मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

कृत्रिम लिवर बनाने के करीब वैज्ञानिक

अमेरिका स्थित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के अनुसंधानकर्ताओं ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिसमें वह प्रत्यारोपण के लिए कृत्रिम लिवर का विकास करने में कामयाब हो सकते हैं। इन अनुसंधानकर्ताओं में एक भारतवंशी वैज्ञानिक भी हैं। वैज्ञानिक कृत्रिम लिवर बनाने में सफल रहे तो करोड़ों जिंदगियां बचाई जा सकेंगी। वैज्ञानिक ट्रांसप्लांटेशन के लिए कृत्रिम लिवर टिश्यू का विकास करने की लिवर की क्षमता को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इसमें बाधाएं आती रही हैं।
लिवर सेल्स खुद ही सक्षम
हेपेटोसाइट्स नाम से पहचानी जाने वाली मैच्योर लिवर सेल्स को जब शरीर से अलग कर दिया जाए तो वह तेजी से अपना नॉर्मल फंक्शन खोने लगती हैं। एमआईटी की इंजीनियर संगीता भाटिया के अनुसार लिवर का कोई हिस्सा निकाल दिया जाए तो वह खुद ही इस हिस्से की भरपाई कर सकता है। सुश्री भाटिया ने कहा कि यह पैराडॉक्स (वह बात जो वास्तव में सच हो लेकिन दिखने में झूठी जान पड़ती हो) है क्योंकि हम जानते हैं कि लिवर सेल्स खुद ही ग्रोइंग (बढ़ने) में सक्षम होती हैं लेकिन पता नहीं क्यों, हम उसे शरीर के बाहर ग्रो नहीं करा सकते हैं।
दर्जनों केमिकल की पहचान
सुश्री भाटिया और उनके साथियों ने ऐसे केमिकल कंपाउंड्स की पहचान की है, जो लिवर को लैब डिश में निर्माण के दौरान न केवल उसका नॉर्मल फंक्शन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं बल्कि नए टिश्यू असंख्य संख्या में बनाने में भी मददगार हो सकते हैं।
केमिकल्स का कमाल
अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसा सिस्टम बनाया है, जिसमें लिवर सेल्स लैब डिश में स्मॉल डिप्रेशंस में फाइब्रोब्लास्ट सेल्स के साथ लेयर्स में लिवर सेल्स का निर्माण कर सकें। इससे अनुसंधानकर्ताओं को 12500 अलग-अलग प्रकार के केमिकल्स के बारे में व्यापक पैमाने पर यह अध्ययन करने का मौका मिलेगा कि वे लिवर सेल ग्रोथ और फंक्शन को कैसे प्रभावित करते हैं।
पहले भी परीक्षण हुए
वैज्ञानिकों ने पूर्व में आईपीएससी से हेपेटोसाइट्स को सृजित करने का प्रयास किया लेकिन इस तरह की सेल्स पूरी तरह परिपक्व स्थिति में नहीं पहुंचीं। हालांकि जब इनका इन दो कंपाउंड्स के साथ इलाज किया गया तो ये सेल्स अधिक पूर्ण रूप में परिपक्व पाई गईं।
50 करोड़ की उम्मीद
अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार इस समय पूरी दुनिया में 50 करोड़ लोग हेपेटाइटिस सी समेत क्रॉनिक लिवर डिजीज जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं। लैब डिश में पैदा की गईं सेल्स से अनुसंधानकर्ताओं को इन मरीजों का इलाज करने के लिए इंजीनियर्ड (कृत्रिम) टिश्यू का निर्माण करने में मदद मिल सकती है।
एंजाइम्स की पहचान
अनुसंधानकर्ताओं ने 83 लिवर एंजाइम्स के एक्सप्रेशन लेवल्स की पहचान की है। इनमें से कुछ के फंक्शन तो बड़े जटिल हैं। 8 अलग-अलग प्रकार के टिश्यू दानदाताओं से हजारों लिवर सेल्स की स्क्रीनिंग करने के बाद वैज्ञानिकों ने 12 कंपाउंड्स की पहचान की है, जो सेल्स को फंक्शंस को मैंटेन रखने या लिवर सेल डिविजन को प्रमोट करने या दोनों काम करने में मददगार हो सकते हैं। इनमें से दो कंपाउंड्स को यंगर डोनर्स से प्राप्त सेल्स में विशेष रूप से बेहतर काम करते पाया गया है। इसलिए अनुसंधानकर्ताओं ने इनका परीक्षण इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल्स (आईपीएससी) से प्राप्त लिवर सेल्स में भी किया। 

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