शुक्रवार, 3 मई 2013

क्रिकेट और जिस्म (व्यंग्य)


 धर्मेंद्र सिंह राजावत
पाजी अपने कुछ पंजाबी साथियों के साथ पब में जाम छलका रहे थे। इसी बीच किसी ने क्रिकेट का किस्सा शुरू कर दिया। किस्सा सुन पाजी परेशान हो गए। ऐसा लगा माने पाजी की दुखती हुई रग पर किसी ने हाथ रख दिया हो।
'देख भाई गुरबीर ! मुझे इस बात का मलाल नहीं कि मेरी आईसीएल पिट गई, मगर मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि, जो आईपीएल हिट हुई उसने क्रिकेट को शर्मसार कर दिया। उफ ! ये जिस्म। इसकी नुमाइश कर कितनी फूहड़ता फैलाई जा रही है। अब लोग अच्छे शॉट का नहीं बल्कि सिक्स या फोर लगने के बाद विदेशी गर्ल्स जो हिप हिलातीं हैं, उनको देखने का इंतजार करते हैं। शॉट लगते ही टीवी पर भी कैमरा हिप पर ही फोकस हो जाता है। मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि मैं भी कभी इसी क्रिकेट का हिस्सा रहा हूं।" पाजी ने बहुत गमगीन होकर कहा
'पाजी ! परेशान होने की जरूरत नहीं है। मेरे पास एक आइडिया है। आप चिंता न करें। न फूहड़ता रहेगी और न फूहड़ता दिखाने वाले।" गुरबीर ने पाजी के कंधे पर हाथ रख दिलासा देते हुए कहा
गुरबीर का इतना कहना था कि पाजी का सारा नशा चूर हो गया। गिलास टेबल पर रखा और गुरबीर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसका चेहरा देखते हुए सवालों की झड़ी लगा दी।
'क्या कहा गुरबीर? क्या मैं सही सुन रहा हूं? सच बता? तू नशे में तो यह सब नहीं कह रहा है?"
'नहीं पाजी। मैं सच कह रहा हूं।" गुरबीर ने जवाब दिया
'अच्छा बता कैसे करेगा यह सब?" पाजी ने फिर सवाल किया
'हम स्टेडियम में लड़कियों को नचाने के बजाय यहां मैच देखने आने वाले दर्शकों के साथ ही घर, दफ्तर और दुकान में टीवी पर मैच देखने वालों को एक ऑफर देंगे।"
गुरबीर की इतनी बात सुनते ही पाजी ने उत्सुकता पूर्वक फिर सवाल किया।
'कैसा ऑफर?"
गुरबीर, ' दो दिन और तीन रातें बैंकॉक में बिताने का।"
पाजी, ' मैं समझा नहीं। यह क्या है?"
गुरबीर, ' अरे पाजी ! जिन दर्शकों को विदेशी लड़कियों के साथ ही देशी कलेंडर क्वीन को देखने की आदत पड़ गई हो, उनकी यह आदत छुड़वाना कोई आसान काम तो नहीं है। आप क्या समझते हैं, कलेंडर क्वीन ऐसे ही कपड़े उतारती फिर रही थी। वर्ल्ड कप के फाइनल में भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों ने ही यह सब कराया था। यही वजह है कि फाइनल मैच देखने के लिए नहीं बल्कि लोग उस पल के दीदार के लिए पहुंचे थे, जब क्वीन अपने हुश्न की पिच पर सभी को बोल्ड कर दे। अब सभी को पता है कि किसी भी चीज की मार्केटिंग कैसे की जाती है। बस एक आप ही हैं, जो नहीं समझते। हम तो ऐसा फॉर्मूला बता रहे हैं, जिससे फूहड़ता भी खत्म हो जाएगी और दर्शकों का दिल भी टूटने के बजाय खुश हो जाएगा। बाकी आपकी मर्जी। और हां, इस सबसे हमें एक्स्ट्रा इनकम होगी सो अलग।"
पाजी, 'देख भाई गुरबीर ! तेरी बातें मेरी समझ से बाहर हैं। तू क्या कह रहा है या क्या करना चाहता है? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"
'लोग बैंकॉक क्यों जाते हैं? यह तो पता है? या फिर मैं यह भी बताऊं?" गुरबीर ने कुछ गुस्सा होते हुए सवाल किया
' हां ! पता है, मगर बहुत ज्यादा नहीं जानता हूं, क्योंकि मैं कभी गया नहीं। अलबत्ता, लोगों से सुना है कि वहां लोग मजे करने के लिए जाते हैं।" पाजी ने कुछ संकोच करते हुए जवाब दिया
'यही मजा तो क्रिकेट से फूहड़ता को खत्म करेगा और अपनी क्रिकेट लीग को सफल बनाएगा।" यह कहते समय गुरबीर के चेहरे पर एक अजब-सी मुस्कान थी
'सही कह रहा है गुरबीर!  मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि क्रिकेट से कभी फूहड़ता खत्म भी की जा सकती है, मगर तेरे दिमाग की तो माननी पड़ेगी। अच्छा ! यह तो बता कि इससे अपनी एक्स्ट्रा इनकम कैसे होगी?" पाजी ने फिर सवाल किया
गुरबीर, 'जब ऑफर के बारे में लोगों को पता चलेगा तो क्रिकेट प्रेमी ही नहीं और भी कई लोग क्रिकेट के मुरीद हो जाएंगे। स्टेडियम में लोगों को जगह तो मिलेगी नहीं, घरों में भी टीवी सेट की संख्या बढ़ जाना तय है। मतलब साफ है, स्टेडिटम की टिकट के साथ ही टीवी की बिक्री बढ़ेगी। जब बिक्री बढ़ेगी तो हमारा कमीशन भी बढ़ेगा। दूसरा, जब सारा प्लान अपना होगा तो जो विजेता बैंकॉक जाएंगे, उनको किस ट्रैवल एजेंसी से भेजना है यह भी तो हम ही तय करेंगे न की लीग के प्रयोजक। और जब हम तय करेंगे तो कमीशन भी हमें ही मिलेगा न की प्रयोजकों को।"
' वाह ! गुरबीर वाह ! वाकई कमाल का आइडिया है। मैच से फूहड़ता खत्म कर तू मेरे मन को तसल्ली और मेरी लीग की सफलता से मुझे फिर ख्याति दिलाएगा। कमाई करवाएगा सो अलग। और हां, आईपीएल की सफलता ने इतने सालों से मुझे जो पीड़ा दी है, वह जब विदेशी लड़कियों के हिप की तरह ही जब हिलेगी तो और मजा आएगा। इसी खुशी में दो-दो पैक और हो जाएं।' पाजी सभी से आग्रह करते हैं ।
'चिअर्स....." सभी जाम-से-जाम टकराते हैं और फिर पीने में
मशगूल जाते हैं।
अरे भाई अब आप किस सोच में पड़ गए हैं। आप भी दो पैक लगाइए और बैंकॉक की सैर करके आइए।


बुधवार, 1 मई 2013

पिता की इज्जत (कहानी)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
जब से ओमवीर सिंह भदौरिया का बेटा थाना इंचार्ज बना तब से रामवीर सिंह तोमर को अपने बेटे से नफरत-सी हो गई। जब भी कोई मौका मिलता वह उस पर ताना कस देते।
'तूने तो मेरी नाक ही कटवा दी। देख, भदौरिया का बेटा। थाना इंचार्ज बन गया। बाप सिपाही और बेटा थाना इंचार्ज। गर्व से सीना चौड़ा करके चलता है भदौरिया। और एक तू है, जो चपरासी बनकर मेरी इज्जत में चार चांद लगा रहा है।"
लेकिन, पिछले एक हफ्ते से उनके व्यवहार में यकायक बदलाव आ गया। अब वह बेटे पर ताना कसने के बजाय फक्र करते हैं। और बात-बे-बात भदौरिया के बेटे पर जरूर ताना मार देते हैं।
रामवीर सिंह तोमर और ओमवीर सिंह भदौरिया में काफी गहरी दोस्ती थी। रामवीर सिंह तोमर एक अखबार के दफ्तर में गार्ड थे और ओमवीर सिंह भदौरिया पुलिस में सिपाही। भदौरिया का बेटा पढ़ाने-लिखने में तेज था, इसलिए ज्यादातर वक्त पढ़ाई में ही गुजारता था, मगर तोमर का बेटा दोस्तों के साथ घूमने-फिरने में मशगूल रहता था।
तोमर का बदला हुआ अंदाज देखकर मैं अपने आप पर काबू नहीं रख सका। आखिरकार एक हफ्ते के बाद मैंने उनको टोक ही दिया।
'तोमर साहब ! क्या बात है? आज कल आप बेटे की बहुत तारीफ करते हैं?"
मेरा सवाल सुनते ही तोमर साहब भड़क गए
'क्यों? आपको क्या तकलीफ है? मेरे बेटा है। मैं तारीफ करूं या गाली दूं।"
तोमर साहब का गुस्सा देख, एक पल के लिए तो मुझे लगा कि कहीं वह मुझसे हाथापाई न कर दें। चूंकि, मैंने शुरुआत कर दी थी, इसलिए जरा संभलकर ही सही, पर मैंने फिर सवाल किया।
'यह सही है कि वह आपका बेटा है, आप जो चाहे करें, मगर मैंने तो आपके पिछले अनुभव को देखते हुए पूछ लिया।"
'मैं सब समझता हूं, धर्मेंद्र जी ! आप यही सोच रहे हैं कि मेरे दोस्त के बेटे ने थाना इंचार्ज बनकर समाज में अपने पिता का नाम और कद ऊंचा कर दिया है। और जिस अखबार के दफ्तर में मैं गार्ड हूं, उसी में मेरे बेटे ने चपरासी की नौकरी कर समाज में मेरा सिर शर्म से झुका दिया।"
मैं कुछ कहता उससे पहले ही तोमर साहब फिर बोलने लगे।
'मगर, आप गलत सोचते हैं। मैं भी पहले गलत सोचता था। समाज में सिर मेरे बेटे ने नहीं बल्कि भदौरिया के बेटे ने झुकाया है।"
उनके जवाब ने मेरी उत्सुकता और बढ़ा दी। मैंने तपाक से फिर सवाल किया
'भदौरिया के बेटे ने कैसे अपने पिता का सिर समाज में झुका दिया?"
  'देखो धर्मेंद्र जी ! जिस थाने में भदौरिया सिपाही है, उसी में उसका बेटा टीआई। जब भी वह थाने पहुंचता है भदौरिया उसको सलामी ठोकता है। अब आप ही बताइए? बाप को बेटे के सामने सलामी ठोकनी पड़े तो इसे आप बाप के लिए फक्र की बात कहेंगे? आप कहें तो कहें, मगर मैं बिल्कुल नहीं कहूंगा। ऐसे बेटे को शर्म आनी चाहिए, जो उन सभी के सामने पिता की इज्जत की धज्जियां उड़ा रहा है, जिनके सामने भदौरिया सालों से सीना चौड़ा करके चलता रहा है। भदौरिया ने इसी दिन के लिए उसे पढ़ा- लिखाकर बड़ा किया था। इससे तो अच्छा मेरा बेटा है। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं, मगर पिता की इज्जत क्या होती है, यह वह अच्छी तरह से जानता है।
'तोमर साहब की बात सुनकर मैं कुछ पल के लिए सोचने पर मजबूर हो गया। आखिर मैंने तोमर साहब से फिर दूसरा सवाल किया
' तोमर साहब ! माना कि भदौरिया साहब के लड़के ने टीआई बनकर अपने पिता की इज्जत बढ़ाने के बजाय उसका बट्टा लगा दिया, मगर जिस दफ्तर में आप गार्ड हैं, उसी में आपके बेटे ने चपरासी बनकर कौन सा तीर मार लिया है? उसके चपरासी बनने से क्या आपकी इज्जत बढ़ गई?
'धर्मेंंद्र जी ! जो आप सोच रहे हैं, कई दिनों तक मैं भी यही सोचकर उसको ताना मारता रहा, मगर वह मेरा नालायक बेटा नहीं था। उसने तो मेरी इज्जत की खातिर अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी।"
'मैं समझा नहीं तोमर साहब! आपकी इज्जत के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। कैसे? मैंने फिर सवाल किया
'मेरा बेटा दोस्तों के साथ आवारा बनकर घूमता था। एक दिन मेरे एडिटर ने मुझे बुलाकर पूछा कि कितना पढ़ा- लिखा है आपका बेटा। मैंने बताया कि वह 12वीं पास है तो उन्होंने कहा कि उससे कहना कि वह मुझसे आकर मिले। वह जब मिलने गया तो उन्होंने उससे कहा कि वह उसे ट्रेनी रिपोर्टर की नौकरी पर रख लेंगे। जब वह रिपोर्टिंग करना सीख जाएगा तो अच्छी तनख्वाह पर रिपोर्टर नियुक्त कर देंगे। वह चाहता तो रिपोर्टर बन जाता है, मगर उसने उनका ऑफर ठुकरा दिया। उस समय मैं काफी नाराज हुआ था। आखिरकार काफी कहने पर उसने चपरासी की नौकरी स्वीकार कर ली। धर्मेंद्र जी ! आपकी तरह मुझे भी अपने बेटे की स्थिति पर न केवल तरस आता था, बल्कि उसके कारनामों से मुझे शर्म भी आती थी, मगर जब उसने मुझे सारी बात बताई तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया।"
'क्या बात बताई?" मैंने बहुत उत्सुक होकर फिर सवाल किया
'मेरे बेटे ने रिपोर्टर की नौकरी मेरी इज्जत की खातिर ठुकरा दी थी। वह अगर रिपोर्टर बन जाता तो मेरी इज्जत नहीं रह जाती।"
'रिपोर्टर बनने से आपकी इज्जत घट जाती? यह क्या कह रहे हैं आप? मैं कुछ समझा नहीं तोमर साहब। क्या चपरासी बनकर आपका बेटा आपकी इज्जत बढ़ा रहा है?" मैंने फिर सवाल किया
'चपरासी बनकर भले इज्जत न बढ़ा रहा हो, मगर रिपोर्टर बनकर मेरी इज्जत तो नहीं उतार रहा है, जैसे भदौरिया का बेटा अपने पिता की उतार रहा है। उसी थाने में टीआई बनकर। धर्मेंद्र जी ! जब मैं बेटे को ताना मारा करता था तो उसने एक दिन मुझसे पूछा, क्या आप जानते हैं कि मैंने रिपोर्टर की नौकरी क्यों छोड़ दी। मैंने जवाब दिया, नहीं। तो वह बोला, यदि मैं उसी दफ्तर में रिपोर्टर बन जाता तो आप मेरे आने पर दफ्तर का दरवाजा खोलते और सिल्यूट मारते। क्या इससे आपकी इज्जत बढ़ जाती? नहीं। बिल्कुल नहीं। यही सोचकर मैंने तय किया कि मेरे पिता की इज्जत से बढ़कर मेरे लिए नौकरी नहीं हो सकती। मैं चाहता तो रिपोर्टर बनकर अपना जीवन सुधार लेता मगर, मैंने आपकी इज्जत की खातिर चपरासी बनना स्वीकार किया। अब आप ही बताइए धर्मेंद्र जी, मेरे बेटे को मेरी इज्जत का ख्याल था या भदौरिया के बेटे को।"
तोमर साहब सही कह रहे थे। उनके बेटे ने जो किया वह शायद ही किसी का बेटा कर
पाता। अब तो  मुझे भी  उस पर फक्र है। बेटे हों तो ऐसे।  

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

ज्ञानी बनना है या अक्लमंद (व्यंग्य)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
फर्रुखाबाद ग्रामीण बैंक में कुछ महीने पहले ही मैनेजर बनकर आए बबलू ठाकुर से उनके दफ्तर के बाबू राधेश्याम दुबे को बहुत चिड़  थी। दरअसल, मैनेजर साहब को जब भी किसी काम की जरूरत पड़ती तो वह दुबे जी को बुलाकर सौंप देते। दुबे जी अपनी जिम्मेदारी निभाते और मैनेजर साहब का काम भी निपटाते। दुबे जी और मैनेजर साहब ने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई साथ-साथ की थी। दुबे जी पढ़ाई में अव्वल थे। स्कूल टीचर हमेशा उनकी तारीफ करते थे, मगर परीक्षा में अच्छे नंबर हमेशा बबलू के आते थे। दुबे जी को इस वजह से उनसे पहले से ही नफरत थी। ऐसे में उनका ब्रांच का मैनेजर बनकर आना और फिर अपना सारा काम करवाना दुबे जी के लिए नासूर बन गया। जिसको ज्ञान है, वह बाबू और जिसको ज्ञान नहीं वह उस पर हुक्म चलाता है,  यही बात दुबे जी को सबसे ज्यादा चुभती थी। दूसरा, आए दिन घूमने-फिरने का प्रोग्राम रहता था मैनेजर साहब का। यह बात भी दुबे जी को नागबार गुजरती थी। उनका मानना था कि एक जिम्मेदार व्यक्ति को अपने दायित्यों के प्रति गंभीर होना चाहिए। मैनेजर साहब कुछ रंगीन मिजाज भी थे। आए दिन पार्टियों में जाना उनका शौक था। महिला मित्रों की भी उनकी काफी लंबी लाइन थी। हमेशा से सादा जीवन पसंद करने वाले दुबे जी की नफरत को मैनेजर साहब की आदतों ने और बढ़ा दिया था।
एक-दो महीने गुजरने पर मैनेजर साहब ने महसूस किया कि दुबे जी का व्यवहार उनके प्रति सामान्य नहीं है। एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने दुबे जी से पूछ लिया।
'क्यों दुबे जी? मुझसे कोई गलती हो गई है क्या?"
'नहीं। कोई गलती नहीं हो गई साहब।" दुबे जी ने जवाब दिया।
'नहीं-नहीं। कोई बात तो जरूर है। आप कुछ खफा-खफा से रहते हो।" मैनेजर साहब बोले
काफी कुरेदने पर दुबे जी का दर्द जुबान पर आ गया।
' आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?" दुबे जी ने सवाल किया
'क्यों नहीं। एक नहीं दस सवाल पूछिए। मुझे क्यों-कोई एतराज होगा।" मैनेजर साहब ने दुबे जी को आश्वस्त किया।
दुबे जी कुछ झेंप गए। स्थिति को टालने के लिए इधर-उधर के एक-दो सवाल पूछ लिए।
' आप संकोच मत करिए दुबे जी। जब पूछ ही रहे हैं तो खुलकर पूछिए न।" मैनेजर साहब ने कुछ दबाव देते हुए कहा
दुबे जी ने कुछ संकोच के बाद सीधा सवाल नौकरी पर किया।
'स्कूल से लेकर कॉलेज के दिनों तक दिनभर लड़कियों के पीछे घूमने वाले लड़के के अच्छे नंबर कैसे आ जाते थे? और उसको नौकरी कैसे मिल गई? वह भी मैनेजर की।"
दुबे जी के सवाल से मैनेजर साहब कुछ पल के लिए तो हतप्रभ रह गए, मगर फिर मुस्कुरा कर जवाब दिया।
'दुबे जी। बुरा मत मानिएगा। जब आप जैसे लोग हैं तो फिर मुझे पढ़ाई की क्या जरूरत? और हां, पढ़ाई से अक्ल नहीं आ जाती है। यदि पढ़ाई से अक्ल आती तो हमारे नहीं तुम्हारे अच्छे नंबर आए होते और हम नहीं बल्कि तुम बैंक के मैनेजर होते। तुम्हें पता है, मैं पढ़ाई नहीं करता था, फिर भी अच्छे नंबर आते थे और आज मैनेजर भी हूं। और आप पढ़कर भी बाबू ही बन पाए। दूसरा, आप जीवन के कभी मजे न ले सके, वह अलग। अब आप ही बताइए कि अक्लमंद आप हैं या मैं। आप जैसे ही लोगों को पढ़ा-लिखा पागल कहा जाता है।"
मैनेजर साहब के जवाब ने दुबे जी हिलाकर रख दिया। अब दुबे जी के दिमाग में एक ही सवाल गूंजा कि  आखिर यह सब हुआ कैसे। दुबे जी ने हिम्मत जुटा का दूसरा सवाल पूछा।
' आखिर आप पास कैसे हो जाते थे? दूसरा, आप बैंक में मैनेजर कैसे बन गए?"
मैनेजर, 'दुबे जी, आपको अपनी पढ़ाई पर भरोसा ही नहीं गुमान भी था, इसलिए आप तो परीक्षा देकर बेफिक्र हो जाते थे, मगर हमारे साथ ऐसा नहीं होता था। हम परीक्षा से पहले और बाद में इस पर काम करते थे। मैं मैथ, अंग्रेजी और साइंस में कमजोर था। इसलिए परीक्षा से पहले इनमें पास होने का इंतजाम कर लेता था।"
'कैसा इंतजाम?" दुबे जी ने सवाल किया
मैनेजर,'अंग्रेजी की परीक्षा में मैं अपनी सामर्थ के अनुसार कॉपी में रुपए रखता था। साइंस की कॉपी में मैं मोबाइल नंबर लिखता था। इतना ही नहीं जब मेरे मोबाइल पर कॉपी जांचने वाला टीचर फोन करता था तो उसके फोन रखने के साथ ही उसके मोबाइल को मैं कम से कम एक हजार रुपए से रीचार्ज करवाता था। रीचार्ज मैसेज ने हमेशा काम किया है। हां, मैथ के टीचर कुछ अक्खड़, पर उतने ही दरियादिल होते हैं, इसलिए उसकी कॉपी में मैं धमकी देता था। मैं फेल हो गया तो मुझे रोजगार नहीं मिलेगा। और जब रोजगार नहीं मिलेगा तो मैं मजबूर होकर आतंकबादी बन जाऊंगा। यह धमकी कभी खाली नहीं गई। फिर चाहे हाईस्कूल, इंटर  की परीक्षा रही हो या फिर कॉलेज के किसी भी साल की। ऐसे में परीक्षा में पास भी हो जाता और दिनभर लड़कियों के साथ मस्ती भी करता था।
'मगर, नौकरी के लिए तो ज्ञान की जरूरत होती है? " दुबे जी ने फिर सवाल किया।
'ज्ञान की कहीं जरूरत नहीं होती है। जरूरत होती है अक्ल की। दुबे जी आप अब भी ज्ञान और अक्ल में
अंतर नहीं समझे। आप ने ज्ञान अर्जित किया है, पर अक्ल नहीं। अक्ल के लिए पढ़ाई की जरूरत नहीं। अक्ल अनपढ़ में भी होती है। यही वजह है कि इस मामले में मैं तुमसे थोड़ा ज्यादा हूं। दुबे जी आप को अपने ज्ञान पर भरोसा था, इसलिए आप पढ़ाई के बाद अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी तलाशने लगे और मौका मिलते ही बाबू बन गए, मगर मुझे पता था कि मैंने डिग्री कैसे ली है। इसलिए मैंने अक्ल चलाई और पिता जी का पुश्तैनी मकान बेचकर रुपए जुटाए। जैसे ही सेटिंग हुई पांच लाख रुपए देकर बैंक में मैनेजर बन गया। अब अधिकारी हूं और आप जैसे पढ़े-लिखे मेरे यहां बाबू हैं तो मुझे काम में भी कोई तकलीफ नहीं होती। और हां, बिना किसी टेंशन के सारे सुख भोगते हुए जिंदगी जी रहा हूं। और एक आप हैं, जिसे काम के बोझ से ही फुर्सत नहीं मिलती। अपना और हम जैसे लोगों का काम ही इतना होता है।"
मैनेजर साहब की बात सुनने के बाद दुबे जी घर गए और काफी सोच- विचार करते रहे। आखिर तय किया कि उन्होंने जो गलती की है, उनके बच्चे यह गलती कतई नहीं करेंगे। वह बाबू नहीं मैनेजर बनेंगे और जिंदगी के सारे सुख भी भोगेंगे। अब आप क्या सोच रहे हैं। अपनी अक्ल लगाओ, ज्ञान पर मत जाओ।

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

बुजुर्ग के सिर पर उगा तीन इंच का सींग


 96 वर्षीय बुजुर्ग के सिर पर तीन इंच लंबा सींग उग आया है। बकरे या अन्य जानवरों के सींगों की तरह ही यह भी मजबूत और नुकीला है।बिहार के बांका जिले में बुजुर्ग की शारीरिक विकृति को देखकरस्थानीय चिकित्सक भी हैरान हैं।
जिले के सलेमपुर गांव के जगदीश कापरी के सिर पर यह सींग निकला है। बताया जाता है कि  छह महीने पहले उन्हें सिर के बीच में सींग विकसित होने का एहसास हुआ। अलबत्ता,  उन्हें सींग से कोई विशेष तकलीफ नहीं  है। मगर, सिर पर असामान्य रूप से सींग निकलने से वह सहमे हुए हैं। इस बाबत सिविल सर्जन डॉ. एनके विद्यार्थी ने बताया कि चिकित्सा विज्ञान में मनुष्यों में हॉर्न यानी सींग निकलने की बात अभी तक सामने नहीं आई है।शरीर के किसी हिस्से में मांस का अतिरिक्त हिस्सा निकलने के मामले जरूर सामने आते रहे हैं। मगर, ठोस सींग का निकलना बिल्कुल अनोखा मामला है। जल्द ही मेडिकल टीम भेजकर इसकी जांच कराई जाएगी। तत्पश्चात उनके इलाज पर विचार किया जाएगा।

रविवार, 28 अप्रैल 2013

फेसबुक इस्तेमाल करना मेरा अधिकार


सोशल  नेटवर्किंग साइट के प्रति लोगों की दीवानगी किस तरह बढ़ती जा रही है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मौका मिला नहीं कि स्टेटस चेक करना, कमेंट करना और देखना या फिर छिप-छिपाकर चैट करना फेसबुक यूजर्स की आदत में शुमार हो चुका है। आलम यह है कि लोग ऑफिस में भी काम के बीच में फेसबुक पर लॉग-इन करना नहीं भूलते। हालिया सर्वे के मुताबिक ऑफिस में फेसबुक इस्तेमाल करने को कर्मचारी अपने अधिकार के तौर पर देखते हैं। करीब एक-तिहाई कर्मचारी काम के दौरान एक घंटा या लगभग पूरा दिन फेसबुक और टि्वटर जैसी सोशल  नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते हैं। यह तथ्य अमेरिका और कनाडा में इंटेलिजेंट ऑफिस द्वारा करीब एक हजार से ज्यादा कर्मचारियों पर किए गए सर्वेक्षण में सामने आए हैं।
काम छोड़ने को तैयार
सर्वे में शामिल करीब एक-चौथाई
लोगों ने स्पष्ट कहा कि वे ऐसी जगह काम ही नहीं करेंगे जहां सोशल मीडिया प्रतिबंधित हो। बिजनेस न्यूज डेली वेबसाइट के मुताबिक, अध्ययन से पता चलता है कि सोशल मीडिया कर्मचारियों का अभिन्न् हिस्सा है। सर्वे में करीब एक-तिहाई लोगों ने उन कंपनियों में काम करने के प्रति उत्साह जताया जहां उन्हें उनकी तकनीकी इस्तेमाल करने की छूट हो। इंटेलीजेंट ऑफिस के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी टॉम कैंपलिस के अनुसार, तकनीकी हमारे काम करने के तरीके को बदलने में सक्षम है और हम देख सकते हैं कि कर्मचारी ऐसा करने में आजादी महसूस करते हैं।  

गर आप साथ हैं


धर्मेंद्र  सिंह राजावत

सारी धरा साथ हो
तो और बात है
तुम अगर साथ हो
तो क्या बात है
मुश्किलों में टूट जाते हैं,
मगर विश्वास है
जीत लेंगे हर बाजी हम,
गर आप साथ हैं