मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

एक्टिविटीज में बिजी बच्चे यानी हेल्दी और हैप्पी

 गर्मियों की छुट्टियां पड़ते ही बच्चों को हर काम में बोरियत होने लगती है, ऐसे में बचता है टीवी, कम्प्यूटर और वीडियो गेम का सहारा। दोपहर के समय तो इन्हें ठीक माना जा सकता है, लेकिन सुबह और शाम के वक्त बच्चे जितना आउटडोर एक्टिविटीज में बिजी रहेंगे, वह उनकी सेहत के लिए उतना ही अच्छी होगा। इसलिए पैरेन्ट्स के लिए भी जरूरी है कि वे बच्चों को इस तरह की एक्टिविटीज में बिजी रहने के लिए इन्करेज करें  ताकि बच्चों की सेहत भी बनी रहे और वे प्रसन्ना भी रहें।
हाल ही में ब्रिटिश अखबार 'डेली मेल" में प्रकाशित दो शोधों में इस बात की पुष्टि हुई है कि आउटडोर एक्टिविटीज न सिर्फ बच्चों को हेल्दी और हैप्पी रखती है बल्कि इनसे आंखों की रोशनी भी बढ़ती है। घर के बाहर खेलने वाले बच्चों को निकट दृष्टि दोष या मायोपिया (जिसमें दूर की चीजें साफ नजर नहीं आती) होने की आशंका उन बच्चों के मुकाबले कम होती है,जो इनडोर गेम्स को तरजीह देते हैं।
इसलिए यह खबर उन पैरेन्ट्स के लिए ध्यान देने योग्य हैं जो बच्चों को घर में सारी सुविधाएं देकर आउटडोर एक्टिविटीज पर ध्यान नहीं देते। जिसका असर बच्चों की फिटनेस पर पड़ता है और वह जाने-अनजाने मोटे होते जाते हैं। गोलू-मोलू बच्चे बचपन में तो बहुत अच्छे लगते हैं, मगर बड़े होकर यह मोटापा उनके लिए परेशानी का सबब बन जाता है।
कैसे किया अध्ययन
ताइवान में की गई पहली स्टडी में 333 बच्चों का परीक्षण किया गया। ये बच्चे पढ़ाई के बीच मिलने वाले ब्रेक के समय मैदान में रहे। इन बच्चों में अधिकतर पहले अपना भोजनावकाश का वक्त क्लास में ही बिताते थे, अब रोजाना लगभग 80 मिनट का वक्त बाहर प्लेग्राउंड में गुजारने लगे। एक अन्य नजदीकी स्कूल ने कंट्रोल ग्रुप के तौर पर काम किया। वहां बच्चों को ब्रेक के दौरान बाहर वक्त गुजारने की इजाजत नहीं दी गई।
दोनों में की गई तुलना
दोनों स्कूल के बच्चों की आंखों की जांच शुरू की गई और एक साल बाद इसके परिणाम में पाया गया कि वह स्कूल जहां बच्चों को ब्रेक के दौरान बाहर जाने की इजाजत थी, उस स्कूल के कम बच्चों में निकट दृष्टि दोष होने के संकेत पाए गए, बनिस्बत उस स्कूल के जहां बच्चों के बाहर जाने पर पाबंदी थी।
इस रिसर्च के बाद इस बात की सिफारिश की गई कि बच्चों को नियमित अंतराल पर ब्रेक मिलता रहे। इसके साथ ही अन्य आउटडोर कार्यक्रमों में भी इजाफा किया जाए। यह बच्चों की आंखों के लिए भी अच्छा होगा। ताइवान स्थित चांग चुंग मेमोरियल हॉस्पिटल, कायोहसियुंग   के डॉक्टर और इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता पी-चांग वू का कहना है कि क्योंकि बच्चे स्कूल में बहुत अधिक वक्त बिताते हैं इसलिए उन्हें वहां ऐसा माहौल मिलना चाहिए, जिसका उनकी सेहत पर पॉजीटिव इफेक्ट पड़े। स्कूलों में उठाए जाने वाले यह कदम मायोपिया से लड़ने का सीधा और व्यावहारिक उपाय हो सकते हैं।  

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