मंगलवार, 5 नवंबर 2013

रहिए स्मार्ट बच्चों के साथ, बनिए स्मार्ट

क्या स्कूलों में अच्छे मार्क्स लाना संक्रामक है! एक नए अध्ययन से से तो यही पता चलता है। जो स्टुडेंट्स स्कूलों में उन फ्रेंड्स से घिरे होते हैं, जो अच्छे मार्क्स लाते हैं तो उनके भी अच्छे मार्क्स
आने की संभावनाएं
कहीं ज्यादा
होती हैं।
अध्ययन में खुलासा 
बिंघमटन स्थित स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क के हिरोको सयामा, जो इस अध्ययन के सह-लेखक हैं, का कहना है कि आज आपके फ्रेंड्स जितने स्मार्ट हैं और आप नहीं हैं लेकिन पूरी संभावनाएं हैं कि कल आप भी उनकी तरह स्मार्ट हो जाएं। सयामा ने एंडवेल में मैंने-एंडवेल हाई स्कूल के हाई स्कूल स्टुडेंट्स के साथ प्रोग्राम नेटसाइ में अपनी रिसर्च लैब के साथ हिस्सा लिया। इस प्रोग्राम में स्टुडेंट्स ये आइडिया लेकर आए कि उनके ग्रेड्स या मार्क्स पर सोशल नेटवर्क का कितना असर होता है।
अध्ययन में यह था
अध्ययन में परखा गया कि क्या एकेडेमिक एचीवमेंट्स अपने मित्र समूह के परफार्मेंस से प्रभावित होते हैं? अध्ययन में छात्रों से सर्वे में पूछा गया कि वे अपने बेस्ट फ्रेंड्स, क्लोज फ्रेंड्स, परिचितों और रिश्तेदारों के बारे में बताएं।  इसके बाद जूनियर से सीनियर वर्ष की तक हर छात्र की क्लास रैंक की सूची मांगी गई। यह पाया गया कि जिन स्टुडेंट्स के फ्रेंड्स की क्लास रैंक अच्छी थी, उनकी खुद की क्लास रैंक भी जूनियर से सीनियर वर्ष की बेहतर पाई गई।
इतना बड़ा अंतर!
लाइवसाइंस के अनुसार असर जबर्दस्त था। जिन स्टुडेंट्स की क्लास में 100वीं रैंक थी और जिसके फ्रेंड्स की औसत क्लास रैंक 50 थी, उनकी खुद की रैक् में 10 से 15 रैंक का उछाल देखा गया। लेकिन जिन स्टुडेंट्स के फ्रेंड्स की औसत रैंक कमजोर थी, उनकी खुद की रैंक में कोई सुधार नजर नहीं आया।
दबाव काम आता है!
सयामा का कहना है कि क्लास में टॉप रहने वाले स्टुडेंट्स कभी भी अपनी ग्रेड्स को नीचे नहीं आने देते, भले ही उनके फ्रेंड्स की रैंक्स लोअर हो। उन्होंने यह भी पाया कि मित्र समूह स्टुडेंट की स्टडी हैबिट जैसे बिहेवियर को सब्कान्शसली प्रभावित करते हैं लेकिन इन सबके ऊपर मित्र समूह का दबाव भी बड़ी भूमिका निभाता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी स्टुडेंट का  दोस्त एक्जाम में बाजी मार रहा है तो वह भी कहीं न कहीं सोचना शुरू कर देगा कि उसे भी उसके फ्रेंड्स के साथ
तालमेल बैठाने के लिए हार्ड वर्क करना होगा।  

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