सोमवार, 6 मई 2013

मामा की मीडिया ने बचाई इज्जत (व्यंग्य)

धर्मेंद्रसिंह राजावत
रेल घूसकांड को अंजाम देने वाले भांजे की करतूत से मामा खासे खफा हैं। उनको इस बात का बेहद अफसोस है कि रेलवे में भांजे ने इतनी कम कीमत में उनकी इज्जत नीलाम कर दी। जब दिल्ली में बैठा घटिया से घटिया नेता अरबों ने नीचे डील नहीं करता है तब भांजे ने महज कुछ लाख में सौदा फाइनल कर मामा की इज्जत का बट्टा लगा दिया।
हालांकि, सरकार ने इस्तीफा नहीं देने की बात कहकर मामा को कुछ राहत जरूर दी है, मगर उनको अब भी तीन बातों की सबसे ज्यादा चिंता सता रही है। पहला, मैडम को कैसे मुंह दिखाएंगे। उनका सामना करना अब आसान नहीं है। दरअसल, जब वह सवाल करेंगी कि किससे पूछकर तुमने रेट गिराए तो उनके पास कोई जवाब नहीं होगा। कैसे कहेंगे कि मैडम हमने नहीं हमारे नालायक भांजे ने रेट बिगाड़ दिया। 'चंद रुपयों में तुम क्या अपने पास रखते और क्या मुझे देते? इस सवाल का मामा के पास कई जवाब नहीं होगा। कमाऊ पूत (मंत्री) के मामले में मामा की रेटिंग गिरने का भविष्य में उनको न जाने क्या खामियाजा भुगतना पड़ेगा, सो अलग। दरअसल, पूरे  12 साल इंतजार करने के बाद यह मंत्रालय पार्टी को मिला था, वह भी न जाने किस-किस की मेहरबानी से।
दूसरी चिंता की बात यह है कि लेन-देन बिरादरी के नेताओं को कैसे समझाएंगे। किस-किस को सफाई देंगे। जब वह कहेंगे कि तुमने मेरा स्तर गिरा दिया तो वह उनको क्या जवाब देंगे। कैसे कह पाएंगे कि मेरा स्तर तो आज भी उतना ही ऊंचा है, जितना 'राजा" का, मगर क्या करें भांजे ने मेरी बाट लगा दी। लेन-देन एसोसिएशन का नियम है कि उसका कानून तोड़ने वाले से लेन-देने के सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं। यदि एसोसिएशन के नेता उनके खिलाफ चले गए तो मुसीबत हो जाएगी। एक बार अधिकार छिन गए तो सारा राजनीतिक जीवन बेकार।
तीसरी सबसे बड़ी चिंता बयानवीर हैं। न जाने क्या बयान दे दें। विकलांगों के घोटाले में उन्होंने यह दावा कर नई मुसीबत खड़ी कर दी थी कि हमारे किसी भी नेता की कीमत इतनी कम नहीं है कि वह लाखों में बिकता फिरे। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया को रुपयों का आंकड़ा जांचने की भी नसीहत दे डाली थी। जब मीडिया को उनकी बात समझ नहीं आई तो उन्होंने साफ कहा कि बात कुछ लाख रुपए की है, तो मैं दावे से कह सकता हूं कि यह सौदा हमारे मित्र ने नहीं किया है। और हां, यदि यह बात करोड़ों की होती तो मैं कह सकता था कि शायद उन्होंने किसी पर मेहरबानी कर दी हो। भांजे ने जो सौदा किया है वह भी इतनी कम कीमत का है कि बयानवीर को यह बात हजम नहीं होगी। वह निश्चित ही कोई-न-कोई बयान देंगे। पक्ष में दिया तो अच्छा नहीं तो फिर नई मुसीबत। हालांकि, पिछले दिनों यूपी में बखेड़ा खड़ा करने के बाद उनके मुंह पर लगाया गया टेप अभी काम कर रहा है, मगर उनके पिछले अनुभवों को देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता है।
पूरे मामले से चिंतित मामा को एक शंका भी सता रही है। उनको लगता है कि भांजे ने कहीं अपने आप को लाइम लाइट में लाने के लिए तो उनका कॅरिअर दांव
पर नहीं लगा दिया। दरअसल, मामा सालों से राजनीति में हैं और जब भी पंजाब जाते तो अखबार से लेकर टीवी की सुर्खियों में रहते, मगर भांजे को कौन जानता। अब एक ही झटके में पूरा देश ही नहीं दुनिया भी उसको जान गई। मीडिया ने इतनी पब्लिसिटी दे दी है कि अब टिकट के साथ ही उसकी जीत भी पक्की है। कहीं विरोधी ने टिकट दे दिया तो 2014 में मुकाबला खुद से भी हो सकता है। हालांकि, इस पूरे मामले में मामा खुश हैं तो सिर्फ मीडिया से। दरअसल, एक मीडिया ही है, जिसने उनकी इज्जत बचा ली। एक दिन बाद ही सही, मगर कुछ लाख की बात को 12 करोड़ तक तो पहुंचा दिया। फिर भले दस करोड़ किसी के बताए और दो करोड़ किसी के। अब कम-से-कम सुनने में तो अच्छा लगता है। कुछ लाख नहीं पूरे बाहर करोड़ डकारे हैं।

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