नौ महीने की उम्र होने पर भी जो बच्चे सीधे नहीं बैठ पाते या जो घुटनों के बल नहीं चल पाते, उन्हें सीखने में दिक्कतें आने के साथ-साथ व्यावहारिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के अनुसंधानकर्ताओं ने पांच साल की उम्र तक 15,000 बच्चों पर अध्ययन कर यह पाया कि जो बच्चे नौ माह की आयु में घुटनों के बल रेंग नहीं पाते, उनके स्कूल में पिछड़ने का खतरा अधिक होता है और उन्हें अपने सहपाठियों के साथ तालमेल बिठाने में भी परेशानी होती है।इस अध्ययन के प्रमुख प्रोफेसर इनग्रिड स्कून ने कहा कि सभी बच्चों की विकास दर अलग-अलग होती है। जिन बच्चों को बैठने या घुटनों के बल चलने में परेशानी होती है, वे बाद में सामान्य हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह समस्याएं विकास संबंधी देरी की वजह से होती हैं जिसके लिए विशिष्ट मदद की जरूरत होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन के अनुसंधानकर्ताओं ने पांच साल की उम्र तक 15,000 बच्चों पर अध्ययन कर यह पाया कि जो बच्चे नौ माह की आयु में घुटनों के बल रेंग नहीं पाते, उनके स्कूल में पिछड़ने का खतरा अधिक होता है और उन्हें अपने सहपाठियों के साथ तालमेल बिठाने में भी परेशानी होती है।इस अध्ययन के प्रमुख प्रोफेसर इनग्रिड स्कून ने कहा कि सभी बच्चों की विकास दर अलग-अलग होती है। जिन बच्चों को बैठने या घुटनों के बल चलने में परेशानी होती है, वे बाद में सामान्य हो जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह समस्याएं विकास संबंधी देरी की वजह से होती हैं जिसके लिए विशिष्ट मदद की जरूरत होती है।
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