्याओं के साथ ही डिप्रेशन में रहने से व्यक्ति जल्द बुढ़ापे से ग्रस्त हो जाता है। नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि डिप्रेशन के कारण शारीरिक क्षमताओं पर भी विपरीत असर पड़ता है और यह कोशिकाओं में एजिंग की प्रक्रिया को तेज कर देता है। अध्ययन से यह भी पता चला है कि जो लोग गंभीर किस्म के डिप्रेशन का शिकार होते हैं वे अन्य लोगों के मुकाबले जल्दी बूढ़े हो जाते हैं। शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को पूरा करने के लिए 2407 लोगों पर रिसर्च की। डिप्रेशन में रहने वाले लोगों की नींद भी पूरी नहीं होती।
नींद पूरी न होने का असर आपकी त्वचा के साथ ही शरीर पर भी पड़ता है। ऐसे में त्वचा पर झुर्रियां और आंखों के नीचे काले घेरे बनना आम है। ऐसा भी बताया गया है कि कम नींद लेने वालों को बुढ़ापा जल्दी आता है।  

किसी लत पर काबू पाने में मददगार होता है ध्यान

 हम अक्सर अपनी बुरी आदतों से परेशान रहते हैं। आदत पर काबू पाने के लिए आपको कई उपाय आजमाने पड़ते हैं। कई बार कुछ दिनों तक उस आदत से दूर रहने के बाद एक बार फिर व्यक्ति उनका शिकार हो जाता है। मगर ताजा शोध में कहा गया है कि बुरी आदतों या आसक्ति पर नियंत्रण करने के लिए पुनर्सुधार उपचारों में 'ध्यान" को शामिल करने से अच्छे परिणाम मिलने की संभावना अधिक होती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह उच्चस्तरीय निष्कर्ष बताता है कि तकनीक पर आधारित उपचार, किसी व्यसन से बाहर निकलने में मदद करने के लिए एक पूरक की तरह सहायक होता है। हम इस बात का वैज्ञानिक और गणितीय तर्क भी देते हैं।
*कम्प्यूटर वैज्ञानिक का शोध :
शोधकर्ताओं ने बताया कि यह निष्कर्ष एक कम्प्यूटर वैज्ञानिक द्वारा पशु और मानव अध्ययन पर किए नए सर्वेक्षण में सामने आया है। मैसाचुसेट्स एम्हर्स्ट के कम्प्यूटर वैज्ञानिक यरिव लेविऑफ, तंत्रिका विज्ञान शोधकर्ता जेरोल्ड मेयेर और कम्प्यूटर वैज्ञानिक एंड्रयू बाटरे के सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर आधारित यह शोध 'फ्रंटियर इन साइकाइट्री" नामक पत्रिका के नवीनतम संस्करण में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ता लेवी के अनुसार सर्वेक्षण का उद्देश्य मौजूदा पशु एवं मानव अध्ययनों का प्रयोग करके लत को बेहतर ढंग से समझने और उसके इलाज के नए तरीकों की तलाश करना है। शोधकर्ताओं ने इस सर्वेक्षण के संदर्भ में 'एलोस्टेटिक सिद्धांत का वर्णन भी किया है। यह सिद्धांत के अनुसार जब कोई व्यक्ति नशीली दवा लेता है या प्रतिफल (रिवार्ड) सिस्टम पर जोर देता है तो वह संतुलन की अवस्था खो देता है।  

30 साल की उम्र के बाद प्रेग्नेंसी हो सकती है खतरनाक

आज के आधुनिक समय में करियर की वजह से लोगों की शादी की उम्र बढ़ती जा रही है। जिसके कारण बच्चों की प्लानिंग भी 30 की उम्र के बाद ज्यादा हो रही है। हाल ही एक शोध में यह बात सामने आई है कि 30 के बाद प्रेग्नेंसी से कई प्रकार की जटिलताएं हो सकती हैं। इस शोध में माना गया है कि जो महिलाएं 30 की उम्र तक पहली बार गर्भवती होती हैं, उन्हें अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शोधकर्ताओं का यह मानना है कि 30 साल की उम्र में पहली बार मां बनने वाली महिलाओं को समय से पूर्व प्रसव यानी प्रीमैच्योर डिलिवरी या मृत शिशु का खतरा अधिक होता है। साथ ही स्मोकिंग करने वाली या अधिक वजन वाली महिलाओं को भी यह खतरा कहीं अधिक होता है।
शोध के दौरान 30 से 34 वर्ष की गर्भवती महिलाओं का 25 से 29 वर्ष की गर्भवती महिलानों से तुलनात्मक अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि 20 से 30 साल के भीतर की आयु महिलाओं के लिए पहली बार मां बनने का सही समय है। यह शोध 'ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी जर्नल" में प्रकाशित हुआ है।  

दिमाग में भी होता है ब्रेक लगाने का स्विच!

'थिंक ट्वाइस एंड देन स्पीक" बोलने से पहले दो बार सोच लो और फिर बोलो। यह बात कहना आसान है, मगर इस पर अमल लाना बेहद जरूरी है क्योंकि बोलने में तो कुछ ही पल लगते हैं लेकिन कभी मुंह से ऐसी भी बातें निकल जाती हैं, जो दूसरों को चोट पहुंचा सकती हैं। इसलिए यदि आपके साथ भी कुछ ऐसा ही होता है तो जरा सोच लीजिए आपकी बातें किसी को चोट पहुंचाने का काम तो नहीं कर रही है ना!
इसी बात को ध्यान रखते हुए वैज्ञानिकों ने व्यक्ति के दिमाग और उसकी प्रणाली को जानने की कोशिश की। विशेषज्ञों ने पता लगाया है कि इंसान के दिमाग में एक ऐसा सर्किट होता है, जो किसी परिस्थिति में दिमाग को सोचने से रोकता है। जिसे सेल्फ कंट्रोलिंग से आसानी से जाना जा सकता है।
ह्यूस्टन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास, स्वास्थ्य विज्ञान केंद्र और सैन डिएगो की यूनिवर्सिर्टी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने यह जानकारी दी है। विशेषज्ञों ने सोचा कि क्या लोगों के शरीर के अंदर स्वानुशासन का ऐसा कोई यंत्र या प्रक्रिया है, जिससे किसी सहयोगी से या सोशल मीडिया पर किसी मित्र से बात करते हुए कब और कहां रूका जाए, इसका निर्धारण किया जा सके।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अक्सर कई लोग इस बात का निर्धारण नहीं कर पाते कि किसी दोस्त या सोशल मीडिया पर किसी से बात करते समय कहां और कब रूकना चाहिए। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए इंसान के दिमाग में एक यंत्र मौजूद होता है। विशेषज्ञों ने एक ऐसी तकनीक पेश की है, जिससे दिमाग की उत्तेजन प्रणाली के माध्यम से स्वानुशासन प्रणाली को तेज किया जा सकता है।
यूटीहेल्थ मेडिकल स्कूल के द विवियन एल स्मिथ डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोसर्जरी में ऐसोसिएट प्रोफेसर और इस शोध के वरिष्ठ लेखक नितिन टंडन ने कहा कि हमारे दैनिक जीवन में ऐसे तमाम अवसर आते हैं, जहां किसी को भी प्रतिक्रियाओं को रोकना चाहिए। उदाहरण के लिए उस समय हर हाल में जब बात सामाजिक संदर्भ में अनुचित हो तो बोलना रोक दें। इसके लिए सेल्फ कंट्रोलिंग पावर जरूरी है। जिससे अनुचित बातों को बोलने से रोका जा सके। यह कंट्रोलिंग पावर ही दिमाग के स्विच को स्टीम्युलेट होने से रोकती है।  

बच्चों का देर से सोना ठीक नहीं

'अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज, मेक्स ए मैन हेल्दी, वेल्दी एंड वाइज"। अमूमन हर पैरेन्ट्स अपने बच्चों को सुबह जल्दी उठने और रात को जल्दी सोने का यह पाठ पढ़ाते हैं। ताकि वे स्वस्थ, धनवान और बुद्धिमान बनें। मगर क्या आपने कभी गौर किया है कि धीरे-धीरे दिनचर्या में आप इतने मशगूल हो जाते हैं कि बच्चे देर रात तक जागते हुए टीवी कम्प्यूटर या पढ़ाई में लगे रहते हैं, आपको ध्यान ही नहीं रहता। जिसका असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। हाल ही में हुए एक शोध में यह बताया गया है कि देर रात तक जागने वाले बच्चों का दिमाग कमजोर हो जाता है और वे पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं।
रात में देर से सोने वाले टीनएजर्स पढ़ने-लिखने में पीछे होते हैं। इसके अलावा ऐसे बच्चों को भावनात्मक परेशानियों से भी जूझना पड़ता है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि इनके मुकाबले जो बच्चे जल्दी से जाते हैं, उनका शैक्षणिक प्रदर्शन बेहतर होता है।
*क्या पाया अध्ययन में :
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के साइकोलॉजी डिपार्टमेंट ने इस पर अध्ययन किया। इस रिसर्च टीम के हेड लॉरेन के मुताबिक जो बच्चे रात में 11:30 के बाद के बाद बिस्तर पर जाते हैं, स्कूल में उनका ग्रेड प्वाइंट बेहद खराब होता है। इन्हें इमोशनल दिक्कतों से भी दो-चार होना पड़ता है। हाई स्कूल, ग्रेजुएशन और कॉलेज जाने के दिनों में भी इन्हें काफी मुश्किलें हो सकती हैं।
*2,700 टीनएजर्स पर किया शोध :
इस अध्ययन के लिए 13 से 18 साल के बीच के तकरीबन 2,700 टीनएजर्स के सोने के घंटों पर शोध हुआ। यह शोध अमेरिका के नेशनल लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी ऑफ अडोलसेंट हेल्थ की ओर से वर्ष 1995 और 1996 में की गई थीं। इसके बाद 2001-02 में जब स्टडी में शामिल बच्चे और बड़े हो गए तो इनसे जुड़ी जानकारियां इकट्ठा की गईं और अब इसका एनालिसिस किया गया। इस शोध का मकसद यह पता करना था कि क्या बच्चों के सोने के वक्त का उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर कोई असर पड़ता है या नहीं। शोध के दौरान यह पता चला कि इनमें से 23 प्रतिशत बच्चे 11:15 बजे या फिर इसके बाद सोने जाते थे।
स्टडी के बीच वक्त का जो अंतराल था, उसमें सारे टीनएजर्स कॉलेज तक पहुंच चुके थे। उनके शैक्षणिक रिकॉर्ड से पता चला कि ग्रेजुएशन में उनका ग्रेड काफी चिंताजनक था।  

हाथों को बचाएं फटने से

ठंड के मौसम में हाथों की त्वचा रूखी हो जाती है। इस मौसम में त्वचा निकलना, नाखूनों के पास क्रैक पड़ना जैसी समस्याएं भी आम होती हैं। जिनसे बचने की कोशिश की जाना चाहिए। यह देखने में काफी भद्दी तो लगती ही है।
सर्दियों के दिनों में मॉइश्चराइजर का साथ जरूर त्वचा को राहत देता है मगर हाथों की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए सिर्फ मॉइश्चराइजर ही काफी नहीं है। ऐसे में अगर आप ठंड में हथेलियों के रूखेपन को वाकई दूर करना चाहते हैं तो इन पांच स्टेप में रोज अपने हाथों का खयाल रखें।
-एक कटोरे में गुनगुना पानी लें और कुछ बूंदें ऑलिव ऑयल की उसमें मिलाएं।
-करीब 20 से 25 मिनट तक इस पानी में दोनों हाथों को डुबोकर रखें।
-फिर हाथों को तौलिए से सुखाकर उस पर बेसन और मलाई का लेप लगाकर हल्का स्क्रब करें।
-फिर गुनगुने पानी से साफ कर लें।
-अब हाथों को पोंछकर उस पर मॉइश्चराइजर लगाएं। सोने से पहले नियमित रूप से ऐसा मैनीक्योर करने से हाथों के रूखेपन को दूर भगाने में मददगार हो सकता है। 

टमाटर में है स्वाद के साथ सेहत भी

बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी है हेल्दी डाइट, क्योंकि इस पर पूरे शरीर को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी होती है। वैसे तो बैलेन्स और रिच डाइट लेने वाली बात सभी को मालूम है, मगर कभी-कभी कोई चीज छूट जाए तो उसे याद कर खाने में शामिल करना न भूलें। यहां बात हो रही है टमाटर की। यूं तो हर रोज आप अपने खाने में टमाटर को शामिल करते ही हैं लेकिन क्या आप टमाटर के सेवन से महिलाओं को होने वाले फायदों के बारे में जानते हैं, नहीं तो हम आपको बताते हैं। हाल ही में हुए एक शोध के मुताबिक टमाटर से युक्त आपकी रिच डाइट ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारी के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शोध में बताया गया कि टमाटर का सेवन महिलाओं के लिए बेहद गुणकारी है। जो पोस्टमैनोपॉजल से होने वाले खतरों को काफी कम करता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार पोस्टमैनोपॉज स्टेज में महिलाओं में उनके वजन बढ़ने के साथ-साथ ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। खाने में टमाटर की हाई डाइट लेने से शरीर में फैट और शुगर मेटाबोलिज्म को रेग्युलेट करने वाले हार्मोन के स्तर पर पॉजिटीव इफेक्ट पड़ता है और ब्रेस्ट कैंसर के खतरे से दूर रहा जा सकता है।
*बहुत कम समय में ज्यादा फर्क :
न्यूजर्सी की रूटगर्स यूनिवर्सिटी में एपिडिमियोलॉजी की असिस्टेंट प्रोफेसर अदना लानोस ने बताया कि टमाटर का गुदा या टमाटर से बने उत्पादों की पर्याप्त मात्रा लेने से बहुत कम समय में ही कई फर्क दिखाई देने लगते हैं। टमाटर में पाया जाने वाला 'लाइकोपीन तत्व" न सिर्फ पोस्टमैनोपॉजल इफेक्ट को कम करता है बल्कि फैट और शुगर को कंट्रोल करते हुए व्यक्ति को हेल्दी और पूरी तरह से फिट भी रखता है।
इसके अलावा इस शोध में यह भी कहा गया है कि न्यूट्रीएंट्स, विटामिन्स, मिनरल्स और फायटोकेमिकल्स जैसे लाइकोपीन से युक्त फ्रूट्स और वेजिटेबल्स का सेवन करने से कई तरह की बीमारियों से दूर रहा जा सकता है।
*क्या पाया शोध में :
शोध के दौरान महिलाओं को दो समूहों में बांटा गया। दस सप्ताह तक एक समूह को टमाटर की अधिकता वाली डाइट और दूसरे समूह को सोया उत्पादों की अधिकता वाली डाइट का सेवन कराया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि सोया उत्पादों की अपेक्षा टमाटर की अधिकता वाली डाइट के सेवन से महिलाओं का ब्लड शुगर लेवल और फैट का स्तर नौ प्रतिशत तक कम हुआ और ब्रेस्ट कैंसर से बचाव वाला हार्मोन 'एडीपोनेक्टिन" का स्तर बढ़ा। यह महिलाओं के स्वास्थ्य में होने वाले बदलाव के लिए एक महत्वपूर्ण जानकारी थी, जिसके आधार पर शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे।  

ठंड में ऐसे बचाएं पौधों की खूबसूरती...

बारिश में पौधों की हरियाली आपको जितनी सुहाती है, ठंड में उनकी चिंता भी उतनी ही सताती होगी। ऐसा हो भी क्यों ना, इस मौसम में खुश्क और सर्द हवाएं पौधों की जड़ों तक नुकसान जो पहुंचाती हैं।
ऐसे में अगर आप बागवानी के मामले में ये उपाय अपनाएंगे तो ठंड के मौसम का असर आपके पौधों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा।
* पौधों में पानी :
ठंड का मतलब यह कतई नहीं है कि आप पौधों में पानी देना छोड़ दें। यकीनन रात में पौधों को थोड़ी ओस जरूर मिलती है लेकिन सर्द हवाएं पौधों की नमी तेजी से छीन लेती हैं। ऐसे में उनमें पानी डालने में मौसम के नाम पर कोताही न करें।
पौधों में कितना पानी दें, इसका कोई सुनहरा नियम नहीं है क्योंकि हर पौधे की पानी की जरूरत अलग है और उसकी सिंचाई जरूरत को ध्यान में रखकर ही होनी चाहिए।
* मिट्टी की नमी :
घर में अगर बगीचा बनाया है तो घास और झाड़ियों की मिट्टी को भरपूर नमी मिले यह ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए सामान्यत: आदर्श नियम है कि एक अंगूठे यानी छह से आठ इंच तक दूरी से मिट्टी पर पानी डालें।
* पौधों की कटिंग :
सर्दी के मौसम में पौधों को धूप अच्छी तरह मिले इसके लिए उनके सूखे पत्तों की छटाई जरूरी है। इसके अलावा, पौधों में 15 दिन के गैप पर खाद, मिट्टी ढीली करने जैसी रुटीन प्रक्रिया तो है ही।
इन बातों का ध्यान रखते हुए आप अपने घर के बगीचे को न सिर्फ हरा-भरा बल्कि बेहद खूबसूरत बना सकते हैं।