शनिवार, 2 नवंबर 2013

बच्चों के साथ समय गुजारना जरूरी

आज के आधुनिक जीवन में हर कोई यंत्रवत जीवन जी रहा है। अधिकांश पति-पत्नी नौकरीपेशा होते हैं और ऐसे में सफर करना पड़ता है बच्चों को। यूं तो बच्चों की स्कूली दिनचर्या और ट्यूशन व अन्य एक्टिविटी भी पूरे दिनभर ही चलती है लेकिन पैरेन्ट्स के नौकरीपेशा होने का असर उनके जीवन पर देखने को मिलता है। इस स्थिति में पहले तो बच्चों को पैरेन्ट्स की कंपनी नहीं मिलती, इसलिए वे अपनी बातों को प्रॉपर तरीके से शेयर ही नहीं कर पाते हैं और दूसरे वे अपनी ही दुनिया में रहने लगते हैं, अकेला महसूस करते हैं और गुमसुम रहने लगते हैं।
हाल ही में एसोचेम लेडिज लीग (एएलएल) द्वारा किए एक अध्ययन में बच्चों और किशोरों  के अलावा कुछ वयस्कों को भी शामिल किया। इनकी उम्र 8 से 24 साल के मध्य थी। इसमें पाया गया कि कम से कम 65 प्रश बच्चे अपने पैरेन्ट्स के साथ पूरे दिन में मुश्किल से एक घंटे से भी कम समय गुजार पाते हैं। यही वजह है कि इस तरह की स्थितियां बच्चों को उदासीन (अलूफ), अंतर्मुखी (इंट्रोवर्ट), इम्पेशेंस (अधीर) और इन्टॉलरेंट (असहिष्णु) बना देती हैं। एएलएल की डायरेक्टर उर्वशी भुटालिया का कहना है कि पैरेन्ट्स के साथ कम समय बिताने, कम्युनिकेशन की समस्या और अपनी बात खुलकर न कह पाने का असर बच्चों और किशोरों के व्यवहार में आसानी से दिखाई देता है। अकेले रहने के आदी बच्चों को घर आए किन्हीं भी लोगों से मेलजोल अच्छा नहीं लगता और वे किसी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।
भावनात्मक लगाव जरूरी
अध्ययन के तहत कहा गया है कि भले ही नौकरीपेशा लोगों को यह बात तथ्यहीन लगे क्योंकि वे इसके पीछे अर्निंग प्रॉब्लम्स को जोड़कर देखेंगे। मगर उनके लिए यह जानना जरूरी है कि सबसे पहले बच्चे ही हमारे जीवन की जमा-पूंजी होते हैं। उनके लिए हम कमा रहे हैं लेकिन उनकी रक्षा, उनके व्यवहार को संयमित रखना, उन्हें संस्कार सिखाना यह सब पैरेन्ट्स के ही हिस्से में आता है। ऐसा न हो कि जीवन की आपाधापी के बीच बच्चों का व्यवहार असंयमित हो जाए, इसलिए जरूरी है कि बच्चों के साथ पैरेन्ट्स समय गुजारें। छुट्टियों में उन्हें पूरा समय दें, उनके साथ खेलें, उनकी बातें समझें और पूरे सप्ताह की ऐसी योजना बनाएं, जिस पर बच्चे आपसे हमेशा चर्चा करते रहें और आपके और उनके बीच की दूरी कम हो।  

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