बुधवार, 24 अप्रैल 2013

फांसी पर झूल जाना चाहता हूं (मासूम से रेप करने वाले के पिता का दर्द)


धर्मेन्द्र सिंह राजावत

उस कम्बख्त पल को याद कर
हर पल को भूल जाना चाहता हूं
जो पल कभी न भूलना था हमें
उसे याद कर फांसी पर झूल जाना चाहता हूं।

जिस चिराग से कभी रोशन हुआ था घर
उस रोशनी से दूर जाना चाहता हूं
हवस के कलंक से झुका दिया है सिर
यह फिर उठे, उससे पहले फांसी पर झूल जाना चाहता हूं।

किसी को कोख में मार, मैंने जानवर जना
                                                     यह सोचकर अफसोस के दरिया में डूब जाना चाहता हूं
बेगुनाह को मार मैंने कितना बड़ा गुनाह किया
इसका अहसास कर फांसी पर झूल जाना चाहता हूं।

बेटों से कहीं अधिक बढ़कर होती हैं बेटियां
यह आपसे ही नहीं सभी से कहना चाहता हूं
मैंने जो अपराध किया वह आप न करें
                                                      यह देश सहित दुनिया को संदेश देना चाहता हूं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें