
धर्मेंद्र सिंह राजावत
देश में गरीबी कोई नया मुद्दा नहीं है। इतिहास को यदि परत-दर-परत पलट कर देखा जाए तो पता चलेगा कि यह हमेशा कायम थी। अलबत्ता, देश में अब जो माहौल बना है, उसने गरीब और गरीबी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कुछ दिन पहले की बात है। मैं परिवार के साथ इंडिया गेट गया था। जब मैं परिजनों के साथ खाने-पीने में मशगूल था तभी पास बैठे दो भिखारियों की बातचीत ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वह दोनों भी गरीबी पर ही बातचीत कर रहे थे।
एक भिखारी दूसरे से पूछ रहा था , ''क्यों घंसू तुम दिनभर में कितने रुपए कमा लेते हो?"
घंसू जवाब देता है, '' यही करीब चार-पांच सौ रुपए।"
धनिया जवाब देता है, '' मैं भी करीब तीन-चार सौ रुपए हर रोज कमा लेता हूं।"
जवाब देने के साथ ही वह गंभीर चिंतन में डूब जाता है। उसको उदास देखकर घंसू फिर से सवाल करता है। ''धंधा अच्छा चल रहा है तो फिर उदास होने की जरूरत क्या है? हां! ठीक है, अभी तीन-चार सौ ही कमा पाता है, पर कुछ और मेहनत कर तो ज्यादा भी कमा सकता है।"
धनिया गंभीर भाव के साथ बोला, '' घंसू ! बात धंधे की नहीं है।"
घंसू ने फिर सवाल किया, '' तो फिर बात क्या है?"
धनिया बोला, '' मुझे चिंता इस बात की सता रही है कि कहीं सरकार को हमारी कमाई की जानकारी मिल गई तो क्या होगा। सरकार की नजर में 28 रुपए हररोज कमाने वाला भी गरीब नहीं है, फिर मैं तो उससे 10-15 गुना ज्यादा कमाता हूं। मुझे डर है कि कहीं सरकार हमें क्रीमी लेयर की श्रेणी में न रख दे। दूसरा, चाहे नौकरी करने वाला व्यक्ति हो या फिर व्यापारी, सरकार सभी से टैक्स वसूलने पर आमादा है, बस उसे इस बात की पुख्ता जानकारी मिल जाए कि वह सुकून से दो वक्त की रोटी परिवार को खिला रहा है। मेरी कमाई की जानकारी उसे मिल गई तो मेरा क्या होगा, यही सोच कर मैं परेशान हूं।"
गरीबी के स्तर का आकलन करने वाली सरकार का शायद दोनों भिखारी मखौल उड़ा रहे थे, पर उनकी बात में एक कड़वी सच्चाई भी झलक रही थी। जिस सरकार की नजर में 28 रुपए कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं होगा तो क्या उसको देश में कोई भी व्यक्ति गरीब नजर आएगा? शायद नहीं। यह सरकार की विफलता, हताशा और खीज का ही नतीजा है, जो गरीब और गरीबी को वह इस तरह परिभाषित कर रही है। कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गांधी और अर्थशास्त्र के जानकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सत्ता में आने से पहले लोगों से वादा किया था कि वह न केवल महंगाई पर लगाम लगाएंगे बल्कि आमजनता की जेब का बोझ भी कम करेंगे, मगर अब वह महंगाई और गरीबी की बात आते ही उखड़ जाते हैं।
प्रधानमंत्री कहते हैं कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जिससे मैं महंगाई को कम कर दूं। अलबत्ता, उन्होंने 80 सवालों की झड़ी जरूर तैयार कर ली है, जिसमें उलझाकर वह गरीब को अमीर साबित कर सकते हैं। फिर न रहेगा बांस (गरीब) और न बजेगी बांसुरी। गौरतलब है कि गरीबी की परिभाषा को आंकड़ों में उलझाकर किसी भी गरीब को अमीर साबित करने का सरकार ने एक नायाब फॉर्मूला निकाल लिया है। इसके तहत 80 से अधिक सवाल एक व्यक्ति से पूछे जाएंगे और यदि उसके एक भी जवाब से सरकार संतुष्ट नहीं हुई तो वह व्यक्ति उसकी नजर में गरीब नहीं हो सकता, फिर चाहे उसके पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी और सिर ढकने के लिए छत भी न हो।
सरकार और प्रधानमंत्री को आंकड़ों से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत जानने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह गरीब और गरीब उनका मखौल उड़ाते रहेंगे।
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