गुरुवार, 21 मार्च 2013

बनाएं शहीदों के सपनों का गणतंत्र

धर्मेंद्र सिंह राजावत

 कुर्बानियां देकर शहीदों ने हमे जो गणतंत्र दिया, उसे हमने
और हमारे समाज ने बदसूरत कर दिया। यह गणतंत्र वतन के लिए जान देने वालों
के सपनों का तो कतई नहीं रहा है। अपने आसपास होने वाली घटनाओं और
वारदातों को देखकर मुझे राजस्थान के अजमेर जिले के शतावरिया (बांदनवाड़ा)
गांव में जन्मे और इंदौर के ऋषिकुल ब्रह्मचर्य आश्रम मंे पढ़े स्वतंत्रता
सेनानी वैद्य ज्योति स्वरूप व्यास के बोल आज भी कानों में यकायक गूंज
उठते हैं।
कुछ बरस पहले ही उनसे भेंट हुई थी। गणतंत्र दिवस नजदीक था, इसलिए इस पर
ही चर्चा शुरू हो गई। उनका चेहरा गंभीर हो गया। फिर बहुत ही बोझिल और
करुणाभरी आवाज में बोले, 'जान पर खेलकर जिस गणतंत्र की कल्पना की थी मुझे
उसका पच्चीस फीसदी भी दिखाई नहीं पड़ रहा है। देश की आजादी के लिए हमने बम
फोड़े, इंदौर से महू छावनी सामग्री ले जाने वाली मालगाड़ी की फिश प्लेटें
उखाड़ उसे नदी मंे गिरा दिया। इसके लिए जेल भी गया। इस सब के पीछे सपना था
कि देश आजाद हो। यहां की हवा आजादी की हो और उसमें हम आजाद होकर सांस
लें। अलबत्ता, आज आजाद तो हैं, पर हवा में भ्रष्टाचार, घोटाले और
रिश्वतखोरी की बदबू आ रही है। पीड़ित परेशान होता रहता है, पर थानों में
उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। नेता वोट मांगने जरूर आता है, पर मसीबत में
वह किसी के लिए अपने घर के दरवाजे नहीं खोलता। कोई दलाल पकड़ा जाता है तो
मिनिस्टर उसकी थाने पहुंचने से पहले ही सिफारिश कर देता है। यह सब देखकर
बहुत दुख होता है।" कुछ देर रुककर वह फिर बोलते हैं, 'अगर सही गणतंत्र
देश में लाना है तो युवाओं और बच्चों को इसके बारे में गंभीरता से सोचना
होगा।"
व्यास जी के दिल की आवाज शायद अब युवाओं ने सुन ली है और इसका असर भी
दिखने लगा है। यही वजह है कि ज्यादातर अपनी ही धुन में रहने वाले युवा ने
अब गणतंत्र का स्वरूप विगाड़ने वाले के खिलाफ मोर्चा लेना शुरू कर दिया
है। अण्णा हजारे का आंदोलन और गैंग रेप की वारदात के बाद दिल्ली मंे
युवाओं का उग्र विरोध-प्रदर्शन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
--

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें