धर्मेंद्र सिंह राजावत
मेरे दिल में तूफान खड़ा कर
मेरे दिमाग का दरवाजा खोल देती है।
ये कम्बख्त कशमकश बहुत बेरहम है
कलम में भी बेड़ियां डाल देती है।
दिमाग जब दिल का साथ नहीं देता
तो यह दिल को भड़का देती है
बहुत देर से बैठा हूं लिखने के लिए
विचार आने से पहले ये जिरह शुरू कर देती है
मायूस होने लगे दिल को दुलार दूं
या दिमाग को बेहतर करार दूं
अब मुसीबत का पर्दा उतार दूं
या बेबस हाथों को औजार दूं
प्रेमिका के प्यार को आकार दूं
या सीने में उसके खंजर उतार दूं
ये सोचने में घंटों गुजार दूं
या फिर कशमकश में दो-चार दूं
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें