गंदे पानी की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए एक राहत भरी खबर है। उनकी इस समस्या को अब महिलाओं की उपयोग की गई साड़ियों और सूर्य की रोशनी से समाप्त किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में पता चला है कि कॉटन की साड़ी से गंदे पानी को छानने और उसे लगभग एक घंटे तक सूर्य की रोशनी में रखने के बाद वह पीने योग्य हो जाता है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में बरसात के पानी को कपड़े से छानकर पानी पीने योग्य बनाने का तरीका पहले से इस्तेमाल होता आ रहा है।
लेकिन अब शोधकर्ताओं ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि साड़ी से छाना गया पानी, जिसे सूर्य की रोशनी में रखा गया हो उसे उबालने की जरूरत नहीं है वह वैसे भी पीने योग्य हो जाता है। महाराष्ट्र के निंबकार कृषि अनुसंधान संस्थान से संबंध रखने वाले नंदनी निंबकार और अनिल राजवंशी ने इस शोध को अंजाम दिया। उनके इस शोध को द जर्नल करंट साइंस में प्रकाशित किया जाएगा।
वर्तमान में घरों के अंदर पानी को साफ करने के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह काफी महंगी हैं और स्थायी भी नहीं हैं। लेकिन साड़ी फिल्टर और सूर्य ताप के संयोजन का काफी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर उन ग्रामीण इलाकों में जहां नदी और कुएं के पानी का उपयोग होता है, यह तरीका एक वरदान होगा।
पानी का शुद्धिकरण रासायनिक उपचार यानी क्लोरीनीकरण या फिर उसे उबालकर किया जाता है। ये दोनों तरीके ऐसे हैं जिन्हें हर समय कर पाना संभव नहीं है। इसके अलावा क्लोरीनीकरण के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जबकि हर वक्त पानी को उबालकर पीना संभव नहीं है।
एनएआरआई के शोधकर्ताओं ने कहा कि पानी को कीटाणुमुक्त बनाने के लिए इसका 55 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करना जरूरी है, और इस तापमान पर सूर्य की रोशनी के माध्यम से भी पहुंचा जा सकता है। इस शोध के परिणामों तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने गंदे पानी को लिया और उसे कॉटन की साड़ी की चार परतें बनाकर साफ किया। इसके बाद छाने गए पानी और 50 से 60 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किए गए पानी के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि साड़ी ने उन कीटाणुओं को काफी हद तक दूर कर लिया गया, जो मनुष्य के लिए घातक साबित हो सकते थे।
लेकिन अब शोधकर्ताओं ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि साड़ी से छाना गया पानी, जिसे सूर्य की रोशनी में रखा गया हो उसे उबालने की जरूरत नहीं है वह वैसे भी पीने योग्य हो जाता है। महाराष्ट्र के निंबकार कृषि अनुसंधान संस्थान से संबंध रखने वाले नंदनी निंबकार और अनिल राजवंशी ने इस शोध को अंजाम दिया। उनके इस शोध को द जर्नल करंट साइंस में प्रकाशित किया जाएगा।
वर्तमान में घरों के अंदर पानी को साफ करने के लिए जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है वह काफी महंगी हैं और स्थायी भी नहीं हैं। लेकिन साड़ी फिल्टर और सूर्य ताप के संयोजन का काफी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर उन ग्रामीण इलाकों में जहां नदी और कुएं के पानी का उपयोग होता है, यह तरीका एक वरदान होगा।
पानी का शुद्धिकरण रासायनिक उपचार यानी क्लोरीनीकरण या फिर उसे उबालकर किया जाता है। ये दोनों तरीके ऐसे हैं जिन्हें हर समय कर पाना संभव नहीं है। इसके अलावा क्लोरीनीकरण के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जबकि हर वक्त पानी को उबालकर पीना संभव नहीं है।
एनएआरआई के शोधकर्ताओं ने कहा कि पानी को कीटाणुमुक्त बनाने के लिए इसका 55 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करना जरूरी है, और इस तापमान पर सूर्य की रोशनी के माध्यम से भी पहुंचा जा सकता है। इस शोध के परिणामों तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने गंदे पानी को लिया और उसे कॉटन की साड़ी की चार परतें बनाकर साफ किया। इसके बाद छाने गए पानी और 50 से 60 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किए गए पानी के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि साड़ी ने उन कीटाणुओं को काफी हद तक दूर कर लिया गया, जो मनुष्य के लिए घातक साबित हो सकते थे।

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