मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

हर रिश्ते से बड़ी दोस्ती

रिश्तों  के ताने-बाने के बिना मनुष्य अकेला जी नहीं सकता। कहीं न कहीं उसे किसी न किसी रिश्ते की जरूरत पड़ती है, जो उसे संबल दे, सहारा दे, प्रेम दे, उसके सुख और दुख को बांटे और उसे हर पल यह महसूस कराए कि वह अकेला नहीं है। व्यक्ति अकेला नहीं जी सकता भले ही उसके लिए रिश्ते बेमानी हो जाएं मगर उसे जीवन के किसी भी मोड़ पर इनकी जरूरत पड़ती ही है। हालांकि रिश्तों की यह इतनी बड़ी भूमिका सिर्फ बानगी है रविवार को मनाए गए फ्रेंडशिप डे की, जो यह बताता है कि हर रिश्ते में खास होता है दोस्ती का रिश्ता। इसे निभाने वाला ही इसके मायने भी समझ सकता है। नहीं तो पल में दोस्त बनाकर, कुछ समय में लड़ाई कर उसे छोड़ देना यह दोस्ती नहीं हो सकती। यूं तो हर रिश्ते की अपनी मान-मर्यादा और सीमाएं होती हैं, जिसके बलबूते पर उन्हें निभाना जरूरी होता है मगर दोस्ती का रिश्ता सबसे जुदा है, जो हमउम्र लोगों में भी एक-दूसरे पर अधिकार जता सकता है तो बड़े-छोटों में भी।
वैसे तो दोस्ती का कोई दिन नहीं होता क्योंकि यह तो मौके-बेमौकों पर ही दोस्त के साथ रहने की अहमियत को बताता है और दोस्तों के साथ रहने का हर दिन ही सेलिब्रेशन का ही रहता है। मगर इसके लिए अगस्त माह का पहला रविवार मुकर्रर किया गया ताकि सभी दोस्त एक-दूसरे से मिलकर एक-दूसरे को अपनी दोस्ती का अहसास दिला सकें, उन्हें यह बता सकें कि वह हर पल, हर मौके पर उनके साथ हैं। दोस्ती को लेकर कई तरह के शोध भी किए गए हैं, जिनमें से कुछ चुनिंदा शोधों पर भी गौर किया जा सकता है-
बच्चों को सिखाएं
बच्चे के स्कूल जाने के बाद उसे सबसे पहले नए-नए दोस्तों का ही साथ मिलता है। बोस्टन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल की ओर से कराए सर्वे में बताया गया कि बच्चों की दोस्ती के लिए सबसे जरूरी है कि पैरेन्ट्स उन्हें बताएं कि वे कैसे दोस्त बनाएं और कैसे दोस्ती निभाएं। हालांकि समय के साथ बच्चा खुद-ब-खुद दोस्ती के मायने समझने लगता है मगर फिर भी बढ़ती उम्र के साथ उसकी दोस्ती पर माता-पिता का ध्यान देना जरूरी है ताकि गलत दोस्ती का उसके जीवन पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े।
उम्र का कोई बंधन नहीं 
हर उम्र के लोग दोस्ती करते हैं और हर उम्र के लोगों में दोस्ती होती है इसलिए दोस्ती के लिए उम्र के बंधन को नहीं माना जाता। ऑस्ट्रेलियाई यूनिवर्सिटी में किया गया शोध भी इसी बात को साबित करता है कि दोस्ती में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। यह पिता-पुत्र में हो सकती है तो मां-बेटी के बीच भी । पार्कों में मार्निंग वॉक करने वाले बुजुर्गों की दोस्ती अक्सर वहां से गुजरने वाले बच्चों के साथ इतनी गहरी हो जाती है कि जब तक वे मिलें नहीं तब तक जैसे उनके दिन की शुरुआत ही नहीं होती।
बॉन्डिंग होती है स्ट्रॉन्ग
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में 300 कॉलेज स्टूडेंट्स पर किए शोध में पाया गया कि दोस्त सबसे बड़े संबल होते हैं, उनकी बॉन्डिंग बहुत स्ट्रॉन्ग होती है। इसमें वे स्टूडेंट्स शामिल थे, जो पासिंग आउट सेरेमनी के बाद अलग-अलग स्थानों पर नौकरी करने लगे या फिर दूसरे स्थानों पर जाकर बस गए। लगातार छह महीने तक किए साक्षात्कार के दौरान पाया गया कि जो स्टूडेंट्स अलग-अलग होने के बाद भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स या अन्य साधनों के जरिए एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, उनमें एक-दूसरे के लिए सपोर्टिव सिस्टम की बॉन्डिंग भी उन लोगों से ज्यादा स्ट्रॉन्ग थी, जो काफी समय से एक-दूसरे से किसी भी साधन के जरिए मिले ही नहीं। ऐसे में पहले ग्रुप के स्टूडेंट्स ने अपने जीवन में फ्रेंड्स को ज्यादा इम्पॉरटेंस दी क्योंकि वे अभी भी अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को किसी भी परिस्थिति में शेयरिंग के साथ सपोर्ट कर रहे थे। 

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