अधिकांश बच्चों में दूध से परहेज की आदत देखी जा सकती है। दूध सामने आते ही नाक-मुंह बनाकर आनाकानी करना और फिर मां की डांट-डपट से दूध पीना अमूमन हर बच्चे का यही काम रहता है। मगर बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए दूध को एक पोषक आहार के रूप में माना जाता है। एक नए अध्ययन में तो इस बात का दावा किया गया है कि न सिर्फ बच्चों को बल्कि कॉलेज जाने वाले जो युवा रोजाना तीन बार दूध नहीं पीते हैं उनमें दूध पीने वालों की तुलना में मेटाबोलिक सिंड्रोम का खतरा तीन गुना ज्यादा होता है। इलिनोइस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मेक्सिको कॉलेज के तकरीबन 339 छात्रों पर यह अध्ययन किया। इनसे फूड फ्रिक्वेंसी की प्रश्नावली भरवाई गई, जिसके आधार पर मेटाबोलिक सिंड्रोम रिस्क फैक्टर्स का पता लगाया गया।
क्या पाया शोध में
शोधकर्ता मार्गरिटा टेरान-गार्शिया ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि चार युवाओं में से मात्र एक ही रोज दूध की उचित मात्रा का सेवन करता है। यह निष्कर्ष एक चेतावनी है, जिसमें 18 से 25 वर्ष के तकरीबन तीन चौथाई कॉलेज स्टूडेंट मेटाबोलिक सिंड्रोम के खतरे के नजदीक खड़े हुए हैं। मेटाबोलिक सिंड्रोम तब उत्पन्ना होता है जब एक ही व्यक्ति में तीन रिस्क फैक्टर्स एब्डॉमिनल ओबेसिटी, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर ज्यादा पाए जाते हैं। इसके अलावा अनहेल्दी कोलेस्ट्रॉल और लिपिड लेवल का बढ़ना भी मेटाबोलिक सिंड्रोम का जोखिम भरा कारक है। इन डिस्आर्डर्स के चलने व्यक्ति में धीरे-धीरे बढ़ने से हार्ट डिसीज और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों का मानना है कि डेयरी प्रोडक्ट्स ओबेसिटी के खिलाफ सुरक्षा का कार्य करते हैं। साथ ही एक्स्ट्रा वेट समेत अन्य हेल्थ प्रॉब्लम्स से निजात दिलाते हैं। शोध के तहत मार्गरिटा ने बताया कि डेयरी प्रोडक्ट्स में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, प्रोटीन होता है। कुल मिलाकर इसे किसी भी व्यक्ति के हेल्दी वेट को बनाए रखने में मदद मिलती है।
दूध का सब्सिट्यूट नहीं
शोधकर्ताओं का कहना है कि दूध का कोई सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। आज के युवा दूध के बदले में सोडा और अन्य स्वीट ड्रिंक्स पीना पसंद करते हैं। मगर उन्हें नहीं मालूम के यह जाने-अनजाने शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी का भंडारण करते हैं। जो मोटापा बढ़ाने के साथ-साथ कई तरह की बीमारियों की उपज हो सकते हैं। कई चेतावनियों के बावजूद आज का एक चौथाई युवा वर्ग डेयरी प्रोडक्ट्स की जगह दूसरे पेय पदार्थों को तवज्जो देते हुए अपनी बॉडी में सरप्लस कैलोरी जमा कर रहे हंै।
क्या है मेटाबोलिक सिंड्रोम
मेटाबोलिक सिंड्रोम चिकित्सकीय विकारों का ऐसा मेल है, जिससे कार्डियोवास्कुलर डिसीज एवं डायबिटीज होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पूर्व में किए एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन से यह पता चला है कि चार में से एक व्यक्ति इससे पीड़ित होता है। यह रोग बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता जाता है। चिकित्सीय राय में मेटाबोलिक सिंड्रोम एक ही व्यक्ति में 5 में से 3 जोखिम कारक होने के आधार पर तय किया जाता है। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारक कमर की मोटाई है, जिसमें पेट के मध्य भाग पर ज्यादा मोटापा होता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम का पता लगाने के लिए अब चार में से दो जोखिम कारकों का होना ही जरूरी है- जिनमें हाई ब्लड प्रेशर, फास्टिंग बल्ड शुगर लेवल का ज्यादा होना, ट्राइग्लिसरॉइड्स का बढ़ना एवं एचडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल कम होना शामिल है। प्रत्येक जोखिम कारक अपने आप में कार्डियोवास्कुलर जोखिम को बढ़ाते हैं। लेकिन जब पांच में से तीन जोखिम कारक एक साथ होते हैं तो रोगी की कार्डियोवास्कुलर रोग से मृत्यु की संभावना ज्यादा रहती है। साथ ही मधुमेह होने का जोखिम भी ज्यादा रहता है।
क्या पाया शोध में
शोधकर्ता मार्गरिटा टेरान-गार्शिया ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि चार युवाओं में से मात्र एक ही रोज दूध की उचित मात्रा का सेवन करता है। यह निष्कर्ष एक चेतावनी है, जिसमें 18 से 25 वर्ष के तकरीबन तीन चौथाई कॉलेज स्टूडेंट मेटाबोलिक सिंड्रोम के खतरे के नजदीक खड़े हुए हैं। मेटाबोलिक सिंड्रोम तब उत्पन्ना होता है जब एक ही व्यक्ति में तीन रिस्क फैक्टर्स एब्डॉमिनल ओबेसिटी, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर ज्यादा पाए जाते हैं। इसके अलावा अनहेल्दी कोलेस्ट्रॉल और लिपिड लेवल का बढ़ना भी मेटाबोलिक सिंड्रोम का जोखिम भरा कारक है। इन डिस्आर्डर्स के चलने व्यक्ति में धीरे-धीरे बढ़ने से हार्ट डिसीज और टाइप 2 डायबिटीज का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों का मानना है कि डेयरी प्रोडक्ट्स ओबेसिटी के खिलाफ सुरक्षा का कार्य करते हैं। साथ ही एक्स्ट्रा वेट समेत अन्य हेल्थ प्रॉब्लम्स से निजात दिलाते हैं। शोध के तहत मार्गरिटा ने बताया कि डेयरी प्रोडक्ट्स में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम, प्रोटीन होता है। कुल मिलाकर इसे किसी भी व्यक्ति के हेल्दी वेट को बनाए रखने में मदद मिलती है।
दूध का सब्सिट्यूट नहीं
शोधकर्ताओं का कहना है कि दूध का कोई सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। आज के युवा दूध के बदले में सोडा और अन्य स्वीट ड्रिंक्स पीना पसंद करते हैं। मगर उन्हें नहीं मालूम के यह जाने-अनजाने शरीर में एक्स्ट्रा कैलोरी का भंडारण करते हैं। जो मोटापा बढ़ाने के साथ-साथ कई तरह की बीमारियों की उपज हो सकते हैं। कई चेतावनियों के बावजूद आज का एक चौथाई युवा वर्ग डेयरी प्रोडक्ट्स की जगह दूसरे पेय पदार्थों को तवज्जो देते हुए अपनी बॉडी में सरप्लस कैलोरी जमा कर रहे हंै।
क्या है मेटाबोलिक सिंड्रोम
मेटाबोलिक सिंड्रोम चिकित्सकीय विकारों का ऐसा मेल है, जिससे कार्डियोवास्कुलर डिसीज एवं डायबिटीज होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पूर्व में किए एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन से यह पता चला है कि चार में से एक व्यक्ति इससे पीड़ित होता है। यह रोग बढ़ती उम्र के साथ बढ़ता जाता है। चिकित्सीय राय में मेटाबोलिक सिंड्रोम एक ही व्यक्ति में 5 में से 3 जोखिम कारक होने के आधार पर तय किया जाता है। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारक कमर की मोटाई है, जिसमें पेट के मध्य भाग पर ज्यादा मोटापा होता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम का पता लगाने के लिए अब चार में से दो जोखिम कारकों का होना ही जरूरी है- जिनमें हाई ब्लड प्रेशर, फास्टिंग बल्ड शुगर लेवल का ज्यादा होना, ट्राइग्लिसरॉइड्स का बढ़ना एवं एचडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल कम होना शामिल है। प्रत्येक जोखिम कारक अपने आप में कार्डियोवास्कुलर जोखिम को बढ़ाते हैं। लेकिन जब पांच में से तीन जोखिम कारक एक साथ होते हैं तो रोगी की कार्डियोवास्कुलर रोग से मृत्यु की संभावना ज्यादा रहती है। साथ ही मधुमेह होने का जोखिम भी ज्यादा रहता है।

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