
धर्मेंद्र सिंह राजावत
भाजपा और 'आप" ने किरण बेदी का सुझाव खारिज कर दिया। मुझे लगता है कि यह सही भी रहा। लेकिन, एक सबसे बड़ा सवाल, जोकि समूची दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता के दिमाग में गूंज रहा है, 'दोबारा चुनाव से किसका हित होगा?" 'आप" का, भाजपा का, कांग्रेस का या फिर आम जनता का?

देखा जाए तो भाजपा और 'आप" के स्टैंड सही लगते हैं। भाजपा जोड़-तोड़ की राजनीति नहीं कर आम चुनाव से पहले अपनी छवि को साफ-सुथरा पेश करने की कोशिश कर रही है तो 'आप" ने जो वादे किए हैं, उसे निभा रही है। लेकिन, ऐसे में जो हालात बन रहे हैं उससे कांग्रेस को हर स्थिति में फायदा होता दिख रहा है। किसी ने सरकार नहीं बनाई तो छह माह बाद अपनी गलती को सुधारने का उसको मौका मिलना तय है। दूसरी बात, आठ सीट जीतने वाली कांग्रेस के लिए छह माह बाद होने वाले चुनाव में खोने के लिए भी कुछ नहीं होगा। बुरी तरह हारी कांग्रेस निश्चित है कि अपनी सीट बढ़ाने की कोशिश करेगी। शायद इसमें कामयाब भी हो जाए। ऐसे में अगर किसी को नुकसान होगा तो भाजपा और 'आप" को। यहां गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा को यदि 34 प्रतिशत और 'आप" को 30 प्रतिशत के करीब वोट मिले हैं तो कांग्रेस को भी 24 प्रतिशत के लगभग। सीटें भले ही उम्मीद से ज्यादा कम हो गई हों, मगर वोट प्रतिशत में बहुत बड़ा अंतर नहीं है, ऐसे में यदि वह थोड़ा-सा भी वोट बैंक में सुधार कर लेती है तो यह भाजपा और 'आप" के लिए नुकसानदेह होगा। इसलिए भाजपा और 'आप" को एक बार ही सही, मगर इस दिशा में भी सोचना चाहिए।हमने बात शुरू की थी किरण बेदी से। दरअसल, मेरे दिमाग में एक विचार तभी से आ रहा है, जब से बेदी ने 'आप" और भाजपा के गठबंधन की मध्यस्थता का टि्वट किया है। आप लोगों को याद होगा कि चुनाव से पहले भाजपा और 'आप" दोनों ने किरण बेदी को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। दोनों पार्टियों की चाहत थी कि बेदी उनसे जुड़ें। साफ-सुथरी छवि और आम से लेकर खास लोगों में लोकप्रिय बेदी दोनों की पसंद थीं। मुझे लगता है कि अब यह मौका ऐसा आ गया है, जब दोनों पार्टियों को ये साबित करना चाहिए कि वह केवल चुनाव में बेदी का उपयोग करने भर के लिए ही नहीं बल्कि वास्तव में उनको पसंद करतीं हैं।
भाजपा, 'आप" को समर्थन नहीं देना चाहती। 'आप" भी किसी से न तो समर्थन लेना चाहती है और न ही देना। दोनों की मजबूरी के बारे में हम ऊपर जिक्र कर ही चुके हैं। अब सवाल उठता है कि क्या भाजपा और 'आप" दोनों किरण बेदी को समर्थन देना चाहेंगे? दरअसल, किरण बेदी दोनों की पसंद भी हैं और बेदी के मुताबिक दोनों पार्टियों के मुद्दे काफी हद तक एक हैं। यदि दोनों पार्टियों के सहयोग से किरण बेदी को मुख्यमंत्री चुन लिया जाता है तो 'आप" के जो मुद्दे हैं, निश्चित ही उन्हें वह आगे बढ़ाएंगी और भाजपा के मुद्दे भी काफी हद तक उनमें समाहित होंगे। जनलोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे द्वारा किए गए आंदोलन में किरण बेदी भी शामिल थीं। निश्चित है कि वे भी जनलोकपाल बिल चाहती हैं। ऐसे में उनके सीएम चुनने से 'आप" ने जो जनता से वादा किया है, वह निश्चित ही पूरा हो जाएगा।
दूसरा, बेदी को सीएम चुनने से 'आप" जनता के बीच जाकर कह सकती है कि उसने उससे वादाखिलाफी नहीं की है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि बेदी जनता की भी पसंद हैं। दोनों पार्टियों के इस रास्ते से जहां जनता एक चुनाव से बच जाएगी वहीं 'आप" और भाजपा को आम चुनाव की तैयारी का वक्त मिल जाएगा। दोनों की छवि को भी धक्का नहीं लगेगा और कांग्रेस को इस मौके का फायदा उठाने का चांस भी नहीं मिलेगा। हालांकि, यह हमारे दिल की बात है, बाकी फैसला तो भाजपा , 'आप" और आप सभी को ही करना है।
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