धर्मेंद्र सिंह राजावत
फर्रुखाबाद ग्रामीण बैंक में कुछ महीने पहले ही मैनेजर बनकर आए बबलू ठाकुर से उनके दफ्तर के बाबू राधेश्याम दुबे को बहुत चिड़ थी। दरअसल, मैनेजर साहब को जब भी किसी काम की जरूरत पड़ती तो वह दुबे जी को बुलाकर सौंप देते। दुबे जी अपनी जिम्मेदारी निभाते और मैनेजर साहब का काम भी निपटाते। दुबे जी और मैनेजर साहब ने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई साथ-साथ की थी। दुबे जी पढ़ाई में अव्वल थे। स्कूल टीचर हमेशा उनकी तारीफ करते थे, मगर परीक्षा में अच्छे नंबर हमेशा बबलू के आते थे। दुबे जी को इस वजह से उनसे पहले से ही नफरत थी। ऐसे में उनका ब्रांच का मैनेजर बनकर आना और फिर अपना सारा काम करवाना दुबे जी के लिए नासूर बन गया। जिसको ज्ञान है, वह बाबू और जिसको ज्ञान नहीं वह उस पर हुक्म चलाता है, यही बात दुबे जी को सबसे ज्यादा चुभती थी। दूसरा, आए दिन घूमने-फिरने का प्रोग्राम रहता था मैनेजर साहब का। यह बात भी दुबे जी को नागबार गुजरती थी। उनका मानना था कि एक जिम्मेदार व्यक्ति को अपने दायित्यों के प्रति गंभीर होना चाहिए। मैनेजर साहब कुछ रंगीन मिजाज भी थे। आए दिन पार्टियों में जाना उनका शौक था। महिला मित्रों की भी उनकी काफी लंबी लाइन थी। हमेशा से सादा जीवन पसंद करने वाले दुबे जी की नफरत को मैनेजर साहब की आदतों ने और बढ़ा दिया था।
एक-दो महीने गुजरने पर मैनेजर साहब ने महसूस किया कि दुबे जी का व्यवहार उनके प्रति सामान्य नहीं है। एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने दुबे जी से पूछ लिया।
'क्यों दुबे जी? मुझसे कोई गलती हो गई है क्या?"
'नहीं। कोई गलती नहीं हो गई साहब।" दुबे जी ने जवाब दिया।
'नहीं-नहीं। कोई बात तो जरूर है। आप कुछ खफा-खफा से रहते हो।" मैनेजर साहब बोले
काफी कुरेदने पर दुबे जी का दर्द जुबान पर आ गया।
' आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?" दुबे जी ने सवाल किया
'क्यों नहीं। एक नहीं दस सवाल पूछिए। मुझे क्यों-कोई एतराज होगा।" मैनेजर साहब ने दुबे जी को आश्वस्त किया।
दुबे जी कुछ झेंप गए। स्थिति को टालने के लिए इधर-उधर के एक-दो सवाल पूछ लिए।
' आप संकोच मत करिए दुबे जी। जब पूछ ही रहे हैं तो खुलकर पूछिए न।" मैनेजर साहब ने कुछ दबाव देते हुए कहा
दुबे जी ने कुछ संकोच के बाद सीधा सवाल नौकरी पर किया।
'स्कूल से लेकर कॉलेज के दिनों तक दिनभर लड़कियों के पीछे घूमने वाले लड़के के अच्छे नंबर कैसे आ जाते थे? और उसको नौकरी कैसे मिल गई? वह भी मैनेजर की।"
दुबे जी के सवाल से मैनेजर साहब कुछ पल के लिए तो हतप्रभ रह गए, मगर फिर मुस्कुरा कर जवाब दिया।
'दुबे जी। बुरा मत मानिएगा। जब आप जैसे लोग हैं तो फिर मुझे पढ़ाई की क्या जरूरत? और हां, पढ़ाई से अक्ल नहीं आ जाती है। यदि पढ़ाई से अक्ल आती तो हमारे नहीं तुम्हारे अच्छे नंबर आए होते और हम नहीं बल्कि तुम बैंक के मैनेजर होते। तुम्हें पता है, मैं पढ़ाई नहीं करता था, फिर भी अच्छे नंबर आते थे और आज मैनेजर भी हूं। और आप पढ़कर भी बाबू ही बन पाए। दूसरा, आप जीवन के कभी मजे न ले सके, वह अलग। अब आप ही बताइए कि अक्लमंद आप हैं या मैं। आप जैसे ही लोगों को पढ़ा-लिखा पागल कहा जाता है।"
मैनेजर साहब के जवाब ने दुबे जी हिलाकर रख दिया। अब दुबे जी के दिमाग में एक ही सवाल गूंजा कि आखिर यह सब हुआ कैसे। दुबे जी ने हिम्मत जुटा का दूसरा सवाल पूछा।
' आखिर आप पास कैसे हो जाते थे? दूसरा, आप बैंक में मैनेजर कैसे बन गए?"
मैनेजर, 'दुबे जी, आपको अपनी पढ़ाई पर भरोसा ही नहीं गुमान भी था, इसलिए आप तो परीक्षा देकर बेफिक्र हो जाते थे, मगर हमारे साथ ऐसा नहीं होता था। हम परीक्षा से पहले और बाद में इस पर काम करते थे। मैं मैथ, अंग्रेजी और साइंस में कमजोर था। इसलिए परीक्षा से पहले इनमें पास होने का इंतजाम कर लेता था।"
'कैसा इंतजाम?" दुबे जी ने सवाल किया
मैनेजर,'अंग्रेजी की परीक्षा में मैं अपनी सामर्थ के अनुसार कॉपी में रुपए रखता था। साइंस की कॉपी में मैं मोबाइल नंबर लिखता था। इतना ही नहीं जब मेरे मोबाइल पर कॉपी जांचने वाला टीचर फोन करता था तो उसके फोन रखने के साथ ही उसके मोबाइल को मैं कम से कम एक हजार रुपए से रीचार्ज करवाता था। रीचार्ज मैसेज ने हमेशा काम किया है। हां, मैथ के टीचर कुछ अक्खड़, पर उतने ही दरियादिल होते हैं, इसलिए उसकी कॉपी में मैं धमकी देता था। मैं फेल हो गया तो मुझे रोजगार नहीं मिलेगा। और जब रोजगार नहीं मिलेगा तो मैं मजबूर होकर आतंकबादी बन जाऊंगा। यह धमकी कभी खाली नहीं गई। फिर चाहे हाईस्कूल, इंटर की परीक्षा रही हो या फिर कॉलेज के किसी भी साल की। ऐसे में परीक्षा में पास भी हो जाता और दिनभर लड़कियों के साथ मस्ती भी करता था।
'मगर, नौकरी के लिए तो ज्ञान की जरूरत होती है? " दुबे जी ने फिर सवाल किया।
'ज्ञान की कहीं जरूरत नहीं होती है। जरूरत होती है अक्ल की। दुबे जी आप अब भी ज्ञान और अक्ल में
अंतर नहीं समझे। आप ने ज्ञान अर्जित किया है, पर अक्ल नहीं। अक्ल के लिए पढ़ाई की जरूरत नहीं। अक्ल अनपढ़ में भी होती है। यही वजह है कि इस मामले में मैं तुमसे थोड़ा ज्यादा हूं। दुबे जी आप को अपने ज्ञान पर भरोसा था, इसलिए आप पढ़ाई के बाद अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी तलाशने लगे और मौका मिलते ही बाबू बन गए, मगर मुझे पता था कि मैंने डिग्री कैसे ली है। इसलिए मैंने अक्ल चलाई और पिता जी का पुश्तैनी मकान बेचकर रुपए जुटाए। जैसे ही सेटिंग हुई पांच लाख रुपए देकर बैंक में मैनेजर बन गया। अब अधिकारी हूं और आप जैसे पढ़े-लिखे मेरे यहां बाबू हैं तो मुझे काम में भी कोई तकलीफ नहीं होती। और हां, बिना किसी टेंशन के सारे सुख भोगते हुए जिंदगी जी रहा हूं। और एक आप हैं, जिसे काम के बोझ से ही फुर्सत नहीं मिलती। अपना और हम जैसे लोगों का काम ही इतना होता है।"
मैनेजर साहब की बात सुनने के बाद दुबे जी घर गए और काफी सोच- विचार करते रहे। आखिर तय किया कि उन्होंने जो गलती की है, उनके बच्चे यह गलती कतई नहीं करेंगे। वह बाबू नहीं मैनेजर बनेंगे और जिंदगी के सारे सुख भी भोगेंगे। अब आप क्या सोच रहे हैं। अपनी अक्ल लगाओ, ज्ञान पर मत जाओ।
फर्रुखाबाद ग्रामीण बैंक में कुछ महीने पहले ही मैनेजर बनकर आए बबलू ठाकुर से उनके दफ्तर के बाबू राधेश्याम दुबे को बहुत चिड़ थी। दरअसल, मैनेजर साहब को जब भी किसी काम की जरूरत पड़ती तो वह दुबे जी को बुलाकर सौंप देते। दुबे जी अपनी जिम्मेदारी निभाते और मैनेजर साहब का काम भी निपटाते। दुबे जी और मैनेजर साहब ने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई साथ-साथ की थी। दुबे जी पढ़ाई में अव्वल थे। स्कूल टीचर हमेशा उनकी तारीफ करते थे, मगर परीक्षा में अच्छे नंबर हमेशा बबलू के आते थे। दुबे जी को इस वजह से उनसे पहले से ही नफरत थी। ऐसे में उनका ब्रांच का मैनेजर बनकर आना और फिर अपना सारा काम करवाना दुबे जी के लिए नासूर बन गया। जिसको ज्ञान है, वह बाबू और जिसको ज्ञान नहीं वह उस पर हुक्म चलाता है, यही बात दुबे जी को सबसे ज्यादा चुभती थी। दूसरा, आए दिन घूमने-फिरने का प्रोग्राम रहता था मैनेजर साहब का। यह बात भी दुबे जी को नागबार गुजरती थी। उनका मानना था कि एक जिम्मेदार व्यक्ति को अपने दायित्यों के प्रति गंभीर होना चाहिए। मैनेजर साहब कुछ रंगीन मिजाज भी थे। आए दिन पार्टियों में जाना उनका शौक था। महिला मित्रों की भी उनकी काफी लंबी लाइन थी। हमेशा से सादा जीवन पसंद करने वाले दुबे जी की नफरत को मैनेजर साहब की आदतों ने और बढ़ा दिया था।
एक-दो महीने गुजरने पर मैनेजर साहब ने महसूस किया कि दुबे जी का व्यवहार उनके प्रति सामान्य नहीं है। एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने दुबे जी से पूछ लिया।
'क्यों दुबे जी? मुझसे कोई गलती हो गई है क्या?"
'नहीं। कोई गलती नहीं हो गई साहब।" दुबे जी ने जवाब दिया।
'नहीं-नहीं। कोई बात तो जरूर है। आप कुछ खफा-खफा से रहते हो।" मैनेजर साहब बोलेकाफी कुरेदने पर दुबे जी का दर्द जुबान पर आ गया।
' आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?" दुबे जी ने सवाल किया
'क्यों नहीं। एक नहीं दस सवाल पूछिए। मुझे क्यों-कोई एतराज होगा।" मैनेजर साहब ने दुबे जी को आश्वस्त किया।
दुबे जी कुछ झेंप गए। स्थिति को टालने के लिए इधर-उधर के एक-दो सवाल पूछ लिए।
' आप संकोच मत करिए दुबे जी। जब पूछ ही रहे हैं तो खुलकर पूछिए न।" मैनेजर साहब ने कुछ दबाव देते हुए कहा
दुबे जी ने कुछ संकोच के बाद सीधा सवाल नौकरी पर किया।
'स्कूल से लेकर कॉलेज के दिनों तक दिनभर लड़कियों के पीछे घूमने वाले लड़के के अच्छे नंबर कैसे आ जाते थे? और उसको नौकरी कैसे मिल गई? वह भी मैनेजर की।"
दुबे जी के सवाल से मैनेजर साहब कुछ पल के लिए तो हतप्रभ रह गए, मगर फिर मुस्कुरा कर जवाब दिया।
'दुबे जी। बुरा मत मानिएगा। जब आप जैसे लोग हैं तो फिर मुझे पढ़ाई की क्या जरूरत? और हां, पढ़ाई से अक्ल नहीं आ जाती है। यदि पढ़ाई से अक्ल आती तो हमारे नहीं तुम्हारे अच्छे नंबर आए होते और हम नहीं बल्कि तुम बैंक के मैनेजर होते। तुम्हें पता है, मैं पढ़ाई नहीं करता था, फिर भी अच्छे नंबर आते थे और आज मैनेजर भी हूं। और आप पढ़कर भी बाबू ही बन पाए। दूसरा, आप जीवन के कभी मजे न ले सके, वह अलग। अब आप ही बताइए कि अक्लमंद आप हैं या मैं। आप जैसे ही लोगों को पढ़ा-लिखा पागल कहा जाता है।"
मैनेजर साहब के जवाब ने दुबे जी हिलाकर रख दिया। अब दुबे जी के दिमाग में एक ही सवाल गूंजा कि आखिर यह सब हुआ कैसे। दुबे जी ने हिम्मत जुटा का दूसरा सवाल पूछा।
' आखिर आप पास कैसे हो जाते थे? दूसरा, आप बैंक में मैनेजर कैसे बन गए?"
मैनेजर, 'दुबे जी, आपको अपनी पढ़ाई पर भरोसा ही नहीं गुमान भी था, इसलिए आप तो परीक्षा देकर बेफिक्र हो जाते थे, मगर हमारे साथ ऐसा नहीं होता था। हम परीक्षा से पहले और बाद में इस पर काम करते थे। मैं मैथ, अंग्रेजी और साइंस में कमजोर था। इसलिए परीक्षा से पहले इनमें पास होने का इंतजाम कर लेता था।"
'कैसा इंतजाम?" दुबे जी ने सवाल किया
मैनेजर,'अंग्रेजी की परीक्षा में मैं अपनी सामर्थ के अनुसार कॉपी में रुपए रखता था। साइंस की कॉपी में मैं मोबाइल नंबर लिखता था। इतना ही नहीं जब मेरे मोबाइल पर कॉपी जांचने वाला टीचर फोन करता था तो उसके फोन रखने के साथ ही उसके मोबाइल को मैं कम से कम एक हजार रुपए से रीचार्ज करवाता था। रीचार्ज मैसेज ने हमेशा काम किया है। हां, मैथ के टीचर कुछ अक्खड़, पर उतने ही दरियादिल होते हैं, इसलिए उसकी कॉपी में मैं धमकी देता था। मैं फेल हो गया तो मुझे रोजगार नहीं मिलेगा। और जब रोजगार नहीं मिलेगा तो मैं मजबूर होकर आतंकबादी बन जाऊंगा। यह धमकी कभी खाली नहीं गई। फिर चाहे हाईस्कूल, इंटर की परीक्षा रही हो या फिर कॉलेज के किसी भी साल की। ऐसे में परीक्षा में पास भी हो जाता और दिनभर लड़कियों के साथ मस्ती भी करता था।
'मगर, नौकरी के लिए तो ज्ञान की जरूरत होती है? " दुबे जी ने फिर सवाल किया।
'ज्ञान की कहीं जरूरत नहीं होती है। जरूरत होती है अक्ल की। दुबे जी आप अब भी ज्ञान और अक्ल में
अंतर नहीं समझे। आप ने ज्ञान अर्जित किया है, पर अक्ल नहीं। अक्ल के लिए पढ़ाई की जरूरत नहीं। अक्ल अनपढ़ में भी होती है। यही वजह है कि इस मामले में मैं तुमसे थोड़ा ज्यादा हूं। दुबे जी आप को अपने ज्ञान पर भरोसा था, इसलिए आप पढ़ाई के बाद अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी तलाशने लगे और मौका मिलते ही बाबू बन गए, मगर मुझे पता था कि मैंने डिग्री कैसे ली है। इसलिए मैंने अक्ल चलाई और पिता जी का पुश्तैनी मकान बेचकर रुपए जुटाए। जैसे ही सेटिंग हुई पांच लाख रुपए देकर बैंक में मैनेजर बन गया। अब अधिकारी हूं और आप जैसे पढ़े-लिखे मेरे यहां बाबू हैं तो मुझे काम में भी कोई तकलीफ नहीं होती। और हां, बिना किसी टेंशन के सारे सुख भोगते हुए जिंदगी जी रहा हूं। और एक आप हैं, जिसे काम के बोझ से ही फुर्सत नहीं मिलती। अपना और हम जैसे लोगों का काम ही इतना होता है।"
मैनेजर साहब की बात सुनने के बाद दुबे जी घर गए और काफी सोच- विचार करते रहे। आखिर तय किया कि उन्होंने जो गलती की है, उनके बच्चे यह गलती कतई नहीं करेंगे। वह बाबू नहीं मैनेजर बनेंगे और जिंदगी के सारे सुख भी भोगेंगे। अब आप क्या सोच रहे हैं। अपनी अक्ल लगाओ, ज्ञान पर मत जाओ।
Very Nice Article.
जवाब देंहटाएंthank;s Dear
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