मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मक्खन है या मुसीबत (कहानी)

धर्मेंद्र सिंह राजावत
सोमवार को दूरसंचार मंत्रालय में सब कुछ सामान्य था सिर्फ पप्पू को छोड़कर। पप्पू जी मंत्रालय में हेडक्लर्क हैं। उनको सभी से हमेशा यही शिकायत रहती है कि उनके साथी उच्चाधिकारियों को मक्खन लगाने में उनसे आगे निकल जाते हैं। लेकिन, आज उनका हाव-भाव देखकर ऐसा लग रहा था मानो उनके मन में खुशी का दरिया हिलोरें ले रहा है। पप्पू में कुछ बदलाव देखकर अपने मन में उठे सवालों के सैलाब को महेश शांत न कर सके और पप्पू के पास जाकर सवाल दाग दिया।
'क्यों पप्पू! आज बहुत खुश लग रहे हो?"
पप्पू ने काफी अचरज भरी निगाह से देखा और उत्तर देने के बजाय उसने भी सवाल दाग दिया।
'क्यों मैं खुश नहीं हो सकता? साहब को उल्टा-सीधा पढ़ा (मक्खन लगाकर) बहुत खुश होते हो। मैंने तो कभी कुछ नहीं पूछा। हां! एक बात साफ समझ लो। न मैं खुश हूं और न ही मैं मंत्री जी को कुछ बताने वाला हूं।"
महेश जी मंत्रालय में बड़े साहब के  पीए हैं। दूसरी पदवी उनको मंत्रालय के साथियों ने सकुनी की दे रखी है। जितना तेज उतना ही शातिर दिमाग। आग की तरह पूरे मंत्रालय में यह खबर फैला दी कि पप्पू आज मंत्री जी से कुछ कहने वाला है। पप्पू क्या कहने वाला है, यह जानने की सभी कर्मचारियों-अधिकारियों की उत्सुकता चरम पर पहुंचती उससे पहले ही मंत्री जी आ पहुंचे। मौका मिलते ही पप्पू भी मंत्री जी के केबिन में जा घुसा। कुछ उत्सुक कर्मचारी कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगे तो कुछ दफ्तर का काम निकालकर मंत्री जी के केबिन में ही पहुंच गए। कुछ संकोच के बाद पप्पू ने अपनी बात शुरू की।
'साहब ! आपकी समस्या का मैंने समाधान ढूंढ निकाला है।"
मंत्री जी, 'किस समस्या का?"
पप्पू , 'सोशल मीडिया का।"
पप्पू के इतने कहने पर मंत्री जी का रिएक्शन ऐसा था मानो नासूर घाव का किसी ने इलाज बता दिया। फिर अचरज भरे अंदाज में सवाल किया।
'क्या कहा पप्पू?"
पप्पू, 'हां साहब ! सही सुना आपने। हमने मीडिया का मुंह बंद करने का मंत्र ढूंढ निकाला है। बहुत उल्टा-सीधा लिखते हैं ये सब। फेसबुक, ट्यूटर और न जाने किस-किस पर। सब के बारे में मुझे खबर है।
मंत्री जी ने खासे उत्सुक होकर पप्पू से सवाल किया
'क्या समाधान ढूंढा है आपने?"
पप्पू, ' साहब !  थोड़ी सी बेइज्जती से बहुत सारी इज्जत बच जाएगी।"
पप्पू की बात सुन मंत्री जी कुछ असहज हो गए। क्षणिक गंभीरता के बाद फिर बोले
'क्या मतलब है आपका?"
मंत्री जी के अंदाज को देखकर पप्पू कुछ झेप गया और सफाई देने के भाव में बोला
'साहब! ग्वालियर की एक अदालत के आदेश के बाद सरकारी और गैर सरकारी के साथ ही कई मीडिया संस्थानों की वेबसाइट्स बिना बताए बंद कर दी गईं थीं।"
पप्पू अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही मंत्री जी ने उसे रोकते हुए फिर सवाल किया
'इसका इससे क्या ताल्लुक?"
पप्पू, 'ताल्लुक है साहब! वेबसाइट्स बंद होने के बाद हुए
हो-हल्ला के बीच एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में एक डॉट.कॉम के संस्थापक ने कहा कि मंत्रालय को इसकी जानकारी देनी चाहिए थी, जिससे कि हम इस मुद्दे पर बहस करा लेते।"
मंत्री जी ने पप्पू को टोकना चाहा पर उसने अपनी बात जारी रखी।
'सर! यह तो तय है कि बहस में हमारी बेइज्जती ही होती, मगर इसके बाद वेबसाइट्स को बंद तो कर सकते हैं  ऐसा करके हम काफी सारी इज्जत बचा सकते हैं।"
पप्पू की बात सुनकर मंत्री जी ने एक पल के लिए लंबी सांस ली और फिर बोले
' पप्पू तुम सही कह रहे हो। सोशल मीडिया वाले जितनी बेइज्जती कर रहे हैं, उससे तो अच्छा है कि सभी को एक-एक कर बहस का मौका दिया जाए। फिर हमेशा के लिए झंझट खत्म। इसके बाद कोई चिल्लाचोंट नहीं होगी,  फिर जो चाहो लूटो-खसोटो।"
मंत्री जी अपनी और अपनी सरकार की बेइज्जती करने वालों को इसका लाइसेंस देने को राजी हो गए। कुछ दिन बाद ही वह इससे संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले थे कि महेश वह मैगजीन लेकर उनके पास आ गया, जिसमें इससे संबंधित लेख लिखा था।
महेश, 'सर ! लेख आपने पढ़ा है?"
मंत्री जी, ' नहीं।"
महेश, 'लेख में न केवल वेबसाइट्स के प्रतिबंध की आलोचना की गई है बल्कि ऐसा करने से पहले बहस की मांग भी की गई है, मगर इसमें कहीं भी नहीं लिखा है कि इसके बाद वेबसाइट्स बंद करने से उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।"
मंत्री जी ने झपटकर मैगजीन ली और उस लेख को पढ़ा। इसके बाद पप्पू पर खासे नाराज हुए।
मंत्री जी, 'क्यों पप्पू तुम मुझे बेइज्जत होने से बचा रहे थे या मेरी बेइज्जती की व्यवस्था कर रहे थे?"
पप्पू, 'लेख में बहस कराने की मांग की गई थी। मैंने समझा कि इसका मतलब तो यही हुआ कि बहस के बाद वेबसाइट्स बंद कर सकते हैं।"
मंत्री जी, 'तुम जो न समझो वही अच्छा है।"
पप्पू ने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप उनके दफ्तर से निकल आया। पीछे-पीछे महेश भी आ गया।
महेश, 'पप्पू ! नकल के लिए जितनी अकल की जरूरत होती है, उतनी ही मक्खन लगाने के लिए मानसिक मशक्कत की।  ये हुनर है, जोकि हर किसी को नहीं आता। ऐसे तो कोई भी ऐरा-गैरा आए और साहब को मक्खन लगा कर चलता बने। इसके लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। जाओ और मक्खन लगाने की कला सीखो।"
पप्पू, ' बाप रे! ये मक्कन है या मुसीबत।

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