गुरुवार, 21 मार्च 2013

गणतंत्र दिवस: मनाने का ही नहीं बनाने का सोचो

धर्मेंद्र सिंह राजावत
गण (व्यक्ति) और तंत्र (व्यावस्था) से मिलकर बना 'गणतंत्र" शब्द वर्तमान
के परिपेक्ष में कितना सार्थक है इसको लेकर नई बहस छिड़ी हुई है। दरअसल,
पिछले दिनों दिल्ली में गैंग रेप की वारदात के बाद युवाओं का जो आक्रोश
दिखा, उससे साफ जाहिर है कि वह देश की व्यावस्था से संतुष्ट नहीं हैं।
यही वजह है कि वह न्याय और सुरक्षा की मांग को लेकर राष्ट्रपति भवन
रायसीना हिल पर सीना खोलकर पहुंच गए। हालांकि, उनको वहां से खदेड़ने के
लिए पुलिस ने पानी की बैछार के साथ ही आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठियां
भी भांजी, मगर बुलंद इरादे लेकर आए युवाओं के आगे वह बेबस हो गए। यहां यह
सवाल खड़ा होता है कि कुछ समय पहले तक ज्यादातर आंदोलनों (अण्णा के अनशन
को छोड़कर)से दूर रहा युवा (खास कर लड़कियां) इस बार आखिर इतना मुखर क्यों
हो गया? दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालने पर समझ में आता है कि अब युवा न केवल
जाग गया है बल्कि उसको यह समझ में भी आ गया है कि देश में गणतंत्र नहीं
गड़बड़तंत्र कायम है। तंत्र का उपयोग के बजाय दुरुपयोग हो रहा है। शायद इसी
कारण वह गैंग रेप की वारदात के बाद न्याय की गुहार लगाने किसी नेता या
प्रधानमंत्री के बजाय सीधा राष्ट्रपति भवन पहुंचा, मगर उसको वह नहीं
मिला जिसकी वह मांग करने वहां पहुंचा था। ऐसे में अब युवाओं को आज के दिन
(गणतंत्र दिवस) यह सोचना होगा कि यह समय गणतंत्र मनाने के साथ ही फिर से
इसके बनाने के बारे में विचार करने का है।
यदि विचार किया जाए तो समझ में आता है कि देश के 'तंत्र" में बहुत ज्यादा
खामी नहीं है। खामी है तो 'गण" में। गण (व्यक्ति) अपने उन दायित्वों का
निर्वाधन नहीं कर रहे हैं, जिसे उन्हें करना चाहिए। यही वजह है कि हमारा
गणतंत्र कमजोर पड़ गया है। अण्णा के जनलोकपाल बिल को ही ले लीजिए। कानून
की मांग को लेकर कई दिन लाखों लोग दिल्ली सहित देशभर की सड़कों पर आंदोलन
करते रहे, पर कुछ हासिल नहीं हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद
यादव ने यह कहकर उनकी चुटकी जरूर ली कि कानून आप नहीं हम बनाते हैं।
अलबत्ता, उन्होंने सही कहा। कानून सांसद ही बनाता है आम आदमी नहीं।
लेकिन, उनको यह याद नहीं रहा कि उनको जनता ही सांसद बनाती है, जो कि
आंदोलन कर रही है। दूसरा, जनता को भी अपने इस पॉवर (नेता चुनने का) का
भान नहीं है। जब कानून लालू बनाते हैं और लालू को जनता बनाती है तो फिर
कानून बनाने की बागडोर तो जनता के हाथ हुई न। बेहतर गणतंत्र कायम करने के
लिए जनता को इसका अहसास करना होगा और इसका उपयोग भी।
अब तंत्र की बात करते हैं। लोग खुद के बारे में सोचने के बजाय तंत्र को
कोसते हैं, मगर हकीकत तो यह है कि इसका ज्यादातर लोग सही उपयोग ही नहीं
करते हैं। मसलन, आम आदमी वोट का और अफसर सीट का। यहां मैं बात करना
चाहूंगा पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी टीएन सेशन की। जिस चुनाव आयोग के बारे
में ज्यादातर लोग जानते तक नहीं थे, उस विभाग ने टीएन सेशन ने पद संभालते
ही कई बड़े काम किए। यहां यह विचारणीय है कि सेशन ने आखिर नया क्या किया?
जवाब मिलेगा कि उन्होंने अधिकारों का उपयोग किया। मसलब साफ है कि तंत्र
तो वही था, पर पहले के अधिकारी उसका सही उपयोग नहीं कर रहे थे। अब जरूरत
है तंत्र का उपयोग कर अच्छे गणतंत्र को आकार देने की। इसके लिए किसी को
कुछ भी करने के बजाय खुद के अधिकारों और उत्तरदायित्यों को समझकर उनको
पूरा कनरे की जरूरत है। फिर न अण्णा को आंदोलन करना पड़ेगा और न युवाओं को
किसी की आबरू लुटने पर रायसीना हिल पर जाकर सुरक्षा की गुहार लगाने की
जरूरत पड़ेगी। हालांकि, जिस तरह दिल्ली गैंग रेप के बाद बिना किसी आह्वान
और बिना किसी के अगुवाई के युवाओं ने आंदोलन किया वह इस बात का संकेत है
कि जल्द ही हम उस गणतंत्र में जी रहे होंगे, जिसकी हमारे शहीदों ने
कल्पना की थी और जिसकी हम इच्छा रखते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें