बुधवार, 1 मई 2013

पिता की इज्जत (कहानी)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
जब से ओमवीर सिंह भदौरिया का बेटा थाना इंचार्ज बना तब से रामवीर सिंह तोमर को अपने बेटे से नफरत-सी हो गई। जब भी कोई मौका मिलता वह उस पर ताना कस देते।
'तूने तो मेरी नाक ही कटवा दी। देख, भदौरिया का बेटा। थाना इंचार्ज बन गया। बाप सिपाही और बेटा थाना इंचार्ज। गर्व से सीना चौड़ा करके चलता है भदौरिया। और एक तू है, जो चपरासी बनकर मेरी इज्जत में चार चांद लगा रहा है।"
लेकिन, पिछले एक हफ्ते से उनके व्यवहार में यकायक बदलाव आ गया। अब वह बेटे पर ताना कसने के बजाय फक्र करते हैं। और बात-बे-बात भदौरिया के बेटे पर जरूर ताना मार देते हैं।
रामवीर सिंह तोमर और ओमवीर सिंह भदौरिया में काफी गहरी दोस्ती थी। रामवीर सिंह तोमर एक अखबार के दफ्तर में गार्ड थे और ओमवीर सिंह भदौरिया पुलिस में सिपाही। भदौरिया का बेटा पढ़ाने-लिखने में तेज था, इसलिए ज्यादातर वक्त पढ़ाई में ही गुजारता था, मगर तोमर का बेटा दोस्तों के साथ घूमने-फिरने में मशगूल रहता था।
तोमर का बदला हुआ अंदाज देखकर मैं अपने आप पर काबू नहीं रख सका। आखिरकार एक हफ्ते के बाद मैंने उनको टोक ही दिया।
'तोमर साहब ! क्या बात है? आज कल आप बेटे की बहुत तारीफ करते हैं?"
मेरा सवाल सुनते ही तोमर साहब भड़क गए
'क्यों? आपको क्या तकलीफ है? मेरे बेटा है। मैं तारीफ करूं या गाली दूं।"
तोमर साहब का गुस्सा देख, एक पल के लिए तो मुझे लगा कि कहीं वह मुझसे हाथापाई न कर दें। चूंकि, मैंने शुरुआत कर दी थी, इसलिए जरा संभलकर ही सही, पर मैंने फिर सवाल किया।
'यह सही है कि वह आपका बेटा है, आप जो चाहे करें, मगर मैंने तो आपके पिछले अनुभव को देखते हुए पूछ लिया।"
'मैं सब समझता हूं, धर्मेंद्र जी ! आप यही सोच रहे हैं कि मेरे दोस्त के बेटे ने थाना इंचार्ज बनकर समाज में अपने पिता का नाम और कद ऊंचा कर दिया है। और जिस अखबार के दफ्तर में मैं गार्ड हूं, उसी में मेरे बेटे ने चपरासी की नौकरी कर समाज में मेरा सिर शर्म से झुका दिया।"
मैं कुछ कहता उससे पहले ही तोमर साहब फिर बोलने लगे।
'मगर, आप गलत सोचते हैं। मैं भी पहले गलत सोचता था। समाज में सिर मेरे बेटे ने नहीं बल्कि भदौरिया के बेटे ने झुकाया है।"
उनके जवाब ने मेरी उत्सुकता और बढ़ा दी। मैंने तपाक से फिर सवाल किया
'भदौरिया के बेटे ने कैसे अपने पिता का सिर समाज में झुका दिया?"
  'देखो धर्मेंद्र जी ! जिस थाने में भदौरिया सिपाही है, उसी में उसका बेटा टीआई। जब भी वह थाने पहुंचता है भदौरिया उसको सलामी ठोकता है। अब आप ही बताइए? बाप को बेटे के सामने सलामी ठोकनी पड़े तो इसे आप बाप के लिए फक्र की बात कहेंगे? आप कहें तो कहें, मगर मैं बिल्कुल नहीं कहूंगा। ऐसे बेटे को शर्म आनी चाहिए, जो उन सभी के सामने पिता की इज्जत की धज्जियां उड़ा रहा है, जिनके सामने भदौरिया सालों से सीना चौड़ा करके चलता रहा है। भदौरिया ने इसी दिन के लिए उसे पढ़ा- लिखाकर बड़ा किया था। इससे तो अच्छा मेरा बेटा है। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं, मगर पिता की इज्जत क्या होती है, यह वह अच्छी तरह से जानता है।
'तोमर साहब की बात सुनकर मैं कुछ पल के लिए सोचने पर मजबूर हो गया। आखिर मैंने तोमर साहब से फिर दूसरा सवाल किया
' तोमर साहब ! माना कि भदौरिया साहब के लड़के ने टीआई बनकर अपने पिता की इज्जत बढ़ाने के बजाय उसका बट्टा लगा दिया, मगर जिस दफ्तर में आप गार्ड हैं, उसी में आपके बेटे ने चपरासी बनकर कौन सा तीर मार लिया है? उसके चपरासी बनने से क्या आपकी इज्जत बढ़ गई?
'धर्मेंंद्र जी ! जो आप सोच रहे हैं, कई दिनों तक मैं भी यही सोचकर उसको ताना मारता रहा, मगर वह मेरा नालायक बेटा नहीं था। उसने तो मेरी इज्जत की खातिर अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी।"
'मैं समझा नहीं तोमर साहब! आपकी इज्जत के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। कैसे? मैंने फिर सवाल किया
'मेरा बेटा दोस्तों के साथ आवारा बनकर घूमता था। एक दिन मेरे एडिटर ने मुझे बुलाकर पूछा कि कितना पढ़ा- लिखा है आपका बेटा। मैंने बताया कि वह 12वीं पास है तो उन्होंने कहा कि उससे कहना कि वह मुझसे आकर मिले। वह जब मिलने गया तो उन्होंने उससे कहा कि वह उसे ट्रेनी रिपोर्टर की नौकरी पर रख लेंगे। जब वह रिपोर्टिंग करना सीख जाएगा तो अच्छी तनख्वाह पर रिपोर्टर नियुक्त कर देंगे। वह चाहता तो रिपोर्टर बन जाता है, मगर उसने उनका ऑफर ठुकरा दिया। उस समय मैं काफी नाराज हुआ था। आखिरकार काफी कहने पर उसने चपरासी की नौकरी स्वीकार कर ली। धर्मेंद्र जी ! आपकी तरह मुझे भी अपने बेटे की स्थिति पर न केवल तरस आता था, बल्कि उसके कारनामों से मुझे शर्म भी आती थी, मगर जब उसने मुझे सारी बात बताई तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया।"
'क्या बात बताई?" मैंने बहुत उत्सुक होकर फिर सवाल किया
'मेरे बेटे ने रिपोर्टर की नौकरी मेरी इज्जत की खातिर ठुकरा दी थी। वह अगर रिपोर्टर बन जाता तो मेरी इज्जत नहीं रह जाती।"
'रिपोर्टर बनने से आपकी इज्जत घट जाती? यह क्या कह रहे हैं आप? मैं कुछ समझा नहीं तोमर साहब। क्या चपरासी बनकर आपका बेटा आपकी इज्जत बढ़ा रहा है?" मैंने फिर सवाल किया
'चपरासी बनकर भले इज्जत न बढ़ा रहा हो, मगर रिपोर्टर बनकर मेरी इज्जत तो नहीं उतार रहा है, जैसे भदौरिया का बेटा अपने पिता की उतार रहा है। उसी थाने में टीआई बनकर। धर्मेंद्र जी ! जब मैं बेटे को ताना मारा करता था तो उसने एक दिन मुझसे पूछा, क्या आप जानते हैं कि मैंने रिपोर्टर की नौकरी क्यों छोड़ दी। मैंने जवाब दिया, नहीं। तो वह बोला, यदि मैं उसी दफ्तर में रिपोर्टर बन जाता तो आप मेरे आने पर दफ्तर का दरवाजा खोलते और सिल्यूट मारते। क्या इससे आपकी इज्जत बढ़ जाती? नहीं। बिल्कुल नहीं। यही सोचकर मैंने तय किया कि मेरे पिता की इज्जत से बढ़कर मेरे लिए नौकरी नहीं हो सकती। मैं चाहता तो रिपोर्टर बनकर अपना जीवन सुधार लेता मगर, मैंने आपकी इज्जत की खातिर चपरासी बनना स्वीकार किया। अब आप ही बताइए धर्मेंद्र जी, मेरे बेटे को मेरी इज्जत का ख्याल था या भदौरिया के बेटे को।"
तोमर साहब सही कह रहे थे। उनके बेटे ने जो किया वह शायद ही किसी का बेटा कर
पाता। अब तो  मुझे भी  उस पर फक्र है। बेटे हों तो ऐसे।  

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