धर्मेंद्र सिंह राजावत
मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके झाबुआ में रहने वाले कालूराम को क्षेत्र के लोग सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी मानते थे। किसी को कोई भी सलाह लेनी होती थी, तो वह कालूराम के पास ही आता था। इसके चलते उसकी इलाके में अच्छी साख थी। सभी लोग उसका सम्मान करते थे। इतना सब होने के बाद भी कालूराम के मन में मलाल था। क्षेत्र में पढ़ाई-लिखाई की कोई व्यवस्था नहीं थी, इस कारण इलाके के ज्यादातर लोग अनपढ़ थे। कालूराम भी पढ़ा-लिखा नहीं था। उसने जो भी सीखा अपने अनुभव से सीखा। उसको इसी बात का अफसोस था कि काश वह पढ़ा-लिखा होता तो उसकी जिंदगी और बेहतर होती। दरअसल, किसी ने उससे कहा था कि 'एक बेहतर जिंदगी का रास्ता किताबों से होकर गुजरता है"। इसी के चलते उसने तय किया कि वह अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर एक ऐसी जिंदगी देगा, जिसे वह खुद नहीं जी सका। हालांकि, वह समाज में होने वाले अपराध के साथ ही लोगों के नैतिक पतन से भी वाकिफ था, इसलिए उसने तय किया वह बेटे को समाज के असली चेहरे से दूर रखेगा।
कालूराम के चाचा का लड़का नेकराम नौकरी की तलाश में काफी पहले शहर में जा बसा था। कालूराम अपने बड़े बेटे घंसू को लेकर उसके पास पहुंचा। बेटे को पढ़ाने की अपने मन की बात नेकराम को बताते हुए उसने यह भी निवेदन किया कि घंसू को शहरी जिंदगी की हवा नहीं लगनी चाहिए। कालूराम के कहे मुताबिक नेकराम ने घंसू की पढ़ाई की व्यवस्था करवा दी। घंसू कुछ घंटे पढ़ाई करने के बाद सारा समय घर पर ही रहता। मानो उसकी दुनिया किताबों तक ही सीमित हो गई हो। आलम यह हो गया कि अब वह जो भी काम करता उसके बारे में या तो उसने पहले से ही किताब में पढ़ लिया होता था या फिर किताब को देखकर करता।
कुछ साल पढ़ाई- लिखाई करने के बाद वह गांव पहुंचा तो कालूराम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दरअसल, उसको अब यकीन हो गया था कि उसके बेटे की जिंदगी सबसे बेहतर होगी। घंसू को आए अभी कुछ ही दिन गुजरे थे कि कालूराम के खेत में खड़ी फसल को जानवरों ने चट कर लिया। मामले की पड़ताल करने पर पता चला कि घंसू ने ही जानवरों को खड़ी फसल के बीच ले जाकर छोड़ दिया था। यह जानकर कालूराम को काफी आश्चर्य हुआ। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि घंसू ऐसा कर सकता है।
'क्यों घंसू, तुमने जानवरों को फसल के बीच ले जाकर क्यों छोड़ा?, कालूराम ने गुस्से में उससे सवाल किया
'जानवर खूंटे से बंधे भूख से तड़प रहे थे। किताब में लिखा है कि जानवरों पर अत्याचार नहीं करना चाहिए। उन पर तो दया करनी चाहिए। इसीलिए मैंने उनको खोल दिया। मुझे क्या पता था कि वह सीधे खेत में ही जाएंगे।" घंसू ने बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया।
घंसू का जवाब सुन कालूराम चुप रह गया। सोचा कि बच्चे ने किताब से सीख तो अच्छी ही ली थी, मगर उसको इस बात का भान नहीं था कि जानवर उसकी ही फसल चटकर जाएंगे। अभी इस वाक्ये को हुए कुछ ही दिन बीते थे कि कालूराम के घर चोर घुस आए। वारदात को अंजाम देते वक्त चोरों ने घर के सदस्यों से रुपए-जेवरात की जानकारी मांगी। सभी लोगों ने कोई-न-कोई बहाना बना दिया, मगर घंसू को जो भी जानकारी थी, उसने सच-सच बता दिया। इसके बाद चोरों ने आराम से अपने काम को अंजाम दिया और चलते बने। चोर अभी कुछ दूर निकले ही थे कि कालूराम ने शोर मचाने के बजाय घंसू को पीटना शुरू कर दिया। घंसू के रोने की आवाज सुनकर आस-पड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए।'क्यों कालू! क्या बात हो गई। इतनी रात गए बेटे को क्यों पीट रहा है?" पड़ोसियों ने सवाल किया
कालूराम ने घर में चोरी की बात बताते हुए घंसू के द्वारा बोले गए सच के बारे में भी सभी को जानकारी दी। इतना सुनते ही सभी ने एक स्वर में घंसू से सवाल किय
'क्यों घंसू! तूने सच-सच क्यों बता दिया?"
'किताब में मैंने पढ़ा था कि कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। झूठ बोलना पाप होता है। इसीलिए।" घंसू ने जवाब दिया
घंसू का जवाब सुनकर सभी चुप रह गए। इसके बाद एक-एक कर सभी अपने घर को चले गए। कुछ देर बाद जब कालूराम का गुस्सा शांत हुआ तो उसने अफसोस जताते हुए बेटे को दुलारा।
'सच बोलना अच्छी बात है, मगर कब बोलना है यह तो सोचता।" कालू ने घंसू से कहा।
चोरी की वारदात को करीब आठ माह बीत गए थे। कालू ने किसी तरह अपने घर की गिरस्ती को फिर से पटरी पर दौड़ाना शुरू कर दिया था। गुरुवार का दिन था। कालूराम घर पर ही आराम कर रहा था, कि उसे याद आया कि उसको पड़ोस के गांव से कुछ सामान मंगाना है। उसने घंसू से कहा कि वह जाए और सामान ले आए। चूंकि, दोनों गांव के बीच जंगल का रास्ता था और एक नदी भी पड़ती थी, इसलिए उसने अपने मामा के लड़के नत्था को भी साथ ले जाने के लिए कह दिया।
नत्था और घंसू दूसरे गांव से सामान लेकर वापस आ रहे थे कि तेज बारिश शुरू हो गई। काफी इंतजार के बाद भी जब बारिश नहीं थमी तो उन्होंने बरसात में ही घर वापस आने का निर्णय किया। बारिश की वजह से नदी उफान मार रही थी। एक तरफ मूसलधार बारिश तो दूसरी तरफ ऊंची-ऊंची लहरों के साथ दहाड़ मारती नदी उनको डरा रही थी। हालांकि, काफी सोचने के बाद दोनों
ने नदी पार करने का निश्चय किया। घंसू तो किसी तरह नदी पार कर गया, मगर नत्था तेज बहाव में डूबने लगा। वह बचाव-बचाव की आवाज लगाने लगा। घंसू डर गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करे। दिमाग पर जोर डाला और किताब की बात याद करने की कोशिश की। यकायक उसको कुछ याद आया तो वह खुशी से उछल पड़ा। इसके बाद उसने अपनी कमर से कटार निकाली और नदी में उतर गया। नत्था के पास पहुंचकर उसने उसके बाल पकड़े और सिर कलम कर लिया।
नत्था का सिर लेकर जब वह घर पहुंचा तो सभी देखकर दंग रह गए। कालूराम के पूछने पर उसने बरसात होने से लेकर नदी में बाढ़ आने तक की कहानी बता दी। इतने में अधीर हो कालू ने सवाल किया
'अरे, यह बता कि नत्था का सिर किसने और क्यों काटा?"
'मैंने, घंसू ने बड़े ही मासूमियत से जवाब दिया।
घंसू का जवाब सुन सभी सन्ना रह गए। ऐसा लगा मानों सभी के ऊपर बिजली गिर गई। सभी ने एक साथ सवाल किया।
'आखिर क्यों?"
घंसू, 'नत्था डूब रहा था इसलिए।"
'डूब रहा था तो उसको बचाना चाहिए था, मगर सिर क्यों काट लिया?" कालूराम ने गुस्साते हुए पूछा।
घंसू, ' किताब में लिखा था कि कोई वस्तु (सेव) यदि खराब हो रही हो तो उसका जो बचा हुआ सही हिस्सा है यदि उसे काट लिया जाए तो वह कुछ और दिनों तक अच्छा रह सकता है। नत्था का पूरा शरीर डूब गया था, केवल सिर ही सुरक्षित था, जिसे बचाया जा सकता था। इसलिए मैंने उसे काटकर बचा लिया।"
घंसू की इतनी बात सुन कालूराम पछाड़मार कर गिर गया और बेहोश हो गया। जब होश में आया तो वह अपनी किस्मत के साथ ही अपने निर्णय पर अफसोस करने लगा। उसने उस व्यक्ति को भी कोसा, जो कह रहा था कि 'बेहतर जिंदगी का रास्ता किताबों से होकर जाता है"। वह जिंदगी भर अपने अनपढ़ होने पर अफसोस करता रहा था, मगर आज सोच रहा था कि यदि किताबों से होकर जिंदगी का ऐसा रास्ता जाता है तो मैं अनपढ़ ही सही।
जब इस घटना की जानकारी नेकराम को मिली तो वह भी शहर से गांव पहुंचा। शाम को खाना खाने के बाद कालूराम और नेकराम बात कर रहे थे। इसी बीच नेकराम ने नत्था की मौत के लिए कालूराम को जिम्मेदार करार दिया। नेकराम की बात सुन कालूराम दंग रह गया।
'क्या कह रहा नेकराम?, आश्चर्य और गुस्से से कालूराम ने सवाल किया
नेकराम, 'सही कह रहा हूं। कत्ल भले ही घंसू ने किया हो, पर असली गुनेहगार तो आप हैं।"
कालू, 'मैं क्यों हूं?"
नेकराम, 'आपको किसी ने बता दिया कि किताबें पढ़ने से जिंदगी सुधर जाती है तो आपने घंसू को पढ़ाने के लिए शहर भेज दिया, मगर समाज के गिरते नैतिक मूल्यों को देखते हुए उसे उससे दूर कर दिया। यही आपकी गलती थी। दरअसल, अनपढ़ व्यक्ति कितना भी तजुर्बा हासिल कर ले, मगर वह पढ़ाई-लिखाई के बिना अधूरा होता है, ठीक इसी तरह कोई भी व्यक्ति कितना भी पढ़- लिख ले, मगर बिना सामाजिक सीख के उसका ज्ञान अधूरा होता है। आपने उसको केवल किताबी ज्ञान दिया।"
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