बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

कहीं आप भी मोबाइल इंटरनेट चिपकू तो नहीं !

 आज के आधुनिक व तकनीकी युग में यूं तो मोबाइल और इंटरनेट बहुत उपयोगी है, लेकिन आज के युवाओं ने इनकी ऐसी आदत डाल ली है कि वे इससे दूरी बनाने की सोच भी नहीं सकते। जहां तक सुविधाओ का सवाल है वहां तक तो ठीक है, मगर अगर यह सुविधा आपकी दिनचर्या ही बिगाड़ दे तो इसे तो पूरी तरह से गलत ही कहा जाएगा। अमेरिका की मीडिया संस्थानों ने हाल ही में कई तरह के सर्वे कर आज के आधुनिक गैजेट्स के साइडइफेक्ट्स बताए हैं। सर्वे में कहा गया है कि मोबाइल और इंटरनेट की आदत न  सिर्फ आपको एंग्जाइटी देती है बल्कि डिप्रेशन और सुसाइड जैसी मनोवृत्तियों को बढ़ावा देने में इसकी सबसे ज्यादा भूमिका है। यह लत कितनी खतरनाक हो सकती है, इसका अंदाजा शायद आज का युवा वर्ग नहीं लगा सकता। मगर वह बढ़ती उम्र के किसी पड़ाव पर इस गलती को खुद स्वीकार लेगा, इसमें भी कोई संशय नहीं।
समय की बर्बादी
उपयोग की चीजें जब हमारी लत बन जाती है, तो हमारी पूरी लाइफ स्टाइल को बदल देती है और इसका पता ही नहीं चल पाता। आज के युवा पढ़ाई की छोटीछोटी बातें भी मोबाइल पर करते रहते हैं। इससे उनका समय तो बर्बाद होता ही है। साथ ही यह पढ़ाई से उनका ध्यान भी भटकाता है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स" ने विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि मोबाइल पर सारा समय चिपके रहना, एसएमएस भेजना और फिर उस एसएमएस के जवाब के इंतजार में अपना पूरा समय बिगाड़ देना, इससे युवाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। भले ही इस बीच घर में मेहमान आ जाएं या फिर घर वालों को ही आपसे कोई काम पड़ जाए। मगर वे अपने मोबाइल शगल में डूबे रहेंगे तो हटेंगे ही नहीं। यही हाल फेसबुकटि्वटर पर अपडेट लिखने और सूचनाओं का आदानप्रदान करने वालों की है। वे जरूरत की बातें एकदूसरे से शेयर करतेकरते ऐसी गपशप में मशगूल होते हैं जैसे इसके अलावा उनके पास कोई काम ही नहीं है। बिना मतलब की गॉसिपिंग न सिर्फ उनका ध्यान भटकाती है, बल्कि ऐसे लोग कभी किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते।
'सोशल मीडिया एंग्जाइटी डिसऑर्डर"  
अखबार के अनुसार फेसबुक और टि्वटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल युवाओं को 'सोशल मीडिया एंग्जाइटी डिसऑर्डर" का मरीज बना देता है। इस बीमारी में हर कोई अपनी तुलना दूसरों से करने लगता है। वहीं मोबाइल पर बारबार एसएमएस की घंटी सुनने की 'रिंग एंग्जाइटी" हो जाती है। साथ ही मैसेज देखने के लिए वह कभी अपने मोबाइल से दूरी बनाना नहीं चाहता।
यह सनक से कम नहीं
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपडेट और फोटो भेजने की सनक आज के अमूमन हर युवाओं में देखी जा सकती है। यहां तो ठीक है लेकिन इस पर कम लाइन मिलने या फोन कॉल व मैसेज कम आने पर उसे बैचेनी महसूस होने लगती है। वह खुद को औरों से कम आंकने लगता है। यह एंग्जाइटी उसे डिप्रेशन में डूबा देती है और यह डिप्रेशन कभीकभी युवाओं में सुसाइड करने जैसी भावनाओं को भी प्रबल कर देता है।
नींद में भी बैचेनी
'एबीसी न्यूज" के अनुसार जो युवा इस तरह से मोबाइल और इंटरनेट के आदी हो जाते हैं, उन्हें नींद में भी बैचेनी होने लगती है। ऐसे लोग गहरी नींद नहीं सो पाते बल्कि रात में नींद खुलने पर उन्हें मोबाइल चेक करने की आदत हो जाती है।
क्यों होता है ऐसा
रात की नींद में खलल का कारण विशेषज्ञ यह बताते हैं कि मोबाइल की स्क्रीन से निकलने वाला नीला प्रकाश, ब्रेन को हमेशा मुस्तैद रहने की हिदायत देता है। ऐसे में शरीर में स्लीपहार्मोन मेलाटोनिन का सीक्रिशन देर से होता है और व्यक्ति की नींद में खलल पड़ता है।
क्रिएटिविटी खत्म हो जाती है
गत वर्ष 'फोर्ब्स मैग्जीन" ने भी अपने एक अध्ययन में इस बात का दावा किया था कि मोबाइल और इंटरनेट के ज्यादा इस्तेमाल से व्यक्ति की क्रिएटिविटी में गिरावट
आती है।  

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