वैज्ञानिकों ने एक नए शोध के तहत यह पता लगाया गया है कि पेसिफिक कॉड (मछली की एक प्रजाति) में पाए जाने वाले प्रोटीन में प्रोस्टेट कैंसर और संभवत: अन्य प्रकार के कैंसर की ग्रोथ रोकने की क्षमता होती है। पेसिफिक कॉड एक महत्वपूर्ण कमर्शियल फूड प्रजाति है। इस शोध में भारतीय मूल के वैज्ञानिक भी शामिल हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन के शीर्ष प्रोफेसर हाफिज अहमद ने बताया कि एंटी-ट्यूमर एक्टिविट वाले नेचरल डाइटेरी प्रोडक्ट्स को प्रमुख रूप से शोध में शामिल किया गया। श्री अहमद इंस्टीट्यूट फॉर मरीन एंड एनवायरंमेंटल टेक्नालॉजी (आईएमईटी) के भी वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश कैंसर पेशेन्ट्स की मौत तब होती है, जब ट्यूमर सेल्स ब्लड और लिम्फ वेसल्स तक पहुंच जाती है और उन्हें पूरी तरह से ढंक लेती है। इस प्रोसेस को मेटास्टेटिस(रोग स्थानांतरण) कहते हैं। ऐसे वक्त यह आवश्यकता होती है कि ये कैंसर सेल्स और किसी क्षेत्र में न फैलें और न ही उनकी वजह से अन्य सेल्स को कोई नुकसान पहुंचे।
इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पेसिफिक कॉड में पाए जाने वाले प्रोटीन की खोज की, जिसकी वजह से कैंसर की ग्रोथ प्रभावित होती है। यह प्रोटीन ग्लाइकोपेप्टाइड है, जो कैंसर की वृद्धि को रोकता है। विशेषकर प्रोस्टेट कैंसर को रोकने में इसे ज्यादा कारगर बताया जा रहा है। इसको लेकर वैज्ञानिक आगे भी कई शोधों में लगे हुए हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन के शीर्ष प्रोफेसर हाफिज अहमद ने बताया कि एंटी-ट्यूमर एक्टिविट वाले नेचरल डाइटेरी प्रोडक्ट्स को प्रमुख रूप से शोध में शामिल किया गया। श्री अहमद इंस्टीट्यूट फॉर मरीन एंड एनवायरंमेंटल टेक्नालॉजी (आईएमईटी) के भी वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश कैंसर पेशेन्ट्स की मौत तब होती है, जब ट्यूमर सेल्स ब्लड और लिम्फ वेसल्स तक पहुंच जाती है और उन्हें पूरी तरह से ढंक लेती है। इस प्रोसेस को मेटास्टेटिस(रोग स्थानांतरण) कहते हैं। ऐसे वक्त यह आवश्यकता होती है कि ये कैंसर सेल्स और किसी क्षेत्र में न फैलें और न ही उनकी वजह से अन्य सेल्स को कोई नुकसान पहुंचे।
इसी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने पेसिफिक कॉड में पाए जाने वाले प्रोटीन की खोज की, जिसकी वजह से कैंसर की ग्रोथ प्रभावित होती है। यह प्रोटीन ग्लाइकोपेप्टाइड है, जो कैंसर की वृद्धि को रोकता है। विशेषकर प्रोस्टेट कैंसर को रोकने में इसे ज्यादा कारगर बताया जा रहा है। इसको लेकर वैज्ञानिक आगे भी कई शोधों में लगे हुए हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें