मंगलवार, 7 मई 2013

संजू बाबा: मेरी खुशी की घड़ी के साथी (व्यंग्य)


धर्मेंद्रसिंह राजावत
कोर्ट से सजा मुकर्रर होने के कुछ दिन बाद संजू बाबा घर पर अपनी पत्नी के साथ किसी बात को लेकर ठहाके लगा रहे थे। यकायक उन्होंने पत्नी से सवाल किया।
'क्यों? अपनों की पहचान कब होती है?
काफी सोचने के बाद पत्नी से जवाब दिया। 'दुख की घड़ी में।"
'गलत, बिल्कुल गलत।" संजू बाबा ने अपने ही अंदाज में कहा।
'तो फिर आप ही बताइए। कैसे होती ही अपनों की पहचान?" पत्नी ने उत्सुकता वश सवाल किया।
'खुशी की बहार जब आती है, तब।" बाबा ने हंसते हुए कहा।
'ऐसा भी होता है क्या?" पत्नी ने आश्चर्य जताते हुए फिर सवाल किया।
' हां, ऐसा ही होता है। खुशी के मौके पर ही पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया। कौन आपका भला सोचता है और कौन आपकी इज्जत, शांति और स्वाभिमान से नफरत करता है। मन, मैंने कभी आपसे नहीं कहा, मगर मैं पिछले कई सालों से पल-पल मर-मर के जी रहा था। मेरे जीवन में उस वक्त खुशी की बहार आई, जब कोर्ट ने फैसला सुनाया। इससे पहले सुबह उठने से लेकर रात बिस्तर पर जाने तक चिंता में डूबा रहता था। इतना ही नहीं चाहे शूटिंग कर रहा होता या फिर कोई पार्टी, मगर हमेशा दिमाग में यही चलता रहता था कि न जाने कब और क्या फैसला आएगा। क्या जीवन भर जेल में सड़ना पड़ेगा या फिर जान से जाऊंगा। आखिरकार वह घड़ी आ गई, जिसका इंतजार था। इतना ही नहीं वह खुशी का पैगाम भी लेकर आई। न जेल में जिंदगी गुजारनी पड़ेगी और न जान से जाऊंगा। अब तो खुशी का काउंटटाउन शुरू हो गया है। महज साढ़े तीन साल की बात है फिर इज्जत और ऐश की जिंदगी। लेकिन, मेरी यह खुशी कई लोगों को अच्छी नहीं लगी। फैसला आते ही कर दिया बवाल शुरू। मेरे चाहने वालों के अलावा केवल चार लोग ही मुझे ऐसे दिखे, जिनको मेरी फिक्र थी। जब लोग हमदर्दी दिखाने का ड्रामा कर रहे थे, तब हमारे प्रशंसक चुप बैठे थे। मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंसू बहाए, जिससे सभी को पता चले कि मेरे दिल में भी दर्द है, मगर सजा माफी की याचिका दायर नहीं करने की बात कहकर अपने स्वाभिमानी होने का सबूत भी पेश कर दिया। मेरे प्रशंसकों को मेरे मन के बजाय मेरे दिल की बात सुनाई पड़ी। उनको एहसास हो गया कि जेल जाने में ही मुझे सच्ची खुशी मिलेगी और फिर मेरी सजा के खिलाफ एक ने भी आवाज बुलंद नहीं की। न कहीं कोई धरना न कहीं कोई प्रदर्शन। ऐसे होते हैं चाहने वाले। अब आप ही बताइए? लोगों की पहचान सुख में होती है या दु:ख में?"
 पत्नी कुछ जवाब देती उससे पहले ही बाबा ने दूसरा सवाल दाग दिया।
'अच्छा छोड़िए, आप तो यह बताइए कि वह चार लोग कौन हैं, जो खुशी के वक्त भी मेरे साथ खड़े रहे?"
दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद पत्नी बोली- ' अरे। उनका नाम याद नहीं आ रहा। हर किसी की काट करने वाले जू हैं न। क्या नाम है उनका?"
'हां, सही कह रही हो, मगर उनको किसी और से ज्यादा खुद की चिंता रहती है। इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने ही सबसे पहले मेरी सजा को लेकर बखेड़ा खड़ा किया। शायद किसी तरह जुगाड़ करके साढ़े तीन साल की सजा भी मैं खत्म करवा लेता, मगर उन्होंने हंगामा करके सारे रास्ते बंद कर दिए। अच्छा किया नहीं तो मुझे हमेशा इस बात का मलाल रहता। लेकिन, उन्होंने यह सब अकेले मेरे लिए नहीं किया, क्योंकि मुझे लगता है कि वह किसी भी मुद्दे में तभी जबर्दस्ती घुसते हैं, जब उनको पब्लिसिटी पाने का मौका दिखता है। शायद उनके लिए मैं पब्लिसिटी पाने का जरिया था। वह मेरे सगे नहीं। सगे तो कोई और हैं।"
'अच्छा। वह आपके सगे नहीं थे तो आप ही बताइए कि आपके कौन सगे हैं, जो खुशी में भी आपके साथ हैं?" पत्नी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सवाल किया।
'मेरे दो अनमोल रतन, एक हैं भाभी दूसरे हैं भैया।"
'भाभी और भैया? आपने तो कभी नहीं बताया कि आपका कोई भाई भी है।"
'अरे। माई डियर, इतनी टेंशन में क्यों आ गई। मैं जया भाभी और अमर भैया की बात कर रहा हूं। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह ऐसी खुशी में भी मेरा साथ खड़े रहेंगे। दरअसल, जब मेरी सजा माफी की बात चली तो कई नेता मेरे समर्थन में आ गए। शायद वह अपनी पहुंच का उपयोग करके मेरे लिए माफी का रास्ता भी बना लेते, मगर राजनीति का वनवास काट रहे भैया और भाभी ने मेरा खुलकर समर्थन करके सभी नेताओं को दूर कर दिया। शायद मैं बहक जाता और सजा माफी के चक्कर में पड़ जाता, पर उन्होंने इसकी कोई गुंजाइश नहीं रखी। इसे कहते हैं अपनापन। अगर मेरी सजा माफ हो जाती तो न मेरी इज्जत रहती न स्वाभिमान। और हां, भैया-भाभी के अलावा बॉलीवुड से दो लोग और मेरे अपने निकले। एक नाना दूसरा किंगों का भी किंग, सबसे बड़ा किंग....खान। जब समूची फिल्म इंडस्ट्री मुझे सजा सुनाए जाने पर दु:ख जता रही थी तब खान ने ही मेरी सजा को बरकरार रहने के लिए ट्यूटर पर अकेले ही मोर्चा खोलकर मेरा हैसला बनाए रखा। वह अपने ट्यूट में लिखता-'संजू ने तो असल जीवन में ही नहीं फिल्मों में भी स्वीकार किया है, 'नायक नहीं, खलनायक हूं मैं।" दूसरा, नाना ने दिल्ली में अवॉर्ड लेने के बाद टीवी चैनल पर सिर्फ-और-सिर्फ मेरी ही बात की। इतना ही नहीं जोर देकर कहा कि जिसने गलती की है, उसको सजा भुगतनी चाहिए। आज मुझे एहसास हो रहा है कि अपनी सजा को लेकर हर दिन जितना मैं परेशान रहता था,
उतने ही ये चारों रहे होंगे। तभी तो मेरा इतना साथ दे रहे हैं। इन चारों के चरित्र देखकर मेरी खुशी और बढ़ गई। चारों का अपनापन मुझे साढ़े तीन साल सजा काटने में काफी मदद करेगा। हर रोज इनको याद करूंगा और कब समय गुजर जाएगा पता भी नहीं चलेगा।"

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